स्टेट्समैन में राजनीतिक विचार
(Political Ideas in Statesman)
प्लेटो की पुस्तक स्टेट्समैन प्रधानतः राजनीति सम्बन्धी एक प्रबन्ध ग्रन्थ है। इस पुस्तक की रचना 'Republic के प्रकाशन से कई वर्षों बाद हुई। इसका रचनाकाल 367-361 ई. पू. के मध्य रखना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इस दौरान प्लेटो के डायोनिसियस द्वितीय के साथ सम्बन्ध अच्छे थे। इस दौरान वह डायोनिसियस द्वितीय के साथ विधियों की प्रस्तावना करने में व्यस्त था। इस पुस्तक का दूसरा नाम 'पालिटिक्स' (Politics) है। इस पुस्तक में प्लेटो ने कानून पर नए द ष्टिकोण से विचार किया है। इसमें प्लेटो आदर्श राज्य की कल्पना को संजोए हुए है लेकिन वह 'रिपब्लिक' की तुलना में इस समय अधिक व्यावहारिक आदर्शवादी दिखता है शैली और स्वर दोनों के द ष्टिकोण से ऐसा प्रतीत होता है कि यह पुस्तक प्लेटो के उन विचारों का संक्रमण है, जिनकी अभिव्यक्ति लाज में हुई है। इस पुस्तक में प्लेटो इस बात पर विचार करने का प्रयास करता है कि यदि मनुष्य को शासन करना है तो उसे कैसा होना चाहिए और क्या करना चाहिए। इसमें वह राजनीति और राजनीति विज्ञान की भूमिका पर भी विचार करता है। इस प्रकार यह पुस्तक अधिक तर्कसंगत और यथातथ्य है। इसमें वर्णित प्रमुख
राजनीतिक विचार निम्नलिखित हैं:
L सरकारों का वर्गीकरण (Classification of Governments) प्लेटो का मानना है कि आदर्श दार्शनिक शासक का कर्त्तव्य राज्य के प्रशासन का संचालन करना ही नहीं है बल्कि ऐसी व्यवस्था कायम करना है कि लोग शिवत्व और न्याय के आदर्श मानदण्डों को अपना सकें। यदि शासक दार्शनिक है तो उसे कानून की आवश्यकता नहीं। परन्तु आदर्श शासक एक दुर्लभ व्यक्ति होता है, अतः कानून आवश्यक है क्योंकि कानून व्यावहारिक ज्ञान तथा भूतकाल के अनुभव का संकलन होता है। इस प्रकार प्लेटो स्टेट्समैन में कानून और उसकी आवश्यकता को आधार मानकर सरकारों का नया वर्गीकरण प्रस्तुत करता है वह सरकारों के छः प्रकार बताता है :
कानून द्वारा संचालित सरकार
एक व्यक्ति का शासन
राजतन्त्र
कानून द्वारा संचालित न होने वाली सरकार
1.
अत्याचारी शासन
(Monarchy)
कुलीनतन्त्र
(Aristocracy)
(Tyranny) अल्पतन्त्र 2.
(Oligarchy)
(Rule of one)
कुछ व्यक्तियों का शासन
(Rule of Few)
लोकतन्त्र
(Democracy)
2.
3. अतिवादी प्रजातन्त्र
(Extreme Democracy)
3. अनेक व्यक्तियों का शासन
(Rule of Many)
पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन
50
सरकारों के इस वर्गीकरण में प्लेटो ने उनकी पारस्परिक श्रेष्ठता व हीनता पर भी विचार किया है। उसने कहा है कि कानून द्वारा शासित राज्य में जनता की भलाई के लिए एक व्यक्ति का शासन अर्थात् राजतन्त्र सर्वोत्तम है और प्रजातन्त्र सबसे निम्न श्रेणी की ही शासन प्रणाली है। परन्तु कानून के शासन के बिना संचालित सरकारों में अतिवादी प्रजातन्त्र सबसे अच्छा है और अत्याचारी शासन सबसे बुरा है।
जनसंख्या का वर्गीकरण (Classification of the Population) अपने ग्रन्थ स्टेट्समैन में प्लेटो ने राज्य की जनसंख्या
को कार्यों के आधार पर चार भागों में बाँटा है :
(i) शासक वर्ग ( Ruling Class)
(iii) प्रशासक वर्ग (Administration Class)
(iii) परीक्षक वर्ग (Examining Class)
(iv) ) जो उपर्युक्त तीनों वर्गों में शामिल नहीं।
शासक वर्ग में शासक, प्रशासक वर्ग में प्रशासनिक ज्ञान रखने वाले अधिकारी, परीक्षक वर्ग में न्यायाधीश व शुद्ध नीतियों की परीक्षा करने वाले तथा अन्तिम वर्ग में पुरोहित, शिल्पी और किसान आदि शामिल होते हैं। इस पुस्तक में 'Republic' की तुलना मैं जनसंख्या का विभाजन अधिक व्यावहारिक व तर्कसंगत जान पड़ता है।
3. लोकतन्त्र पर विचार (Views on Democracy) प्लेटो ने 'स्टेट्समैन' में वर्णित वास्तविक राज्यों के सन्दर्भ में प्रजातन्त्र
के प्रति अधिक सन्तुलित द ष्टिकोण अपनाया है जबकि उसने रिपब्लिक में इसके विपरीत विचार व्यक्त करते हुए उसे सबसे निकृष्ट शासन माना है किन्तु विधि या कानून-रहित शासनों में इसे सर्वोत्तम माना है क्योंकि इसमें जनता स्वेच्छाचारी शासकों को आसानी से बदल सकती है और उनके स्थान पर अन्य को बिठा सकती है।
4. इतिहास सम्बन्धी विचार (Views on History) प्लेटो ने 'स्टेट्समैन' में मानव इतिहास की विस्त त व क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार मानव समाज सबसे पहले 'क्रोमस का युग' (The Age of Cromas) था। इस युग में संसार का शासन देवी था। लोगों की स्थिति पशुओं के झुण्ड जैसी थी। इसके बाद सभ्यता का युग आया। इसमें ईश्वर ने संचालन का कार्य अपने हाथों में वापिस ले लिया और लोग लाचार व निरीह बन गए ये जंगली जानवरों का शिकार बन जाते थे। देवताओं ने उनकी दुर्दशा पर रहम करके मनुष्यों को आग कलाएँ, पौधे व बीज दिए। इससे मनुष्य स्थायी निवास बनाकर उत्तरदायित्व ढंग से अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
उपर्युक्त विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि 'स्टेट्समैन' में प्लेटो का द ष्टिकोण यथार्थवादी है। उसने इस पुस्तक में प्रजातन्त्र को सराहा है। इस पुस्तक में प्लेटो ने उत्पादक वर्ग को महत्त्व दिया है। इसमें कानून को महत्त्व देते सरकारों का वर्गीकरण किया है। इस पुस्तक में प्लेटो के प्रौढ़ विचारों का दर्शन होता है। बार्कर के अनुसार "आदर्शवाद समाप्त होने से बहुत दूर है किन्तु वास्तविक राजनीति के प्रति एक अधिक यथार्थवादी द ष्टिकोण के साथ इसका अस्तित्व है। "वस्तुतः 'स्टेट्समैन' में प्लेटो के जिस यथार्थवादी द ष्टिकोण की शुरुआत हुई है, उसका पूर्ण विकास उसके अगले ग्रन्थ 'लॉज' में हुआ है। हुए उसने
लाज : उप आदर्श राज्य
(The Laws : Sub- Ideal State)
प्लेटो की तीनों रचनाओं में लॉज अन्तिम कृति है जिसका प्रकाशन 347 ई. पू. में हुआ। प्लेटो का व द्वावस्था में लिखित ग्रन्थ जिसमें गम्भीरता व परिपक्वता का गुण 'रिपब्लिक की तुलना में अधिक है। लॉज में प्लेटो ने आदर्श एवं व्यावहारिकता का सुन्दर समन्वय करके उप-आदर्श राज्य की रूपरेखा तैयार करने का प्रयास किया है। उसने राज्य में व्यावहारिकता का गुण पैदा करने के लिए आदर्श राज्य में पर्याप्त संशोधन किए हैं। प्लेटो ने लॉज के दार्शनिक शासक के स्थान पर कानून को प्रतिष्ठित करके न्याय के स्थान पर आत्मसंयम के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। लॉज में दार्शनिक शासक पर विधि की सीमाएँ हैं। लाज प्लेटो के सम्पूर्ण राजनीतिक अनुभवों का निचोड़ है। इसमें प्लेटो ने बताया है कि शासक विधि के स्वामी नहीं सेवक और दास है। लाज में प्लेटो का द ष्टिकोण यथार्थवादी है लॉज प्लेटो की उत्तरकालीन कृति होने के कारण विचारों की प्रौढ़ता
का सागर है जो अमूल्य रत्न प्रदान करती है। इस पुस्तक में प्लेटो ने नगर राज्यों की समस्याओं पर अन्तिम परिणाम प्रस्तुत किए हैं। सेवाइन ने कहा है कि लाज़ प्लेटो के सम्पूर्ण लेखों में सबसे अधिक सुन्दर है। यह पुस्तक 12 भागों में विभाजित है। प्रथम दो भागों में संगीत व न त्य शिक्षा, तीसरे में राज्य के ऐतिहासिक विकास, चौथे में राजनीतिक विकास, पाँच से आठ तक राज्य के कानूनों, शासन विधान, पदाधिकारियों, राज्य की जनसंख्या शिक्षा पद्धति आदि का वर्णन, नौये से ग्यारहवें तक फौजदारी और दीवानी नियम संहिताओं का वर्णन, बारहवें भाग में कर्त्तव्यविमुख होने वाले सरकारी अधिकारियों के लिए दण्ड-व्यवस्था का वर्णन किया गया है। यह पुस्तक भी संवाद शैली में लिखी गई है। इसमें वर्णित राजनीतिक विचार निम्नलिखित है:
1. आत्मसंयम (Self Control) रिपब्लिक में आदर्श राज्य में न्याय ही प्लेटो के सिद्धान्त का मालिक गुण है, लेकिन लाज के आत्मसंयम का गुण ही मौलिक गुण है। आत्मसंयम का अभिपाय यह है कि नागरिक कानून का पालन करें, राज्य की संस्थाओं के प्रति उनके मन में सम्मान हो और ये कानून की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए सदा तैयार रहे लाज में न्याय आत्मसंयम के अधीन है। बार्कर का कहना है कोई भी सद्गुण तब तक सद्गुण नहीं होता जब तक कि आत्मसंयम का सद्गुण पूर्ण रूप में उससे प्रथम स्थान प्राप्त नहीं करें बुद्धि, साहस तथा न्याय सभी के सद्गुण के लिए समान रूप से, यह एक पूर्व शर्त है अथवा इनकी पूर्णता के लिए अनिवार्य है।" आत्मसंयम का सद्गुण राज्य होने की आधारशिला है। आत्मसंयम पर आधारित न होने वाला राज्य अपूर्ण एवं दोषपूर्ण है। प्लेटो का मानना है कि राज्य में एकता, स्वतन्त्रता, सहमति की स्थापना इस सद्गुण के द्वारा ही हो सकती है आत्म संयम का सद्गुण राज्य में विवेक तथा वासना के तत्वों में समन्वय स्थापित करके राज्य में शान्ति-व्यवस्था कायम करता है।
2 कानून की सर्वोच्चता (Supremacy of Law) प्लेटो ने अपने ग्रन्थ 'लाज में कानून के शासन को अच्छा माना है। इसमें शासक व शासित दोनों ही कानून के अधीन रहते हैं। प्लेटो ने अपने कटु अनुभव के अनुसार यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि राज्य में दार्शनिकों का शासन न हो तो कानून का शासन अवश्य होना चाहिए उसका मानना है कि एक प्रज्ञावान शासक को तो कानून की आवश्यकता नहीं होती लेकिन ऐसा सद्गुणी शासक मिलना कठिन होता है, इसलिए कानून की आवश्यकता पड़ती है। प्लेटो ने कहा है कि कानूनों के बिना व्यक्ति की स्थिति बर्बर पशुओं की तरह हो जाती है।" अपने व्यावहारिक कटु अनुभव के बाद प्लेटो ने कानून की सर्वोच्चता को प्रतिपादित किया और कहा कि यदि प्रज्ञावान उपलब्ध न हो, तो कानून के शासन को ही स्वीकार करना चाहिए। प्लेटो ने कानून को मानव आत्मा का अंग तथा आत्मसंयम व विवेक का मूर्त रूप माना है। प्लेटो के अनुसार प्राचीन समाज में विभिन्न परिवारों एवं कुलों में विभिन्न परम्पराएँ व प्रथाएँ होती हैं, जिनमें परस्पर विरोध होता रहता है इससे सार्वजनिक हित का मार्ग अवरुद्ध होता है। इसलिए सार्वजनिक हित की पुष्टि से इन परम्पराओं और प्रथाओं में उचित समन्वय एवं तालमेल पैदा करने के लिए कानून का जन्म होता है। इसके अलावा कानून का निर्माण प्राकृतिक प्रकोपों, युद्ध अथवा आर्थिक परिस्थितियों से उत्पन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी किया जाता है। प्लेटो का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति में सार्वजनिक हित को समझने की योग्यता नहीं होती। यह अपने स्वार्थ के कारण सार्वजनिक हित के रास्ते में बाधा उत्पन्न करता है। इसे दूर करने के लिए कानून का बहुत महत्व है। कानून का शासन ही सर्वोच्च होता है। इसलिए शासकों को कानून का ही अनुकरण करना चाहिए, अन्यथा सार्वजनिक हित की हानि होगी ओर राज्य का पतन हो जाएगा। प्लेटो के अनुसार कानून सार्वभौतिक होता है, इसलिए इसका कठोर व संहिताकरण होना जरूरी है। कानून का शासन ही दार्शनिक शासक के अभाव में शासक व जनता का मार्गदर्शक बनकर उन्हें सद्मार्ग पर चलाता है। कानून निर्माण समाज सुधार के लिए ही होता है, इसलिए उसे ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए। प्लेटो का कहना है कि "राज्य को कानून के अनुसार होना चाहिए, कानून को राज्य के अनुसार नहीं सरकार को भी कानून के शासन का संचालन करना चाहिए। सरकार कानून की दास व सेविका होती है, स्वामी नहीं सरकार कानून में परिवर्तन नहीं कर सकती इसे तो जनता एवं देववाणियों द्वारा स्वीकृत होने पर ही बदला जा सकता है।" अतः हम कह सकते हैं कि प्लेटो ने लाज में कानून को सर्वोच्च
मानकर कानून के शासन का ही समर्थन किया है। 3. इतिहास का महत्व (Importance of History) प्लेटो ने ताज में ऐतिहासिक अनुभवों से लाभ प्राप्त करने के लिए ऐतिहासिक विधि का सहारा लिया है। वह हमें अनुभवों पर आधारित शिक्षा देता है। प्लेटो ने लाज में इतिहास के आधार पर एक निश्चित शासन प्रणाली का समर्थन किया है जिसमें राज्य की सत्ता और जनता की सहमति को स्वीकार किया
राजनीतिक नि
जाता है। प्लेटो ने इतिहास के उदाहरणों के आधार पर कानून के नियम और मिश्रित संविधान की व्यवस्था का समर्थन किया है। प्लेटो ने बताया है कि राज्यों के आत्मसंयम न रहने और सत्ता के एक ही व्यक्ति के हाथ में आ जाने पर ही आरगोस (Argon) एवं मैसिना (Messimu) जैसे राज्यों का उसी तरह पतन हो गया जिस तरह अधिक पालो वाले जहाज तथा अधिक मांस वाला शरीर नष्ट हो जाता है एथेन्स के लोकतन्त्र का पतन भी आत्म-संयम के अभाव के कारण ही हुआ था। इस प्रकार अनेक ऐतिहासिक दष्टातों के आधार पर प्लेटो ने अपने राजनीतिक विचारों को 'लाज' में पुष्ट किया है।
4. शान्ति एवं युद्ध (Peace and War) प्लेटो ने अपने ग्रन्थ 'लाज' में युद्ध की निन्दा व शान्ति का समर्थन किया है। प्लेटो
ने 'लाज' की प्रारम्भिक पुस्तकों में सैनिकवाद की कटु आलोचना करते हुए, स्पार्टा के पतन का कारण यहाँ के सैनिक संगठन को माना है। उसकी मान्यता है कि 'साहस' युग पर आधारित राज्य विकृत होकर युद्ध-प्रेमी हो जाता है। युद्ध निरर्थक होता है। इससे शान्ति का पतन होता है और समाज में अशान्ति व अराजकता का सूत्रपात होता है। युद्ध से साहस विकसित होता है और अनुशासन की भावना बढ़ती है, परन्तु यह साहस अविवेक पर आधारित होने के कारण जनकल्याणकारी नहीं होता। प्लेटो कहता है कि वास्तविक साहस तभी सम्भव है, जब यह विवेक द्वारा अनुशासित होकर जन-कल्याण के लिए कार्य करे। प्लेटो युद्ध को एक व्याधि मानता है। उसका कहना है कि रोगग्रस्त रुग्ण और अपूर्ण राज्य ही युद्ध का सहारा लेता है आंतरिक शान्ति व लोककल्याण के लिए युद्ध की अपेक्षा शान्ति अधिक जरूरी होती है। इस प्रकार प्लेटो ने रिपब्लिक' में वर्णित सैनिकवाद की लॉज में कटु आलोचना करके शान्ति को ही अधिक महत्व दिया है।
5. प्रशासनिक व्यवस्था (Administrative System) रिपब्लिक की तरह प्लेटो ने लाज में सरकार की सर्वोच्चता को महत्त्व न देकर कानून के शासन को महत्त्व दिया है। कानून के शासन के पालन के लिए एक सुद उ प्रशासनिक व्यवस्था का ढाँचा मी लॉज में पेश किया गया है। प्लेटो ने उपादर्श राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रूपरेखा निम्न प्रकार से प्रस्तुत की है।
(क) जन-सभा (Popular Assembly) यह राज्य की नगर सभा है इसमें नगर- राज्य के सभी 5040 सदस्य शामिल होते हैं और यह राज्य के उच्च संस्थाओं और पदाधिकारियों का चयन करती है यह कानूनों में परिवर्तन और न्याय भी करती है। इसकी बैठक वर्ष में एक बार जरूरी होती है।
(ख) विधि-संरक्षक अथवा परामर्शदाता बोर्ड (Guardians of Law or Advisory Board) इस संस्था के सदस्य केवल 50 वर्ष से अधिक आयु के नागरिक ही बन सकते हैं। उनका कार्यकाल 20 वर्ष होता है उनकी कुल संख्या 37 होती है उनका चुनाव तिहरी चुनाव प्रणाली द्वारा साधारण सभा के 5040 सदस्यों में से किया जाता है ये कानून के संरक्षक होते हैं। राज्य के प्रशासन में शिक्षामन्त्री का विशेष स्थान होता है।
(ग) प्रशासनिक परिषद् (Administrative Council) प्रशासनिक परिषद् में 360 सदस्य होते हैं। इनका चुनाव एक वर्ष के लिए किया जाता है। नागरिकों के चारों वर्गों में से 90-90 सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं। प्रशासनिक परिषद् के 36 सदस्यों को 12 भागों में बाँटा जाता है। विधि-संरक्षकों के परामर्श अनुसार प्रशासनिक परिषद् शासन करती है। (घ) न्याय-व्यवस्था (Administration of Justice) प्लेटो ने 'लाज' में सभी विवादों को व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक दो भागों में बाँटकर उनके समाधान हेतु तीन न्यायालयों की स्थापना की गई है (1) पंचायती न्यायालय (i) क्षेत्रीय न्यायालय (iii) विशेष चुने हुए न्यायाधीशों का न्यायालय इस सम्पूर्ण न्याय विभाग का संरक्षक शिक्षा मन्त्री होता है। (ख) स्थानीय शासन (Local Administration) प्लेटो ने 'लॉज' में स्थानीय शासन की व्यवस्था में नगरों में दो प्रकार के अधिकारी नगर निरीक्षक एवं बाजार निरीक्षक का उल्लेख किया है। नगर निरीक्षक तीन तथा बाजार निरीक्षक पाँच है। नगर निरीक्षक का चुनाव नागरिकों के प्रथम वर्ग से तथा बाजार निरीक्षकों का चुनाव द्वितीय व तीय वर्ग के नागरिकों में से किया जाता है। स्थानीय प्रशासन को सुविधापूर्ण ढंग से चलाने के लिए सम्पूर्ण नगरराज्य को 12 भागों में बाँटकर
प्रत्येक भाग में 5 ग्रामीण निरीक्षक नागरिकों द्वारा चुने जाते हैं। उपर्युक्त संस्थाओं के अतिरिक्त 'लाज' में प्लेटो ने दोष निरीक्षक, परीक्षा मण्डल, रात्रि-परिषद् आदि का भी उल्लेख किया है।
6. सामाजिक और आर्थिक ढाँचा (Social and Economic Structure) : प्लेटो ने 'लॉज' में उप-आदर्श राज्य के सामाजिक संगठन पर विचार करते हुए परिवार एवं विवाह की संस्थाओं पर विचार किया है। वह परिवार को एक नैतिक एवं धार्मिक सत्ता मानता है। वह विवाह को एक धर्म तथा अविवाहित रहने को अधर्म मानता है। उसने विवाह की संस्था पर राय के नियन्त्रण को स्वीकार किया है। उसने विवाह उत्सवों का समर्थन किया है। वह विपरीत गुण व प्रकृति वाले विवाहों को उत्तम मानता है। विवाह से पूर्व स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र चिकित्सक से अवश्य लेना चाहिए। वह जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए सन्तानोत्पत्ति को राज्य द्वारा नियन्त्रित करने का समर्थक है। वह स्त्री शिक्षा को अनिवार्य मानता है। वह स्त्री को सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए कहता है वह सह-शिक्षा का विरोध करता है।
'रिपब्लिक' के विपरीत लॉज में प्लेटो ने व्यक्तिगत सम्पत्ति रखने की छूट अवश्य दी है, लेकिन उसके प्रयोग और उसकी मात्रा को निश्चित कर दिया है। वह सार्वजनिक हित में सम्पत्ति पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक मानता है। वह लॉज के सम्पत्ति सम्बन्ध ढाँचे पर कहता है कि नागरिकों को भूमि एवं मकान तो निजी रूप में प्राप्त होंगे। उसकी भूमि को उपज का उपभोग सार्वजनिक भोजनालयों में पंचायती ढंग से होगा। नागरिकों में भूमि का वितरण इस प्रकार से होगा कि नागरिकों में आर्थिक असमानता सीमित मात्रा में रहेगी। नागरिक केवल भूमि से उत्पन्न धन ही रखेंगे। उन्हें सोना, चाँदी अथवा विलास की वस्तुएँ रखने का अधिकार नहीं होगा। दास खेती करेंगे और विदेशी व्यापार करेंगे। नगर राज्य में तीन वर्ग- दास, विदेशी व नागरिक होंगे। इस प्रकार प्लेटो ने कुछ विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों को ही नागरिक माना है । इस ग्रन्थ में भी प्लेटो की मौलिक समस्या यह है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कार्यों को करते में भाग कैसे ले । इस समस्या का समाधान करने में प्लेटो 'लॉज' में असफल ही रहा। हुए सामाजिक कार्यों
7. शिक्षा व्यवस्था (Education System) : प्लेटो ने 'लॉज' में भी 'रिपब्लिक' की तरह शिक्षा को बहुत महत्त्व दिया है। उसने स्त्री व पुरुषों के लिए समान पाठ्यक्रम स्वीकार किया है लेकिन सह-शिक्षा प्रणाली का विरोध किया है। वह शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को सद्गुणी बनाना बताता है। वह समान शिक्षा प्रणाली अपनाने का सुझाव देता है। उसने शिक्षा को प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा तीन भागों में बाँटकर सब नागरिकों के लिए शिक्षा को अनिवार्य मानता है। वह कला और साहित्य पर कठोर नियन्त्रण की बात करता है। उसने पाठ्यक्रम में संगीत और व्यायाम को पूर्ण महत्त्व दिया है। उसका 'लॉज' में वर्णित शिक्षा-सिद्धान्त वास्तव में शिक्षा-संगठन का सिद्धान्त है।
8. धार्मिक संस्थाएँ (Religious Institutions) : प्लेटो ने 'लॉज' के दसवें अध्याय में धर्म की विस्त त व्याख्या की है। उसकी धर्म के प्रति रुचि उसकी व द्धावस्था के अनुभव की परिचायक है। उसे धर्म का अव्यवस्थित तथा व्यक्तिगत रूप पसन्द नहीं है और वह धार्मिक आडम्बरों का विरोध करता है। वह नास्तिकता को दण्डनीय अपराध मानता है तथा धर्म को राज्य के नियन्त्रण में रखता है। उसका मानना है कि धर्म का रूप राज्य द्वारा निश्चित होना चाहिए। उसके धार्मिक विचारों के कारण उसकी पुस्तक 'लॉज' को धार्मिक उत्पीड़न का प्रतिपादन करने वाला प्रथम ग्रन्थ कहा है।
उपर्युक्त विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि 'लॉज' प्लेटो के राजनीतिक चिन्तन और अनुभवों का सारांश है। लॉज के इन अनुभवों पर आधारित सिद्धान्तों ने परवर्ती चिन्तकों को बहुत अधिक प्रभावित किया है और इतिहास में अपनी गहरी व अमिट छाप छोड़कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। 'लॉज' में प्लेटो ने अपने उपादर्श राज्य में अपने राजनीतिक अनुभवों को प्रतिस्थापित किया है। प्लेटो की विचारधारा का अरस्तू पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और रोमन कानून को तो 'लॉज' की ही सन्तान कहा गया। अतः प्लेटो की पुस्तक 'लॉज' प्लेटो के उपादर्श राज्य का व्यावहारिक ढाँचा ! प्रस्तुत करती है। इससे प्लेटो को यथार्थवादी होने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका यह ग्रन्थ एक ऐतिहासिक धरोहर बन गया।