प्रस्तावना
भा रत के स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं के योगदान की चर्चा करने से पूर्व कुछ प्रश्न मन में सहज ही उठते है, सर्वप्रथम इन प्रश्नों के उत्तर देना आवश्यक है। सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है कि वे महिलाए जिन्हें प्राचीन काल से केवल भोग्य की वस्तु समझा जाता रहा स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पुरूषो ने अचानक इनके योगदान को कैसे स्वीकार कर लिया ? द्वितीय, वे कौन सी परिस्थितियाँ थी, जिनमें महिलाओं को अपनी घर गृहस्थी से निकलकर मैदान में तलवार उठाना पड़ा ? इन सभी प्रश्नों के उत्तर कहीं न कहीं हमें 1857 की महान क्रांति में तथा इसके बाद के अन्य महत्वपूर्ण आन्दोलनों में महिलाओं की भूमिका से प्राप्त किया जा सकता है यह 1857 की क्रांति ही थी जिसमें रानी लक्ष्मी बाई ने अपने वंश और परिवार के अस्तित्व की रक्षा के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का विगुल फूंका था । ऐसी ही परिस्थितियों में लखनऊ में बेगम हजरत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया। राष्ट्रवादी पुरूषों ने जब महिलाओं के इस छिपे हुए गुण को देखा तो उन्हें लगा कि देश को स्वतंत्र कराने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है पुरुषों की महिलाओं के प्रति परिवर्तित होती सोच की अभिव्यक्ति एक राष्ट्रवादी कवि ने अपनी इन पंक्तियों में की है-
" नाचो और खुशियाँ मनाओ
जिन्होने कहा था
महिलाओं का किताब छूना पाप है मर चूके हैं।
जिन पागलों ने कहा था वे स्त्रियों को घरों में बन्द करके रखेगें अब अपना चेहरा छिपाकर बैठे हैं
उन्होने घरो में हमसे ऐसे काम कराया मानो हम गाय-बैल हो मार खाकर चुप चाप काम करना
हमने उसे समाप्त कर दिया है
नाचो, गाओ और खुशियाँ मनाओ।"
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का वास्तविक प्रारम्भ 1857 की महान क्रांति से ही माना जाता है। भारत की स्वतंत्रता की ओर यह महान क्रांति की प्रथम कदम थी। 1857 का विद्रोह मुख्यतः एक सैनिक विद्रोह था, जिसे किसानों, दस्तकारों, मजदूरों तथा धर्मगुरूओं का भी समर्थन मिला और यह आम जनता के विद्रोह में बदल गया। 1857 का यह विद्रोह ज्यादा समय तक अंग्रेजों को परेशान न कर सका और न ही अपने उद्देश्य में सफल रहा फिर भी अपनी विफलता में भी उसने एक महान उद्देश्य की पूर्ति की। यह उस राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन का प्रेरणा श्रोत बन गया, जिसने वह प्राप्त कर दिखाया जो कि विद्रोह नहीं प्राप्त कर पाया था।
1857 की प्रथम क्रांति से लेकर 1947 में भारत के स्वतंत्रता प्राप्त होने तक के मध्य हुए विभिन्न राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेने में महिलायें पुरूषों से पीछे न थी। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन पहला ऐसा अवसर था, जब महिलायें सार्वजनिक रूप से पुरूषों से कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने के लिए घर से बाहर निकल पड़ी। रानी लक्ष्मी बाई, सरोजनी नायडू तथा एनी बेसेंट जैसी अनेक महिला नेत्रियों ने राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में अपनी उपस्थिति का जो एहसास दिलाया वह कालान्तर में अन्य भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा की श्रोत बनी।
गाँधी जी आन्दोलनों में महिलाओं की भागीदारी के पक्षधर थे, वे महिलाओं की सभाओं में तथा अपने भाषणों में आन्दोलनों में उनकी भागीदारी को अनिवार्य बताते थे और साथ ही उन्हें यह कहकर प्रेरित करते थे कि देवियों और वीरांगनाओं की तरह आन्दोलनों में उनकी अपनी अलग भूमिका है और उनमें इस भूमिका को निभाने की शक्ति और हिम्मत भी है। उन्होंने महिलाओं को विश्वास दिलाया कि आन्दोलन को उनके महत्वपूर्ण योगदान की जरूरत है। उन्होने महिलाओं के बारे में कहा कि महिलाएँ गृह निर्माता है और पोषक है तथा भारत के पुनरूत्थान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।" गाँधी जी के महिलाओं को प्रेरित करने का ही परिणाम रहा कि आगे सभी आन्दोलनों में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपने शौर्य त्याग बलिदान का परिचय दिया।
असहयोग आन्दोलन
सन् 1920-22 में जब असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तो पहली बार महिलाएँ भारी संख्या में आन्दोलन से जूड़ी सैकड़ों महिलाएँ खादी और चरखे बेचने गली-गली गई, उन्होंने खादी को लोकप्रिय बनाने के लिए जुलूस निकाले और समूहों में विदेशी कपड़ों की होली जलाई। 1921 के कांग्रेस सम्मेलन में 144 महिला प्रतिनिधियो ने भाग लिया। इसमें 131 महिला स्वैच्छिक कार्यकर्ता और 14 विभिन्न समितियों में थी। कांग्रेस की कार्य कारिणी में महिलाओं की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। कस्तूरबा गाँधी, सरोजनी नायडू, ऐनी बेसेंट आदि नेत्रियों ने भी कांग्रेस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कई बार कांग्रेस का उचित मार्गदर्शन भी किया। मुम्बई में महिलाओं ने राष्ट्रीय स्त्री सभा का गठन किया, यह प्रथम महिला संगठन था, जो बिना पुरूषों के चलाया जाता था। राष्ट्रीय स्त्री सभा की सदस्याएं पूरे मुम्बई में खादी प्रचार में लगी थी स्त्री सभा की सदस्याओं ने गाँव में बनाई जाने वाली खादी की बिक्री के लिए शहर में कई केन्द्र खोले, प्रदर्शनियाँ आयोजित की, घर-घर जाकर खादी बेची तथा इसकी बिक्री से होने वाले लाभ को जन कल्याण के कार्यों में लगाया गया। इस आन्दोलन में न केवल समृद्ध घरों की महिलाएं आगे आई बल्कि इस आन्दोलन में श्रमिक वर्ग तथा निम्न वर्ग की महिलाओं ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। महिलाओं के इन आन्दोलनों में भाग लेने का ही परिणाम रहा कि समय-समय पर इनके अधिकारों से सम्बन्धित नियम भी बनते रहे तथा उन्हें पारम्परिक कार्यों के अलावा फैक्टरियों आदि में कार्य करने की अनुमति प्रदान की गई तथा उन फैक्टरियों में उन्हें मूलभूत सुविधाएं भी प्रदान की गई।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन
1930 में प्रारम्भ हुए इस आन्दोलन में महिलाओं ने अपनी भागीदारी और भी अधिक प्रबल ढंग से सुनिश्चित की। 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन अहमदाबाद से डांड़ी तक 240 मील की डांड़ी यात्रा से शुरू हुआ यह आन्दोलन अंग्रेजों के नमक कानून तोड़ने उनके नमक बनाने के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए चलाया गया इस आन्दोलन में गाँधी जी को लगा कि डांडी यात्रा अत्यधिक कठिन कार्य है जोकि महिलाओं के लिए कर पाना मुश्किल प्रतीत हुआ लेकिन महिलाओं ने उनकी इस सोच को बदला और पूरे डांड़ी यात्रा के दौरान जहाँ-जहाँ भी उन्होंने सभाएं की वहाँ सर्वाधिक संख्या में महिलाएं उपस्थित रही डांडी यात्रा के बाद महिलाओं को आन्दोलन में पूरी तरह सम्मिलित कर लिया गया हजारों महिलाओं ने नमक सत्याग्रह आन्दोलन में नमक गनाने से लेकर उनके विक्रय का भी कार्य किया। इस नमक सत्याग्रह में कुल 80 हजार जेल भेजे जाने वाले लोगों में 17 हजार महिलाएं थी।
सविनय अवज्ञा आन्दोलन में कर और राजस्व के बहिष्कार की प्रतिक्रिया स्वरूप लोगों के घरों के समान, उपकरण तथा जमीन आदि नीलाम कर दी जाती थी। इन नीलामियों के बहिष्कार में भी महिलाएं आगे आयी और नीलामी का सामान लेने वालों के घरों में भूख हड़ताल या धरना देती थी, जिससे उन्हें समान लौटाने के लिए मजबूर होना पड़ता था इस कार्य में महिलाओं को कई बार अपमान के कड़वे घूँट भी पीने पड़े। 1930 के दशक में महिलाओं को पहली बार पुलिस दमन का सामना करना पड़ा। महिलाओं के जत्थे पर लाठियाँ चलायी गयी, जेल भेजा गया फिर भी वे अपने मार्ग से नहीं हटी तथा और भी दृढता से प्रतिरोध का सामना किया। शहरी और ग्रामीण महिलाओं ने 1932-33 में भारी संख्या में गिरफ्तारी दी। कहा जाता है कि 1930-35 के बीच 20 हजार महिला सत्याग्रही जेल भेजी गई और उन्हें सजा भी हुई।
इन आन्दोलनों में महिलाओं के अधिक संख्या में भागीदारी की पृष्ठ भूमि 1920-30 के मध्य तैयार हो चुकी थी क्योकि इस दौरान कई महिला संगठन अस्तित्व में आ चुके थे इन सभी ने महिलाओं की लामबंदी जुलूस व प्रभातफेरी निकालने धरने आदि आयोजित करने के काम के साथ-साथ खादी के प्रचार-प्रसार, चरखा चलाने का प्रशिक्षण और खादी बेचने आदि के काम भी किए। जैसे-जैसे आन्दोलन ने जोर पकड़ा और उसमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ी महिलाओं के मुद्दे भी सार्वजनिक चर्चा में आए। महिलाओं की लामबन्दी करने और उनके मुद्दे उठाने में सबसे ज्यादा सक्रिय संगठन आल इंण्डिया वूमेन्स कान्फ्रेन्स (A.I.W.C.) था जिसकी स्थापना कांग्रेस 1928 में महिलाओं की आन्दोलन में बढ़ती भागीदारी को देखकर किया था।
भारत छोड़ो आन्दोलन
1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में हजारों की संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। इस दौरान महिलाएं क्रांतिकारी पुरुषों के सहयोग के लिए भी तैयार थी तथा उनके गैरकानूनी कामों में भी भागीदार बन रही थी महिलाओं को आत्मरक्षा के कई प्रशिक्षण भी दिए गए ताकि वे अपनी रक्षा स्वयं कर सके । बरी साल में महिलाओं के आत्मरक्षा की कई समितियाँ बनी जहाँ उन्हें लाठी चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। पटना, हुगली, बाली, त्रिपुरा आदि स्थानों पर महिलाओं ने प्रभातफेरियाँ निकालकर तथा पोस्टर प्रदर्शनियाँ लगायी। 1940 के दशक में महिला आन्दोलन पूरी तरह स्वाधीनता आन्दोलन में समाहित हो गया।
इस प्रकार यदि देखा जाए तो भारत के सम्पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं के महत्वपूर्ण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 1857 की महान क्रांति में भी झांसी तथा लखनऊ जैसे क्षेत्र का नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई तथा बेगम हजरत महल ने किया, यह भारतीय महिलाओं के राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रारम्भ था। इसके बाद तो जैसे-जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन परवान चढ़ता गया। सरोजनी नायडू, कुस्तुरबा गाँधी, एनी बेसेंट आदि न जाने कितने नाम थे जो भारतीय महिलाओं के प्रेरणास्त्रोत बनी। गाँधी जी ने महिलाओं के आत्मत्यागी एवं बलिदानी स्वभाव के हिमायती थे। गाँधीजी को सोच थी कि गर्भधारण और मातृत्व के अनुभव से गुजरने के कारण महिलाएं शांति और अहिंसा का संदेश फैलाने के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं। गाँधीजी स्वयं अपने को दक्षिण अफ्रीकी सत्याग्राही महिलाओं से प्रभावित होने की बात स्वीकारते है। गाँधीजी ने 1921 में एकबार कहा था कि "पुरुषों की नजरों महिलाएं कमजोर नहीं है वरन दोनों लिंगों में ज्यादा श्रेष्ठ इसलिए है कि आज भी वे त्याग, खामोश, पीड़ा, विश्वास और ज्ञान की साक्षात प्रतिमा है।"
निष्कर्ष
इस प्रकार जब हम महिलाओं की भागीदारी राष्ट्रीय आन्दोलन में देखते हैं तो वह उनकी घरेलू भूमिका का विस्तार मात्र ही दिखती है। यद्यपि कि आन्दोलन में उनकी भागीदारी से न तो उनके घरेलू जीवन या परिवारिक समीकरणों में कोई अन्तर आया, न उनकी जीवन शैली में कोई परिवर्तन आया और न ही उनकी राजनीतिक भूमिका में कोई बदलाव आया महिलाओं ने राजनीति आन्दोलन में योगदान अवश्य किया लेकिन उसे इसका लाभ न मिल सका। कुछ महिलाओं ने महिला अधिकारों की बात भी की तो उसे भी कांट-छांटकर पेश किया गया। राष्ट्रवादियों ने महिलाओं की भीतरी या बाहरी राजनीतिक गतिविधियों में परम्परा से हटकर कुछ बदलाव लाने की सोची ही नहीं। महिला का कार्य क्षेत्र घर था, उनकी पोषक और त्यागमयी मां की छवि को जों का त्यों बनाये रखा गया। इस बात पर जोर दिया कि महिलाएं सर्वजानिक क्षेत्र में जाएं तो भी अपना नारी सुलभ गुण नहीं छोड़े ।
इस प्रकार यदि देखा जाए तो एक तरफ जहाँ महिलाओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई वहीं दूसरी तरफ इन आन्दोलनों में महिलाओं के सशक्त और प्रभावशाली योगदान के बाद भी पुरुषों की महिलाओं के प्रति परम्परावादी सोच में कोई परिवर्तन न आ सका। यही कारण रहा है कि स्वतंत्रता के आज 60 वर्षों बाद भी महिला, अबला तथा कमजोर बनी हुई है। पुरुषों की परम्परावादी मानसिकता में अभी पूरी तरह बदलाव नहीं आया है।