धर्म सुधार आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग का योगदान (1483-1546)

धर्म सुधार आंदोलन में मार्टिन लूथर किंग का योगदान (1483-1546)

                             सारांश 

मार्टिन लूथर मानवता वादी था अतः वह पुनर्जागरण का शिशु था। अपनी रोम यात्रा में पोप की अनैतिकता और धर्माधिकारियों की धनलोलुपता ने उसके हृदय में चर्च सुधार की तीव्र इच्छा जगा दी टेटजेल नामक पदाधिकारी द्वारा पाप विमोचन के लिए लिखा गया क्षमा पत्र एक निष्कृष्ट सिद्धान्त मानकर वह चुप न रह सका और धार्मिक सुधारों के पक्ष में ब्रिटेनवर्ग में चर्च के द्वार पर 95 क्रांतिकारी प्रस्ताव लिखकर चिपकाये और उसने कहा कि कर्मकाण्ड के पालन से मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। हालांकि मार्टिन लूथर धर्म बहिष्कृत कर दिया गया किन्तु सुधारवादी आंदोलन का श्री गणेश हो गया। मार्टिन लूथर का धर्म सुधार आंदोलन रोमन चर्च में पोप के सर्वोच्च स्थान को नष्ट करने में सफल हुआ। मार्टिन लूथर (1483-1546) द्वारा चलाया गया धर्म-सुधार आंदोलन अन्य सभी पूर्ववर्ती आन्दोलनों से अधिक सफल रहा।

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में मार्टिन लूथर के धार्मिक सुधारों को प्रस्तुत किया गया है लेख में पुनर्जागरण के बाद धर्म-सुधार आंदोलन को मिला महत्व एवं उसके परिणामों का यथास्थान विश्लेषण किया है। रोमन पोप व उसके द्वारा फैलाये धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ मार्टिन लूथर की धर्म सुधार नीति एवं आंदोलन का विवरण प्रस्तुत किया गया है। मार्टिन लूथर के जन्म से लेकर विश्वद्यालय के प्राध्यापक तक तथा धर्म सुधार आंदोलन के प्रणेता तक लेख में उसके विचारों का प्रस्तुतीकरण है। मार्टिन लूथर अपने जीवन में घटी घटनाओं से चिन्तित था और रोमन पोप के पद की सर्वोच्चता के खिलाफ था उसका मानना था रोमन पोप का सर्वाधिकार अनैतिक है। वह चर्च की समस्त सम्पत्ति का उपभोग ही नहीं बल्कि दुरूपयोग ही करता है। मार्टिन लूथर ने कहा कि जर्हा चर्च है उस देश में उस राजा का चर्च की सम्पत्ति पर अधिकार होना चाहिए नकि रोमन पोप का परिणामतः राजा मार्टिन लूथर के पक्ष में आये और धर्म सुधार आंदोलन का श्रीगणेश हुआ। यह मार्टिन लूथर द्वारा किया गया सुधार पोप की शक्ति में हास करने में सहायक सिद्ध हुआ। प्रस्तुत लेख मार्टिन लूथर की धर्म सुधार व आन्दोलन से सम्बन्धित है। नीति

लूथर के धर्म सुधार की पृष्ठभूमि

मार्टिन लूथर ट्यूटोनिक जाति के एक कृषक परिवार में सन् 1483 ई0 में पैदा हुआ था और 1546 में उसका देहावसान हो गया था। अपनी भावना पद्धति में वह मानवतावादी था अतः इस दृष्टि से वह पुनर्जागरण का शिशु था किन्तु अपने धार्मिक विद्रोह में वह इससे सर्वथा अप्रभावित था।" स्वभावतः वह उसकी (पुनर्जागरण की भावना का उत्तराधिकारी नहीं था और न हीं उसकी समस्त प्रवृत्तियों का वह व उसकी पद्धतियों और सिद्धान्तों का केवल धर्म सुधार आन्दोलन के मूल में पुनर्जागरण की भावना नहीं थी। लूथर प्रारम्भ से ही धार्मिक प्रवृत्ति का था। 1507 ई0 में एक पादरी के रूप में प्रतिष्ठित होकर वह ब्रिटेनबर्ग के विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुआ 1510-11 ई0 के बीच उसने रोम की धार्मिक यात्राएं की। अपनी रोम यात्रा में पोप की अनैतिकता और धर्माधिकारियो की धन लोलुपता ने उसके हृदय में चर्च -सुधार की तीव्र इच्छा जगा दी 1516-17 के आस- पास एक घटना ने उसे बैचेन कर दिया जब टेटजेल (Tetzel) नामक एक पादरी ने ब्रिटेनबर्ग में पाप-विमोचन के लिए क्षमा पत्र ( Indulgences) नामक एक अत्यन्त ही निकृष्ट सिद्धान्त का प्रचार प्रारम्भ किया, जिसके अनुसार कोई भी पापी चर्च को कुछ धन देकर अपने पापों का शमन कर सकता था और मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बन सकता था। अब लूथर चुप न रह सका। इन उपदेशों के विरोध और अपने धार्मिक सुधारों के पक्ष में उसने ब्रिटेनबर्ग में चर्च के द्वार पर 95 कान्तिकारी प्रस्ताव अथवा मन्तव्य ( Thesis) लिखकर चिपकाए जिनमें चर्च की मान्यताओं का खण्डन करने के लिए कहा गया कि कर्मकाण्ड के पालन से मोक्ष नहीं मिल सकती। इस पर पोप के अधिकारियों के साथ उसका कटु वाद-विवाद हुआ और उसे धर्म- बहिष्कृत कर दिया गया। इस प्रकार लूथर के सुधारवादी आन्दोलन का श्रीगणेश हुआ।

मार्टिन लूथर के धर्म सुधार आन्दोलन का स्वरूप

"इस धरती पर अब तक हुए और भविष्य में होने वाले चोरों और लुटेरों में रोम सबसे बड़ा है। हम गरीबों को ठगा जा रहा है। हमारा जन्म शासक बनने के लिए हुआ था किन्तु हमें अत्याचारियों के जुए के नीचे अपना सिर झुकाने को बाध्य किया जा रहा है। अब वह समय आ गया है कि स्वाभिमानी ट्यूटोनिक (जर्मन) रोम के पोप की कठपुतली रहना बन्द कर दें।" मार्टिन लूथर किंग

पुनर्जागरण आन्दोलन के पश्चात राजनीतिक चिन्तन के इतिहास का नवीन स्वरूप देने का श्रेय धर्मसुधार आन्दोलन को है। जिसके द्वारा रोमन चर्च में परिवर्तन लाने और इस सिद्धान्त का कि समस्त यूरोप एक ईसाई समाज है जिसका सर्वोच्च प्रधान पोप है' को नष्ट करने का कार्य किया। यद्यपि 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक सभी क्षेत्रों में नवीन शक्तियों और विचारधाराओं का प्रादुर्भाव हो रहा था किन्तु महान धर्म-संस्था रोमन चर्च अभी तक इन सब परिवर्तनों से अप्रभावित था। यह स्पष्ट हो चुका था कि जब तक रोमन चर्च मध्यकालीन बना हुआ था तक यूरोप का आधुनिकीकरण करना दुष्कर था सुधारवादी आंदोलन ने इस दिशा में निर्णायक भूमिका अदा की यह मध्यकालीन विचारों और आधुनिकता का मिश्रण था। मैकियावली ने धर्म को राजनीति से बहिष्कृत करने का भरसक प्रयास किया। जबकि मार्टिन लूथर (Martin Luther) एवं काल्विन (Calvin) ने धर्म तथा राजनीति को घनिष्ट सम्बन्धों में जोड़कर पुनः मध्यकालीन विचार को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।

धर्म-सुधार आन्दोलन ने किसी एक विषय को प्रभावित न करके यूरोप की सम्पूर्ण संस्कृति को प्रभावित किया जिससे यह स्पष्ट नहीं हो सकता कि यह आन्दोलन, कांति थी या प्रक्रिया थी। इस विषयमें अलग-अलग विचारकों ने अलग-अलग मल प्रकट किये हैं।

धर्म-सुधार आन्दोलन केवल चर्च की बुराइयों के प्रति विद्रोह न था अपितु इसने धर्म को एक नया दर्शन दिया। जहाँ तक बुराइयों के विद्रोह का सम्बन्ध है उसका आरम्भ पहले ही हो चुका था पर ईसाई धर्म-दर्शन पर पुनर्विचार नहीं हुआ था। यह धर्म सुधार आन्दोलन द्वारा ही सम्भव हो सका। एल्टन ने धर्म-सुधार आन्दोलन के दो पक्ष बताये हैं जिसमें बाहय पक्ष का सम्बन्ध चर्च की बुराइयों से था जिसके प्रति विद्रोह का श्री गणेश मध्य युग में ही हो चुका था। चर्च के संगठन में सुधार करने, चर्च में पोप की निरपेक्ष शक्ति के दावे को ठुकराने और चर्च के अधिकार के लिए व्यापकतर आधार की माँग करने की सीमाओं में परिषदीय आन्दोलन (Conciliar Movement ) की ही प्रत्यावृत्ति कहा जा सकता था। मार्टिन लूथर (1483-1546) द्वारा चलाया गया धर्म-सुधार आंदोलन अन्य सभी पूर्ववर्ती आन्दोलनों से अधिक सफल रहा।

मार्टिन लूथर द्वारा धर्म-सुधार आन्दोलन की सफलता के प्रमुख कारण

1. धर्म सुधार आन्दोलन में उत्तरी जर्मनी के विभिन्न राजाओं व जनता ने सहयोग व समर्थन किया।

2. धर्म-सुधार आंदोलन का एक कारण यह भी था कि जर्मनी के राजा रोमन चर्च की विशाल सम्पत्ति पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे अतः वे पोप से सफल प्रतिरोध के लिए सामने आये। 3. जर्मनी की जनता चर्च के विभिन्न करों से प्राप्त धन का प्रवाह रोकना चाहते थे।

4. जनता चर्च के भ्रष्टाचार से ऊब चुकी थी लिहाजा धर्म सुधार आंदोलन का भरपूर सहयोग किया। 5. जर्मनी की जनता में यह बात समझ आ गयी थी कि उनके कठोर श्रम से उपार्जित धन इटली वालों के

भोग-विलास पर खर्च होती है अतः इसे रोका जाना आवश्यक है। इसलिए भी धर्म सुधार आंदोलन सफल हुआ।

उपरोक्त कारणों से धर्म-सुधार आन्दोलन को राष्ट्रीय रूप मिल गया था। मार्टिन लूथर की इस अपील ने जनता के मन मस्तिष्क पर बड़ा प्रभाव डाला इस धरती पर अब तक हुए और भविष्य में होने वाले चोरों और लुटेरों में रोम सबसे बड़ा है। हम गरीबों को ठगा जा रहा है। हमारा जन्म शासक बनने के लिए हुआ था किन्तु हमें अत्याचारियों के जुए के नीचे अपना सिर झुकाने को बाध्य किया जा रहा है। अब वह समय आ गया है कि स्वाभिमानी ट्यूटोनिक (जर्मन) रोम के पोप की कठपुतली रहना बन्द कर दें।"

मार्टिन लूथर के राजनीतिक विचार

मार्टिन लूथर ने जर्मनवासियों की भावनाओं को यह कह कर जाग्रत किया कि पोप ने अवैध रूप से शक्ति अपने हाथों में संचित कर रखी है। लौकिक मामलों में उसका हस्तक्षेप अनुचित है। जर्मनी या अन्य देशों में चर्च की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार वहाँ के शासकों का है। पोप एवं अन्य पादरी केवल चर्च के अधिकारी हैं कांसीलियर वाद-विवाद में प्रस्तुत कि "चर्च पृथ्वी के समस्त ईसाई मतालम्बियों की सभा है। पादरियों के विशेषाधिकारों तथा विमुक्तियों की आलोचना करते हुए उसने पोप विरोधी तर्कों का ही प्रयोग किया था। उसका कहना था पद सम्बधी अन्तर केवल प्रशासनिक सुविधा के कारण है, समुदाय के प्रति सभी वर्गों के मनुष्यों का कर्तव्य है चाहे वे जन साधारण हो या पादरी इसलिए कोई कारण नहीं है। कि लौकिक मामलों में जन साधारण की भांति पादी वर्ग उत्तरदायी न हो।

मार्टिन लूथर ने धार्मिक विषयों में विवशकारी शक्ति (Coercive Force) को स्वीकार नहीं किया। धार्मिक मामलों में बल प्रयोग के विषय में उसने लिखा कि "विधर्मिता को बल द्वारा दूर नहीं किया जा सकता उसके लिए एक अन्य साधन की आवश्यकता है और वह साधन तलवार के संघर्ष से भिन्न है यहां ईश्वर के वचन को लड़ना चाहिए यदि उससे कोई फल नहीं निकलता तो लौकिक शक्ति इस मामले को नहीं सुलझा सकती है वह दुनियां को खून से भर सकती है। "लूथर का विश्वास था कि धर्म का वास्तविक तत्व अभ्यान्तरिक अनुभव में है जो रहस्यात्मक और अवर्णनीय है। बल प्रयोग किसी भी दशा में धर्म की अभिवृद्धि में सहायक नहीं हो सकता वह इस निष्कर्ष पर पहुॅचा कि विधर्मिता का और विषमता युक्त शिक्षा का दमन होना चाहिए बल प्रयोग को आवश्यक समझते हुए मार्टिन ने कहा चूँकि चर्च अपनी दुर्बलताओं को खुद ठीक नहीं कर सकता था, अतः उन दुर्बलताओं को ठीक करने का उत्तरदायित्व लौकिक शासकों पर आ गया है अतः आवश्यक है कि राजा, शासक, कुलीन नगर और समुदाय धर्म-सुधार आरम्भ कर दें जब-जब वे ऐसा करेगें तो विशप और पादरी जो इस समय डरते है विवेक का अनुसरण करने के लिए विवश हो जाएंगे। धर्म सुधार की सफलता के लिए शासकों पर निर्भर हो जाने से लूथर के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह इस सिद्धान्त पर बल दे कि प्रजा को विनम्रतापूर्वक अपने शासकों की आज्ञा माननी चाहिए।

लूथर ने आरम्भ में यह शिक्षा दी कि पादरियों अथवा धर्माधिकारियों के दुराचारों को रोककर उनका सुधार करना व्यक्ति का कर्तव्य है किन्तु जर्मनी के कृषकों द्वारा सामाजिक न्याय के नाम पर अपने शासकों के विरूद्ध विद्रोह करने पर शासकों का पक्ष लेते हुए लूथर ने सामनतों के सलाह दी कि वे विद्रोह को दबाने के निर्दयतापूर्वक विद्रोहियों की हत्या कर दे । राजाओं के अधिकार का समर्थन करते हुए उसने घोषणा की- "इन परिस्थितियों में हमारे राजाओं को समझना चाहिए कि वे भगवान के प्रकोप को क्रियान्वित करने वाले अधिकारी है। दैवी प्रकोप ऐसे दुष्टों को दण्ड देने की आज्ञा देता है। इन परिस्थितियों में जो राजा रक्तपात से बचना चाहेगा, वह उन सब हत्याओं और अपराधों के लिए उत्तरदायी होगा, जो ये सुअर (विद्रोही किसान) कर रहे हैं। उन्हें बन्दूक के बल पर अपने कर्तव्य समझाए जाने चाहिए।"

लूथर ने एक ओर तो व्यक्तियों के लिए सविनय आज्ञापालन का सिद्धान्त रखा और राजाओं के प्रति सक्रिय विरोध की निन्दा की वहीं दूसरी ओर सम्राट के अधीन राजागण द्वारा सम्राट की अवहेलना करने के विचार का पोषण किया। यदि सम्राट अपनी शक्ति का उल्लंघन करे। वास्तव में लूथर का यह परस्पर विरोधी दृष्टिकोण था। इस पर सेबाइन ने टिप्पणी करते हुए लिखा है कि "शासको के ऊपर सम्राट की वास्तविक शक्ति केवल नाममात्र की थी। इसलिए इस असंगति का व्यवहार में कोई विशेष महत्व न था । सब मिलाकर लूथर निश्चित रूप से इस सिद्धान्त का समर्थक था कि शासन सत्ता का विरोध करना नैतिक दृष्टि से अनुचित है।"

लूथर का मूल्यांकन

लूथर के विचारों में विरोधाभस इस बात में है कि एक तरफ उसने शासकों को देवता कहा और दूसरे स्थान पर उन्हें साधारणतः धरती पर सबसे बड़ा मूर्ख और निकृष्टतम धूर्त कहा। तब ऐसे मूर्खों और धूतों की आज्ञापालन के सर्वसाधारण के अशर्त कर्तव्य पर बल देना कहाँ तक युक्ति-संगत था ? आगे उसने कहा कि यदि कोई राजा व्यक्ति से अपना धर्म त्यागने को कहें तो व्यक्ति को राजाज्ञा ठुकरा देनी चाहिए और सहर्ष दण्ड भुगत लेना चाहिए। इन सबका अर्थ यही निकलता है कि लूथर की विचारधारा में राज्य के प्रति भक्ति, ईश्वर के प्रति निष्ठा से सीमित थी।'

निष्कर्ष

निष्कर्ष तौर पर यह कहना उचित होगा कि लूथर के सभी सिद्धान्त तत्कालीन परिस्थितियों के परिणाम थे। राजाओं ने वैयक्तिक स्वार्थवश लूथर का समर्थन किया और उसे संरक्षण दिया, अतः लूथर ने उन्हें पोप एवं सम्राट से स्वतंत्र बतलाते हुए उनके दैवी अधिकारों का पोषण किया। आधुनिक यूरोपीय विचार में लूथर उदार वाद का प्रवर्तक नहीं, बल्कि राज्यवाद (Stateism) का संदेशवाहक सिद्ध हुआ ।

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