भारत का संविधान
भारत के संविधान की विशेषताएं -
संविधान का अर्थ -
संविधान किसी देश के लिखित में लिखित आधारभूत कानूनों का संग्रह होता है ।
इन कानूनों के द्वारा यह देश की सरकार के विभिन्न अंगों अर्थात व्यवस्थापिका कार्यपालिका व न्यायपालिका का स्वरूप तय करता है उनकी शक्तियों व सीमाओं का फैसला करता है साथ ही यह सरकार और नागरिकों की आपसी संबंधों का निर्धारण करता है और यह बताता है कि नागरिकों के क्या अधिकार होंगे और क्या कर्तव्य होंगे ।Q. हमारा संविधान एक मजबूत संविधान है कैसे ?
Ans . भारत की संविधान निर्माताओं ने हमारे देश की ऐतिहासिक ,सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण किया है और उनका लक्ष्य एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना था ।
भारतीय संविधान की विशेषताएं -
1. लोकप्रिय प्रभुसत्ता पर आधारित संविधान -
भारत का संविधान लोकप्रिय प्रभुसत्ता पर आधारित संविधान है अर्थात यह भारतीय जनता द्वारा निर्मित संविधान है इस संविधान द्वारा अंतिम शक्ति भारतीय जनता को प्रदान की गई है संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम भारत के लोग दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा से आज दिनांक 26 नवंबर 1949 ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी ) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित आत्मा अर्पित करते हैं ।
2. प्रस्तावना या उद्देशिका
भारतीय संविधान के मौलिक उद्देश्य एवं लक्ष्य को संविधान की प्रस्तावना में दर्शाए गया है ।
■ डॉक्टर के एम मुंशी ने इसे '' संविधान की राजनीतिक कुंडली " का है ।
■ इसके महत्व के कारण '' ठाकुर दुर्गा दास भार्गव ने इसे ''संविधान की आत्मा ''का है
मूल प्रस्तावना में समाजवादी पंथनिरपेक्ष तथा अखंडता जैसे शब्दों को 42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया
डॉक्टर के एम मुंशी ने संविधान की प्रस्तावना की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि इसमें राष्ट्र की एकता और व्यक्ति की गरिमा को विशेष महत्व दिया गया है ।
3. विश्व का सबसे विशाल संविधान -
भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है मूल रूप में 395 अनुच्छेद वह 8 अनुसूचियां थी जबकि वर्तमान में 101 संविधान संशोधन के बाद इसमें 395 अनुच्छेद 22 भाग 12 अनुसूचियां व पांच परिशिष्ट है भारतीय संविधान की तुलना में -
● संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में अनुच्छेद 7
● कनाडा के संविधान में 147 अनुच्छेद
● ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 अनुच्छेद
● दक्षिण अफ्रीका के संविधान में 153 अनुच्छेद
● स्विट्जरलैंड के संविधान में 195 अनुच्छेद
4. लिखित व निर्मित संविधान -
भारत का संविधान अमेरिका , कनाडा व स्विट्जरलैंड जैसे संघीय संविधान की भांति लिखित व निर्मित संविधान है भारतीय सविंधान निर्माण में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा ।
5. संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य -
संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में पूर्ण रुप से स्वतंत्र है इस अर्थ में यह प्रभुसत्ता संपन्न देश है देश की प्रभुसत्ता जनता के हाथ में है शासन जनता का है जनता के द्वारा है जनता के लिए चलाया जाता है अतः भारत में लोकतांत्रिक पद्धति को अपनाया गया है ।
भारत गणराज्य है
क्योंकि यहां का राष्ट्राध्यक्ष अर्थात राष्ट्रपति वंशानुगत में होकर जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित किया जाता है ।
6. संसदीय शासन व्यवस्था -
भारत में इंग्लैंड की वेस्टमिनिस्टर प्रणाली को अपनाया गया है इस प्रणाली में कार्यपालिका व्यवस्थापिका की प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होती है देश के राष्ट्र अध्यक्ष का पद गरिमा व प्रतिष्ठा का होता है परंतु उसकी स्थिति संवैधानिक प्रधान की होती है वास्तविक शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल द्वारा किया जाता है संसद का विश्वास समाप्त हो जाने पर मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना होता है इस व्यवस्था में प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल का नेतृत्व करता है भारत में संसदीय व्यवस्था को केंद्र के साथ-साथ राज्यों में भी अपनाया गया है जहां राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है ।
7. मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य -
मानवोचित जीवन जीने तथा व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए भारत के संविधान निर्माताओं ने देश के नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार प्रदान किये, किंतु 44 वें संविधान संशोधन 1978- 79 के पश्चात अब उनकी संख्या मूल अधिकारों की संख्या 6 रह गई है ।
◆समानता का अधिकार
◆ स्वतंत्रता का अधिकार
◆ शोषण के विरुद्ध अधिकार
◆धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
◆संस्कृति व शिक्षा संबंधी अधिकार
◆संवैधानिक उपचारों का अधिकार
यह सभी अधिकार वाद योग्य है क्योंकि इन अधिकारों का हनन होने पर नागरिक न्यायालय की शरण ले सकते हैं 86 वे संविधान संशोधन दिसंबर 2002 चौकी जुलाई 2009 में संसद में पारित किया गया एवं 1 अप्रैल 2010 को लागू किया इसके द्वारा प्रारंभिक शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में संविधान में शामिल कर दिया गया अब अनुच्छेद 21 के बाद एक नया अनुच्छेद 21a जोड़ा गया जिसके अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को अनिवार्य वह निशुल्क शिक्षा प्राप्त हो इसकी व्यवस्था करना राज्य का दायित्व है ।
42 वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा नागरिकों के 10 मूल कर्तव्यों को निर्धारित किया गया जिनका पालन करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व इसमें संविधान का पालन करना भारत की एकता संप्रभुता एवं अखंडता की रक्षा करना भाईचारे की भावना का विकास करना प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा करना आदि प्रमुख कर्तव्य है 46 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के द्वारा 6से 14तक के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने संबंधी मूल कर्तव्य जोड़ा गया अतः वर्तमान में मूल कर्तव्यों की संख्या 11 है ।
8. नीति निर्देशक तत्व -
राज्य के नीति निर्देशक तत्व आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक के नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन किया गया है सामाजिक आर्थिक विकास न्याय व समता के उद्देश्यों को सामने रखते हुए निर्देशक तत्व सरकार के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं इनके क्रियान्वयन के लिए सरकार बाध्य नहीं है यह वाद योग्य नहीं है यह सरकार के लिए सकारात्मक निर्देश है चीन की उपेक्षा किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है यह लोक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक तत्व है ।
9. समाजवादी राज्य -
42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा भारत को समाजवादी गणराज्य घोषित किया गया मूल संविधान में इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था क्योंकि संविधान निर्माता भावी पीढ़ियों पर किसी विचारधारा को आरोपित नहीं करना चाहते थे और समाज में कम से कम भेदभाव की अवस्था हो ।
10. पंथनिरपेक्ष राज्य -
धार्मिक मामलों में राज्य ने एक तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया है यह ने तो किसी धर्म विशेष को राज्य धर्म मानता है मैं किसी समुदाय को समर्थन देता है धर्म के क्षेत्र में प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता प्रदान करता है जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 25 में है इसमें कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वतंत्रता है कि वह किसी भी धर्म को मानने या उसका पालन करें धर्म के आधार पर राज्य किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान है संविधान सभा में मूल संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग नहीं किया गया किंतु 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया ।
11. वयस्क मताधिकार -
हमारे देश के संविधान में 18 वर्ष की आयु प्राप्त प्रत्येक नागरिक को समान रूप से मताधिकार प्रदान किया गया यद्यपि मूल संविधान में वयस्क मतदाता की आयु 21 वर्ष थी किंतु संविधान में 61 वें संविधान संशोधन 1989 के द्वारा व्यस्क मतदाता की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया ।
12. विलक्षण दस्तावेज-
संविधान निर्माताओं की बुद्धिमता दूरदृष्टि का प्रमाण है कि उन्होंने संविधान में जनता द्वारा मान्य आधारित मूल्यों व सर्वोच्च आकांक्षाओं को स्थान दिया इसलिए भारतीय संविधान एक विलक्षण दस्तावेज है।
13. संघात्मक और एकात्मक तत्व का मिश्रण -
संविधान निर्माता एक ऐसे संघ का निर्माण करना चाहते थे जिसमें केंद्र सरकार एकता बनाए रखें और राज्यो को भी स्वाययता मिले । इसलिए इसमें संघात्मक और एकात्मक तत्वों का मिश्रण है संविधान में ऐसे अनेक प्रावधान है जो केंद्र को राज्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बनाते हैं जैसे केंद्र को राज्य की अपेक्षा ज्यादा शक्तियां समवर्ती सूची में केंद्र के निर्णय की स्वीकृति लेना अवशिष्ट शक्तियां केंद्र के पास आपातकाल में केंद्र का राज्य पर नियंत्रण इकहरी नागरिकता एकीकृत न्याय व्यवस्था अखिल भारतीय सेवाएं संसद को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार राष्ट्रपति के द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति राज्यों की केंद्र पर निर्भरता आदि ऐसे विषय हैं जिन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र को दिया गया है अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतीय संघ विश्व की अन्य विशेषताओं से है ।
14. कठोरता एवं लचीलापन का मिश्रण -
भारतीय संविधान कटोरवा लचीलापन का मिश्रण संविधान संशोधन की प्रक्रिया द्वारा इसके कठोर लचीलापन का निर्धारण किया जाता है भारत में दोनों प्रक्रियाओं को अपनाया गया संविधान के कुछ भागों का संशोधन सरल व कुछ भागों का जटिल है संविधान में कठोरता का जो समावेश है वह संयुक्त राज्य अमेरिका एवं लचीलापन का समावेश ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है ।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन की दो विधियां दी गई है व्यवहार में एक तीसरी विधि भी है कुछ विषय यह संसद के दोनों सदनों के साधारण बहुमत से संशोधित किए जाते हैं जैसे राज्यों का पुनर्गठन राज्यों में विधान परिषदों की स्थापना व समाप्ति केंद्र शासित प्रदेश बनाना संसद सदस्यों के वेतन भत्ते में भर्ती करना आदि
(1) भारत के संविधान के कुछ अनुच्छेदों को संशोधित करने के लिए संसद के दोनों सदनों की पूर्ण बहुमत अदा उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है संविधान के भाग 3 में 4 के अनुच्छेद इस श्रेणी में आते हैं ।
(2) संविधान के कुछ अनुच्छेद संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के पूर्ण बहुमत था उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत तथा आदि राज्यों की विधानसभाओं का समर्थन आवश्यक है राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति केंद्र व राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन आदि विषयों के संशोधन के लिए यह जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है ।
15. न्यायपालिका की स्वतंत्रता -
संविधान की सर्वोच्चता प्रजातंत्र की रक्षा व नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है भारत में न्यायिक स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई व्यवस्थाएं की गई है भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है तथा इन्हें महाभियोग द्वारा पद से हटाया जा सकता है कार्यपालिका के आदेश तथा व्यवस्थापिका के कानून यदि इस संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं तो न्यायपालिका को ने अवैध घोषित करने का अधिकार है नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण परमादेश प्रति से उतरे क्षण वह अधिकार पृच्छा जैसे लेखों को जारी किया जा सकता है इन सभी व्यवस्थाओं के माध्यम से न्यायिक स्वतंत्रता के उद्देश्यों को प्राप्त करने की व्यवस्था की गई है ।
16. न्यायिक पुनरावलोकन व संसदीय संप्रभुता का समन्वय -
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांत व संसदीय संप्रभुता के मध्य मार्ग को अपनाया गया है हमारे संविधान में संसद को सर्वोच्च बनाया गया है साथ ही उस को नियंत्रित करने के लिए सर्वोच्च न्यालय को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार प्रदान किया गया है न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय कार्यपालिका के आदेशों तथा संसद द्वारा निर्मित कानून को अवैध घोषित कर सकता है जो संविधान की मूल भावना के अनुकूल न हो ।
17. विश्व शांति का समर्थक -
वसुदेव कुटुंबकम सिद्धांत को अपनाते हुए भारतीय संविधान में विश्व शांति का समर्थन किया है संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य का यह कर्तव्य है कि अंतरराष्ट्रीय शांति सुरक्षा व राष्ट्रों के बीच न्याय पूर्ण में सम्मानजनक संबंधों की स्थापना करें भारत ने तो किसी देश की सीमा व आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहता है उन्हें अपने देश में किसी देश के हस्तक्षेप को बर्दाश्त करता है भारत सरकार ने इसी भावना के अनुरूप पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया है ।
18. आपातकालीन उपबंध -
संविधान के भाग 18 में आपातकालीन उपबंधो का उल्लेख किया गया है ,अनुच्छेद 352 में युद्ध बाहरी आक्रमण एवं आंतरिक सशस्त्र विद्रोह के कारण अनुच्छेद 356 राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाने की स्थिति में तथा 360 वित्तीय संकट के कारण आपातकाल लागू होने पर संपूर्ण देश या देश के किसी बात का शासन राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है और देश का संघीय स्वरूप एकात्मक हो जाता है ।
19. एकल नागरिकता-
भारतीय संविधान द्वारा संघात्मक शासन की व्यवस्था की गई है और सामान्यतः संज्ञा राज्यों के नागरिकों के दोहरी नागरिकता प्राप्त होनी चाहिए प्रथम संघ की नागरिकता दूसरी राज्य की नागरिकता लेकिन भारतीय संविधान निर्माताओं का विचार था कि दोहरी नागरिकता भारत की एकता को बनाए रखने में बाधक हो सकती है अतः संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान में संघ राज्य की स्थापना करते हुए एक तो नागरिकता के आदर्श को ही अपनाया है।
20. लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श -
संविधान के नीति निर्देशक तत्वों से यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान के माध्यम से एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श निश्चित किया गया इस हेतु केंद्र व राज्य सरकारी नागरिकों को पौष्टिक भोजन आवास वस्त्र शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधाएं उपलब्ध कराएं नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाए जहां तक संभव हो आर्थिक समानता की स्थापना की जाए केंद्र व राज्य सरकार संविधान में दिए गए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है जिसके लिए नियोजन की पद्धति को अपनाया गया है ।
21. अल्पसंख्यक एवं पिछड़े वर्गों के कल्याण की विशेष व्यवस्था -
भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक की धार्मिक भाषाई और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई है इसके अतिरिक्त संविधान अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के नागरिकों को सेवाओं में संसद विधानसभाओं और अन्य क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है प्रारंभ में यह व्यवस्था 26 जनवरी 1960 थी संविधान के अनुच्छेद 330 332 के तहत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को लोकसभा व विधानसभाओं में आरक्षण प्रदान किया गया है प्रारंभ में यह व्यवस्था 25 जनवरी 1960 तक के लिए की गई थी किंतु संविधान में संशोधन कर इसकी समय सीमा को बढ़ाया जाता रहा अब 95 संविधान संशोधन 2010 के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को 25 जनवरी 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया है अनुच्छेद 335 में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्र सरकार की सेवाओं में सितंबर 1993 से 27% आरक्षण लागू किया गया।
संविधान की प्रस्तावना का विस्तृत वर्णन :-
प्रत्येक संविधान के प्रारंभ में एक प्रस्तावना होती है जिसके द्वारा संविधान के मूल उद्देश्य वह लक्ष्य को स्पष्ट किया जाता है जिसे संविधान की क्रिया विधि तथा उसका पालन संविधान की मूल भावना से किया जा सके संविधान के गौरवपूर्ण मूल्यों को संविधान की प्रस्तावना में रख दें ।
प्रस्तावना में संशोधन -
संविधान के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 2 के द्वारा प्रस्तावना में पहली बार संशोधन किए गए जो इस प्रकार से है -
[1] प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य के स्थान पर संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र के प्रति स्थापित किया गया ।
[2] राष्ट्र की एकता के स्थान पर राष्ट्र की एकता और अखंडता को प्रतिस्थापित किया गया ।
इन संशोधनों के बाद संविधान की वर्तमान प्रस्तावना कुछ इस प्रकार से है
" हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी , पंथनिरपेक्ष , लोकतंत्र राज्य बनाने के लिए उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय , विचार अभिव्यक्ति, विश्वास , धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा व अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा मैं आज तारीख 26 नवंबर 1949 ईस्वी ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी ) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मा अर्पित करते हैं । "
प्रस्तावना की विस्तृत विवेचना
प्रस्तावना की विस्तृत विवेचना :-
1. घोषणात्मक भाग :-
2. उद्देश्य भाग :-
3. विवरणात्मक भाग :-
(A.) सामाजिक आर्थिक , राजनीतिक न्याय , सामाजिक न्याय
( B.) स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व :-
( C ) व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता और अखंडता :-
धन्यवाद