जीन जेक्स रूसो का जीवन परिचय ( Biography of Jean-Jacques Rousseau )
इस लेख के बारे में निम्न बिन्दुओं पर लिखा गया है :
- जीन जेक्स रूसो का जीवन परिचय
- रूसो के महत्वपूर्ण कार्य अर्थात् प्रमुख रचनाएँ ( Important Works )
- रूसो की अध्ययन पद्धति ( Method Of Study )
- रूसो के प्रेरणा स्रोत या प्रभाव ( Sources Of Inspiration )
परिचय (Introduction)
राजदर्शन के इतिहास में रूसो को एक महान् तथा विवादास्पद दार्शनिक माना जाता है। एक ओर कॉण्ट (Kant ), बर्क (Burke) और लास्की (Laski) जैसे विद्वान उसको महान् दार्शनिक मानते हैं, जबकि मार्ले (Marley), वॉल्टेयर (Voltaire) जैसे लेखक उसके चिन्तन को महत्त्वहीन मानते हैं। इस मतभेद के बावजूद राजनीतिक दर्शन के इतिहास में रूसो का एक विशेष एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने सामाजिक समझौता सिद्धान्त को नई दिशा दी और राज्य के सावयविक सिद्धान्त (Organic Theory) और यूनानी आदर्शवाद (Idealism) को पुनः स्थापित किया। उनके प्रसिद्ध कथन 'मनुष्य स्वतन्त्र पैदा हुआ है, परन्तु वह हर जगह जंजीरों से जकड़ा हुआ है।' (Man is born free but everywhere is in chains) ने यूरोप के लोगों में स्वतन्त्रता के प्रति एक नई जाग पैदा की और फ्रांसीसी क्रान्ति (1789) का प्रेरणा-स्रोत बना। रूसो शायद प्रथम विचारक हैं जो सर्वजनवासिनी प्रभुसत्ता सिद्धान्त (Theory of Popular Sovereignty) तथा सरकार के संचालन में जनता की राजनीतिक सहभागिता (Political Participation) को महत्त्व दिया। इसे अतिरिक्त उनकी 'सामान्य इच्छा का सिद्धान्त' बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हुआ और ग्रीन जैसे विचारकों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना। इस सिद्धान्त में रूसो ने सत्ता (Authority) और स्वतन्त्रता (Liberty) के बीच सन्तुलन स्थापित करने का दावा किया है।
जीवन परिचय (Life History )
सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रवर्तक जीन जैक्स रूसो का जन्म 28 जून 1712 ई. में स्विटज़रलैण्ड के जेनेवा नामक नगर में हुआ। प्रसवकाल में ही उसकी माँ की म त्यु हो गई और उसका पिता आइजक रूसो धार्मिक अत्याचारों से तंग आकर फ्रांस छोड़कर चला गया था। रूसो का पिता अनुत्तरदायी, चरित्रहीन और अस्थिर स्वभाव का था, इसलिए उसने रूसो के पालन-पोषण पर विशेष ध्यान नहीं दिया। गरीबी और अभाव के कारण उसे औपचारिक शिक्षा से वंचित रहना पड़ा। उसके पिता की कुप्रवत्तियों का प्रभाव रूसो पर भी पड़ा। रूसो भी आवारागर्दी में समय व्यतीत करने लगा। उसके पिता द्वारा उसे अकेला जेनेवा में छोड़कर इटली जाने पर उसके चाचा ने उसकी देखभाल व पालन-पोषण करना शुरू किया। 1724 में रूसो ने स्कूल जाना छोड़ दिया और कानून के आफिस में किरानी की नौकरी की। परन्तु उसके स्वभाव के कारण उसने नौकरी छोड़ देनी पड़ी। 1726 में यह संगतराश की नौकरी करने लग गया। यहाँ उसने कठोर परिश्रम किया। उसने चोरी करने तथा झूठ बोलने की कला भी सीख ली। एक दिन उसे घर आने में देरी हो गई। मालिक के दण्ड के भय से वह जेनेवा छोड़कर फ्रांस भाग गया। उसकी अन्तरात्मा शून्य प्रायः थी। उसने जीवन में एक ही नियम का पालन किया- "जब कष्ट में पड़ो, भाग जाओ'। वह 1728 तक आवारा घुमक्कड़ का जीवन जीता रहा। इस दौरान उसने भीख मांगी, चोरी की, असत्य भाषण दिया । दूसरों से सहायता ली और धर्म भी बदला। यह रूसो का प्रथम जीवनकाल है।
रूसो के जीवन का दूसरा काल 1728 ई. से 1742 ई. तक है। इस दौरान वह फ्रांस के विभिन्न भागों में घूमता रहा। लोगों ने उसकी सहायता की। लेकिन रूसो ने कभी अहसान नहीं माना। उसने नए मित्र भी बनाए लेकिन उसकी झगड़ालू प्रव ति के कारण सभी ने उसका साथ छोड़ दिया। इस दौरान एक कैथोलिक पादरी ने उसे शिक्षा दिलाने का प्रयास किया, लेकिन वह उससे भी अधिक दिनों तक सम्बन्ध बनाए नहीं रह सका।
1742 ई. से 1749 ई. तक का समय उसके जीवन का तीसरा चरण है। इन 7 वर्षों की अवधि में रूसो ने अपने भावी जीवन का मार्ग प्रशस्त करता रहा। वह 1742 ई. में पेरिस चला गया। वह अपने नवीन संगीत स्वर का प्रदर्शन करना चाहता था लेकिन उसे मान्यता नहीं मिली। यहाँ उसका सम्पर्क मैडन डी ब्रोऊली नामक महिला से हुआ; जिसके प्रभाव से उसने वेनिस स्थित फ्रांसीसी दूतावास में एक नौकरी मिल गई। परन्तु उसके लड़ाकू स्वभाव के कारण उसे इस पद से भी हाथ धोना पड़ा। 1744 में रूसो वापिस पेरिस चला गया। 1745 में उसकी मुलाकात एक अनपढ़, बदसूरत, भोगविलासिनी धोबिन महिला थिरेसी वाशियेर से हुई। उसके 5 बच्चे हुए। पालन-पोषण में असमर्थ रहने पर रूसो ने उन सभी बच्चों को एक अनाथालय में छोड़ दिया। 1749 ई. तक उसका सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक जीवन पूर्णतः असफल रहा। इस समय तक समाज में उसका कोई स्थान नहीं था।
रूसो का चौथा जीवनकाल 1749 से 1762 ई. तक का है। 1749 ई. में एक ऐसी घटना हुई जिसने रूसो की जीवन की धारा बदल दी। उसे अन्धकार से निकालकर प्रकाश और प्रसिद्धि में लाकर पटक दिया गया। 1749 ई. में डिजान की अकादमी ने एक निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसका विषय था- "विज्ञान तथा कला की प्रगति ने नैतिकता को भ्रष्ट किया है। या शुद्ध ?" अपने जीवन के अनुभवों से उत्प्रेरित रूसो ने कहा कि इसने नैतिकता का हास किया है। उसने सिद्ध कर दिखाया कि मनुष्य स्वभाव से अच्छा है लेकिन उसे समाज की कृत्रिम संस्था भ्रष्ट बनाती है। यह निबन्ध लिखने पर रूसो को प्रथम पुरस्कार मिला। पेरिस में साहित्यिक क्षेत्र में रूसों को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ। अपने निबन्ध में रूसो ने लिखा कि- "विज्ञान • और कला ने मनुष्य का पतन किया है, मानव की चरित्रहीनता का उत्तरदायित्व आज के समाज पर है; मानव स्वभाव से अच्छा है, परन्तु हमारी सामाजिक संस्थाओं ने उसे दुष्ट बना दिया है।" उसने विवेकी मनुष्य को पतित पशु की संज्ञा दी। रूसो के इस निबन्ध ने विवेक-युग के कृत्रिम समाज में क्रान्ति ला दी। आलोचकों ने पत्रों द्वारा उसकी आलोचना शुरू कर दी। इस वाद-विवाद से रूसो की प्रतिभा और भी निखरने लगी। रूसो ने नए विश्वास के साथ जीवन की शुरुआत की। इस नए विश्वास ने उसके जीवन की धारा को पूर्णतः बदल दिया। 1754 ई. में रूसो ने एकाडेमी द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इसका विषय था- 'असमानता का उद्भव और आधार' (Discources on the Origin and Foundation of Inequality ) । इसमें उसने फ्रांस के तत्कालीन कृत्रिम जीवन पर गहरी चोट की। इसमें फ्रांस के राजतन्त्र की भी आलोचना की गई। वह 1754 में जेनेवा चला गया। उसने वहाँ प्रोटेस्टैण्ट धर्म स्वीकार किया और वहाँ उसे काफी सफलता मिली परन्तु वह वापिस पेरिस लौट आया। 1762 ई. में अपने धार्मिक विचारों के कारण उसे फ्रांस छोड़कर जर्मनी में शरण लेनी पड़ी। रूसो के जीवन का अन्तिम काल 1762 ई. से 1778 ई. तक है। इस दौरान उसने एक निर्वासित व्यक्ति की तरह जीवन व्यतीत किया। उसने धर्म-विरोधी विचारों के कारण जर्मनी के एक गाँव में 1765 ई. में उसकी हत्या का भी प्रयास किया गया। उसके बाद वह प्राण रक्षा हेतु 1766 ई. में इंगलैण्ड भाग गया, रूसो के जीवन का यह काल महान् विषाद का काल है। वहाँ उसकी भेंट बर्क तथा ह्यूम से हुई। उसकी ह्यूम से मित्रता जल्दी ही समाप्त हो गई। इस दौरान विभिन्न व्यक्तियों द्वारा प्रताड़ित, तिरस्कृत और परेशान रूसो 1767 ई. में फ्रांस लौट गया। जीवन का शेष समय उसने पेरिस में ही व्यतीत किया। फ्रांस की क्रांति से 11 वर्ष पूर्व 3 जुलाई 1778 ई. में 66 वर्ष की आयु में उसकी म त्यु हो गई।
महत्त्वपूर्ण कार्य (Important Works)
रूसो ने 1750 ई. से 1778 ई. तक निम्नलिखित रचनाएँ लिखी :-
1. डिसकोर्स आन दि मॉरल एफेक्ट्स ऑफ दि ऑर्ट्स एण्ड साइन्सेज (Discource on the Moral Effects of the Arts and Sciences, 1751)
यह पुस्तक निबन्ध रूप में डिजॉन की अकादमी द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता से प्रेरित होकर लिखी गई। इस पुस्तक में नैतिकता पर विज्ञान व कलाओं के विकास के प्रभाव का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक के कारण रूसो की आलोचना भी हुई। परन्तु इसने रूसो को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित बनाया। यह पुस्तक निबन्ध रूप में एक सर्वोत्तम रचना है।
2. डिसकोर्स आन दि आरिजन ऑफ इनइकवैलिटी (Discource on the Origin of Inequality, 1755 ) :
यह पुस्तक रूसो द्वारा द्वितीय निबन्ध प्रतियोगिता में 1754 में भाग लेने के बाद 1755 लिखी गई है। इस पुस्तक में निबन्ध रूप में लिखते हुए रूसो ने बताया कि समाज में विषमता कैसे पैदा हुई।
3. पोलिटिकल इकॉनामी (Political Economy, 1755)
यह पुस्तक निबन्ध रूप में दिदरो द्वारा संपादित विश्वकोश में प्रकाशित हुए।
4. दें नॉवेल हेलॉयज (The Nouvelle Heloise, 1761) यह पुस्तक उपन्यास रूप में लिखी गई ।
5. सोशल कांट्रेक्ट (Social Contract, 1762)
यह पुस्तक राजनीतिक विज्ञान पर लिखी गई सर्वोत्तम रचना है। इसमें रूसो ने सामाजिक समझौता की विस्तारपूर्वक विवेचना की है।
6. दॉ इमाइल (The Emile, 1762)
यह पुस्तक शिक्षा से सम्बन्धित विषय पर लिखी गई है। इसके प्रकाशन से उसे महान् कष्ट झेलना पड़ा। इस पुस्तक में रूसो ने इस बात पर जोर दिया कि बाल शिक्षा को पादरियों के चंगुल से मुक्त करना चाहिए एवं किशोरावस्था तक किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए। इन धर्म विरोधी विचारों के कारण फ्रांस की संसद ने उसे बन्दी बनाने का आदेश दे दिया और उसकी मात भूमि जेनेवा की परिषद् ने पुस्तक को जला डालने की आज्ञा दी।
7. कन्फेशन्स (Confessons):
रूसो ने इसे अपनी अर्ध-विक्षिप्तावस्था में लिखा । इसके अतिरिक्त रूसो ने डायलॉग्स (Dialogues ) तथा अपने रिवरीज (Reveries) लिखे और पौलैण्ड एवं कोसिका के लिए संविधानों का प्रणयन किया।
अध्ययन पद्धति (Method of Study )
रूसो की अध्ययन पद्धति हॉब्स की अध्ययन पद्धति से काफी मेल खाती है। दोनों की अध्ययन पद्धति अनुभूतिमूलक और मनोविज्ञान युक्त थी। उसके विचार संवेग और कल्पना पर आधारित हैं। वह एक यथार्थवादी दार्शनिक चिन्तक नहीं, अपितु एक अलौकिक प्रतिभावान व्यक्ति है। उसमें न तो मांटेस्क्यू का पांडित्य है और न ही वाल्टेयर का तर्क। रूसो ने राजनीतिक दर्शन को विद्वानों के शांत, एकांत व आरामदेह अध्ययन कक्ष से उठाकर साधारण जनता की गलियों में पटक दिया है। उसकी आवाज कुलीन व पादरी वर्ग का प्रतिनिधित्व न करके आम जनता का प्रतिनिधित्व करती है। रूसो प्रथम चिन्तक है जिसने अपनी कृतियों द्वारा किसानों, मजदूरों एवं निम्न मध्यवर्ग के असंख्य लोगों की मूक संवेदनाओं और भावनाओं को वाणी दी है। रूसो की अध्ययन पद्धति हॉब्स की तरह इतिहास का सहारा लेकर अनुभूतिमूलक पद्धति है। मैकियावेल्लि, बोदाँ, हॉब्स, लॉक, ग्रेशियस, सिडनी, मान्टेस्क्यू, वाल्टेयर आदि विचारों का उसकी पद्धति पर प्रभाव पड़ा। वह यूनानी साहित्य तथा काल्विन के धार्मिक विचारों से भी प्रभावित हुआ। अतः उसकी पद्धति भावात्मक, पद्यात्मक, कल्पनात्मक संवेगपूर्ण, रोमांसवादी तथा अंतप्रेरणीय है।
प्रेरणा-स्रोत (Sources of Inspiration)
किसी भी चिन्तक के ऊपर तत्कालीन परिस्थितियाँ अवश्य ही प्रभाव डालती हैं। रूसो के ऊपर भी समकालीन परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा। ये परिस्थतियाँ निम्नलिखित हैं :-
1. पूर्ववर्ती विचारकों का प्रभाव ( Influence of Predecessors)
रूसो ने प्लेटो, लॉक, हॉब्स तथा ग्रोशियस का काफी अध्ययन किया। प्लेटो ने उसे प्रारम्भ में तथा ग्रेशियस ने उसे अन्त में प्रभावित किया। प्लेटो से उसने जनतन्त्र को पसन्द करना तथा उसे आदर्शवाद की परिभाषा में रखना सीखा। राज्य द्वारा व्यक्ति को आत्मसात् करने के विचार पर वह प्लेटो से ही प्रभावित हुआ। उसके निबन्ध 'असमानता के उद्भव पर लॉक के व्यक्तिवाद का प्रभाव है। लॉक का जनसहमति का सिद्धान्त रूसो के सामाजिक समझौते का आधार बना। रूसो के समाज व व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में विचार प्लेटो व अरस्तू के समान ही हैं। रूसो की 'सोशल कांट्रेक्ट' पुस्तक पर हॉब्स और लॉक का प्रभाव है। हॉब्स के प्रभाव के कारण वह निरंकुशवाद का समर्थन करता परन्तु लॉक के प्रभाव के कारण वह लोकतन्त्र का समर्थन करता। इसके अतिरिक्त रूसो पर माण्टेस्क्यू, ह्यूम तथा बर्फ का भी प्रभाव पड़ा।
2. तत्कालीन राजनीतिक वातावरण ( Contemporary Political Situation) :
उस समय जनता निरंकुश शासक, सामन्तशाही व चर्च के अत्याचारों से परेशान थी। रूसो का लक्ष्य जनता को अत्याचारों से मुक्ति दिलाना था। अतः उसने अपने साहित्य में अत्याचारों से मुक्ति दिलानेका प्रयास किया है। 'Emile' नामक ग्रन्थ में चर्च की निन्दा की गई है। इसी प्रकार उसने अपने 1754 के निबन्ध में सामाजिक विषमता की समस्या पर प्रकाश डाला है।
3. रूसो को जेनेवा के वातावरण ने भी प्रभावित किया है, इसलिए उसके विचार स्थानिक रहे। वह छोटे नगर राज्यों के पक्ष में था ।
4. निबन्ध प्रतियोगिता का प्रभाव ( Influence of Essay Competition) :
1749 ई. में रूसो ने डिजॉन एकेडेमी द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। इस प्रतियोगिता में उसे प्रथम पुरस्कार मिला। यहीं से उसके नए जीवन की शुरुआत हुई। रूसो की प्रतिभा निखरने लगी। यह रूसो के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसने उसके जीवन को एक लेखक बनने की ओर प्रेरित किया। उसका सम्पूर्ण राजनीतिक दर्शन उसकी पहली घटना से अवश्य ही प्रभावित हुआ है।