जीन जैक्स रूसो की मानव प्रकृति की अवधारणा संबंधी विचार ( Jean-Jacques Rousseau's Concept of Human Nature )
मानव प्रकृति की अवधारणा (Conception of Human Nature)
रूसो ने अपने मानव स्वभाव सम्बन्धी विचार अपनी पुस्तक 'सामाजिक समझौता' (Social Contract), 'दि इमाईल' (Emile) तथा 'व्यक्तियों के बीच असमानता के उद्भव एवं आधार पर निबन्ध' में प्रकट किए हैं। मानव प्रकृति के मूलतः अच्छा होने के बारे में रूसो प्लेटो से सहमत हैं। जहाँ हॉब्स मनुष्य को पूर्णतः दुर्गुणी मानता है और लॉक मनुष्य को पूर्णतः सद्गुणी मानता है, वहीं रूसो मनुष्य को दुर्गुणों तथा सद्गुणों का मिश्रण मानता है। अतः रूसो मानव स्वभाव के बारे में लॉक व हॉब्स से अलग द ष्टिकोण रखता है। रूसो का मत है कि संसार में पाया जाने वाला भ्रष्टाचार, पाप तथा दुष्टता मनुष्य की जन्मजात दुष्टता का परिणाम नहीं है, लेकिन कला, विज्ञान एवं संस्कृति ने उसे भ्रष्ट किया है। अतः मनुष्य की प्रकृति जन्मजात पशुओं जैसी नहीं है। वे विकृत सामाजिक संस्थाओं की देन हैं। रूसो के अनुसार मनुश्य एक सामाजिक प्राणी है और उससे सोचने-समझने की योग्यता व बुद्धि होने के कारण सद्गुणी बनाया जा सकता है तथा उसे पतन के मार्ग से हटाकर सद्मार्ग पर चलाया जा सकता है। रूसो के अनुसार मनुष्य के स्वभाव का निर्माण दो मौलिक प्रव त्तियों से होता है। ये दोनों प्रव त्तियाँ लाभदायक अधिक तथा हानिकारक कम होती हैं, अतः मनुष्य प्रकृति से अच्छा है। ये दो प्रव त्तियाँ निम्न हैं:-
1. आत्मरक्षा की प्रवत्ति (Instinct of Self Preservation): रूसो के अनुसार आत्मरक्षा की भावना हमें अपने को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है। आत्मरक्षा की प्रवत्ति मनुष्य को स्वार्थी व निकम्मा बना देती है। इसलिए इसे स्वार्थी प्रवत्ति भी कहा जाता है। यदि मनुष्य में यह प्रव त्ति न होती तो वह आदिकाल में ही नष्ट हो गया होता। आत्मरक्षा की प्रवत्ति ने मनुष्य को प्राकृतिक संकटों व हिंसक जानवरों से बचाकर रखा। रूसो ने कहा है- "मनुष्य का प्रथम कानून स्वयं अपना प्रतिरक्षण करना है, उसे सबसे पहले अपनी चिन्ता रहती है।” अतः आत्मरक्षा की प्रव त्ति मनुष्य के जीवन के हर कार्य की प्रेरणा बनती है। व्यक्ति इसी प्रवत्ति के कारण स्वार्थ की ओर प्रेरित होता है और स्वहित को प्राथमिकता देता है।
2. सहानुभूति की प्रव ति ( Instinct of Sympathy): रूसो के अनुसार यह प्रवत्ति समाज में सहयोग पैदा करके मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी बनाने में सहायता करती है। यदि प्रकृति हमें यह प्रव त्ति न देती तो हमारा जीवन दुष्कर हो जाता। इस प्रवत्ति की प्रकृति कल्याणकारी होती है। यह प्रव त्ति सभी मनुष्यों में पाई जाती है। रूसो का विचार है कि दया, सहानुभूति या परस्पर सहायता की प्रवत्ति के कारण मनुष्य प्राकृतिक अस्था में दूसरे मनुष्यों के कष्ट देखकर द्रवित हो उठता है। अतः यह प्रव त्ति स्वाभाविक है और मनुष्य को प्रेम और मिलजुल कर रहना सिखाती है।
रूसो का मानना है कि इन दोनों प्रव त्तियों में संघर्ष पैदा होता है। ऐसी स्थिति में यह जानना कठिन होता है कि मनुष्य किस प्रवत्ति की ओर प्रेरित हो । परिवार हित की इच्छा कभी-कभी ऐसे कार्य की माँग करती है जो कि समाज हित में नहीं है। अन्दर सहानुभूति के भाव होते हुए भी, मनुष्य अन्य के प्रति सहानुभूति नहीं दिखा पाता है क्योंकि आत्मरक्षा की प्रवत्ति या स्वार्थी प्रवत्ति उसे ज्यादा प्रभावित करती है। इस विरोध के बावजूद भी मनुष्य अपनी दोनों प्रव त्तियों को पूरा करना चाहता है। परन्तु दोनों प्रव त्तियाँ पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं हो सकर्ती । इसलिए व्यक्ति इन दोनों संघर्षमय प्रव त्तियों में तालमेल बिठाने का प्रयास करता है। अतः वह समझौतावादी प्रवत्ति अपनाता है।
रूसो का मानना है कि आत्मरक्षा तथा सहानुभूति की प्रव त्तियों में संघर्ष के कारण एक तीसरी भावना का जन्म होता है जिसे अन्तःकरण की प्रवत्ति कहा जाता है। अन्तःकरण बुद्धि की उपज नहीं है, क्योंकि अन्तःकरण के जन्म के बाद बुद्धि का जन्म होता है। यह शिक्षा की भी उपज नहीं है, क्योंकि शिक्षा का आधार अच्छा और बुरा ज्ञान है और इस ज्ञान का जन्म भी बुद्धि के प्रादुर्भाव के बाद ही होता है। इस प्रकार अन्तःकरण बुद्धि और शिक्षा दोनों से प्राचीन है। यह प्रकृति का उपहार है। यह स्वाभाविक रूप से व्यक्ति को प्राप्त होता है। इसका उद्देश्य मनुष्य का कल्याण है। इसलिए यह भी मनुष्य के लिए शुभ और लाभदायक होता है। अन्तःकरण एक ऐसी भावना है जिसमें सत्य और असत्य, उचित और अनुचित का निर्णय करने की क्षमता नहीं होती। यह केल मनुष्य को सदैव अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देती है, परन्तु सत्य और असत्य, शुभ या अशुभ के बारे में निर्णय नहीं कर सकता। इसलिए मार्गदर्शन के लिए व्यक्ति विवेक पर निर्भर है। विवेक ही मनुष्य को सत्कार्य का ज्ञान कराता है । अन्तःकरण की प्रेरणानुसार मनुष्य अपनी आत्मरक्षा व सहानुभूति की प्रव त्तियों का पालन करता है। आत्मरक्षा और सहानुभूति को प्रवत्तियों में सामंजस्य मनुष्य अपने विवेक और अन्तःकरण की सहायता से ही बिठाता है। इसलिए रूसो मनुश्य को स्वभाव से अच्छा मानता है।
रूसो का कहना है कि आत्मरक्षा या स्वार्थ की प्रवत्ति मनुष्य को घमण्डी बना देती है। व्यक्ति अपना सद्मार्ग छोड़कर कुमार्ग की ओर प्रवत्त हो जाता है। इसी से उसका पतन प्रारम्भ होता है। वेपर के अनुसार "घमण्ड से भी बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। सम्पूर्ण विश्व के मनुष्य इसके जाल में फँस जाते हैं। घमण्ड व्यक्ति के विवेक को उस समय तक भड़काता रहता है, जब तक कि वह अपनी वास्तविक प्रव त्ति नहीं छोड़ देता।" इस प्रकार घमण्ड समस्त दोषों की जननी है जिससे आज सं संसार ग्रस्त है। इसी दुर्गुण के कारण व्यक्ति दूसरों को हानि पहुँचाता है। विफल होने पर आग उगलने लगता है और दूसरों को लज्जित करता है। यह सहानुभूति की भावना को दबाता है, अन्तःकरण को विकृत करता है एवं विवेक को अपवित्र बनाता है। इस प्राकर संसार के समस्त दोषों का स्रोत धमण्ड है। घमण्ड की छत्र-छाया में कला और संस्कृति मनुष्य के स्वभाव को विकृत कर देती है। अतः घमण्ड का परित्याग करके ही मनुष्य अपनी प्रकृति की क्षमता के अनुसार पूर्णता प्राप्त कर सकता है। रूसो का कहना है कि “प्राकृतिक मनुष्य वह है जो अपने सजग अन्तःकरण एवं प्रबुद्ध विवेक द्वारा अपनी आत्मरक्षा और सहानुभूति में सामंजस्य स्थापित करता है।" यदि हम विवेक को दम्भ के प्रभाव से निकालना होगा और हमें स्वाभाविक भावनाओं, आत्म-प्रेम तथा संवेदना पर ही संतोष करना होगा।
रूसो के मानव स्वभाव सिद्धान्त के निहितार्थ (Implications of Rousseau's Theory of Human Nature)
रूसों के मानव स्वभाव सम्बन्धी सिद्धान्त से बहुत सी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। वे निम्नलिखित हैं :-
1. रूसो का प्राकृतिक मनुष्य सभ्य, गुणवान और पूर्ण है। अरस्तू के समान रूसो भी इस बात में विश्वास करता है कि प्रकृति विकास की चरमोत्कृष्ट अवस्था में, प्रारम्भिक रूप नहीं। दूसरे शब्दों में, जब कोई वस्तु अपनी नैसर्गिक क्षमता के अनुसार अपने विकास की पराकाष्ठा पर पहुँचती है, तो अन्तिम रूप से विकसित अवस्था ही उसकी प्रकृति होती है। परन्तु जहाँ अरस्तू ने मनुष्य को स्वभावतः सामाजिक माना है, रूसो उसे अच्छा मानता है, सामाजिक नहीं।
2. रूसो का प्राकृतिक मानव असभ्य व जंगली नहीं है। रूसो पीछे की ओर नहीं, नैतिक रूप से आगे बढ़ने का सन्देश देता है ।
3. रूसो की यह धारणा विवेक विरोधी नहीं है। रूसो विवेक को पूरा महत्त्व देता है। विवेक ही उचित कार्यों का निर्धारण करता है, अन्तःकरण का मार्गदर्शन करता है, मानवीय भावनाओं को विकसित करता है, मनुष्य को प्राकृतिक मानव बनने में सहायता प्रदान करता है एवं उसे पूर्णता की प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। अतः रूसो के विवेक को महत्त्व देने के कारण वह बुद्धिवादी विचारक है।
4. रूसो कार्य की स्वतन्त्रता को भी मानव स्वभाव का एक आवश्यक तत्त्व मानता है। उसने कहा है कि जो मनुष्य स्वतन्त्रता खो देता है, वह अपना मनुष्यत्व भी खो देता है। आत्मरक्षा तथा सहानुभूति की तरह स्वतन्त्रता भी मानव स्वभाव का अभिन्न अंग है।
हॉब्स व लॉक से तुलना (Comparison with Hobbes and Locke)
हॉब्स, लॉक व रूसो के मानव स्वभाव पर विचार परस्पर मतभेद पर आधारित है। हॉब्स के अनुसार मानव स्वभाव से स्वार्थी, क्रूर, हिंसक व दुष्ट है। लॉक मनुष्य को सद्गुणी मानता है। लॉक के अनुसार मनुष्य स्वभाव से अच्छा है। रूसो के अनुसार मानव स्वभाव में अच्छाइयों का मिश्रण है। मानव मूल रूप में सहयोगी, सरल तथा सद्भावना से परिपूर्ण है। रूसो की नजर में मानव निःस्वार्थी, आत्मप्रेमी, सहयोगी तथा अच्छा प्राणी होता है, परन्तु विवेक व सम्पत्ति के उदय से उसके स्वभाव में परिवर्तन होता है और वह स्वार्थी तथा संघर्षमय बन जाता है। इस प्रकार हॉब्स ने मानव स्वभाव के बुरे पक्ष का तथा लॉक व रूसो ने दोनों पक्षों का वर्णन करके मध्यमार्ग अपनाया है। ये दोनों मानव स्वभाव को देख व दैवीय गुणों का मिश्रण मानते हैं। अतः मानव प्रकृति पर लॉक व रूसो के विचार लगभग समान हैं।