स्वतंत्रता
स्वतंत्रता
स्वतंत्रता अंग्रेजी भाषा के लिबर्टी (Liberty) शब्द का हिंदी रूपांतरण है । जिसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के लिबर शब्द हुई है । जिसका शाब्दिक अर्थ है - बंधनों का अभाव ।
व्यापक रूप से स्वतंत्र का एक शब्द नहीं एक आंदोलन है । जैसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में असंख्य लोगों ने अपना बलिदान स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किया , जो एक पवित्र त्याग था । अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम हो या फ्रांस की राज्यक्रांति सभी का केंद्रीय पक्ष स्वतंत्रता प्राप्ति ही था ।
स्वतंत्रता के संबंध में प्रमुख विचार :-
पैट्रिक हेनरी के विचार - " मुझे स्वतंत्रता दीजिए या मृत्यु " ।
बाल गंगाधर के विचार -" स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा "।
इतिहासकार रिची के अनुसार - " जीवन के अधिकार के बाद साधारणतया स्वतंत्रता के अधिकार का नाम लिया जाता है और बहुत से व्यक्तियों के लिए यह प्राथमिक और सबसे आवश्यक अधिकार है " ।
स्वतंत्रता के संबंध में दो विचार है -
i) बंधनों का अभाव या प्रतिबंधों से मुक्त होना ।
ii) युक्तियुक्त प्रतिबंधों का होना ।
इन्हीं दोनों विचारों के आधार पर स्वतंत्रता का अर्थ नकारात्मक एवं सकारात्मक रूप में समझा जा सकता है ।
स्वतंत्रता का नकारात्मक अर्थ :-
स्वतंत्रता की अवधारणा में यह माना जाता है कि सभी प्रकार के बंधनों का अभाव ही स्वतंत्रता है । इस अवधारणा के समर्थकों में समझौतावादी विचारकों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है । व्यक्तिवादी विचारक भी इसके समर्थक थे ।
होब्स के अनुसार - " स्वतंत्रता का अभिप्राय नियंत्रण का सर्वथा अभाव है " । रूसो भी इसी विचार से प्रभावित था ।
व्यक्तिवादी विचारक जे. एस. मिल का कहना है कि अंतःकरण , धर्म , विचार , प्रकाशन , व्यवसाय में दूसरों के साथ संबंध बनाने के क्षेत्र में व्यक्ति को निर्बाध छोड़ देना चाहिए । जे.एस.मिल ने इसी संबंध में कहा है कि राज्य को व्यक्ति के निजी कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ।
नकारात्मक विचार धारा की मान्यता है -
◆ प्रतिबंधों का अभाव स्वतंत्रता है ।
◆ राज्य के कार्य क्षेत्र में विस्तार के साथ-साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित होती जाती है ।
◆ कम से कम शासन करने वाली सरकार अच्छी है ।
◆ सरकार द्वारा समर्थित संरक्षण व्यक्तिगत हित मैं ठीक नहीं है ।
◆ मानव विकास के लिए खुली प्रतियोगिता का सिद्धांत हितकर है ।
वैश्वीकरण के वर्तमान युग में जहां मनुष्य परस्पर निर्भर रहता है । स्वतंत्रता का यह अर्थ तार्किक नहीं है ।
स्वतंत्रता का सकारात्मक अर्थ :-
स्वतंत्रता की यह अवधारणा सबके लिए समान स्वतंत्रता की पक्षधर है । हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार - " प्रत्येक व्यक्ति वह सब करने को स्वतंत्र है जिसकी वह इच्छा करता है यदि वह इस दौरान अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता का हनन नहीं करता हों "।
थॉमस पेन के अनुसार - " स्वतंत्रता उन बातों को करने का अधिकार है , जो दूसरों के अधिकारों के विरुद्ध न हों "।
महात्मा गांधी भी इसी विचारधारा के समर्थक थे ।
गांधीजी के अनुसार - " स्वतंत्रता को नियंत्रण के अभाव के रूप में नहीं बल्कि व्यक्तित्व के विकास की अवस्था की प्राप्ति के रूप में देखते हैं " । इस रूप में स्वतंत्रता का अर्थ उन परिस्थितियों से जो व्यक्ति को एक उन्मुक्त या जीवन - जीने के लिए प्रेरित करें एवं जीवन को सुरक्षित रख सके , उसको जीवन यापन के संसाधन जुटाने के अवसर प्राप्त हो , वह अपने विचारों को प्रकट कर सके एवं व्यक्तित्व का विकास कर सकें ।
स्वतंत्रता की सकारात्मक विचारधारा की मान्यताएं निम्नलिखित है :-
◆ स्वतंत्रता पर युक्ति युक्त प्रतिबंध आवश्यक है ।
◆ समाज एवं व्यक्ति के हित परस्पर निर्भर है ।
◆ स्वतंत्रता का वास्तविक स्वरूप राज्य के कानूनों के पालन में है ।
◆ राजनीतिक एवं नागरिक स्वतंत्रता का मूल्य आर्थिक स्वतंत्रता के बिना निरर्थक है ।
◆ स्वतंत्रता के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए दूसरों की स्वतंत्रता को मान्यता देना आवश्यक है ।
स्वतंत्रता के विभिन्न रूप या प्रकार :-
1. प्राकृतिक स्वतंत्रता :-
यह प्रकृति प्रदत्त स्वतंत्रता है । जो व्यक्ति को जन्म के समय ही प्राप्त हो जाती है । व्यक्ति स्वयं भी इसका स्थानांतरण नहीं कर सकता है । यह स्वतंत्रता राज्य के अस्तित्व में आने से पूर्व की अवस्था है । इस विचार के समर्थकों का मानना है कि राज्य की स्थापना के साथ यह स्वतंत्रता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है । रूसो ने इस संबंध में कहा है कि " मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है किंतु वह सर्वत्र बंधनों से जकड़ा रहता है " । सभी समझौतावादी विचारक इस स्वतंत्रता के समर्थक है ।
2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता :-
इस स्वतंत्रता का संबंध व्यक्ति की जीवन शैली से है । इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति को अपने निजी जीवन के कार्यों जैसे अपनी पसंद , विचार अभिव्यक्ति , वेशभूषा , खानपान , रहन-सहन , परिवार , धर्म आदि में स्वतंत्रता होनी चाहिए । लोकतांत्रिक देशों में इस प्रकार की स्वतंत्रता को बहुत महत्व दिया गया है किंतु जब इसका प्रभाव समाज पर विपरीत पढ़ने लगे तो इस पर नियंत्रण आवश्यक हो जाता है ।
3. नागरिक स्वतंत्रता :-
हमारे देश में मौलिक अधिकारों के रूप में संविधान द्वारा प्रदत है ये वे स्वतंत्रताएं है जिन्हें देश का नागरिक होने के कारण स्वीकार करता है । और राज्य मान्यता प्रदान कर उनका संरक्षण करता है ।
गैटेल के अनुसार - " स्वतंत्रता उन अधिकारों और विशेषाधिकारों को कहते हैं जिनको राज्य अपने नागरिकों के लिए उत्पन्न करता है और रक्षा करता है " ।
4. राजनीतिक स्वतंत्रता :-
राज्य के कार्यों एवं राजनीतिक व्यवस्था में लोगों की भागीदारी को ही राजनीतिक स्वतंत्रता कहते हैं ।
गिलक्रिस्ट ने इसे लोकतंत्र का दूसरा नाम कहा है ।
यह वह स्वतंत्रता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को मतदान करने , चुनाव में भाग लेने व सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति पाने का अधिकार है । जब अपनी आकांक्षा की अभिव्यक्ति तथा राजशक्ति के प्रयोग के अधिकार सर्व-साधारण जनता के हाथों में आ जाते हैं , तो राजनीतिक स्वतंत्रता स्थापित हो जाती है । सरकार का जनता के अधीन रहना और जनमत के अनुसार कार्य करना राजनीतिक स्वतंत्रता का द्योतक है ।
5. आर्थिक स्वतंत्रता :-
आर्थिक स्वतंत्रता को सभी स्वतंत्रताओं का आधार माना गया है । आर्थिक स्वतंत्रता से अभिप्राय है व्यक्ति का आर्थिक स्तर ऐसा होना चाहिए जिसमें वह स्वाभिमान के साथ बिना किसी वित्तीय चुनौती के स्वयं तथा अपने परिवार का जीवन यापन आसानी से कर सकें । इसमें व्यवसाय चुनने तथा रोजगार की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है ।
6. धार्मिक स्वतंत्रता :-
इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक विचारों से है । इसके अंतर्गत व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने आस्था व आचरण की छूट का प्रावधान है । इस स्वतंत्रता में धर्म के संस्कार , रीति- रिवाज , पूजा के तरीके , संस्थाओं के गठन व धर्म के प्रचार की आजादी है ।
7. नैतिक स्वतंत्रता :-
इसका संबंध व्यक्ति के चरित्र , नैतिकता तथा औचित्य पूर्ण व्यवहार से है । अंतः करण और नैतिक गुणों से प्रभावित होकर किया जाने वाला कार्य नैतिक स्वतंत्रता कहलाता है । स्वार्थ , लोभ , क्रोध , घृणा , दुष्प्रभाव जैसी चारित्रिक दुर्बलताओं के वशीभूत होकर कार्य करने वाला व्यक्ति नैतिक परतंत्रता की श्रेणी में आता है ।
8. सामाजिक स्वतंत्रता :-
सामाजिक स्वतंत्रता , सामाजिक समानता व न्याय की जननी मानी जाती है । व्यक्ति के साथ जाति , वर्ण , लिंग , नस्ल व धर्म के आधार पर भेदभाव न किया जाना स्वतंत्रता है । कानून के समक्ष सबको समानता व समान कानूनी संरक्षण प्राप्त हों । यही सामाजिक स्वतंत्रता है ।
9. राष्ट्रीय स्वतंत्रता :-
कोई राष्ट्र जब संप्रभु राज्य बन जाता है । तो यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रतीक है , अर्थात वह अन्य देशों के आदेशों की पालन से मुक्त हो जाते हैं । उपनिवेशवाद इसका सबसे बड़ा शत्रु है । राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बिना व्यक्ति की अन्य सभी स्वतंत्रताएं गौण है ।
10. संवैधानिक स्वतंत्रता :-
यह स्वतंत्रता नागरिकों को संविधान द्वारा दी जाती है । संविधान इनकी रक्षा की गारंटी देता है और शासन इनमें कटौती नहीं कर सकता । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 में नागरिकों के लिए संवैधानिक उपचारों के अधिकार की व्यवस्था की गई है ।