जीन जेक्स रूसो का सम्प्रभुता का सिद्धांत ( Rousseau's Theory of Sovereignity )
सम्प्रभुता का सिद्धान्त (Theory of Sovereignty)
रूसो के सम्प्रभुता सम्बन्धी विचार उसके 'सामाजिक अनुबंध सिद्धान्त' से सम्बन्धित है। इस सिद्धान्त में रूसो ने निरंकुशवाद एवं उदारवाद जैसे दो परस्पर विरोधी विचारों को समन्वित करने का प्रयास किया है। रूसो के सिद्धान्त में सामाजिक समझौता, सम्प्रभुता और सामान्य इच्छा की धारणाएँ परस्पर इस प्रकार जुड़ी हुई हैं कि एक के बिना दूसरे की व्याख्या नहीं की जा सकती। समप्रभुता की आधुनिक धारणा का विकास बोदाँ के सिद्धान्त से प्रारम्भ हुआ, जिसे हॉब्स ने और अधिक स्पष्ट किया। बोदाँ और हॉब्स ने निरंकुश सम्प्रभुता का समर्थन किया। लॉक और माण्टेस्क्यू ने सम्प्रभुता के सिद्धान्त की उपेक्षा की। उन्होंने इसे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का शत्रु माना। रूसो ने लॉक के उदारवाद तथा हॉब्स के निरंकुशवाद में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है।
रूसो के अनुसार समुदाय सभी मनुष्यों के योग से बनता है। इस समुदाय में सामान्य इच्छा का निवास है जो सर्वोच्च होती हैं । जब समुदाय सामान्य इच्छा द्वारा संचालित होता है, तो वह सम्प्रभु कहलाता है। परन्तु जब वह निष्क्रिय होता है तो वह राज्य कहलाता है। रूसो के अनुसार सामान्य इच्छा ऐसी प्रभुसत्ताधारी है जो लॉक के लोकप्रिय प्रभुसत्ताधारी और हॉब्स के पूर्ण सत्ताधारी प्रभु के समन्वय का प्रतीक है। रूसो सम्प्रभुता को परिभाषित करते हुए कहता है- "सम्प्रभुता सामान्य इच्छा की कार्यान्विति है" (Sovereignty is the exercise of the General Will)। दूसरे शब्दों में रूसो के राज्य में सामान्य इच्छा ही सम्प्रभु है। रूसो के अनुसार "जिस प्रकार प्रकृति ने मानव को अपने सभी अंगों के ऊपर निरपेक्ष शक्ति प्रदान की है, उसी प्रकार सामाजिक समझौता राजनीतिक समाज को अपने सभी सदस्यों पर असीम शक्ति प्रदान करता है और यही असीम शक्ति जब सामान्य इच्छा के द्वारा निर्देशित होती है तो सम्प्रभुता का नाम धारण कर लेती है। इस प्रकार रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता द्वारा उत्पन्न समुदाय सम्प्रभु होता है। रूसो की मान्यता है कि संधीकरण का कार्य एक नैतिक तथा सामूहिक सत्ता को जन्म देता है। इस सत्ता का अपना अस्तित्व, जीवन व इच्छा होती है। रूसो इस इच्छा को सामान्य इच्छा कहता है। इसी सामान्य इच्छा में सम्प्रभुता निवास करती है। रूसो के अनुसार सामाजिक समझौता राजनीतिक समाज को अपने सभी सदस्यों पर निरंकुश शक्ति प्रदान करता है। सामान्य इच्छा द्वारा निर्देशित होने पर यह शक्ति सम्प्रभुता होती है। अतः सम्प्रभुता समपूर्ण समाज में निहित है, वह सर्वोच्च शक्ति है। उसके विरुद्ध किसी को भी विद्रोह करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह जनता की शक्ति की प्रतीक है।" रूसो के अनुसार सम्प्रभुत्ता सम्पूर्ण समाज में निहित है। प्रत्येक व्यक्ति समझौते में भागीदार होने के कारण सम्प्रभुता का भी भागीदार है। किसी को उसके विरुद्ध विद्रोह का अधिकार नहीं है। अतः रूसो ने जनता की सत्ता का प्रतिपादन करके 'लोकप्रिय प्रभुसत्ता के सिद्धान्त' का प्रतिपादन किया है। रूसो के शब्दों में "प्रभुसत्ता का प्रत्येक कार्य अर्थात् लोकमत का प्रत्येक अधिकृत कार्य सभी नागरिकों के लिए समान रूप से हितकर हो।" प्रभुसत्ता लोकमत में होती है। रूसो का सम्प्रभु सारा समाज है। इसलिए आलोचक कहते हैं कि यह हॉब्स का 'लेवियाथन' है जिसका सिर काट दिया गया है।
सम्प्रभुता की विशेषताएँ (Features of Sovereignty)
रूसो की सम्प्रभुता की निम्न विशेषताएँ हैं :-
1. प्रभुसत्ता अहस्तान्तरणीय है : प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और उसे वहीं रहना चाहिए। रूसो कहता है- "मैं कहता हूँ कि प्रभुसत्ता केवल लोकमत का कार्यान्वयन होने के कारण भी हस्तान्तरणीय नहीं हो सकती। शक्ति को तो हस्तान्तरिक किया जा सकता है, प्रभुसत्ता का नहीं।" यदि सम्प्रभु अपनी सम्प्रभुता का हस्तान्तरण करता है तो उसका अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा।
2. प्रभुसत्ता अविभाज्य है : जिस प्रकार सम्प्रभुता का हस्तान्तरण नहीं हो सकता, उसी प्रकार सम्प्रभुता अविभाज्य भी है। मत का एक गुण यह होता है कि वह एकतायुक्त तथा अविभाज्य होता है। यदि लोकमत का विभाजन करेंगे तो वह नष्ट हो जाएगा। इसलिए लोकमत ही सम्प्रभुता हो सकती है। प्रभुसत्ता का कार्यपालिका, विधानपालिका व न्यायपालिका में विभाजन वास्तव में प्रभुसत्ता का विभाजन न होकर उसके कार्यों का विकेन्द्रीयकरण है। इसके बाद भी सम्प्रभुता अविभाज्य रूप में जनता में निवास करती है। प्रभुसत्ता के विभाजन का अर्थ है पहले उसे अपने स्थान से हटाना।
3. प्रभुसत्ता अदेय है : रूसो के अनुसार किसी समुदाय को प्रभुसत्ता से दूर नहीं हटाया जा सकता। इसलिए यह अदेय है। रूसो के शब्दों में- "जिस कारण से प्रभुसत्ता अदेय है, उसी कारण से अविभाज्य भी है।" अतः रूसो की सम्प्रभुता अदेय है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति के शरीर से उसके प्राण को प थक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार सामान्य इच्छा से सम्प्रभुता को अलग करना सम्भव नहीं है। इसका हस्तान्तरण भी सम्भव नहीं है।
4. प्रभुसत्ता का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता : रूसो के अनुसार “चूँकि सम्प्रभुता अदेय होती है और सामान्य इच्छा में निहित रहती है। सामान्य इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं किया जा सकता; इसलिए सम्प्रभुता का भी प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता। प्रभुसत्ता जनता में निहित होने का कारण उसका प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता। "जैसे कोई जाति अपना प्रतिनिधि नियुक्त करती है, वह स्वतन्त्र नहीं रहती तथा अपने अस्तित्व को खो देती है।"
5. सम्प्रभुता असीम है : सामाजिक समझौते के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने प्राकृतिक अधिकार अपने सामूहिक अस्तित्व : को समर्पित कर देता है। अतः प्रभुसत्ताधारी पूर्ण सत्तासम्पन्न हो जाती है। सिद्धान्त के विरोध का अधिकार किसी को नहीं है तथा प्रभुसत्ताधारी के आदेश का पालन होता है।
6. रूसो के अनुसार सम्प्रभुता सभी कानूनों का स्रोत है : राज्य के समस्त कानून सम्प्रभु के द्वारा निर्मित होते हैं। सम्प्रभु कानून द्वारा अपनी इच्छा को व्यक्त करता है और अपने सारे कार्यों का सम्पादन करता है। सम्प्रभुता दोषातीत है, क्योंकि यह सामान्य इच्छा पर आधारित है। इससे त्रुटि की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
7. सम्प्रभुता एकता स्थापित करने का सूत्र है ।
8. सम्प्रभुता सदैव नयायशील होती है।
9. सम्प्रभुता अविच्छेद्यता का गुण भी रखती है। सामान्य इच्छा के रूप में यह जनता में रहती है। अतः इसको जनता से दूर नहीं किया जा सकता।
उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि रूसो जनप्रभुता का उपासक है। उसकी सम्प्रभुता अदेय, अविभाज्य, असीम, दोषातीत है। सम्प्रभुता एकता का प्रतीक तथा कानून का स्रोत है। रूसो ने लोकप्रिय प्रभुसत्ता के विचार को आगे बढ़ाया है। उसने सम्प्रभु सामान्य इच्छाको अविभाज्य, अदेय, असीम, अप्रतिनिधिक तथा एकता का सूत्र कहा है। रूसो ने अपने सामान्य इच्छा के सिद्धान्त द्वारा जनता को सम्प्रभु बनाया है।
हॉब्स व लॉक से तुलना (Comparison with Hobbes and Locke)
हॉन्स और रूसो के सम्प्रभुता सम्बन्धी विचारों में समानताएँ हैं। दोनों सम्प्रभुता को असीम, अविभाज्य, अनियन्त्रित और निरंकुश मानते हैं। दोनों समझौते द्वारा अपने समस्त अधिकार सम्प्रभु को सौंपते हैं। इसी प्रकार लॉक व रूसो दोनों सम्प्रभुता का निवास स्थल समाज को मानते हैं। दोनों ने सम्प्रभुता को जनसहमति पर आधारित किया है। इन आधारभूत समानताओं के बावजूद भी तीनों की सम्प्रभुता सम्बन्धी धारणा में कुछ अन्तर है :-
1. रूसो तथा लॉक के अनुसार सम्प्रभुता समाज या समस्त समुदाय में निवास करती है, जबकि हॉब्स के अनुसार सम्प्रभुता शासन या सत्ता में निवास करती है।
2. रूसो तथा लॉक ने लोकप्रभुता के सिद्धान्त का समर्थन किया है, जबकि हॉब्स ने निरंकुश सम्प्रभुता का वर्णन किया है।
3. रूसो तथा लॉक ने राज्य व सरकार में भेद किया है, जबकि हॉब्स ने ऐसा कोई विभाजन स्वीकार नहीं किया है।
4. हॉब्स और रूसो के अनुसार सम्प्रभुता असीम, अविभाज्य, निरंकुश है, जबकि लॉक के अनुसार सम्प्रभुता
निरंकुश नहीं हो सकती। निरंकुश सम्प्रभु के विरुद्ध जनता को विद्रोह करके उसे हटाने का अधिकार है।
5. हॉब्स निरंकुश राजतन्त्र का, लॉक सीमित राज्य का तथा रूसो लोकप्रिय प्रभुसत्तासम्पन्न प्रजातन्त्र का समर्थन करता है। लॉक अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र तथा रूसो प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का समर्थन करता है।
6. हॉब्स व रूसो की सम्प्रभुता भ्रष्ट नहीं हो सकती, लॉक की सम्प्रभुता को विद्रोह द्वारा नष्ट किया जा सकता है।
7. हॉब्स की सम्प्रभुता एक व्यक्ति या समूह में, लॉक की सम्प्रभुता सारे समुदाय में तथा रूसो की सामान्य इच्छा में निहित है। हॉब्स के राज्य में व्यक्ति लॉक के राज्य में व्यक्ति तथा रूसो के राज्य में समाज में सम्प्रभुता निवास करती है।
उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि निरंकुश सम्प्रभुता का समर्थक होते हुए भी रूसो लॉक से अधिक प्रजातांत्रिक है। रूसो का सम्प्रभु हॉब्स की तरह स्वेच्छाचारी नहीं है। रूसो का सम्प्रभु जनहित में कार्य करता है और जनसहमति पर आधारित होता है। तीनों समझौतावादी विचारकों की सम्प्रभुता सम्बन्धी विचारों का विश्लेषण करने पर यह बात सामने आती है कि- "रूसो का प्रभुसत्ता सिद्धान्त हॉब्स की कानूनी एवं लॉक की राजनीतिक सम्प्रभुता का सम्मिश्रण है अर्थात् रूसो ने हॉब्स की कानूनी सम्प्रभुता और लॉक की राजनीतिक सम्प्रभुता के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है।