क्षेत्रवाद क्या है ।। इसके दुषपरिणाम ।। भाषावाद

 क्षेत्रवाद के बारे में - क्षेत्रवाद क्या है ।। इसके दुषपरिणाम ।। भाषावाद

क्षेत्रवाद का अर्थ -

 क्षेत्रवाद से अभिप्राय है कि स्थानीय निवासियों के द्वारा संघ या राज्य की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष अथवा राज्य या प्रांत से लगाओ यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें क्षेत्र विशेष के लोग अपने लिए आर्थिक सामाजिक राजनीतिक शक्तियों की अधिक से अधिक मांग करते हैं |

क्षेत्रवाद के कारण -

भारत में क्षेत्रवाद पनपने की कुछ कारण इस प्रकार से हैं - 

1. प्रकृति प्रदत भिन्नताएं व  असमानताएं - 

 

 भारत में भौगोलिक भिन्नता भी क्षेत्रवाद के लिए उत्तरदाई रही है भारत चार भौगोलिक क्षेत्रों में बटा हुआ है 

- उत्तर का पर्वतीय प्रदेश 

- गंगा सिंधु का विशाल मैदान 

- दक्षिण का पठार पश्चिम का 

- रेगिस्तानी क्षेत्र इन अलग-अलग क्षेत्रों में विशिष्ट समस्याएं उत्पन्न हुई है और इन क्षेत्रों में असंतुलन पैदा हो गया है

2. प्रशासन द्वारा संसाधनों के समान वितरण का अभाव या प्रशासनिक भेदभाव -

 प्रशासनिक कारणों से भी विभिन्न राज्यों के विकास में अंतर रहा है कुछ राज्यों ने अपनी प्रभावशाली औद्योगिक नीति के कारण विकास किया तो कुछ में प्रशासनिक व्यवस्था के कमजोर होने के कारण विकास धीमी गति से हो रहा है । 

3. केंद्रीय निवेश तथा विकास संबंधी भिन्नता -

क्षेत्रवाद का प्रमुख कारण केंद्रीय निवेश व विकास संबंधी भिन्नता रही है क्योंकि जब केंद्र सरकार के द्वारा निवेश किया जाता है किसी विकास संबंधी योजना के अंतर्गत वह भी असमान रूप से किया जाता है जिसके कारण क्षेत्रवाद की भावनाएं उत्पन्न हो जाती है ।

4. ऐतिहासिक कारण- 

भारत में कुछ शक्तिशाली राजाओं ने संपूर्ण भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित किया लेकिन विशाल आकार और यातायात के साधनों के अभाव के कारण अखंड केंद्रीय राज्य में अधिक समय तक नहीं चल सके ।

5. राजनीतिक कारण - 

स्वतंत्रता से पूर्व ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए सुधारों के परिणाम स्वरुप कुछ क्षेत्रों में सुधार के विशेष प्रयास किए गए जबकि कुछ उपेक्षित रह गए इस असमानता की स्थिति ने भी क्षेत्रवाद को जन्म दिया ।

6. सांस्कृतिक विविधता - 

भारत विभिन्न सांस्कृतिक विभिन्नताओं तथा परंपराओं का देश होने के कारण या उच्च सांस्कृतिक समूह में परस्पर सांस्कृतिक भिन्नता है यही सांस्कृतिक भिन्नता क्षेत्रवाद का कारण ।

7. भाषावाद - 

 भारत में भाषागत विविधता रही है तथा भाषा के आधार पर अनेक राज्यों का निर्माण हुआ है राज्य सरकारों की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण भाषा के आधार पर किया गया है 


भारत में क्षेत्रवाद के दुष्परिणाम - 

1. देश की अखंडता को चुनौती - 

क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बलवृद्धि होने  में राष्ट्र की एकता अखंडता को गौण  रख दिया जाता है यहां तक कि इसके उग्र स्वरूप में तो कई बार अलगाववाद का भी भाव पनपने लगता है जो राष्ट्रीय एकता को चुनौती दे डालता है ।

2. नए राज्यों की मांग - 

क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित होकर नए राज्यों की मांग की जाती है यह मांगी कभी कभी हिंसक रूप धारण कर लेती है झारखंड उत्तराखंड छत्तीसगढ़ तेलंगाना आदि राज्यों के निर्माण से पूर्व है आदि इसके उदाहरण हैं ।

3. क्षेत्रीय राजनीति एवं राजनीतिक दलों का  प्रभाव -

क्षेत्रवाद का दुष्परिणाम यह होता है कि क्षेत्रीय राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का वर्चस्व हो जाता है ।

4. भूमि पुत्र की अवधारणा  -

 भूमि पुत्र की अवधारणा अपने क्षेत्र के निवासियों के संघवाद से अधिक प्राथमिकता देती है भूमि पुत्र की अवधारणा के अंतर्गत किसी राज्य अथवा क्षेत्रीय निवासियों द्वारा उप राज्य में निवास तथा रोजगार प्राप्त करने के स्वरूप में विशेष संरक्षण की मांग की जाती है असम और महाराष्ट्र में यह प्रवृत्ति अधिक रही है  ।

5. स्वयंभू नेताओं का उदय -

 क्षेत्रवाद के कारण कुछ स्वार्थी नेता और संगठन विकसित होने लगते हैं जो जनता की भावना को उभार कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करना चाहते हैं इन नेताओं को क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों के प्रति कोई रुचि नहीं होती है

6. राष्ट्रीय कानूनों व आदेशों को चुनौती -

संकीर्ण क्षत्रिय ता राष्ट्रीय कानूनों व आदेशों को भी चुनौती देती है क्षेत्रीय तक के फलस्वरुप विभिन्न क्षेत्र के लोग कभी प्रादेशिक कभी राजनीतिक स्वशासन कभी क्षेत्रीय स्वार्थ को लेकर पृथक राज्य की मांग करने लगते हैं जो राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती होती है । 

.क्षेत्रवाद समस्या व समाधान एवं उपाय -

1. संतुलित राष्ट्रीय नीति का निर्माण -

केंद्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह सभी क्षेत्रों के समान विकास हेतु नीति निर्माण के समय राजनीतिक भेदभाव किए बिना संतुलित व समदर्शी नीति का निर्माण करें छोटे व संसाधनों की दृष्टि दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर राजू के विकास को भी सामान प्राथमिकता दें तो धीरे-धीरे वहां के निवासियों में विश्वास पैदा हो जाएगा वहां क्षेत्रवाद उग्र  स्वरूप शांत होगा ।

2. राज्य में स्थाई आधारभूत ढांचागत विकास -

क्षेत्रीय भिन्नता में  कमी लाने के लिए पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों में सिंचाई बिजली यातायात व संचार की आधारभूत साधनों के विकास को प्राथमिकता देनी होगी ।

3. विकास के विशेष कार्यक्रमों का परियोजनाओं के रूप में प्रारंभ किया जाना -

यह प्रक्रिया सरकार ने प्रारंभ कर दी है सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम, 

 मरू विकास कार्यक्रम, पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना आदि से क्षेत्रीय असंतुलन कम किया जा सकता है ।

4. प्रशासनिक दृष्टि से छोटे राज्यों का गठन -

छोटे-छोटे राज्यों से प्रांतीय सरकारों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं तथा केंद्रीय करों के वितरण में भी हिस्सेदारी बढ़ती है ।

5. सांस्कृतिक विभिन्नता को एकीकरण की ताकत बनाना -

दूरदर्शन रेडियो समाचार पत्र व अन्य संप्रेक्षण माध्यमों द्वारा बिनता कोई एक ताकत के रूप में उभरना ह को पहचान संस्कृतियों की पहचान व प्रतिष्ठा देना उन्हें एक दूसरे के साथ सहचार्य भाव से जोड़ना एकीकरण का माध्यम हो सकती है

6. भाषाई विविधता का समान -

 राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं का भी विकास और सम्मान होना चाहिए राष्ट्रभाषा मातृभाषा पता एवं अन्य क्षेत्रीय भाषा का अध्ययन अनिवार्य कर देना चाहिए ।

 भाषावाद के बारे  में , भाषावाद का अर्थ एंव भारत में भाषावाद

भाषावाद का अर्थ - 

जब किसी समाज या राज्य में व्यक्तियों के द्वारा अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हुए अन्य भाषाओं को गौण समझने की प्रवृत्ति को ही भाषा की संज्ञा दी जाती है ।

भाषावाद - 

भारत एक बहुभाषी देश है इसके विभिन्न प्रांतों में भिन्न-भिन्न भाषाएं बोली जाती है भारतीय संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए हिंदी को राजभाषा और संक्रमण काल के लिए अंग्रेजी के प्रयोग का प्रावधान किया है संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 के अनुसार सन 1955 में राज्य भाषा आयोग की स्थापना की गई तथा 1967 में राजभाषा संशोधन अधिनियम पारित किया गया ।

त्रिभाषा फार्मूला - 

सन 1967 में राजभाषा संशोधन अधिनियम द्वारा त्रिभाषा फार्मूला लागू करने का सुझाव आया इसके तहत सरकारी सेवाओं में पत्राचार के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी अंग्रेजी वह अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी ली जाएगी हिंदी का निरंतर विकास भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होगा। 

                                                  त्रिभाषा सूत्र में हिंदी अंग्रेजी तथा अन्य प्रादेशिक भाषा शामिल है हिंदी का निरंतर विकास भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है इस स्पष्ट प्रावधानों के होते हुए भी हमारे देश में हिंदी भाषा के विकास में निरंतर बांधाये बनी हुई है भाषा के आधार पर नए राज्यों का निर्माण की मांग में भी भाषावाद की संकीर्णता निहित है ।

भाषावाद की समस्या के समाधान के उपाय - 

भारत में भाषा के आधार पर उग्र आंदोलन राष्ट्र की एकता व अखंडता के लिए चुनौती है  इनके शांतिपूर्ण हल निकालने चाहिए कुछ उपाय यह भी हो सकते हैं - 

1. परस्पर समझाना वह प्रेरित करना बहुसंख्यक हिंदी भाषा भाषियों का दायित्व बनता है कि अहिंदी भाषी राज्यों को समझाईश द्वारा प्रेरित  करें कि हिंदी किसी भी रूप में प्रादेशिक भाषा के लिए चुनौती नहीं बल्कि सहायक है ।

2. हिंदी का प्रचार पसार सुनियोजित तरीके से सभी को विश्वास में लेकर किया जाए

3. भाषाई आदान प्रदान हेतु सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया जाए ।

4. पर्यटन को बढ़ावा देकर हिंदी की आवश्यकता को व्यवहारिक बनाया जा सकता है ।

5. त्रिभाषा फार्मूला व्यवस्थित रूप से केंद्र व राज्य के स्तर पर सुचारु रुप से लागू किया जाए ।

6. प्रादेशिक भाषाएं भी हिंदी के प्रसार के लिए सहायक हो सकती है उसी दिशा में उनका भी विस्तार किया जाए ।

7. राजनीतिक संकीर्णता समाप्त कर राष्ट्रीय हित में भाषावाद की समस्या का हल ढूंढा जाए ।

8. भाषाई संप्रेषण का माध्यम है यह परस्पर जोड़ती है तोड़ती नहीं यह भाव  देशवासियों के मन में जगाना होगा ।

                                  धन्यवाद 

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