न्याय
न्याय की अवधारणा :-
पश्चिमी परंपरा के अंतर्गत न्याय के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए सदचरित एवं मनुष्य के सद्गुणों पर विचार किया जाता था । इसमें उन सद्गुणों की तलाश की जाती थी जो व्यक्ति को न्याय की ओर अग्रसर करते थे ।
भारतीय परंपरा के अंतर्गत न्याय के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए मनुष्य के धर्म को प्रमुखता दी गई है । इन दोनों ही मान्यताओं में मनुष्य के कर्तव्य पालन पर बल दिया गया है । अर्थात प्रत्येक मनुष्य द्वारा अपना निर्दिष्ट कार्य करना एवं दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना ही न्याय हैं ।
न्याय का अर्थ :-
न्याय अंग्रेजी भाषा के Justice शब्द का हिंदी रूपांतरण है । इसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के Justie शब्द से हुई है , जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - जोड़ना या जोड़ने का कार्य ।
इस प्रकार न्याय उस अवस्था का नाम है जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे से जुड़ा रहता है । न्याय की अवधारणा यह है कि एक समाज में सभी व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करें और इस प्रकार संपूर्ण समाज आपस में जुड़ा रहे ।
न्याय की परिभाषाएं :-
विभिन्न राजनीतिक विद्वानों ने न्याय के संबंध में विभिन्न परिभाषाएं दी है -
प्लेटो के अनुसार -
" प्रत्येक व्यक्ति को अपना निर्दिष्ट कार्य करना और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करना न्याय है " ।
अरस्तु के अनुसार -
" न्याय वह संपूर्ण सद्गुण है जो हम एक - दूसरे के साथ व्यवहार में प्रदर्शित करते हैं " ।
डेविड ह्यूम के अनुसार -
"न्याय के उदय का एकमात्र आधार सार्वजनिक उपयोगिता है "।
वर्तमान समय में न्याय एक व्यापक संकल्पना है जिसका प्रयोग नैतिक , वैधानिक , प्राकृतिक , सामाजिक , राजनीतिक एवं आर्थिक आदि रूपों में किया जाता है ।
न्याय का परंपरागत सिद्धांत :-
न्याय के परंपरागत सिद्धांत में सदगुण , सदचरित्र , सदकार्य , आध्यात्मिक और औचित्यपूर्णता को मानव का आत्मीय गुण मानकर न्याय की व्याख्या की गई है । ऐसे कार्यों को जो उपर्युक्त तथ्यों पर खरे उतरते हैं उन्हें न्याय परख माना गया है ।
प्लेटो ने माना है कि न्याय आत्मा का सद्गुण है । प्लेटो के अनुसार आत्मा में निहित न्याय का विचार वास्तव में राज्य में निहित न्याय का ही रूप है । जिस प्रकार आत्मा में विद्यमान न्याय व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों को संतुलित करता है । ठीक उसी प्रकार राज्य में व्याप्त न्याय समाज के तीनों वर्गो अर्थात शासक , सैनिक तथा उत्पादक वर्ग में सामंजस्य स्थापित करता है ।
अरस्तु का मानना है कि जो उचित और विधिक है जो सामान और औचित्यपूर्ण वितरण में आस्था रखता है वही न्याय है ।
प्लेटो के न्याय संबंधी विचार :-
प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक ( Republic )में न्याय को समझाने के लिए न्याय के दो रूपों की व्याख्या की है - व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय ।
1. व्यक्तिगत न्याय :-
प्लेटो की मान्यता है कि मानवीय आत्मा में तीन तत्व पाए जाते हैं बुद्धि , साहस , तृष्णा । व्यक्ति की आत्मा में विद्यमान न्याय इसके व्यक्तित्व के उपर्युक्त तीनों पक्षों को परस्पर संतुलित करता है ।
2. सामाजिक न्याय या राज्य संबंधी न्याय :-
प्लेटो मानवीय आत्मा के तीन तत्वों की प्रधानता के आधार पर राज्य या समाज में तीन वर्ग स्थापित करता है - पहला शासक वर्ग या अभिभावक वर्ग इसमें बुद्धि का अंश सर्वाधिक पाया जाता है । दूसरा सैनिक वर्ग या रक्षक वर्ग इसमें शौर्य एवं साहस तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाया जाता है । तीसरा उत्पादक या सहायक वर्ग इसमें इंद्रिय तृष्णा एवं इच्छा तत्व की अधिकता पाई जाती है । सभी मनुष्यों में यह तीनों तत्व कम या अधिक मात्रा में पाए जाते हैं । किंतु जिस तत्व की मात्रा या अंश प्रधान रूप में पाया जाता है । वह उसके सद्गुणों को प्रकट करता है ।
प्लेटो न्याय को आत्मा का माननीय सद्गुण मानता है । प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की आत्मा में निहित न्याय राज्य में न्याय के समान है । आत्मा का न्याय व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों में संतुलन स्थापित करता है । इस प्रकार राज्य में व्याप्त न्याय समाज के तीनों वर्गों शासक , सैनिक और उत्पादक वर्ग के मध्य सामंजस्य स्थापित करता है । अर्थात प्लेटो के अनुसार इन तत्वों की उपस्थिति के अनुपात में ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता व क्षमता के अनुरूप आचरण करना चाहिए और दूसरों के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । इस प्रवृत्ति को ही प्लेटो न्याय की संज्ञा देते हैं ।
अरस्तु के न्याय संबंधी विचार :-
अरस्तु के अनुसार न्याय का अर्थ है - मानवीय संबंधों का नियमन है । अरस्तु का विश्वास था कि लोगों के मन में न्याय के बारे में एक जैसी धारणा के कारण ही राज्य अस्तित्व में आता है । अरस्तु के अनुसार न्याय में वह सब शामिल है जो उचित एवं विधिक है , जो समान और औचित्यपूर्ण वितरण में आस्था रखता हो । साथ ही जो इस बात पर बल देता हो कि जो अन्यायपूर्ण व उसमें वांछित सुधार की संभावना हमेशा बनी रहती है ।
अरस्तु ने न्याय के दो उपवेद माने हैं - वितरणात्मक न्याय तथा सुधारात्मक न्याय ।
1. वितरणात्मक न्याय या राजनीतिक न्याय :-
वितरणात्मक न्याय के संबंध में अरस्तु की धारणा यह है कि पद , प्रतिष्ठा व धन संपदा का वितरण अंकगणितीय अनुपात में नहीं बल्कि रेखा गणित अनुपात में होना चाहिए । अर्थात इसमें सबको बराबर का हिस्सा नहीं मिलना चाहिए । बल्कि प्रत्येक को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार हिस्सा मिलना चाहिए ।
इस संबंध में अरस्तु का मत है कि -
i) शक्ति एवं सरंक्षण का वितरण व्यक्ति की योग्यता एवं योगदान के अनुरूप हो ।
ii) अरस्तु आनुपातिक समानता का पक्षधर है ।
iii) शासन की बागडोर उन्हीं को ही सौंपी जानी चाहिए जिसमें शासन करने की योग्यता व क्षमता हों ।
iv) लाभ एवं उत्तरदायित्व व्यक्ति की क्षमता एवं सामर्थ्य के अनुपात में होना चाहिए ।
2. सुधारात्मक न्याय :-
अरस्तु का सुधारात्मक न्याय से तात्पर्य - ऐसे न्याय से है जो नागरिकों के अधिकारों की अन्य व्यक्तियों के द्वारा हनन की रोकथाम की व्यवस्था करता है ।
इस संबंध में अरस्तू ने राज्य के दो कर्तव्य बताए हैं -
i) राज्य व्यक्ति के जीवन , समान , संपत्ति और स्वतंत्रता की रक्षा करें ।
ii) वितरणात्मक न्याय से प्राप्त मनुष्य के अधिकारों की रक्षा राज्य द्वारा की जानी चाहिए ।
मध्यकालीन न्याय संबंधी विचार :-
मध्यकालीन विचारक संट ऑगस्टाइन न्याय को राज्य का आवश्यक एवं अपरिहार्य तत्व मानते हैं । थॉमस एक्विनास कानून और न्याय को आपस में जुड़ा हुआ मानते हैं । थॉमस एक्विनास ने लिखा है कि " न्याय एक व्यवस्थित एवं अनुशासित जीवन व्यतीत करने तथा उन कर्तव्यों का पालन करने में निहित है जिन की व्यवस्था मांग करती है " ।
संट ऑगस्टाइन ने अपनी ईश्वरीय राज्य की अवधारणा में न्याय को इसका महत्वपूर्ण एवं आवश्यक तत्व माना है । यह अपनी रचना " द सिटी ऑफ गॉड " में लिखते हैं कि " जिन राज्यों में न्याय विद्यमान नहीं है वह केवल चोर उच्चक़्क़ो के खरीद-फरोख्त है " ।
संट ऑगस्टाइन परिवार , लौकिक राज्य और ईश्वरीय राज्य के संदर्भ में न्याय की विवेचना करते हैं कि व्यक्ति द्वारा ईश्वरीय राज्य के प्रति कर्तव्य पालन ही न्याय है ।
समकालीन न्याय संबंधी विचार :-
आधुनिक काल में न्याय संबंधी धारणा के प्रमुख प्रतिपादक डेविड ह्यूम , जेरेमी बेंथम , स्टूअर्ट मिल ।
डेविड ह्यूम -
" नियमों का पालन मात्र माना है क्योंकि अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि ये नियम सर्वहित का आधार है । अतः सार्वजनिक उपयोगिता को न्याय का एकमात्र स्रोत होना चाहिए । मनुष्य की प्रकृति तर्क बुद्धि या अनुबंध ने इन नियमों का स्रोत ढूंढने से कोई लाभ नहीं " ।
उपयोगितावाद के प्रवर्तक जेरेमी बेंथम के अनुसार सार्वजनिक वस्तुओं , सेवाओं आदि का वितरण उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए । जिसका सूत्र 'अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख है '
जे. एस. मिल -
Js मिल ने न्याय को सामाजिक उपयोगिता का महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए यह तर्क दिया कि मनुष्य अपने लिए सुरक्षा की कामना करते हैं । इसलिए वे नैतिक नियम स्वीकार कर लेते हैं । जिनमें दूसरे भी वैसी ही सुरक्षा का अनुभव कर सकें । अतः उपयोगितावाद ही न्याय का मूल मंत्र है ।
समकालीन युग में प्राकृतिक कानून या कोरी उपयोगिता पर आधारित न्याय की संकल्पना में विश्वास नहीं किया जाता है क्योंकि प्राकृतिक कानून के नियमों , प्राकृतिक अधिकारों या सार्वजनिक उपयोगिता के स्वरूप के बारे में कोई सर्वे - सम्मत मान्यता विकसित नहीं हो पाई । आज न्याय के संबंध में केवल ऐसी संकल्पना को स्वीकार कर सकते हैं । जिसका निर्माण जीवन के सामाजिक , आर्थिक एवं राजनीतिक यथार्थ को सामने रखकर किया गया हो ।
जॉन रॉल्स के न्याय संबंधी विचार
जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक ' द स्टोरी ऑफ जस्टिस ' (The Story Of Justice) में आधुनिक संदर्भ में सामाजिक न्याय का विश्लेषण किया है । रोल्स न्याय संबंधी परंपरागत विचारों का विरोध करता है जो एक सामाजिक संस्था को न्याय प्रद बनाने पर बल देते हैं । रोल्स ने उपयोगितावादियों के अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख पर आधारित न्याय को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा है कि यह सिद्धांत बहुमत कि अल्पमत पर तानाशाही स्थापित करता है ।
जॉन रोल्स संवैधानिक लोकतंत्र में न्याय के दो मौलिक सिद्धांतों को प्रतिस्थापक करता है -
i) प्रत्येक व्यक्ति को समान मूलभूत स्वतंत्रता की व्यापक व्यवस्था की प्राप्ति का समान अधिकार प्राप्त है जो सभी को समान रूप से मिले हैं ।
ii) सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाए कि इन दोनों से न्यूनतम लाभान्वित व्यक्तियों अर्थात सबसे अधिक पिछड़ों को अधिकतम लाभ हो , प्रत्येक को उचित अवसर की समानता की स्थिति में पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति सुलभ है ।
जॉन रोल्स समाज के लिए सबसे औचित्यपूर्ण न्याय उस सिद्धांत को मानता है जिसमें लोग स्वतं ही अज्ञानता के पर्दे को स्वीकार कर लेते हैं । ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति मूलभूत नैतिक शक्तियों से संपन्न नैतिक व्यक्ति होता है ।
भारतीय राजनीतिक चिंतन न्याय संबंधी विचार :-
भारतीय राजनीतिक चिंतन में न्याय को विशेष स्थान एवं महत्व प्रदान किया गया है ।
मनु , कौटिल्य , बृहस्पति , शुक्र , विदुर , भारद्वाज आदि ने न्याय को राज्य का प्राण माना है । प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में धर्म का प्रयोग न्याय के समान ही हुआ है । धर्म की प्राचीन भारतीय अवधारणा व्यक्ति को समाज में उसके नियत स्थान एवं निर्दिष्ट कर्तव्य का ज्ञान कराती है । भारतीय चिंतन में न्याय को कानूनी रूप से स्वीकार किया गया है ।
मनु और कौटिल्य ने न्याय को निष्पक्षता वऔर सत्यता पर बल दिया तथा कहा कि जो राजा पृथ्वी पर अपनी प्रजा के लिए न्याय की व्यवस्था नहीं कर सकता , वह जीवित रहने योग्य नहीं है ।
न्याय के विविध रूप :-
परंपरागत रूप में न्याय की दो ही अवधारणाएं प्रचलित रही है - नैतिक न्याय और कानूनी न्याय । लेकिन वर्तमान में न्याय को व्यापक रूप में ग्रहण किया जाने लगा । आज नैतिक व कानूनी न्याय की अपेक्षा सामाजिक व आर्थिक न्याय को अधिक महत्व दिया जाता है ।
◆ नैतिक न्याय -
नैतिक न्याय नैतिकता पर आधारित है । यह न्याय कुछ प्राकृतिक नियमों और प्राकृतिक अधिकारों द्वारा निर्दिष्ट होती है । जब व्यक्ति का आचरण सदाचारी व व्यवहार समाजों अनुकूल हो तो इसे नैतिक न्याय की अवस्था कहा जाता है । जबकि जब व्यक्ति का आचरण , व्यवहार नैतिकता से परे होता है तो वह नैतिक न्याय के विरुद्ध माना जाता है । प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक के सभी चिंतक सत्य , अहिंसा , करुणा , वचनबद्धता व उदारता आदि गुणों को नैतिक सिद्धांत मानते आ रहे हैं ।
◆ कानूनी न्याय -
राजनीतिक व्यवस्था में कानूनी व्यवस्था को न्याय व्यवस्था भी कहा जा सकता है । इसमें वे सभी कानून व नियम शामिल है जिन का नागरिक स्वाभाविक रूप से अनुसरण करते हैं ।
कानूनी न्याय की धारणा दो बातों पर बल देती है -
i) सरकार द्वारा निर्मित कानून न्यायोचित होने चाहिए ।
ii) कानूनों को न्यायोचित ढंग से लागू करना चाहिए और इसके साथ जो व्यक्ति कानूनों का उल्लंघन करता है उसे निष्पक्ष रुप से दंडित करना चाहिए ।
◆ राजनीतिक न्याय -
राजनीतिक न्याय का अर्थ है कि राज्य के मामलों में जनता की भागीदारी है । न्याय समानता व समता पर आधारित होना चाहिए । एक राजव्यवस्था में सभी व्यक्तियों को समान अधिकार व अवसर प्राप्त होने चाहिए । राजनीतिक न्याय सभी व्यक्तियों के कल्याण पर आधारित होता है । ऐसा न्याय केवल प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ही प्राप्त किया जा सकता है । राजनीतिक न्याय प्राप्ति के साधन हैं व्यस्त मताधिकार , भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता । बिना किसी भेदभाव के सार्वजनिक पद पर आसीन होने का अधिकार समान रूप से प्राप्त करना । राजनीतिक न्याय की प्राप्ति के लिए संवैधानिक शासन में आवश्यक माना गया कि किसी विशेष वर्ग व व्यक्ति को विशेष अधिकार प्रदान न करना राजनीतिक न्याय का एक अन्य गुण है ।
◆ सामाजिक न्याय -
सामाजिक स्थिति के आधार पर व्यक्तियों में भेदभाव नहीं करना और प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तित्व के विकास का पूर्ण अवसर प्रदान करना सामाजिक न्याय है । राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा जीवन जीने के लिए सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए । इस न्याय के अभाव समानता , स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रह जाता ।
जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय को विशेष महत्व प्रदान किया है ।
◆ आर्थिक न्याय -
आर्थिक न्याय का उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता लाना है । आर्थिक न्याय का सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि आर्थिक संसाधनों का वितरण करते समय राज्य व्यवस्था को व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए । आर्थिक न्याय गरीबों और अमीरों के बीच की खाई को कम करने पर बल देता है ।