थॉमस हॉब्स का सामाजिक समझौता सिद्धांत

सामाजिक समझौता (Social Contract )

हाब्स के अनुसार मनुष्य अपने स्वभाव से एक असामाजिक प्राणी है और मानव को केवल निरंकुश राजसत्ता द्वारा ही शासित किया जा सकता है। मनुष्य अपने तर्क व विवेक द्वारा प्राकृतिक अवस्था से छुटकारा पा सकता है। चूँकि प्राकृतिक अवस्था में अधिकारों के अनियंत्रित प्रयोग के कारण संघर्ष की स्थिति पैदा होती है, इसलिए जब तक मनुष्य के अधिकारों पर नियन्त्रण नहीं होगा, शान्ति ओर सुरक्षा की स्थापना नहीं हो सकती। विवेक से प्रेरित होकर सभी मनुष्य आपस में समझौता करके अपने अधिकारों को किसी एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह को सौंप देते हैं। यह सामाजिक समझौता ही राज्य (कामनवैल्थ ) की उत्पत्ति का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का आधार वैज्ञानिक भौतिकवाद है और यह सिद्धान्त इंगलैण्ड की राजनीतिक अराजकता व सामाजिक स्थिति से भी प्रभावित हुआ है। हॉब्स के यहाँ राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में दो प्रकार का उल्लेख मिलता है - प्रथम संस्था द्वारा तथा द्वितीय अर्जन द्वारा सामाजिक समझौते के सिद्धान्त में हॉब्स ने प्रथम प्रकार को मान्यता दी है। हॉब्स के अनुसार व्यक्ति ने आत्मरक्षा का स्थायी हल तलाशने के लिए पारस्परिक समझौते द्वारा प्रभुत्व सम्पन्न राज्य की स्थापना की ताकि प्राकृतिक अवस्था के सारे दोषों से छुटकारा मिल सके। अतः हॉब्स एक सामाजिक समझौतावादी विचारक है। उसने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'लेवियाथन' में इसको प्रकाशित किया है। 

इस समझौते को निम्नलिखित विवरण द्वारा समझा जा सकता है :-

1.मानव स्वभाव की व्याख्या :  हॉब्स सामाजिक समझौते के अन्तर्गत मानव प्रकृति एवं स्वभाव की व्याख्या करते हुए कहता है कि मानव एक सामाजिक प्राणी न होकर पूर्ण रूप से अकेला है। मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है। वह अपनी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए सदैव प्रयास करता रहता है। वह निर्बाध रूप से स्वतन्त्रता का उपभोग करता है। वह अपनी इच्छापूर्ति के लिए दूसरों को मारने से भी परहेज नहीं करता। वह पाशविक व हिंसक बनकर दूसरों से प्रतिशोध लेता रहता है। वह शक्ति प्राप्ति के लिए दूसरों को डराता है व उनका वध भी करता है। हॉब्स के अनुसार मानव में स्वार्थ, भय, शक्ति के प्रति प्रेम, अहंकार, संघर्ष आदि सभी दुर्गुण मौजूद हैं, परन्तु इन दुर्गुणों के साथ ही मानव में विवेक का तत्त्व भी पाया जाता है। अतः हॉब्स के अनुसार मनुष्य मूलतः एक असामाजिक प्राणी है जो सदैव आत्मरक्षा की मूल प्रवत्ति से संचालित होता है। यही भावना या प्रव त्ति उसे हिंसा करने के लिए तथा दूसरों को भयभीत करने के लिए उकसाती है।

2. प्राकृतिक अवस्था (State of Nature) : हॉब्स ने प्राकृतिक अवस्था को पूर्व सामाजिक  अवस्था कहा है जो मानव की राज्य उत्पत्ति से पूर्व की अवस्था थी। इस अवस्था में कोई नियम नहीं था। उसका जीवन .. था। जिसकी लाठी उसकी भैंस', 'जो छीन सकते हो छीन लो' या फिर 'जिसको मार सकते हो मार दो' आदि नियम लागू थे। मानव की स्वतन्त्रता तथा जीवन रक्षा उसके शक्ति बल पर निर्भर थी। अतः मनुष्य पशुओं से भी बदत्तर था । स्वार्थ हेतु मारकाट व खून-खराबा सब किया जा सकता था । परस्पर सन्देह व अविश्वास की भावना युद्ध की स्थिति बनाए रखती थी। ऐसी अवस्था में न तो कोई सर्वोच्च सत्ता थी जो सभी को नियन्त्रित कर सके। उस अवस्था में उचित व अनुचित का ज्ञान नहीं था। उस युग में निजी सम्पत्ति का सर्वथा अभाव था। प्रत्येक वस्तु का स्वामित्व उसके बाहुबल पर निर्भर था। न कोई कानून था और न कोई न्यायकारी शक्ति । सरकार जैसी संस्था का अभाव था। इसलिए व्यक्ति निर्बाध स्वतन्त्रता का उपभोग करते थे। हॉब्स के अनुसार “मनुष्य का जीवन एकाकी, दरिद्र, अपवित्र, पाशविक तथा  क्षणिक था। मानव को सदैव मत्यु का भय सताता था। हॉब्स ने आगे लिखा है- "प्राकृतिक अवस्था में उचित तथा अनुचित, न्याय तथा अन्याय का कोई स्थान नहीं था। धोखा और शक्ति ही मुख्य गुण समझे जाते थे।

3.समझौते का कारण (Causes of Social Contract) प्राकृतिक अवस्था में जब मनुष्य बहुत तंग आ गए तो उन्होंने दयनीय, भयपूर्ण तथा भ्रष्ट अवस्था से निकालने के लिए एक सर्वोच्च तथा निरंकुश सत्ता को अपने सारे अधिकार व स्वतन्त्रताएँ सौंप दी। इस सत्ता द्वारा ही मनुष्य में शान्ति तथा उसकी आत्मरक्षा को स्थायित्व प्रदान किया जा सकता था। इस अराजकता के माहौल से निकलने के लिए सभी व्यक्तियों ने अपने को किसी एक या अनेक सर्वोच्च सत्ता को समस्त अधिकार दे दिए। ऐसा करना उस समय व्यक्तियों की मजबूरी थी। पाशविकता व दरिद्रता से निकलने के लिए तथा भय के निराकरण हेतु सामाजिक समझौता अपरिहार्य हो गया था।

4. समझौते की प्रक्रिया (Procedure of Social Contract) : मनुष्य ने इसमें अपने उस स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश स्वशासन का परित्याग किया जो उसे प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त थे। साथ ही एक निरंकुश शासन के बन्धन को स्वीकार किया। हॉब्स ने मानव के समझौते की प्रक्रिया को इस प्रकार व्यक्त किया है- "मैं अपने ऊपर अपना शासन करने का अधिकार इस मनुष्य (राजा) या इस मनुष्य समूह ( शासक वर्ग) को सौंपता हूँ। किन्तु शर्त यह है कि तुम भी अपने इस अधिकार को मेरी तरह ही उस मनुष्य को या इस मनुष्य-समूह को सौंप दो और मेरे समान इसके प्रत्येक कार्य का समर्थन करो। " इस अनुबंध से दो स्तर होते हैं। प्रथम स्तर पर प्रतिज्ञा की जाती है एवं दूसरे स्तर पर लागू किया जाता है। इस प्रक्रिया में सत्ताधिकारी व्यक्ति शक्ति का भय दिखाकर या शक्ति का प्रयोग करके इसे पूर्णतः लागू करते हैं। हॉब्स ने कहा है- "तलवार के बिना संविदाएँ केवल शब्द हैं और उनमें यह ताकत नहीं होती कि मनुष्य उनका पालन करने को विवश हो।" हॉब्स आगे कहता है कि "यदि किसी बलवती शक्ति का भय न हो, तो शब्दों के बन्धन इतने कमजोर होते हैं कि वे मनुष्य की महत्त्वकांक्षा, लोभ, क्रोध तथा अन्य भावनाओं को नियन्त्रण में नहीं रख सकते।"

5. राज्य की उत्पत्ति (Origin of the State) : समझौते द्वारा सभी मनुष्य संविदा की प्रतिज्ञा करते हैं। संविदा करने वाले व्यक्तियों का समूह ही राज्य या लैटिन भाषा ने नगर कहलाता है। इस प्रकार सारा जनसमुदाय समझौते द्वारा एक व्यक्ति या समूह में संयुक्त हो जाता है। हॉब्स ने 'लेवियाथन' में इसकी स्पष्ट व्याख्या की है। जिस व्यक्ति तथा व्यक्ति समूह को संविदा करने वाले मानव अपने अधिकार सौंपते हैं वह दीर्घ कार्य 'लेवियाथन' है और वह जनता की शान्ति व प्रतिरक्षा के लिए पथ्वी में मानव-देव की भाँति है।

6. राज्य का स्वरूप (Nature of State) : हॉब्स के समझौते द्वारा दो कार्यों की पूर्ति होती है। प्रथम वह एक व्यवस्थित तथा सभ्य समाज की स्थापना करता है। दूसरे इस समझौते द्वारा एक ऐसे राज्य की स्थापना होती है जिसमें मनुष्य अपने समस्त प्राकृतिक अधिकारों का परित्याग कर एक निरंकुश प्रभु का निर्माण करते हैं, जिसमें राज्य आश्वासन देता है कि वह मानव की प्रत्येक शत्रु से रक्षा करेगा। साथ ही मनुष्य भी समझौते द्वारा निर्मित राज्य व्यक्तियों या व्यक्ति की आज्ञा पालन के लिए बाध्य है। राज्य की सम्पूर्ण शक्ति सम्पन्न व्यक्ति या व्यक्तियों का समुदाय ही अन्य व्यक्तियों की इच्छाओं को एक शक्तिशाली इच्छा के रूप में परिवर्तित कर सकता है। जो व्यक्ति इस शक्ति का प्रतीक होता है वही राज्य कहलाता है। हॉब्स के अनुसार लोगों को एकमात्र कार्य सम्प्रभु के आदेशों का पालन करना होता है। अतः प्रभुसत्ता को लोगों पर असीम अधिकार होते हैं। हॉब्स के अनुसार इस सम्प्रभु को केवल आंतरिक शांति व सुरक्षा ही कायम नहीं करनी पड़ती बल्कि बाह्य आक्रमण से भी राज्य की सुरक्षा करनी पड़ती है। सम्प्रभु समाज में शांति कायम करता है। सम्प्रभु समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करता है। हॉब्स अपने संघ (Commonwealth) की रचना इस प्रकार करता है- "ऐसी सम्मिलित शक्ति के नियमों का एकमात्र तरीका जो विदेशी आक्रमण से उनकी (मनुष्य की) की रक्षा कर सके तथा उन्हें पारस्परिक संघर्ष से बचा सके, उनकी सारी शक्ति को एक व्यक्ति या व्यक्तियों के संघ को इन प्रकार सौंप देना है कि बहुसंख्यक इच्छाशक्ति (Will) एक रूप हो जाए जिससे एक व्यक्ति या व्यक्तियों के संघ को नियुक्त किया जा सके, जो उनके समस्त अधिकार ग्रहण करके साकार हो जाए और हर एक इसका उत्तरदायित्व ले कि वह जो अधिकार ग्रहण करता है, उनकी सामूहिक सुरक्षा तथा शान्ति के लिए कार्य करेगा या करवाएगा तथा इसके लिए सब की इच्छा सामूहिक हित में एक की इच्छा हो जाएगी तथा सब अपने निर्णय को उसके अधीन कर उसके सम्मुख विनत होंगे।" इस प्रकार हॉब्स का मानना है कि सारे व्यक्ति इसको मानने के लिए बाध्य हैं। इस समझौते से सम्प्रभु को असीमित शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। हॉब्स का सम्प्रभु (राज्य या लेवियाथन) पूर्ण रूप से निरंकुश है- "समझौते के द्वारा अनेक इच्छाओं के स्थान पर एक इच्छा का निर्माण होता है। सम्प्रभु के आदेश ही कानून हैं और उसका प्रत्येक कार्य न्यायपूर्ण होता है । "

अतः समझौते के बाद समाज व राज्य का प्रादुर्भाव हुआ। कला, साहित्य, विज्ञान, व्यापार आदि का श्रीगणेश हुआ। हॉब्स के शब्दों में- “महान् दैत्य (लेवियाथन) अथवा राज्य उस मर्त्यप्रभु का इसी प्रकार से जन्म होता है यह वही मर्त्यप्रभु है जिसकी कृपा पर अमर ईश्वर की छत्रछाया में हमारी शान्ति और सुरक्षा निर्भर है।" सामाजिक समझौते द्वारा हॉब्स 'निरंकुश राजतन्त्र एक राज्य की स्थापना करता है। हॉब्स का सम्प्रभु सर्वशक्तिमान है। सम्प्रभु कानून से ऊपर है। कानून सम्प्रभु का आदेश है। सम्प्रभु सर्व बन्धनों से मुक्त है। सम्प्रभु की इच्छा का सभी को सम्मान करना पड़ता है। दण्ड देने की शक्ति सम्प्रभु के पास है । सम्प्रभु के कार्यों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

हॉब्स के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की विशेषताएँ (Features of Hobbes's Social Contract)

1. निरंकुश सम्प्रभु (Absolute Sovereign):  निरंकुश सम्प्रभु समझौते में शामिल नहीं है तथा उसे समझौते द्वारा सभी मनुष्यों के समस्त अधिकार प्राप्त हैं। सम्प्रभु अपनी सत्ता का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करेगा। उसकी सत्ता पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। अतः वह व्यक्ति असीम शक्ति प्राप्त कर निरंकुश सम्प्रभु बन बैठा है। सम्प्रभु के समझौते में शामिल न होने के कारण उसे बदला नहीं जा सकता। वह अपने कार्यों के लिए किसी व्यक्ति या संस्था के प्रति उत्तरदायी नहीं है। उसकी शक्तियाँ असीमित हैं।

2. समझौता सामाजिक व राजनीतिक दोनो (Social as well as Political Contract) : प्राकृतिक अवस्था में न तो समाज था और न राज्य। मनुष्य ने अपनी प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त अधिकारों का परित्याग कर सामाजिक समझौते के बन्धन को स्वीकार किया है जिसके कारण समाज की उत्पत्ति हुई तथा उस समाज में शान्ति और व्यवस्था को बनाये रखने के लिए राज्य जैसी संस्था का आविर्भाव हुआ । इस प्रकार इस समझौते की प्रकृति सामाजिक व राजनीतिक दोनों थी

3. अल्पमत को विद्रोह का अधिकार नहीं (Minority has no right to Revolt ) : सामाजिक समझौते के सिद्धान्त में अल्पमतको बहुमत के आदेशों का पालन करना पड़ता है। बहुमत के सम्प्रभु के चुनाव में उन्हें कोई भी आपत्ति उठाने का अधिकार नहीं है। यदि वह इस चुनाव में राजधर्म विरोध की स्थिति बनाये रखेंगे तो उन्हें नागरिक समाज से बाहर ही रहना पड़ेगा और बहुमत द्वारा उनका सर्वनाश भी किया जा सकता है। यदि वे राज्य का अंग बने रहना पसन्द करते हैं तब भी उन्हें मौन रूप से बहुमत की इच्छा स्वीकार करनी होगी। अतः हॉब्स के समझौते में अल्पमत की इच्छओं का कोई स्थान नहीं अल्पमत के हित बहुमत से जुड़े हुए हैं। अल्पमत को विद्रोह करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।

4. समझौते का उल्लंघन नहीं (No Violation of the Contract) : मनुष्य समझौते में शामिल होकर तथा सम्प्रभु को सारे अधिकार सौंपकर बँध जाता है। वह समझौते का उल्लंघन नहीं कर सकता। उसे समझौता भंग करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। यदि वह समझौता तोड़ेगा तो वह पुनः प्राकृतिक अवस्था में पहुँच जाएगा दुःखदयी प्राकृतिक अवस्था में वह कभी वापिस लौटना नहीं चाहेगा। अतः मनुष्य इस समझौते का विरोध करने से डरता है।

5. सम्प्रभु समझौते का भागीदार नहीं (The Sovereign was not party to the Contract) : यह समझौता प्राकृतिक अवस्था में मनुष्यों के बीच हुआ है। सम्प्रभु इसमें शामिल नहीं है। जैसा कि एवेन्स्टीन का कहना है- "हॉब्स का सामजिक समझौता प्रजाजनों के बीच हुआ है। सम्प्रभु समझौते का भागीदार नहीं है, वह तो उसकी उत्पत्ति है । "

6. समझौता चिरस्थायी है (Contract is Perpetual) : हॉब्स के अनुसार समझौता सदा के लए हुआ है तथा चिरस्थायी है। किसी भी व्यक्ति को इसके उल्लंघन का अधिकार नहीं है। जो व्यक्ति अपने साथ दूसरों की आत्मरक्षा को संकट में डालने का प्रयत्न करते हैं अर्थात् समझौते की शर्तों को तोड़ते हैं, उन्हें म त्यु दण्ड देने का अधिकार शासक को प्राप्त है। अतः दण्ड के भय से कोई भी समझौते का उल्लंघन करना नहीं चाहता। इसलिए समझौता चिरस्थायी बन जाता है।

7. समझौते का उद्देश्य (Aim of the Contract): मनुष्यों के जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा कर, उन्हें आन्तरिक तथा बाह्य रक्षा प्रदान कर, शांति स्थापित करना ही समझौते के सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य है। सामाजिक समझौता लोगों के जान-माल की रक्षा की गारण्टी देता है। 8. सामाजिक समझौता, शासनात्मक नहीं (Social Contract not Goovernmental) : हॉब्स के पूर्व, प्रतिपादित समझौता राजा और प्रजा तथा शासक और शासित के बीच होने के कारण शासनात्मक समझौता था। हॉब्स के समझौते ने प्राकृतिक अवस्था में सभी व्यक्तियों के बीच होने के कारण सामाजिक समझौते का रूप धारण किया है।

9. कानून सम्प्रभु का आदेश (Law is the Command of Sovereign) : कानून सम्प्रभु का आदेश है। न्याय करने, राष्ट्रों और शक्तियों से युद्ध अथवा सन्धि करने का अधिकार पूर्णतः सम्प्रभु को प्राप्त है। सम्प्रभु के आदेशों को अनियमित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह विवेक तथा नैतिक आचरण का सार है।

10. व्यक्तिगत समझौता ( Individual Contract) हॉब्स के अनुसार यह समझौता व्यक्तिगत रूप से हुआ है, सामूहिक रूप से नहीं

समझौते की आलोचना (Criticism of the Contract)

हॉब्स का सामाजिक समझौता सर्वत्र कटु आलोचना का केन्द्र बना। इसकी चर्च, जनता तथा राजवंश ने कटु आलोचना की है तथा गम्भीर रूप से उसका विरोध किया है। हॉब्स ने चच पर राज्य के पूर्ण नियन्त्रण पर जोर दिया है। यह जनता को अस्वीकार्य इसलिए था क्योंकि वह निरंकुश राजतन्त्र की स्थापना पर जोर देता है। हॉब्स ने राजतन्त्र को भौतिक तथा सामान्य व्यक्तियों द्वारा स्थापित संस्था बताया है, जबकि राजवंश के समर्थक राजतन्त्र को दैवी एवं पवित्र संस्था मानते हैं राजवंश के समर्थक कलैरैण्डन, हॉब्स की 'लेवियाथन' में प्रस्तुत विचारों से इस तरह असहमत था कि उसने हस्तलिखित प्रति ही जला डाली और कहा- "मैंने कभी कोई ऐसी पुस्तक नहीं पढ़ी जिसमें इतना अधिक राजविद्रोह, विश्वासघात तथा धर्म-द्रोह भरा हो। " 

हॉब्स के समझौते के सिद्धान्त की आलोचना निम्न तर्कों पर आधारित है :-

1. निरंकुशता का समर्थन (Support of Despotism) हॉब्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त शासन पर किसी तरह का अंकुश नहीं है। चाहे वह कानून का अंकुश हो या व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हॉब्स द्वारा स्थापित शासन पूरी तरह निरंकुश है। अतः हॉब्स ने मनुष्य के सभी अधिकारों को शून्य कर लेवियाथन की दासता के पाश में जकड़ दिया है। इस सिद्धान्त के अनुसार सम्प्रभु सर्वशक्तिमान व निरंकुश है। उसकी शक्तियों पर कोई बाहरी प्रतिबन्ध नहीं है। यह सिद्धान्त सम्प्रभु की निरंकुशता का पूर्ण पक्षधर है।

2. मानव स्वभाव का दोषपूर्ण चित्रण (Defective picture of Human Nature) : हॉब्स ने मानव स्वभाव के एक पक्ष को ही प्रस्तुत किया है। मनुष्य के लिए उसका द ष्टिकोण निराशावादी है। मनुष्य में उदारता, परोपकार, प्रेम, दया, सहानुभुति आदि गुण भी पाए जाते हैं। हॉब्स ने इन सारे गुणों को भुलाकर मानव को स्वार्थी प्राणी माना है। उसका यह चित्रण एकपक्षीय व दोषपूर्ण है। एकपक्षीय दष्टिकोण के आधार पर मानव स्वभाव का विश्लेषण पक्षपातपूर्ण है।

3. प्राकृतिक अवस्था का चित्रण अनैतिहासिक (Unhistorical picture of State of Nature) : हॉब्स द्वारा प्रस्तुत प्राकृतिक अवस्था का चित्रण इतिहास से मेल नहीं खाता क्योंकि इतिहास के अनुसार मनुष्य सदैव परिवार व कबीले के रूप में रहा। वह कभी अकेला नहीं रहा। इसके साथ मनुष्यों के आपसी युद्ध की कल्पना भी इतिहास की मान्यताओं से सिद्ध नहीं होती।

4. प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक अधिकारों की मान्यता असंगत (Irrelevance of Natural Rights in State of Nature) : हॉब्स ने मनुष्य की प्राकृतिक अवस्था का वर्णन करते हुए कहा है कि उसमें व्यक्ति को कुछ अधिकार प्राप्त थे, जिनका रूप प्राकृतिक था। अराजकतापूर्ण प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति का कोई अधिकार हो सकता है, यह कहना असंगत व विश्वास से परे है। हॉब्स स्वयं स्वीकार करता है कि उस अवस्था में 'जिसकी लाठी उसकी भैंस का नियम प्रचलन में था तो ऐसी अवस्था में अधिकारों की कल्पना करना सर्वथा तर्कहीन है।

5. लोग भय के कारण सत्ता के अधीन नहीं रह सकते (People do not subject themselves to Authority out of Fear): हॉब्स के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में लौट जाने के डर से समझौते में शामिल रहने के लिए बाध्य हुआ तथा इसी कारण वह सम्प्रभु के आदेशों का पालन करने लगा। परन्तु प्रो. वाहन का कथन इसके पूर्णतः विपरीत है कि नागरिकों में नैतिक सम्बन्धों का होना आवश्यक है और जहाँ पर नैतिक सम्बन्ध नहीं वहाँ पर वस्तुतः कोई भी सम्बन्ध नहीं है। आतंक तथा भय राज्य के लोगों को बाँधने का साधन नहीं हो सकते। मानव विवेक के आधार पर सत्ता को स्वीकार करते हैं। वे सुख-शान्ति बनाए रखने के लिए स्वेच्छा से सत्ता के अधीन रहते हैं।

6. अतार्किक (Illogical) : हॉब्स ने जो प्राकृतिक अवस्था में मानव का चित्रण प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार मनुष्य एकाकी, दरिद्र, अपवित्र व क्षणिक था और समझौता करने के पश्चात् ही उसने अपने एकाकी जीवन को त्याग कर सामाजिक बनकर समाज में रहना प्रारम्भ किया। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य जो स्वार्थी, अभिमानी, जंगली तथा असामाजिक था, एकाएक समझौते के लिए किस तरह तैयार हो गया। इस प्रकार के समझौते के लिए राजनीतिक चेतना का होना आवश्श्यक है। बिना राजनीतिक चेतना के मनुष्य समझौते की ओर आकर्षित नहीं हो सकता।

7. समझौता एक पक्षीय नहीं हो सकता (Contract cannot be One-sided) : कोई भी समझौता द्विपक्षीय होता है। हॉब्स का समझौता पूर्ण रूप से एकपक्षीय है, क्योंकि हॉब्स ने समझौते में सम्प्रभु को शामिल नहीं किया। समझौता लागू करने के लिए सम्प्रभु को असीमित अधिकार देने की बात संगत नहीं है। इसलिए तार्किक द ष्टि से यह समझौता असंगत व दोषपूर्ण है।

8. सिद्धान्त विरोधी तत्त्व (Paradoxes in the Theory): हॉब्स ने अपने समझौते के सिद्धान्त में सम्प्रभु की असीमित शक्ति प्रदान की है। इसके विपरीत वह व्यक्ति को सम्प्रभु का विरोध करने का अधिकार भी देता है। यह सही है कि कुछ महत्त्वपूर्ण दशाओं में ही व्यक्ति सम्प्रभु का विरोध कर सकते हैं। यदि सम्प्रभु नागरिक जीवन की रक्षा करने में असफल रहा हो तो उस दशा में उसका विरोध किया जा सकता है। परन्तु तर्क की माँग यह है कि जब सम्प्रभु को असीमित अधिकार प्राप्त है तो व्यक्ति को विरोध का अधिकार किस तरह मिल सकता है और व्यक्ति को विरोध का अधिकार प्राप्त है तो सम्प्रभु पाए जाते हैं। को असीमित अधिकार किस प्रकार प्राप्त होंगे। इस प्रकार हॉब्स के इस सिद्धान्त में परस्पर विरोधी तत्त्व

9. राज्य और सरकार में अन्तर (State and Government are two Different Things) : हॉब्स के सिद्धान्तानुसार राज्य और कानून में कोई अन्तर नहीं है। उसने राज्य के कानूनी निरंकुशवाद को सरकार से मिलाने की भूल की है। हॉब्स यह भूल गया है कि सरकार राज्य का आवश्यक तत्त्व है। सरकार में परिवर्तन होने से राज्य में परिवर्तन नहीं होता। इसलिए राज्य व सरकार अलग-अलग हैं। सरकार राज्य की तुलना में छोटा रूप रखती है। राज्य सर्वदा विद्यमान रहता है। सरकारें बदलती रहती हैं। अतः ये दोनों भिन्न संस्थाएँ हैं।

10. राज्य एक निर्मित संस्था नहीं (State is not an Artificial Institution) :
वास्तव में राज्य एक निर्मित संस्था नहीं बल्कि विकसित संस्था है। राज्य एक ऐतिहासिक विकास का परिणाम है जबकि हॉब्स ने राज्य को समझौते द्वारा एक निर्मित संस्था माना है।

हॉब्स के सिद्धान्त की इन आलोचनाओं के पश्चात् भी यह स्वीकार किया जा सकता है कि हॉब्स ने सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया है कि राज्य न तो ईश्वर द्वारा कृत दैवी संस्था है और न ही ऐतिहासिक विकास का परिणाम। बल्कि व्यक्तियों की निश्चित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह अस्तित्व में आया है जो मानव द्वारा निर्मित एक कृत्रिम संस्था है। राज्य एक साधन नहीं है परन्तु साध्यों की ओर ले जाने वाला एकमात्र साधन है। इसके अतिरिक्त हॉब्स की विचारधारा में सम्प्रभुता की धारणा के प्रतिपादन का मार्ग प्रशस्त किया है। हॉब्स ने मानव स्वभाव का विश्लेषण कर यर्थार्थ के धरातल पर मानव स्वभाव को चित्रित किया है। अतः हॉब्स का चिन्तन वैज्ञानिक चिन्तन है। हॉब्स का चिन्तन राजनीतिशास्त्र के विचारकों के लिए एक पथ-प्रदर्शक का कार्य करता है।

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