समानता
समानता :-
समानता की अवधारणा की उत्पत्ति विशेषाधिकार प्रक्रिया के विरुद्ध हुई है । प्रकृति ने सभी मनुष्य को जन्म से ही समान उत्पन्न किया है । असमानता का निर्माण परिस्थितियों के कारण होता है ।
स्वतंत्रता तथा समानता एक दूसरे के पूरक है । समानता , लोकतांत्रिक व्यवस्था का अधिकार है बिना समानता के लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना संभव नहीं है ।
i) 1789 की फ्रांस की राज्य क्रांति में यूरोप के इतिहास में तीन नई प्रवृत्तियों को जन्म दिया स्वतंत्रता , समानता तथा बन्धुत्व ।
ii) जॉन लॉक ने सर्वप्रथम समानता के सिद्धांत का वैज्ञानिक ढंग से प्रतिपादन किया । इसको स्वतंत्रता की भांति समानता को भी मानव का प्राकृतिक अधिकार माना ।
iii) 1688 ई. इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति , 1776 की अमेरिकी क्रांति तथा 1789 की फ्रांस की राज्यक्रांति का आधार समानता की अवधारणा थी ।
iv) मानव अधिकारों की घोषणा पत्र में कहा गया है कि मनुष्य , स्वतंत्र व सम्मान पैदा हुए हैं । वे अपने अधिकारों के विषय में भी स्वतंत्र व समान रहते हैं ।
समानता का अर्थ :-
समानता उस परिस्थिति का नाम है , जिसके कारण सभी व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु समान अवसर प्राप्त हो सके , तथा साथ ही सामाजिक विषमता के कारण उत्पन्न होने वाली असमानताओं को समाप्त किया जा सके । समाज में सभी व्यक्तियों को एक समान किए जाने की अवधारणा संभव नहीं है । क्योंकि प्रकृति ने सभी को रंग - रूप , आकार , शारीरिक बनावट तथा मानसिक रूप से अलग - अलग बनाया है ।
लास्की के अनुसार समानता का यह अर्थ नहीं कि " प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए अथवा प्रत्येक व्यक्ति को समान वेतन दिया जाए " यदि ईंट ढोने वाले का वेतन एक प्रसिद्ध गणितज्ञ या वैज्ञानिक के बराबर कर दिया जाए तो इससे समाज का उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा । इसलिए समानता का अर्थ यह है कि कोई विशेष अधिकार वाला वर्ग न रहे । और सबको उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों ।
बार्कर के अनुसार -
समानता का यह अर्थ है कि " अधिकारों के रूप में जो सुविधाएं मुझे प्राप्त है वैसी ही और उसी मात्रा में वे सुविधाएं दूसरों को भी उपलब्ध हो । तथा दूसरों को जो अधिकार प्रदान किए जाएं , वह मुझे भी अवश्य प्राप्त होने चाहिए ।
समानता के आधारभूत तत्व :-
◆ समान लोगों के साथ समान व्यवहार करना ही समानता है । ◆ सभी लोगों को विकास के समान अवसर प्राप्त हो ।
◆ समाज एवं राज्य सभी लोगों के साथ समान आचरण एवं व्यवहार करें ।
◆ मानवीय गरिमा तथा अधिकारों को समान संरक्षण प्राप्त हो ।
◆ प्रत्येक व्यक्ति को समाज में समान महत्व दिया जाए । ◆समाज में किसी भी व्यक्ति के साथ जाति , धर्म , भाषा , वर्ण , लिंग , निवास स्थान या संपत्ति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाए ।
समानता के प्रकार या रूप :-
1. नागरिक समानता -
नागरिक समानता से तात्पर्य है - कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और कानून की दृष्टि से ऊंच-नीच , गरीब - अमीर , धर्म तथा नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए । हमारे देश में संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 14 द्वारा सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता और विधि के समक्ष समान संरक्षण प्रदान किया गया है ।
2. राजनीतिक समानता :-
राजनीतिक समानता से तात्पर्य है कि राज्य के सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के राज्य के कार्यों में भाग लेने की समानता हो । राज्य सभी वयस्क नागरिक जो अन्य योग्यताएं पूर्ण करते हो उन्हें समान रूप से मताधिकार , राजनीतिक पद के लिए उम्मीदवार के रूप में खड़ा होना एवं सार्वजनिक पदों को प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो ।
राजनीतिक समानता , प्रजातंत्र की आधारशिला है ।
3. सामाजिक समानता :-
सामाजिक दृष्टि से सभी व्यक्ति समान हो । किसी को विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हो । समाज में सभी को विकास के समान अवसर व सहभागिता मिलें ।
4. आर्थिक समानता :-
आर्थिक समानता से तात्पर्य यह है कि समाज में आर्थिक विषमता कम से कम रहे , लोगों के जीवन स्तर में बहुत अधिक अंतर न हो , सब को उन्नति व विकास के समान अवसर मिले तथा कोई विशेष अधिकारों वाला वर्ग न हों । आर्थिक समानता तभी स्थापित हो सकती है , जब सभी को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो , सभी को समान कार्यों के लिए समान वेतन मिले , प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति का अवसर प्राप्त हों , सभी को रोजगार के उचित अवसर प्राप्त हों ।
5. सांस्कृतिक समानता :-
सांस्कृतिक समानता से आशय है कि राज्य के द्वारा बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक वर्गों के साथ समान व्यवहार किया जाए , सभी नागरिकों को अपनी भाषा , लिपि एवं संस्कृति की रक्षा के लिए समुचित अवसर हों ।
भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को अपनी लिपि , भाषा एवं संस्कृति की रक्षा करने और उसे बनाए रखने का अधिकार देकर सांस्कृतिक समानता की स्थापना की गई है ।
6. प्राकृतिक समानता -
प्राकृतिक समानता के प्रतिपाठकों का यह मानना है कि प्रकृति ने सभी मनुष्य को समान बनाया है । इसलिए प्रकृति के अनुसार सभी मनुष्य समान है । लेकिन वर्तमान समय में प्राकृतिक समानता का सिद्धांत मान्य नहीं है , वास्तव में प्रकृति ने सभी मनुष्य को सम्मान नहीं बनाया है । सभी मनुष्य शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से सम्मान नहीं है । अतः प्राकृतिक समानता का आशय यह है कि राज्य द्वारा सभी मनुष्यों को समान मानकर सभी को उन्नति तथा विकास के समुचित अवसर प्रदान किए जाएंगे ।
7. कानूनी समानता -
कानूनी समानता आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों की एक विशेष अवधारणा है । कानूनी समानता के माध्यम से ही सामाजिक विषमताओं का अंत किया जा सकता है । कानूनी समानता में दो बातें निहित है - पहली , कानून के समक्ष समानता अर्थात कानून की दृष्टि में सभी नागरिक समान है । सभी के लिए एक ही प्रकार के कानून है । दूसरी , कानून का समान संरक्षण । अर्थात कानून के द्वारा सभी को सम्मान रूप से रक्षा की जाती है । तथा व्यक्ति को सभी दंडित किया जाता है , जब उसने किसी कानून का उल्लंघन किया हो ।
8. अवसर की समानता :-
इस समानता से अभिप्राय है कि राज्य अपने सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समुचित विकास के लिए समान अवसर प्रदान करता है । समान अवसरों को प्रदान करने में राज्य जाति , धर्म , लिंग , वर्ण , नस्ल आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता । तथा सभी नागरिकों को शिक्षा , नौकरी व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर प्रदान होने चाहिए ।
9. शिक्षा की समानता :-
शिक्षा की समानता से आशय है कि बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने से है । लेकिन राज्य द्वारा समाज के कमजोर व पिछड़े वर्गों के लिए विशेष सुविधाएं प्रदान करना , समानता का हनन नहीं है ।
स्वतंत्रता और समानता के में संबंध :-
स्वतंत्रता और समानता में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है । क्योंकि यह दोनों ही अवधारणाएं व्यक्ति के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है , लेकिन फिर भी इन दोनों ही अवधारणाओं के संबंध में एकमत नहीं है । अतः इनके संबंधों को दो अलग-अलग रूपों में समझा जा सकता है -
1. स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी है -
इस मत के समर्थक मानते हैं कि स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे की विरोधी है । जैसे लार्ड एक्टन का मानना है कि " समानता के आवेश में स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है " । इस विचार के समर्थकों का मत है कि जहां स्वतंत्रता है , वहां समानता नहीं रह सकती और जहां समानता है वहां स्वतंत्रता नहीं रह सकती । इस विचार को मानने वाले विचारक कहते हैं कि असमानता तो हमें प्रकृति से मिली है , स्वयं प्रकृति में हमें अनेक प्रकार की विविधता देखने को मिलती है । जैसे कहीं नदी , पहाड़ तो , कहीं मैदान है । सभी व्यक्ति समान रूप से योग्य नहीं होते हैं , अतः योग्य और अयोग्य व्यक्ति की कैसे सम्मान किया जा सकता है ।
2. स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे की पूरक है -
इस मत के समर्थक रूसो , पोलार्ड , हरबर्टन डिन इस विचार के संबंध में रूसों ने लिखा है कि " समानता के बिना स्वतंत्रता जीवित नहीं रह सकती "।
पोलार्ड के अनुसार " स्वतंत्रता की समस्या का एकमात्र समाधान समानता में निहित है । वस्तुतः व्यक्ति का विकास दोनों के संरक्षण में ही हो सकता है " ।
गांधीजी के अनुसार - " स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु व्यक्तित्व के विकास की अवस्थाओं की प्राप्ति है नियंत्रणहीन स्वतंत्रता स्वच्छदता है , तो बंधन मुक्त स्वतंत्रता निरर्थक है ।
होब्स के अनुसार - " एक भूख से मरते हुए व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का क्या लाभ है , वह स्वतंत्रता को न तो खा सकता है और न पी सकता है ।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे की पूरक है । राजनीतिक समानता के बिना स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाएगी और नागरिक समानता के अभाव में स्वतंत्रता का उपयोग करने का अवसर ही नहीं मिलेगा । सामाजिक समानता के अभाव में कुछ लोगों का विशेषाधिकार हो जाए और आर्थिक समानता की अनुपस्थिति में संपत्ति का केंद्रीकरण पूंजीपतियों तक सीमित हो जाएगा ।
हर्बर्ट डिन ने स्वतंत्रता और समानता के पारस्परिक संबंधों के विषय में लिखा है कि " स्वतंत्रता में समानता निहित है । स्वतंत्रता और समानता में परस्पर द्वंद नहीं और ना ही एक दूसरे से पृथक है बल्कि एक ही आदर्श के दो तथ्य है ।