न्यायपालिका ; सर्वोच्च न्यायालय का गठन कार्य एवं न्यायिक पुनरावलोकन
न्यायपालिका -
भारत में न्यायपालिका का एकीकृत रूप है अर्थात संघ और राज्य दोनों के लिए एक ही न्यायपालिका है जबकि अमेरिका में संघ राज्यों के लिए अलग-अलग न्यायालय है |
भारतीय संविधान में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका का प्रावधान किया गया है भारत में सन 1950 से ही न्यायपालिका ने संविधान की व्याख्या और सुरक्षा करने तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है |

भारत में न्यायपालिका की संरचना
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सर्वोच्च न्यायालय / उच्चतम न्यायालय / सुप्रीम कोर्ट
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उच्च न्यायालय
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जिला न्यायालय / सेशन कोर्ट
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अधीनस्थ न्यायालय प्रारंभिक न्यायालय
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न्यायपालिका की भूमिका या स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका की आवश्यकता -
न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका यह है कि यह कानून के शासन या विधि के शासन की रक्षा और कानून की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करें | न्यायपालिका व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करती है तथा विवादों को कानूनों के अनुसार हल करती है और यह सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र की जगह किसी एक व्यक्ति या समूह की तानाशाही ने ले लिया जाये | उपयुक्त कार्यों के लिए जरूरी है कि न्यायपालिका सभी प्रकार के राजनीतिक दबावों से मुक्त हो |
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने से संबंधित प्रावधान-
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति -
न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में विधायक का को अलग रखा गया है , इससे तात्पर्य है ऐसी भावना से है कि न्यायाधीश दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने न्यायिक कार्यों को संपन्न कर सके |
सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है लेकिन राष्ट्रपति को इस मामले में असीमित शक्तियां प्राप्त नहीं है | सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करेंगे जिनसे वह आवश्यक समझे | सामान्यत यह परंपरा रही है कि उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाता है |
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परंतु इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान पहली बार कनिष्ठ न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया |
सन 1973 में शैलट ग्रोवर और न्यायमूर्ति हेगड़े की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर ए.एन. रे. को उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया तथा सन् 1977 में न्यायमूर्ति बी आर कृष्णा अय्यर की वरिष्ठता का उल्लंघन कर एम.एच् .बेग. को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया |
इन घटनाओं के पश्चात यह तय किया गया कि उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालय की सलाह से की जाएगी |
प्रारंभ में न्यायपालिका का विचार था कि मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका पूरी तरह सलाहकार की है लेकिन 6 अक्टूबर 1993 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की एक खंडपीठ में निर्णय दिया जिससे न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित कॉलेजियम प्रणाली की उत्पत्ति हुई |
कॉलेजियम प्रणाली -
इस प्रणाली के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व सर्वोच्च न्यायालय के अन्य चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की सलाह से कुछ नाम प्रस्तावित करेगा और इसी में से राष्ट्रपति नियुक्तियां करेगा इससे ही कॉलेजियम प्रणाली कहते हैं | इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्तियों की सिफारिश के संबंध में सामूहिकता का सिद्धांत स्थापित किया क्योंकि इस तरह न्यायपालिका की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय और मंत्रिपरिषद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं |
वर्तमान सरकार न्यायाधीशों की जवाबदेहिता और अधिक पारदर्शिता की व्यवस्था के अंतर्गत न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नई व्यवस्था लाना चाहती थी ताकि नियुक्ति में भाई भतीजावाद की प्रवृत्ति को रोका जा सके लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन के 99 संविधान संशोधन 2014 द्वारा लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)अधिनियम को असंवैधानिक करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया गया और उच्च न्यायालय पालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया |
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग
121 वे संविधान संशोधन विधेयक या 99 संविधान संशोधन अधिनियम 2014 के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु केंद्र की तत्कालीन सरकार ने 16 सदस्य आयोग का गठन किया इसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के नाम से जाना जाता है |
✒ भारत के मुख्य न्यायाधीश इस आयोग के अध्यक्ष होंगे |
✒ सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश इसके सदस्य होंगे |
✒ भारत के कानून मंत्री या विधि मंत्री इस के पदेन सदस्य होंगे |
✒ दो प्रबुद्ध नागरिक इसके सदस्य होंगे जिसका चयन प्रधानमंत्री मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता वाली 3 सदस्य समिति करेगी|
✒ दो प्रबुद्ध नागरिकों में से एक सदस्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अन्य पिछड़ा या अलग संख्या महिला वर्ग से होगा |
2. कार्यकाल की निश्चितता -
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक निर्धारित किया गया है तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का कार्यकाल 62 वर्ष की आयु तक निर्धारित किया गया है | अतं ये सभीसेवानिवृत्ति की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं अगर न्यायाधीशों के विरोध सिद्ध कदाचार या कार्य की असमर्थता का प्रस्ताव पारित हो जाता है तो इनको एक विशेष प्रक्रिया द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है | इस प्रकार का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों के प्रथक प्रथक विशेष बहुमत एवं उपस्थित सदस्य संख्या में मतदान में भाग लेने वाली सदस्य संख्या के बहुमत से पारित होना चाहिए |
3. पर्याप्त वेतन एवं भत्ते -
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पर्याप्त वेतन व् भते दिए जाते हैं इनका वेतन पूर्णता कर मुक्त होता है एवं कार्यकाल के दौरान इनके वेतन भत्तों में किसी भी प्रकार की कटौती का निषेध है |
4. न्यायाधीशों के आचरण संबंधी चर्चा पर रोक -
सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण संबंधी सार्वजनिक चर्चा पर प्रतिबंध होता है अतः न्यायाधीश ने अपने न्यायिक कार्यों को पूर्ण निष्पक्षता के साथ संपन्न कर सके |
5. सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर रोक-
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद उनके वकालत करने पर रोक लगा दी जाती |
न्यायपालिका की सरचना या बनावट
भारत में न्यायपालिका की संरचना पिरामिड की तरह है इसमें सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय फिर उच्च न्यायालय फिर जिला न्यायालय सबसे नीचे अधीनस्थ या प्रारंभिक न्यायालय हैं |

1. सर्वोच्च न्यायालय /उच्चतम न्यायालय / सुप्रीम कोर्ट
भारत का सर्वोच्च न्यायालय वास्तव में विश्व के सबसे शक्तिशाली न्यायालयों में से एक है इसके फैसले सभी अदालतों या न्यायालयों को मानने होते हैं यह उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का तबादला यहां स्थानांतरण कर सकता है |
✒ यह किसी भी न्यायालय का मुकदमा अपने पास मंगवा सकता है |
✒ यह किसी एक उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे को दूसरे उच्च न्यायालय में भिजवा सकता है |
2. उच्च न्यायालय हाई कोर्ट -
✒ यह निचली अदालतों के फैसले पर की गई अपील की सुनवाई कर सकता है |
✒ यह मौलिक अधिकारों को बहाल करने के लिए रिट या लेख जारी करते हैं |
✒ यह राज्य के क्षेत्राधिकार में आने वाले मुकदमों का निपटारा कर सकता |
✒ यह अपने अधीनस्थ न्यायालय का पर्यवेक्षण जांच एवं नियंत्रण करता है |
3. जिला न्यायालय / सेशन कोर्ट-
✒ यह जिले में दायर दर्ज मुकदमे की सुनवाई करता है |
✒ यह निचली अदालतों के फैसले पर की गई अपील की सुनवाई करता है |
✒ यह गंभीर किस्म के आपराधिक मामलों पर फैसला देता है |
4. अधीनस्थ / प्रारंभिक न्यायालय -
✒ यह फौजदारी और दीवानी किस्म के मुद्दों पर विचार करता है |
सर्वोच्च न्यायालय का गठन
न्यायपालिका की उच्चतम संस्था को सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट कहते हैं |यह न्यायालय नई दिल्ली में स्थित है | इस न्यायालय से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख संविधान के भाग 5 में अनुच्छेद 124 से 147 तक के किया गया है |
वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 30 अन्य न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित है संसद विधि के माध्यम से न्यायाधीशों की संख्या में कमी या वृद्धि कर सकती है ।
न्यायाधीशों की योग्यताएं -
✒ वह भारत का नागरिक हों |
✒ वे कम से कम 5 वर्ष तक किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की पद पर रह चुका हों |
✒ या वे 10 वर्ष तक अधिवक्ता के पद पर कार्य कर चुका हों |
✒ वे राष्ट्रपति की नजर में कानून का अच्छा ज्ञाता हो |
सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं कार्य एवं शक्तियां
1. प्रारंभिक मौलिक क्षेत्राधिकार -
सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक किया मौलिक क्षेत्राधिकार का तात्पर्य उन मुकदमों से इनकी सुनवाई करने का अधिकार केवल उच्चतम न्यायालय को है |
जैसे-
✒ संघ सरकार व राज्य सरकारों के मध्य उत्पन्न हुए विवाद
✒ दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य उत्पन्न हुए
✒ मौलिक अधिकारों से संबंधित विवादों की सुनवाई करने का अधिकार
2.समवर्ती क्षेत्राधिकार -
इस क्षेत्र अधिकार के अंतर्गत मौलिक अधिकारों से जुड़े हुए विवादों की सुनवाई की जाती है मौलिक अधिकारों से संबंधित उत्पन्न विवादों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को भी प्रदान किया गया है |
मौलिक अधिकारों की रक्षा न्यायालय के द्वारा पांच प्रकार के लेख जारी किए जाते हैं इन्हे रीट की संज्ञा दी जाती है|
बंदी प्रत्यक्षीकरण , परमादेश , प्रतिषेध ,उत्प्रेषण एंव अधिकार पृच्छा
3. अपीलीय क्षेत्राधिकार-
सर्वोच्च न्यायालय अंतिम अपीलीय न्यायालय क्योंकि इस न्यायालय में सभी प्रकार के नियमों के विरुद्ध अपील की जा सकती है तथा इस न्यायालय के द्वारा सुनाए गए फैसले अंतिम रूप से मान्य होंगे |
4. अभिलेख न्यायालय अनुच्छेद 129 -
संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय की संज्ञा दी गई है क्योंकि यह न्यायालय सभी न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुन सकता है इसके द्वारा सुनाए गए फैसले सभी जगह साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाते हैं और इस न्यायालय के आदेशों को नहीं मानने पर यह हम उनके विरोध न्यायिक अवमानना की कार्रवाई भी कर सकता है|
5. परामर्श दात्री -
अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उल्लेख किया गया कि उपराष्ट्रपति लोकगीत या सार्वजनिक महत्व के विषयों एवं संविधान की व्याख्या से जुड़े हुए विषयों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श या राय मांग सकता है
6. निर्णय या आदेश की व्याख्या संबंधी क्षेत्र अधिकार -
सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा सुनाएगी निर्णयों के मामले में अगर उसे सच है यहां शंका उत्पन्न हो जाए तो वह अपने द्वारा सुनाए गए फैसले पर पुनर्विचार कर सकता है |
✒ न्यायिक पुनरावलोकन अनुच्छेद 137 ✒
अनुच्छेद 137 के अनुसार न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधायिका द्वारा निर्मित कानून और न्यायपालिका के द्वारा जारी किए गए ऐसे आदेशों की को अवैध या सुनने घोषित किया जा सकता है जो संवैधानिक प्रावधानों की प्रतिकूल हो |
✒ न्यायिक सक्रियता ✒
जब न्यायपालिका व्यवस्थापिका कार्यपालिका द्वारा जारी किए जा रहे वेद अधिकारियों के विरुद्ध दिशा निर्देश जारी करती है तो ऐसी कार्रवाई को न्यायिक सक्रियता कहते हैं अथवा किसी के द्वारा मुकदमा करने पर उसे मुद्दे पर विचार करने के बजाय न्यायपालिका ने अखबार में छपी खबरों एवं डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बनाकर उन पर विचार करना शुरू कर दिया इस तरह न्यायपालिका की यह नई भूमिका न्यायिक सक्रियता के रूप में लोकप्रिय हुई |
न्यायिक सक्रियता के दो प्रमुख साधन -
जनहित याचिका एवं सामाजिक व्यवहार याचिका
✒जनहित याचिका -
जब आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के लिए स्वयंसेवी संगठन सामाजिक कार्यकर्ता तथा कोई भी संपन्न व्यक्ति या समूह न्यायालय में जो याचिका देता है उसे जनहित याचिका कहते हैं अथवा कानून की सामान्य प्रक्रिया में कोई व्यक्ति तथा अदालत जा सकता है जब उसका कोई व्यक्तिगत रुखसार हुआ है इसका मतलब यह है कि अपने अधिकारों का उल्लंघन या किसी विवाद में फसने पर कोई व्यक्ति न्याय पाने के लिए या इंसाफ पाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है लेकिन 1979 ईस्वी में न्यायालय ने अपने अधिकारों के दायरे को बढ़ाते हुए एक ऐसे मुकदमे की सुनवाई करने का निर्णय लिया जिसमें पीड़ित लोग नहीं बल्कि उनकी ओर से मुकदमा दूसरों ने दाखिल किया था क्योंकि इसमें जनहित याचिका से संबंधित एक मुद्दे पर विचार होता है ऐसे ही एक अन्य मुद्दे पर न्यायपालिका ने स्वयं प्रसंग लेते हुए अखबारों में छपी खबरों एवं डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बनाकर उस पर विचार करना भी जनहित याचिका के नाम से जाना जाता है |
न्यायपालिका और अधिकार
✒ न्यायपालिका को व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है संविधान ऐसी दो विधियों का उल्लेख करता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय नागरिक अधिकारों की रक्षा कर सकें
✒ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने रिट एवं जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रतिषेध परमादेश उत्तरण एवं अधिकार पृच्छा जारी कर के मौलिक अधिकारों को फिर से स्थापित कर सकता है तथा अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को भी ऐसे रेट है यहां लेख जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है
✒ अनुच्छेद 13 के तहत सर्वोच्च न्यायालय किसी कानून को गैर संवैधानिक घोषित कर उसे लागू होने से रोक सकता है
✒ यह दोनों प्रावधान एक और सर्वोच्च न्यायालय नागरिक अधिकारों के संरक्षक तथा दूसरी और संविधान की व्याख्या कार के रूप में स्थापित करते हैं|