भारत में मतदान व्यवहार
(Voting Behaviour in India)
लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली में चुनावों के दौरान मतदाताओं की विशिष्ट भूमिका होती है। मतदान एक और सहमति तक पहुंचने का तरीका है तो दूसरी ओर यह समाज के विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष को नापने का ढंग है। इस कारण से विश्व के विभिन्न देशों में इसने बड़ी संख्या में शोधकर्ताओं को आकर्षित किया है। मतदान व्यवहार के अध्ययन का आरम्भ सन् 1913 में फांश में शुरू हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रथम विश्व युद्ध के बाद तथा इंग्लैण्ड में द्वितीय विश्व युद्ध बाद इसका अध्ययन आरम्भ हुआ। भारत में भी दूसरे आम चुनावों के बाद मतदान व्यवहार का अध्ययन आरंभ हुआ। के
मतदान व्यवहार से अभिप्राय है कि आज के मतदाता अपना मत देते समय किन-किन तत्वों से प्रभावित होते है। यह सारे तत्व सभी समयों तथा स्थानों पर एक समान नहीं होते। विभिन्न परिस्थितियों में तथा विभिन्न स्थानों पर मतदान व्यवहार अलग अलग होता है। आज मतदान व्यवहार के अध्ययन का क्षेत्र काफी व्यापक हो गया है। इसके अन्तर्गत हम केवल मतदान करने वालों के व्यवहार का ही अध्ययन नहीं करते वरन् उन लोगों के व्यवहार का भी अध्ययन करते हैं जो मतदान नहीं करते। इसके अन्तर्गत चुनावों से पहले तथा चुनावों के बाद विभिन्न क्षेत्रों के मतदाताओ से सम्पर्क स्थापित करके और उनसे विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछकर मतदान व्यवहार के सम्बन्ध में महत्वपूण्र निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न किया जाता है। इस प्रक्रिया में समय, धन और श्रम तीनों की आवश्यकता पड़ती है।
भारत में मतदान व्यवहार को अनेक तत्वों ने प्रभावित किया हैं, जिनका वर्णन नीचे किया जा रहा है, लेकिन मतदान के बारे में एक बात निश्चित है कि यह जनसंख्यात्मक लक्षणों और सामाजिक व आर्थिक तत्वों के अनुसार बदलता रहता है।
(1) जातिवादः
जातिवाद मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख तत्व रहा है। वैसे तो इस तत्व का प्रभाव भारतीय संघ के सभी राज्यों में है, लेकिन फिर भी बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और केरल में इस तत्व का प्रभाव अधिक है। इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण और आशावर्द्धक तथा यह है कि यदि चुनाव के अन्तर्गत कोई महत्वपूर्ण प्रश्न या विशेष समस्या सामने हो, तो फिर जाति के तत्व का प्रभाव बहुत कम हो जाता है। 1971 के लोकसभा चुनाव, 1972 के विधानसभा चुनाव, 1977 के लोकसभा चुनावों और दिसम्बर 1984 व नवम्बर 1989 के लोकसभा चुनावों में यह बात देखी गयी है।
आर्थिक स्थिति :
व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है। साधारणतया यदि व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति अच्छी हो तो मतदाता शासक दल के पक्ष में मतदान करते हैं, अन्यथा शासक दल के विरूद्ध । इसी कारण शासक दल की यह चेष्टा रहती है कि चुनाव 'अच्छी कषि' के वर्ष में हों। 1980 के लोकसभा चुनाव मे जनता पार्टी की पराजय का एक कारण जनता की आर्थिक कठिनाइयां भी थी, जिसके लिए उन्होंने जनता पार्टी और जनता 'एस' को उत्तरदायी माना ।
तत्व :
मतदाता को प्रभावित करने वाला एक बहुत अधिक तत्व नेत त्व है और इस तत्व के आधार पर भारत के अब तक चुनाव परिणामों की व्याख्या की जा सकती है। प्रथम तीन आम चुनावों में काग्रेस की विजय का कारण प० नेहरू का व्यक्तिगत था, चौथे आम चुनाव में काग्रेस के पास प० नेहरू जैसा कोई व्यक्तित्व नहीं था। 1971 तथा 1972 के चुनावों में श्रीमति गांधी के नेत त्व के आधार पर विजय प्राप्त की जा सकी ओर 1977 में कांग्रेस की भारी पराजय का कारण यह था कि श्रीमति गांधी के व्यक्तित्व की छवि बहुत अधिक धूमिल हो गई थी। नेत त्व का प्रश्न चुनाव में कितना अधिक महत्वपूर्ण होता है, यह बात 1980 के लोकसभा चुनावों से पूर्णतया स्पष्ट हो गयी है। दिसम्बर 1984 के लोकसभा चुनावों में भी जनता ने नेत त्व के प्रश्न पर ही मतदान किया। 1989 में कांग्रेस की पराजय का कारण बोफॉस सौदे में दलाली को लेकर राजीव गांधी की छवि का धूमिल होना था। फरवरी 1998 तथा 1999 के चुनावों में भाजपा की सफलता का राज श्री अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व ही प्रमुख तत्व माना जाता है।
राजनीतिक स्थिरता और केन्द्र में सुद ढ़ सरकार की आकांक्षा
भारतीय मतदाता सामान्यता राजनीतिक स्थिरता और केन्द्र में सुद ढ़ शासन चाहते है और 1977 के पूर्व तक उनके द्वारा कांग्रेस को समर्थन प्रदान किये जाने का एक प्रमुख कारण रहा है। 1977 में जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि जनता पार्टी स्थायी शासन देने में समर्थ है तभी उनके द्वारा इस दल को सता प्रदान की गयी। 1980 तथा 1984 के लोकसभा चुनावों मे जनता द्वारा इन्दिरा कांग्रेस का भारी बहुमत प्रदान किये जाने का यह सबसे प्रमुख कारण था ।
दलों की विचार धारा, कार्यक्रम व नीति
भारतीय मतदाता यद्यपि बहुत अधिक नहीं, लेकिन कुछ सीमा तक दलों की विचारधारा, कार्यक्रम और नीति से भी प्रभावित होते है। इस सम्बन्ध मे उनके द्वारा निषेधात्मक विचारधारा और कार्यक्रम के स्थान पर सकारात्मक विचारधारा और कार्यक्रम को पसन्द किया जाता है। 1971 के चुनाव में जनता ने 'गरीबी हटाओ' के कार्यक्रम को अपना मत दिया था और 1979 में उन्होंने महसूस किया कि जनता पार्टी अन्य बातों के साथ-साथ सकारात्मक आर्थिक कार्यक्रम रख रही है।
क्षेत्रवाद की प्रवति :
भारत के कुछ क्षेत्रों में क्षेत्रवाद की प्रव ति प्रबल है। पंजाब में अकाली दल 1967 से 1971 तक, तमिलनाडु में डी०एम०के० और 1977 के चुनावों में अन्ना डी०एम०के० की सफलता इस क्षेत्रवादी प्रव ति का परिचय देती है। प० बंगाल और केरल, आदि राज्यों में कुछ क्षेत्रीय दलों की सफलता का कारण भी यही है।
भाषाई स्थिति :
भाषा का तत्व भी भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करता रहा है। 1967 और 1971 के चुनावों में डी०एम० के० ने हिन्दी विरोध के नाम पर समर्थन प्राप्त किया और 1977 के लोकसभा चुनावों में दक्षिण भारत में जनता पार्टी की असफलता का एक कारण यह रहा है कि दक्षिण भारत के व्यक्तिय अब तक जनता पार्टी की भाषा नीति के सम्बन्ध में पूर्णतया आश्वस्त नहीं थे।
युद्ध में सफलता-असफलता :
युद्ध में सफलता-असफलता भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है। 1962 की असफलता का 1967 में कांग्रेस के भाग्य पर विपरीत प्रभाव पड़ा और 1971 के युद्ध में प्राप्त सफलता ने 1972 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सफलता को बहुत सरल कर दिया।
सामन्तशाही व्यवस्था का प्रभाव
मतदान व्यवहार पर सामन्तशाही व्यवस्था का प्रभाव भी देखा गया, लेकिन यह प्रभाव क्रमशः कम होता जा रहा है। स्वतन्त्रता आन्दोलन में कांग्रेस और अन्य दलों की भूमिका :
स्वतन्तत्रा प्राप्ति के बाद प्रथम तीन चुनावों में इस तत्व की भूमिका प्रमुख रही है। लेकिन यह क्रमशः कम होती गयी
और ऐसा होना नितान्त स्वाभाविक भी है।
आर्थिक साधन :
आर्थिक साधन भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं लेकिन 1977 से चुनावों ने स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक साधन चुनाव को निर्णायक रूप में प्रभावित नहीं कर पाते। 1984 के लोकसभा चुनावों तथा 1985 के विधानसभा चुनावों में आर्थिक साधनों की भूमिका का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है।
दल अथवा प्रत्याशी की जीत की संभावना :
कौन-सा दल या कौन-सा उम्मीद्वार चुनाव जीतने की स्थिति में है। यह मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। यदि जनता को ऐसा लगे कि अमुक उम्मीदवार या दल चुनाव जीतने की स्थिति में है तो अधिकतर मतदाता उसी के पक्ष में अपने मत का प्रयोग करते है ताकि उनका मत व्यर्थ न जायें। ऐसा 1977 के चुनावों मे हुआ ।
तत्कालीन परिस्थितियाँ :
चुनाव के समय जो महत्वपूर्ण समस्याएं अथवा मुद्दे मौजूद होते हैं, वे भी मतदान व्यवहार को बहुत प्रभावित करते है। उदाहरण के तौर पर सन् 1977 के लोकसभा चुनाव के समय संकटकालीन स्थिति को घोषणा एक ऐसा मुद्दा थी, जिसका मतदान पर बहुत प्रभाव पड़ा। इसी प्रकार सन् 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या तथा 1991 में राजीव गांधी की हत्या ने पूरे देश में मतदान व्यवहार को प्रभावित किया।
संक्षेप में कह सकते है कि भारत में मतदान व्यवहार को बहुत से तत्व प्रभावित करते है। अभी तक यह समझा जाता रहा है कि भारतीय जनता अशिक्षित, निर्धन और अनेक कारणों से अपने मताधिकार का प्रयोग सही रूप से नहीं कर पाती है, लेकिन ऐसा सोचना उचित नहीं है। आज भारतीय मतदाता जागरूक है। वह अशिक्षित व निर्धन होने के बावजूद भी अपने मत का सही रूप से प्रयोग करना जानती है। भारतीय जनता ने इस बात का परिचय पिछले चुनावों में दिया है। कोई भी दल जनात की स्वीक ति के बिना सत्ता में नहीं रह सकता। 1991 के चुनावों में बोफोर्स का मामला छाया रहा और कांग्रेस के विरूद्ध मतदान हुआ, वह बात अलग कि कांग्रेस ने ही सरकार का गठन किया। 1996, 1998 तथा 1999 में हुए लोकसभा व विधानसभा चुनावों में भी यह सिद्ध कर दिया कि मतदाता का रूझान क्षेत्री दलों की ओर है।