कार्ल मार्क्स का वैज्ञानिक समाजवाद सिद्धांत ( Karl Marx's Theory of Scientific Socialism )
कार्ल मार्क्स का वैज्ञानिक समाजवाद
मार्क्सवाद को सर्वप्रथम वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का श्रेय कार्ल मार्क्स व उसके सहयोगी एंजिल्स को जाता है। फ्रांसीसी विचारकों सेण्ट साईमन तथा चार्ल्स फोरियर ने जिस समाजवाद का प्रतिपादन किया था, वह काल्पनिक था। मार्क्स ने अपनी पुस्तकों तथा के वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किया। वेपर ने कहा है कि पूर्ववर्ती समाजवादी विचारकों ने सुन्दर गुलाबों के स्वप्न लिए थे, गुलाब के पौधे उगाने के लिए जमीन तैयार नहीं की।" यह कार्य तो मार्क्स ने किया। उसने काल्पनिक समाजवाद को व्यावहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उसने एक वैज्ञानिक की तरह सामाजिक प्रगति के लिए उत्तरदायी तत्वों को खोज निकाला और एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लिए विधिवत् प्रक्रिया का रास्ता बताया। इसलिए मार्क्स का दर्शन अत्यन्त सुसम्बद्ध व व्यवस्थित होने के कारण वैज्ञानिक है और उसका समाजवाद भी वैज्ञानिक समाजवाद है।
मार्क्स के दर्शन को मोटे तौर पर तीन भागों में बांटा जा सकता है -
1. Dialectical Materialism (द्वन्द्ववात्मक भौतिकवाद)
2. Historical Materialism (ऐतिहासिक भौतिकवाद)
3. Theory of Class Struggle and Concept of Surplus Value (वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त एवं अतिरिक्त मूल्य की अवधारणा)
मार्क्स के दर्शन की व्याख्या निम्नलिखित सिद्धान्तों के आधार पर की जा सकती है --
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism)
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त मार्क्स के सम्पूर्ण चिन्तन का केन्द्र बिन्दु है। मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्ववाद को अपने इस सिद्धान्त का आधार बनाया है। मार्क्स का मानना है कि संसार में हर प्रगति द्वन्द्वात्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार तत्व के स्थान पर द्वन्द्वात्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार तत्व के स्थान पर मार्क्स ने पदार्थ तत्व को महत्त्वपूर्ण बताया है। मार्क्स के अनुसार जड़ प्रकृति या पदार्थ ही इस सृष्टि का एकमात्र मूल तत्व है। इसे इन्द्रिय ज्ञान से देखा जा सकता है। जो सिद्धान्त जड़ प्रकृति या पदार्थ में विश्वास रखता है, भौतिकवाद कहलाता है। मार्क्स के अनुसार आत्मा तत्व का कोई अस्तित्व नहीं है। इसके विपरित पेड़ पौधे, जीव - - जन्तु मकान आदि वस्तुएं प्रत्यक्ष रूप से देखी जा सकती है, इसलिए से सत्य है। ये भौतिक वस्तुएं ही विचारों का आधार होती है। मार्क्स का मानना है कि इस जगत का विकास किसी अप्राकृतिक शक्ति के अधीन न होकर उसकी अर्न्तमयी विकासशील प्रकृति का ही परिणाम है।
हीगल ने द्वन्द्वात्मक का प्रयोग विश्वात्मा (World Spirit) के विचार को स्पष्ट करने के लिए किया है। हीगल ने द्वन्द्ववाद की प्रक्रिया के तीन अंग-वाद (Thesis) प्रतिवाद (Anti- Thesis) तथा संवाद (Synthesiss) है। हीगल का मानना है कि प्रत्येक वस्तु के विचार में ही विरोधी तत्वों का समावेश होता है। कालान्तर में जब ये विरोधी तत्व वाद पर हावी हो जाते हैं तो निषेधात्मक निषेध (Negative Negation) के नियम के द्वारा प्रतिवाद का जन्म होता है। यही द्वन्द्ववाद प्रक्रिया का प्रमुख आधार है। सही अर्थों में द्वन्द्वात्मकता विरोधी तत्वों का अध्ययन है। विकास विरोधी तत्वों के बीच संघर्ष का परिणाम है। इसी के एक उच्चतर वस्तु का जन्म होता है। इसी से सभी ऐतिहासिक व सामाजिक परिवर्तन होते हैं। मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्वात्मक को तो सत्य माना है। लेकिन उसके विचार तत्व का प्रतिकार किया है। उसने पदार्थ तत्व को महत्त्व देकर भौतिकवाद का ही पोषण किया है। उसके अनुसार द्वन्द्वात्मक विकास पदार्थ या जड़ प्रकृति की परस्पर विरोधीमयी प्रकृति के कारण होता है। इसलिए उसका भौतिकवाद द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) है।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) मार्क्स के इस सिद्धान्त को समझने के लिए द्वन्द्व, भौतिक - तथा वाद तीनों शब्दों का अलग अलग अर्थ समझना आवश्यक है। (क) द्वन्द्व' से तात्पर्य है दो विरोधी पक्षों = का संघर्ष । (ख) भौतिक' का अर्थ है जड़ तत्व अथवा अचेतन तत्व 'वाद' से तात्पर्य है सिद्धान्त, विचार या - धारणा । इस प्रकार सरल अर्थ में 'द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का अर्थ है वह भौतिकवाद जो द्वन्द्ववाद की पद्धति को स्वीकृत हो । अर्थात् जड़ प्रकृति या पदार्थ को सृष्टि का मौलिक तत्त्व मानने वाला सिद्धान्त भौतिकवाद है। इसी तरह द्वन्द्ववादी प्रक्रिया के अनुसार जड़ जगत में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। पदार्थ की विरोधमयी प्रकृति के कारण इस सृष्टि में निरन्तर होने वाला परिवर्तन या विकास द्वन्द्वात्क भौतिकवाद कहलाता है। -
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आधाभूत मान्यताएं (Basic Assumption of Dialectical Materialism)
मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आधारभूत मान्यताएं या धाराणाएं निम्नलिखित हैं -
I. सृष्टि का मूल तत्व 'पदार्थ' है।
II. सृष्टि और उसमें मौजूद मानव समाज का विकास द्वन्द्वात्मक पद्धति से होता है।
मार्क्स का माना है कि यह सारा संसार पदार्थ' (Matter) पर ही आधारित है अर्थात् इस सृष्टि का स्वभाव पदार्थवादी है। इसलिए विश्व के विभिन्न रूप गतिशील पदार्थ के विकास के विभिन्न रूपों के प्रतीक हैं और यह विकास द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा होता है। इसलिए भौतिक विकास आत्मिक विकास से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस जगत का विकास किसी बाहरी शक्ति के अधीन न होकर उसकी भीतरी शक्ति तथा उसको स्वभाव में परिवर्तन का ही परिणाम हैं इस तरह मार्क्स ने पूर्ववर्ती मार्क्सवाद के ऊपर लगाए गए कई आपेक्षों का हल पेश कर दिया।
मार्क्स की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया : मार्क्स तथा एंजिल्स ने अपनी इस प्रक्रिया को अनेक उदाहरणों द्वारा समझाया है।
गेहूं के पौधे का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा है कि गेहूं का दाना का बाद है। भूमि में बो देने पर यह गलकर या नष्ट होकर अंकुरित होता है और एक पौधे के रूप ले लेता है। यह पौधा द्वन्द्वात्मक विकास में प्रतिवाद' (Anti - thesis) है। इस प्रक्रिया का तीसरा चरण पौधे में बाली का आना, उसका पकना तथा उसमें दाने बनकर पौधे का सूख जाना है। यह संवाद कहलाता है। यह वाद और प्रतिवाद दोनों से श्रेष्ठ है। उन्होनें आगे उदाहरण देते हुए कहा है कि पूंजीवाद वाद है। सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद को प्रतिवाद तथा साम्यवाद संवाद कहा जा सकता है। यहां पूंजीवाद संघर्ष के बार विकसित रूप में पौधा रूपी अधिनायकवाद की स्थाना होगी जो अन्त में साम्यवादी व्यवस्था के रूप में पहुंचकर आदर्श व्यवस्था (संवाद) का रूप ले लेगा।
मार्क्स का मानना है कि द्वन्द्ववाद की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। कालान्तर में वाद प्रतिवाद तथा प्रतिवाद संवाद बनकर वापिस पूर्ववत स्थिति (वाद) में आ जाते हैं। जैसे गेहूं के दाने से पौधा बनना, पौधे से फिर दाने बनना, प्रत्येक वस्तु की विरोधीमयी प्रवृति ही द्वन्द्वात्मक विकास का आधार होती है। इससे ही नए विचार (संवाद) का जन्म होता है। इस प्रक्रिया में पहले किसी वस्तु का निषेद्य (Negation) होता है और बाद में निषेद्य का निषेद्य (Negation of Negation) होता है और एक उच्चतर वस्तु अस्तित्व में आ जाती है।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं (Characteristics of Dialectical Materialism)
मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं निम्नलिखित हैं -
1. आंगिक एकता (Organic Unit) - मार्क्स के अनुसार इस भौतिक जगत में समस्त वस्तुएं व घटनाएं एक दूसरे से सम्बन्धित है। इसका कारण इस संसार का भौतिक होना है। यहां पदार्थ का अस्तित्व विचार से पहले है। संसार से सभी पदार्थ व घटनाएं एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं और उनमें अंगिक एकता भी - है। एक घटना को समझे बिना दूसरी घटना का यथार्थ रूप नहीं समझा जा सकता है।
2. परिवर्तनशीलता (Changeability) - मार्क्स का मानना है कि आर्थिक शक्तियां संसार के समस्त क्रिया कलापों का आधार होती है। ये सामाजिक व राजनीतिक विकास की प्रक्रिया पर भी गहरा प्रभाव डालती है। ये आर्थिक शक्तियां स्वयं भी परिवर्तनशील होती है और सामाजिक विकास की प्रक्रिया को भी परिवर्तित करती हैं। यह सब कछ द्वन्द्ववादी प्रक्रिया पर ही आधारित होता है। इसलिए विश्व में कुछ भी शाश्वत् वे स्थायी नहीं है। प्रकृति निरन्तर रूप बदलती रहती है। परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। -
3. गतिशीलता (Dynamism) : मार्क्स का मानना है कि प्रकृति में पाया जाने वाला प्रत्येक पदार्थ गतिशील है। - जो आज है, कल नहीं था, कल था व आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं होगा। गतिशीलता का यह सिद्धान्त इस जड़ प्रकृति में निरन्तर कार्य करता है और नई नई वस्तुओं या पदार्थों का निर्माण करता है। इसलिए यह भौतिकवादी विश्व सदैव गतिशील व प्रगतिशील है। इससे गतिशील बनने में किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। स्वत ही गतिशील रहता है क्योंकि गतिशीलता जड़ प्रकृति का स्वभाव है।
4. परिमाणात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन (Quantitative and Qualitative change ) - प्रकृति में परिवर्तन एवं विकास साधारण रीति से केवल परिमाणात्मक (Quantitative) ही नहीं होते बल्कि गुणात्मक (Qualitative) भी होते हैं। ये परिवर्तन क्रान्तिकारी तरीके से होते हैं। पुराने पदार्थ नष्ट होकर नए रूप में बदल जाते हैं और पुरानी वस्तुओं में परिणात्मक परिवर्तन विशेष बिन्दु पर आकर गुणात्मक परिवर्तन आ जाएगा। इस गुणात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया को क्रान्तिकारी प्रक्रिया कहा जाता है। ये परिवर्तन धीरे- धीरे न होकर झटके के साथ व शीघ्र होते हैं। इसी से पदार्थ का पुराना रूप नष्ट होता है और नया रूप अस्तित्व में आता है।
5. संघर्ष (Struggle) - मार्क्स का मानना है कि प्रत्येक वस्तु में संघर्ष या प्रतिरोध का गुण अवश्य पाया जाता है। यह विरोध नकारात्मक व सकारात्मक दोनों होता है। जगत के विकास का आधार यही संघर्ष है। संघर्ष के माध्यम से ही विरोधी पदार्थों में आपसी टकराव होकर नए पदार्थ को जन्म देता है। इस संघर्ष में ही नई वस्तु का अस्तित्व छिपा होता है।
द्वन्द्वदात्मक भौतिकवाद के नियम (Laws of Dialectical Materialism)
मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के तीन नियम है -
(क) विपरित गुणों की एकता व संघर्ष का नियम,
(ख) परिमाणात्मक द्वारा गुणात्मक परिवर्तन का नियम,
(ग) निषेद्यात्मक निषेध का नियम ।।
(क) विपरित गुणों की एकता व संघर्ष का नियम (Law of unity and struggle of opposites) -
यह नियम मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का प्रमुख भाग है। इसे द्वन्द्ववाद का सार तत्व भी कहा जा सकता है। यह नियम प्रकृति, समाज और चिन्तन के विकास की द्वन्द्ववादी प्रक्रिया को समझने के लिए अति आवश्यक है। इस नियम के अनुसार संसार की सभी वस्तुओं के अन्दर विरोध अन्तनिर्हित है। विरोधों के संघर्ष के परिणामस्वरूप ही जगत के विकास की प्रक्रिया चलती है। इसी के द्वारा मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तन में बदलते हैं। मार्क्स ने एक चुक्बक का उदाहरण देकर बताया है कि प्रत्येक चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं, जिन्हें उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के नाम से जाना जाता है। ये एक दूसरे के निषेधक होते हुए भी एक दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। चुम्बक के कितने भी टुकड़े कर दिए जाएं ये परस्पर विरोधी ध्रुव नष्ट नहीं होते। इसी प्रकार चुम्बक की तरह प्रत्येक वस्तु या पदार्थ में परस्पर विरोधी ध्रुव विद्यमान रहते हैं। वे उसके आन्तिरिक पक्षों, प्रवृतियों या शक्तियों के प्रतीक हैं, जो परस्पर निद्येषक होने के बावजूद भी परस्पर सम्बन्धित होते हैं। इन परस्पर अन्तर्विरोधी अविन्छेदनीय सम्बन्धों से ही विपरीतों की एकता का जन्म होता है। उदाहरण के लिए श्रमिक और पूंजीपति एक दूसरे के विपरित वर्ग चरित्र होते हुए भी एक एकताबद्ध पूंजीवादी समाज का - निर्माण करते हैं। इनमें से एक का अभाव पूंजीवादी समाज के अस्तित्व को नष्ट कर देगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की एकता की सीमाओं के भीतर ही विरोधियों के बीच संघर्ष चलता रहता है। यही पदार्थ और चेतना का विकास का स्त्रोत है। लेनिन ने कहा है कि विकास विपरीतों का संघर्ष है।" जिस वस्तु में जितनी संघर्ष की प्रवृति रहती है, वह वस्तु उतनी ही गतिशील व परिवर्तन होती है। यह समाज के विकास का आधार है।
(ख) परिणामात्क द्वारा गुणात्मक परिवर्तन का नियम (Law of Qualitative change induced by Quantitative Changes )
मार्क्स का कहना है कि मात्रा में बड़ा अन्तर आने पर गुण में भी भारी अन्तर आ जाता है। यही नियम प्रकृति में होने वाली आकस्मिक घटनाओं की व्याख्या का आधार है। उदाहरण के लिए जैसे हम पानी को गर्म करते हैं तो वह एक निश्चित बिन्दु पर भाप में बदल जाता है उसी प्रकार उसका तापमन एक निश्चित बिन्दु तक कम करने पर वह बर्फ बन जाता है। यह जल का गुणात्मक परिवर्तन है। इस तरह वस्तुओं में भारी मात्रात्मक परिवर्तन से गुणात्मक परिवर्तन होना अवश्यम्भावी हो जाता है। वैसे तो छोटे मोटे परिवर्तन सृष्टि की समस्त वस्तुओं में निरन्तर होते रहते हैं, लेकिन उनसे वस्तु के मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आता। वह वस्तु के मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं आता। यह परिवर्तन तो विशेष बिन्दु पर ही होता है। ये परिवर्तन जब सामाजिक क्षेत्र में होते हैं तो इन्हें हम क्रान्ति कहते हैं। कुछ समय तक धीरे धीरे परिवर्तन होने के बाद औद्योगिक क्रान्ति, फ्रेंच राज्य क्रान्ति रूसी राज्य क्रान्ति जैसे परिवर्तन अकस्मात् ही होतें है। उदाहरणार्थ औद्योगिक क्रान्ति या पूंजीवाद का परिवर्तन होने से पहले उपनिवेशों के शोषण से थोड़े से ही पूंजीपतियों के पास पूंजी का संग्रह होने लगता है और दूसरी तरफ किसानों के जमीनों से वंचित होने पर भूसम्पत्ति सर्वहारा वर्ग की संख्या बढ़ने लगती है। ये दोनों परिवर्तन धीरे धीरे होते हैं किन्तु एक समय - ऐसा आता है जब कारखानों को बनाने के लिए पर्याप्त पूंजी व मजदूर उपलब्ध हो जाते हैं तो उसी समय औद्योगिक क्रान्ति आती है और पूंजीवाद की स्थापना हो जाती है। मार्क्स क्रान्ति की स्वाभाविकता को सिद्ध करने के लिए इस नियम का औचित्य सिद्ध करता है और कहता है कि परिमाणात्मक से गुणात्मक परिवर्तन करने वाली क्रान्तियां है नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना छंलाग द्वारा समाजवाद में बदल जाएगा और सामाजिक व्यवस्था में भारी गुणात्मक अन्तर आएगा।
(ग) निषेद्यात्मक निषेद्य का नियम (Law of Negative Negation) -
यह नियम प्रकृति के विकास का अन्तिम नियम प्रकृति के विकास की सामान्य दशा पर प्रकाश डालता है। निषेध' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हीगल ने विचार तत्व के विकास के लिए किया था। मार्क्स ने इसका प्रयोग भौतिक जगत में किय। निषेध शब्द का अर्थ किसी पुरानी वस्तु से उत्पन्न नई वस्तु का पुरानी वस्तु को अभिभूत कर लेने से है। अतः निषेध विकास का प्रमुख अंग है। किसी भी क्षेत्र में तब तक कोई विकास नहीं हो सकता जब तक किवह अपने अस्तित्व के पुराने रूप का निषेद्य न करे। निषेध ही अन्तर्विरोधों का समाधान करता है। पुरानी वस्तुओं का स्थान नई वस्तु लेती है। विकास के इस क्रम में पुराना नया हो जाता है और फिर कोई और नया उसका स्थान ले लेता है। इस प्रकार विकास का यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। यह निषेद्य की प्रक्रिया समय की अविरल धारा के समान निर्बाध रूप से चलती रहती है। प्रत्येक पुराना नए को जन्म देते समय उसके निषेद्य को जन्म देकर इस विकास की प्रक्रिया को गतिशील बनाता है। निषेध से निषेध की उत्पत्ति होती है। कालान्तर में निषेध निषेध को जन्म देता है और निषेध का अनन्त क्रम जारी रहता है। अतः विकास अनगणित क्रमबद्ध निषेधों की एक सत्य कहानी है। अर्थात् प्रगति द्वन्द्वात्मक विकास की आम दशा है। यह सर्पिल आकार में उच्च से उच्चतर स्थिति की तरफ निरन्तर प्रवाहमान रहती है। मार्क्स ने उदाहरण देकर निषेध की प्रक्रिया को समझाते हुए कहा है "आदिम साम्यवाद का दास समाज, दास समाज का सामन्तवाद, सामन्तवाद का - पूंजीवाद, पूंजीवाद का समाजवाद निषेध करता है। इन्में प्रत्येक अगला प्रथम का निषेध है और यह प्रक्रिया सतत् रूप से चलती है। यही विकास का आधार है। एंजिल्स ने इसको समझाते हुए कहा है कि अण्डों से - तितलियां अण्डों का निषेध करके ही उत्पन्न होती हैं और नए अण्डे तब उत्पन्न होते हैं जब तितलियों का निषेध हो जाता है। इसी तरह मार्क्स ने कहा है कि निजी सम्पत्तिवादी समाज व्यवस्था आदिम साम्यवाद का निषेध है और इसके स्थान पर निषेद्य द्वारा वैज्ञानिक समाजवाद की स्थाना होगी जो पहले दोनों से श्रेष्ठ होगा। इस तरह प्रत्येक पदार्थ में अन्तर्विरोधों के संघर्ष में निषेध का नियम कार्य करता है और इसी से समाज की प्रगति का मार्ग आर्ग बढ़ता है। अतः निषेद्यात्मक निषेध का नियम प्रगति का आधार है।
मार्क्स के द्वन्द्ववाद की हीगल के द्वन्द्ववाद से तुलना (Comparison of Marx's Dialecticism with Hegel's Dialecticis)
यद्यपि मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक पद्धति का विचार हीगल से लिया था लेकिन फिर भी उन दोनों में आपसी मतभेद पाए जाते हैं।
दोनों में समानता - हीगल तथा मार्क्स दोनों द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के तीन तत्वों वाद, प्रतिवाद व संवाद में विश्वास - करते हैं। मार्क्स भी हीगल की तरह विश्वास करता है कि 'वाद' में निषेध होने पर प्रतिपाद का जन्म होता है और कालान्तर में प्रतिवाद' भी निषेध के गुण द्वारा संवाद' बन जाता है। यह प्रक्रिया निषेद्यात्मक निषेद्य के नियम द्वारा अनवरत रूप से चलती रहती है। कालान्तर में संवाद निषेद्य द्वारा वाद को उत्पन्न करता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया जल चक्र के समान प्रकृति में सदैव विद्यमान रहती है। इस तरह हीगल व मार्क्स दोनों द्वन्द्ववादी प्रक्रिया पर समानता का रूख रखते हैं।
दोनों में असमानता - मार्क्स ने हीगल के विपरीत भौतिकवाद को अपने दर्शन का आधार बनाया है। हीगल के मत - में भौतिक वस्तुएं प्रकृति आदि आत्मा के विकार या उससे उत्पन्न हैं। लेकिन मार्क्स का कहना है जिसे हम आत्मा, मन अथवा मस्तिषक कहते हैं, वह उसी प्रकार भौतिक शरीर से उत्पन्न वस्तुएं हैं जैसे घड़ी के पुर्जों को एक निश्चित क्रम से संयुक्त करने पर उसमें गति आ जाती है। इस प्रकार हीगल विचारों को प्रधान मानते हुए पदार्थ को विचारों का प्रतिबिम्ब मानता है। किन्तु मार्क्स पदार्थ तत्व को प्रमुख देता है और उसका विचार है कि 'पदार्थ' से ही विचारों की उत्पत्ति होती है। मार्क्स ने कहा है. "मानवीय चेतना उसके सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना - का निर्धारण करता है।" मार्क्स ने आगे कहा है कि "मैनें हीगल के द्वन्द्ववाद को जो शीर्षासन कर रहा था, उसके अन्दर छिपे विचारों को जानने के लिए पैरों के बल खड़ा किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हीगल व मार्क्स में आधारभूत समान्ता होते हुए भी दोनों की द्वन्द्ववादी पद्धति में कुछ अन्तर भी है।
द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना (Criticism of Dialectical Materialism)
मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं-
1. गूढ़ तथा अस्पष्ट (Vague and Unclear ) - मार्क्स ने द्वन्द्ववाद की जो व्याख्या की है, उसमें अस्पष्टता का पुट अधिक है। वेवर ने उसकी इस धारणा को अत्यधिक रहस्मयी बताया है। उसने आगे कहा है मार्क्स - यह नहीं बताता कि भौतिकवाद से उसका क्या अभिप्राय है। वह केवल यही बताता है कि उसका भौतिकवाद यान्त्रिक न होकर द्वन्द्वात्मक है। मार्क्स ने यह नहीं बताया कि पदार्थ किस तरह गतिशील होता है। लेनिन ने स्वयं स्वीकार किया है कि हीगल के द्वन्द्ववाद के समझे बिना मार्क्स के द्वन्द्ववाद को समझना अति कठिन कार्य है। अतः मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद अत्यन्त रहस्यमी है। यद्यपि लेनिन तथा अन्य साम्यवादी लेखकों ने अपनी रचनाओं में इसको स्थान देने का प्रयास तो किया है, लेकिन वे इसकी विस्तृत विवेचना करने में असफल रहे। इसका प्रमुख कारण इसी अस्पष्टता है।
2. आत्म-तत्व की उपेक्षा (Ignores Individual Element) - इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचना यह भी है कि - आत्म तत्व की घोर उपेक्षा करता है। मार्क्स ऐन्द्रिय ज्ञान को ही प्रामाणिक मानता है। भारतीय आध्यात्मवादी विचारकों व लेखकों के मन में मार्क्स की बात उतर नहीं सकती। मार्क्स ने जितने बल से जड़ जगत की सत्ता सिद्ध की ही दूसरी व्यक्ति उतनी ही प्रबलता से अनुभव के आधार पर आत्मा की सत्ता सिद्ध करते हैं। अतः आत्मा के तत्व में विश्वास रखने वालों की दृष्टि से विशेष रूप से भारतीय आध्यात्मवाद की दृष्टि से मार्क्स का यह सिद्धान्त गलत है।
3. विकास एवं जड़-चेतन पदार्थ (Evolution in living and Non living sustance) - आलोचकों का कहना है कि द्वन्द्ववाद आदर्शवाद से तो कदाचित सम्भव हो सकता है, लेकिन भौतिकवाद में नहीं। विवेक या विश्वात्मा आन्तरिक आवश्यकताओं के कारण स्वयं विकासित हो सकती है परन्तु पदार्थ जो आत्मा विहीन होता है, स्वयं विकसित नहीं हो सकता। इसलिए जड़ जगत में होने वाले सारे परिवर्तन आन्तरिक शक्ति की बजाय बाहरी शक्ति का ही परिणाम है। उदाहरण के लिए मोटर एक जड़ पदार्थ है। वह स्वयं नहीं चल - सकती। उसे चलाने के लिए चेतन पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है। इस तरह जड़ व चेतन को समान मानना व उनकी तुलना करना तर्कसंगत नहीं हो सकता। भौतिक जगत के नियम उसी रूप में मानव समाज में लागू नहीं हो सकते। मार्क्स के वर्ग विहीन समाज की स्थापना भौतिक आधार पर ही नहीं हो सकती बल्कि सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति की प्रेरणा में मानवीय चेतना का बहुत बड़ा हाथ होता है। -
4. अप्रमाणिक (Unproved) - मार्क्स ने अपने द्वन्द्वात्क भौतिकवाद की पुष्टि दृष्टांतो के आधार पर की है न की - प्रमाणों के आधार पर। दृष्टांतों का प्रयोग भी मनमाने ढंग से किया गया है। प्राणिशास्त्र के नियम इतिहास के नियमों से भिन्न होते हैं। लेनिन तथा एंजिल्स ने स्वयं कहा था "जीवशास्त्र के विचारों को हमें सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में नहीं लाना चाहिए।" अतः यह मानना अनुचित है कि भौतिक जगत के नियम मानव जीवन के समान रूप से लागू हो सकते हैं। ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण मार्क्स ने नहीं दिया, जिससे माना जा सके कि भौतिक जगत व प्राणी जगत के नियम समान हैं।
5. नैतिक मूल्यों की उपेक्षा (Neglect of Moral Values) - मार्क्स ने पदार्थ तत्व को मानवीय चेतना एवं - अंतःकरण से अधिक महत्व दिया है। उसने मनुष्य को स्वार्थी प्राणी माना है जो अपने हित के लिए नैतिक मूल्यों एवं मर्यादाओं की उपेक्षा करता है। सत्य तो यह है कि मनुष्य स्वार्थी होने के साथ परोपकार के गुण भी रखता है। इस तरह नैतिक मूल्यों की उपेक्षा करके मार्क्स ने पक्षपाती व एकांगी दृष्टिकोण का ही परिचय दिया है।
6. सामाजिक जीवन में अमान्य (Not Applicable in Social Life) - मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त जड़ जगत् से सम्बन्धित एक भौतिकवादी वैज्ञानिक सिद्धान्त है, जिसे मानव के सामाजिक जगत में पूरी तरह से लागू करना कठिन है। वस्तुतः सामाजिक जीवन की मुख्य इकाई स्वयं व्यक्ति होता है जो पदार्थ की तरह व्यवहार नहीं करता है। सामाजिक जीवन की घटनाएँ प्रकृति के नियमों के अनुसारी चलती है। इस तरह सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में मार्क्स की वैज्ञानिक दृष्टि का दावा खोखला व अमान्य है तथा मार्क्स की द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त सामाजिक जीन में लागू नहीं हो सकता। -
7. मनोवैज्ञानिक दोष (Psychological Defect) - मार्क्स ने भौतिक जगत के विकास का आधार संघर्ष को माना है। यह भौतिक संतुष्टि को ही मानसिक संतुष्टि का आधार मानता है। किन्तु यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि कई बार मनुष्य दुःखों में भी मानसिक रूप से संतुलित रहता है। कई बार निर्धन व्यक्ति धनवानों की बजाय अधिक संतुष्ट दिखाई देता है। इस तरह मार्क्स ने सहयोग, प्रेम, सहानुभूति एवं सहिष्णुता आदि मानवीय गुणों की उपेक्षा करके मानवीय स्वभाव का दोषपूर्ण चित्रण किया है। उसने सामाजिक प्रगति का आधार 'संघर्ष' प्रगति का मार्ग अवरूद्ध करता है। सामाजिक विकास का मार्ग रोककर सामाजिक विद्यटन को जन्म देता है। इस तरह मार्क्स का यह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण गलत है।
8. नियतिवाद का समर्थन (Support to Fatalism) - मार्क्स का मानना है कि मानव विकास की प्रक्रिया पूर्व - निश्चित है। इस विकास प्रक्रिया में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार मार्क्स ने नियतिवाद का समर्थन किया है। उसके अनुसार संसार की प्रत्येक घटना ऐतिहासिक नियतिवाद का ही परिणाम है। मार्क्स ने मानव की स्वतन्त्र इच्छा' की घोर उपेक्षा की है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मनुष्य ने अपनी स्वतन्त्र इच्छा के बल पर इतिहास की धारा को मोड़ दिया। इस विश्व में प्रत्येक घटना के पीछे नियतिवाद के साथ साथ मानवीय चेतना का भी हाथ होता है। -
इस प्रकार मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की वैज्ञानिकता व पूर्णता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया सकता है। उसके इस सिद्धान्त में अनेक दोष हैं। इसके लिए स्वयं मार्क्स काफी हद तक दोषी है। हैलोवल ने कहा है - "मार्क्स स्वयं एक गम्भीर दार्शनिक नहीं था, जो कुछ गम्भीरता उसमें है वह सब हीगल के कारण है। इस तरह सेबाइन तथा वेवर ने भी दर्शनशास्त्र की बजाय राजनीति, कानून तथा अर्थशास्त्र का ज्ञाता माना है। प्रो० हंट ने मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को अवैज्ञानिक कहा है। इस प्रकार निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त न तो मौलिक है और स्पष्ट है। यह अनेक विसंगतियों का कच्चा चिट्ठा है।
लेकिन अनेक दोषों के बावजूद भी राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में सिद्धान्त का विशेष महत्त्व है। मार्क्स ने इस सिद्धान्त के बल पर यह बताया कि मनुष्य की सारी समस्याएं इहिलौकिक हैं। समाज के कोई भी अवस्था चिरस्थायी नहीं है और सामाजिक परिवर्तन में भौतिक (आर्थिक) परिस्थितियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण व आधारभूत होती है। इस सिद्धान्त के आधार पर मार्क्स नए समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया और पूंजीवाद के शोषण से मजदूरों को मुक्ति दिलाकर साम्यवादी समाज की स्थापना के स्वप्न देखा। इस सिद्धान्त के आधार पर ही मार्क्स ने यथार्थवादी चिन्तन को एक ठोस व विश्वसनीय आधार प्रदान किया और समाजवादियों ने यह दृढ़ विश्वास पैदा किया कि उनकी विचारधारा पूर्ण वैज्ञानिक है और साम्यवाद की स्थापना अवश्यम्भावी है। इस सिद्धान्त का महत्त्व इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि आगे लेनिन तथा अन्य समाजवादी विचारकों ने मार्क्स की ही विचारधारा को अपने चिन्तन का आधार बनाया और मार्क्स की भविष्यवाणियों की सुरक्षा की।