पंचायती राज व्यवस्था ।। 73वां एंव 74 वां संविधान संशोधन अधिनियम

पंचायती राज व्यवस्था ।। 73वां एंव 74 वां संविधान संशोधन अधिनियम

 

                 -: स्थानीय स्वशासन :-


स्थानीय शासन का तात्पर्य - स्थानीय स्तर कि उन संस्थाओं से जो जनता द्वारा चुनी जाती है तथा जिन्हें राष्ट्रीय या प्रांतीय शासन के नियंत्रण में रहते हुए नागरिकों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिकार और दायित्व प्राप्त होते हैं । 

हमारे देश में स्थानीय स्वशासन के दो स्तर  विद्यमान है - जिनमें ग्रामीण स्थानीय शासन( पंचायतीराज ) तथा शहरी स्थानीय शासन ( नगर निकाय ) के नाम से जाना जाता है ।
 भारत में पंचायतीराज शासन प्रणाली प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है । चोल शासन में तो इसका आदर्श रूप देखा जा सकता है । इतिहासकार अलतेकर ने भारतीय गांवों को छोटे-छोटे गणराज्यों की संज्ञा दी है ।

 स्वतंत्र भारत में पंचायती राज का विकास :- 


 स्वतंत्र भारत में ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में सुधार के लिए सन 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम फोर्ड फाउंडेशन की मदद से लागू किया गया । सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण लोगों को सस्ते बीज एवं बेहतर तकनीकी सुविधाएं देने का प्रयत्न किया गया , परंतु इस कार्यक्रम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली । इसलिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सन 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया । इस समिति ने अपने प्रतिवेदन में पूरे देश में त्रिस्तरीय पंचायतीराज प्रणाली को लागू करने की सिफारिश कीं । 

 मेहता समिति की सिफारिश को लागू करने वाला पहला राज्य राजस्थान था । यहां 2 अक्टूबर 1959 को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गांव से इस व्यवस्था का उद्घाटन किया था । इस व्यवस्था को अपनाने वाला दूसरा राज्य आंध्रप्रदेश था । 

  1960 के दशक में पंचायती राज व्यवस्था को देश के विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाया गया किंतु राज्यों द्वारा गठित इन संस्थाओं में स्तरों की संख्या , उनका कार्यकाल एवं निर्वाचन पद्धति में समानता नहीं थी । जबकि राजस्थान में मेहता समिति के द्वारा सुझाए गए त्रिस्तरीय स्वरूप को अपनाया गया ।

पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु गठित समितियाँ :- 


1. बलवंत राय मेहता समिति (1957)- 


 पंचायतीराज की त्रिस्तरीय संस्थाओं की गठित की सिफारिश कीं ।

2.  अशोक मेहता समिति - 


 इस समिति का गठन अशोक मेहता की अध्यक्षता में जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1977 में किया गया था । 
 
जिसकी प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित है - 
 
● द्वि - स्तरीय पंचायती राज प्रणाली को अपनाया जाये जिनके नाम जिला परिषद एवं मंडल पंचायत होगी ।

● जिला कलेक्टर सहित सभी अधिकारी जिला परिषद के अधीन रखे जाएं ।

● संस्थाओं के चुनाव दलगत आधार पर करवाए जाएं । 

● पंचायतों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए तथा महिलाओं के एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए ।

● पंचायतीराज संस्थाओं के समर्थन में लोगों को प्रेरित करने वाले स्वयंसेविक संस्थाओं की भूमिका बढ़ाई जाए । 

 3. जी.वी.के.राव समिति (1985) - 

 योजना आयोग ने ग्रामीण विकास एवं गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की समीक्षा के लिए एक समिति की स्थापना की जिसकी प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित है - 

● ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय शक्तियाँ ।
● राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाए । ●पंचायतों का कार्यकाल 8 वर्ष और त्रिस्तरीय पंचायतों का गठन किया जाए ।

4. एल. एम. सिंघवी समिति (1986) - 


 राजीव गांधी की सरकार ने लोकतंत्र के विकास के लिए पंचायतों के पुनर्गठन नामक समिति की स्थापना की जिसकी अध्यक्षता लक्ष्मीमल सिंघवी ने की थी । 
सिफारिशें :- 
● पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जाए ।
● त्रिस्तरीय पंचायत का गठन किया जाए । ●पंचायतों के चुनाव एक निश्चित अवधि में संपन्न कराने के लिए एक निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की जाए । 

5.पी.के. थुंगन समिति (1986) - 

इस समिति ने भी पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश कीं ।

 73वां संविधान संशोधन अधिनियम - 1993 :-


 पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रीत्व  में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर पंचायतीराज के संवैधानिक मामले पर विचार किया और  सितंबर 1991 में 73वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया । अंततः यह विधेयक 1992 में संसद द्वारा पारित किया गया । जो 24 अप्रैल 1993 को प्रभावी हुआ । इस अधिनियम के लिए जो संयुक्त प्रवर समिति गठित की गई उसके अध्यक्ष राजस्थान से नाथूराम मिर्धा ( नागौर ) थे । 
24 अप्रैल को प्रतिवर्ष पंचायतीराज दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

अधिनियम की विशेषताएं :- 


1. त्रिस्तरीय प्रणाली - 


73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भारत के सभी राज्यों के लिए त्रिस्तरीय ढांचे का प्रावधान किया गया । ग्राम स्तर पर  ग्राम पंचायत , खंड या  ब्लॉक स्तर पर  पंचायत समिति एवं जिला स्तर - जिला परिषद का गठन किया गया । जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है इन्हें मध्यवर्ती ( पंचायत समिति ) के गठन के रूप में छूट दी गई । ग्राम पंचायत के मुखिया को सरपंच , पंचायत समिति के मुखिया को प्रधान एवं जिला परिषद की मुखिया को जिला प्रमुख कहा जाता है ।

2.  पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करना :-


 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है । इसके माध्यम से संविधान में एक नया भाग-9 " पंचायत शीर्षक " के साथ एवं एक नई 11वीं अनुसूची जोड़ दी गई है । इन संस्थाओं के क्षेत्राधिकार की शक्ति में वृद्धि करने के लिए 29 विषय प्रदान किए गए हैं । जो निम्नलिखित हैं - 

1. कृषि , जिसमें कृषि विस्तार सम्मिलित है ।2.भूमि विकास , भूमि सुधार लागू करना , भूमि संगठन व भूमि संरक्षण ।
3.लघु सिंचाई , जल प्रबंधन और नदियों के मध्य की भूमि का विकास । 
4. पशुधन , दुग्ध का व्यवसाय तथा मुर्गी पालन ।
5.  मछली उद्योग 
6.वनजीवन तथा वनों में कृषि
7. लघु वन उत्पादन 
8.लघु उद्योग जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल है ।
9. खादी , ग्राम एवं कुटीर उद्योग 
10. ग्रामीण विकास 
11.पेयजल 
12. इंधन व चारा 
13. सड़क , पुल , नदी तट , जल मार्ग तथा संसार के अन्य साधन । 
14. ग्रामीण विद्युत एवं विद्युत विभाजन ।
15. गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोत ।
16. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम ।
17.  शिक्षा - प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के विद्यालय ।
18.तकनीकी प्रशिक्षण व व्यवसायिक शिक्षा ।
19. प्रौढ़ व  अनौपचारिक शिक्षा 
20. पुस्तकालय एवं वाचनालय
21. सांस्कृतिक गतिविधियां 
22. मेले एवं बाजार 
23. स्वास्थ्य एवं इससे संबंधित संस्थाएं अस्पताल , प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि
24. परिवार कल्याण 
25. महिला एवं बाल विकास 
26. समाज कल्याण , विशेषकर मानसिक विमंदित व दिव्यांगों का कल्याण शामिल है ।
27.  सार्वजनिक वितरण प्रणाली
28. सार्वजनिक संपत्तियों पर देखरेख 
29 समाज के कमजोर वर्ग विशेषकर अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति के कल्याण व  समृद्धि के कार्य ।

3. निर्वाचन की पद्धति - 

 ग्राम स्तर पर वार्ड पंच एवं सरपंच , खंड या ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति सदस्य एवं जिला स्तर पर जिला परिषद सदस्यों का जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचन किया जाता है । साथ ही यह व्यवस्था की गई है कि खंड एवं जिला स्तर के अध्यक्ष जो कि हमारे राज्य में प्रधान है । वह जिला प्रमुख कहलाते हैं । उनका चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों में से किया जाएगा ।


4. आरक्षण की व्यवस्था :- 


यह अधिनियम पंचायती राज की संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई या 33% सीटों के आरक्षण की व्यवस्था करता है । यही अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान करता है । यह अधिनियम राज्य विधान मंडलों को इन संस्थाओं के पिछड़े वर्ग के लिए भी आरक्षण का अधिकार देता है । राजस्थान में 1999 से पिछड़े वर्गों के लिए 21% आरक्षण कर दिया गया है ।

5. पंचायतों का निश्चित कार्यकाल :- 


अधिनियम पंचायतीराज की सभी संस्थाओं के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित करता है । यदि पंचायतों का विघटन निर्धारित समय से पहले हो तो पंचायतों के विखण्डन के 6 माह भीतर  चुनाव होने चाहिए ।  यह चुनाव बचे हुए समय के लिए होगा । यदि पंचायतों का कार्यकाल 6 माह से कम बचा हो तो निर्धारित समय पर चुनाव पूरे 5 वर्ष के लिए होगा ।

6. राज्य निर्वाचन आयोग :- 


पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव प्रक्रिया के नियमित एवं निष्पक्ष संचालन हेतु एक निर्वाचन आयोग का गठन किया जाएगा । जो मतदाता सूचियां तैयार करने से लेकर पदाधिकारियों को निर्वाचित घोषित कर शपथ दिलाने तक की प्रक्रिया की निगरानी करेगा । राज्य का राज्यपाल राज्य निर्वाचन अधिकारी या राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करेगा इस की नियुक्ति की अवधि एवं सेवा शर्तें भी राज्यपाल द्वारा ही तय की जाती है । सेवाकाल में राज्य निर्वाचन अधिकारी को पद से हटाने का वही तरीका है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का है । 

7. राज्य वित्त आयोग का गठन -


 इस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष बाद वित आयोग के गठन का प्रावधान किया है । यह आयोग राज्यपाल को इन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति समीक्षा ,  आय के स्रोत , धन के वितरण , राज्य सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान कर एवं चुंगी कर के बारे में अनुशंसा करता है । 

8. लेखा परीक्षण :- 


 इस अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकार इन संस्थाओं के लेखों का समय-समय पर परीक्षण एवं जांच हेतु नियमों का निर्माण कर सकती है ।

9. चुनाव हेतु आयु संबंधी प्रावधान :- 


 सभी प्रकार की पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव लड़ने हेतु न्यूनतम आयु 21 वर्ष रखी गई है ।

        -: नगर स्थानीय स्वशासन ( नगर निकाय ) :-


 नगरों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने व उसे सक्रिय बनाने के लिए सन 1992 में संविधान में 74वां संशोधन पारित कर एक कानून बनाया गया जो 1 जून 1993 से लागू हुआ । इस 74 वें संविधान संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान में एक उप भाग भाग 9 (क) शामिल किया गया ।  इसी अधिनियम के तहत संविधान में 12वीं अनुसूची को जोड़ा गया । और इसमें नगर निकायों से संबंधित 18  विषयों का उल्लेख किया गया

 विषय :-  


1.नगरीय योजना ' जिसमें शहरी योजना भी है । 2. भू - उपयोग नियमन व भवन निर्माण । 3.आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनाएं ।
4. सड़कें एवं पूल ।
5. घरेलू उद्योग एवं वाणिज्य प्रयोजन के लिए जल प्रबंधन 
6. अग्निशमन सेवाएं 
7. नगरीय एवं वानिकी पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी तंत्र का प्रबंधन 
8. समाज के विशिष्ट आवश्यकता वाले कार्य के हितों का संरक्षण । 
9.सार्वजनिक स्वास्थ्य ,  स्वच्छता , सफाई एवं कचरा प्रबंधन 
10. गंदी बस्ती सुधार व उन्नयन कार्यक्रम 
11.शहरी निर्धनता निवारण कार्यक्रम
12. कॉजी गृहों का प्रबंधन 
13. सार्वजनिक उद्यान , खेल मैदान इत्यादि विकसित करना
14. सांस्कृतिक , शैक्षणिक एवं सौंदर्यपरक पहलुओं का विस्तार 
15. श्मशान ,कब्रिस्तान , विद्युत शवदाह घरों का प्रबंधन करना 
16. जन्म - मृत्यु पंजीयन 
17. वधशालाओं एंव चमड़ा उद्योग का क्रियान्वयन 
18. रोड लाइट , पार्किंग बस स्टॉप जैसी सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार शामिल है ।

 नगर निकायों के स्तर :- 


 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा तीन प्रकार के नगर निकायों -  नगरपालिका , नगर परिषद ,  नगर निकाय की व्यवस्था की गई है ।

1. नगर पंचायत / नगरपालिका :- 


जिन शहरों या कस्बों की जनसंख्या 10 हजार  से अधिक व  1 लाख तक होती है । वहाँ नगर पंचायतों का गठन किया जाता है ।  इन नगर पंचायतों को राजस्थान में नगरपालिका का नाम दिया गया है । इसका जो प्रमुख चेयरमैन या अध्यक्ष कहलाता है ।

2. नगर परिषद :- 


 सामान्यत 1 लाख से अधिक व 3 लाख तक की जनसंख्या वाले शहरों में नगर परिषद की स्थापना की जाती है । इसे कई वार्डों में बांट दिया जाता है । प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किया जाता है । नगर परिषद के प्रमुख को सभापति कहते हैं । 

3. नगर निगम :- 


तीन लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है । इसका प्रमुख मेयर या महापौर कहलाता है । इनका चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष निर्वाचन विधि से जो भी सरकार के कानून द्वारा निर्धारित की गई है उसी के द्वारा किया जाता है ।

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