जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के दर्शन की आलोचना (Criticism of Hegelian Philosophy)
हीगल के दर्शन की आलोचना (Criticism of Hegelian Philosophy)
सेबाइन के अनुसार " हीगल का दर्शन बहुत अधिक जटिलताओं से युक्त है। "
आइवर ब्राउन के अनुसार, " व्यावहारिक दृष्टि से हीगल के सिद्धांत का अर्थ है आत्मिक दासता दैहिक अधीनता, अनिवार्य सैनिक भर्ती, राष्ट्रीय हितों के लिए युद्ध और शान्तिकाल में मनुष्यों द्वारा लेवियाथन दैत्य की उपासना और युद्धकाल में मोलोक की उपासना ।"
मैक्सी का कथन है कि "राज्यों का पृथ्वी पर ईश्वर का आगमन बताने के उद्देश्य से शुरू होने वाला राजनीतिक हीगलवाद नास्तिक निरंकुशों या तानाशाहों के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए समाप्त हुआ। "
वेपर के अनुसार, " हीगल सर्वाधिकारवादी सिद्धांतों को पिता है।"
शोपनहार जैसा आलोचक उसके दुरूह शब्दजाल को पागल व्यक्ति का प्रलाप कहता था ।
उदारवादी आर. हाइम ने हीगल को 'पुनर्स्थापना का सरकारी दार्शनिक और उनके दर्शन को 'प्रशाई दर्शन' की संज्ञा दी। अपनी बहुचर्चित पुस्तक "हीगल और उसका काल" (1857) में उन्होंने लिखा- "मुझे तो लगता है कि सारे वास्तविक की विवेकपूर्णता विषयक प्रसिद्ध उक्ति की तुलना में जिस अर्थ में वह हीगल की प्रस्तावना में मिलती है, उसकी तुलना में हॉब्स और फिल्मर ने हाम्लेट और स्टाल ने जो कुछ भी कहा था, वह सब एक अर्थ में कहीं अधिक स्वतन्त्र सिद्धांत था । "
हीगल के राजनीतिक दर्शन की निम्नलिखित तर्कों के आधार पर आलोचना की जाती है-
1. द्वन्द्वात्मक पद्धति अस्पष्ट और सर्वथा अवैज्ञानिक -
सेबाइन के अनुसार द्वन्द्वात्मक पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न पारिभाषिक शब्दों का मनमाने ढंग से प्रयोग किया गया है, वह किसी भी प्रकार से कोई वैज्ञानिक पद्धति नहीं है।
2. राज्य को ईश्वर का मूर्तिमान रूप समझना -
हीगल के दर्शन में राज्य को ईश्वर का अवतार माना गया है. जो गलती नहीं करता। इस सम्बन्ध में हाबहाउस ने लिखा है कि हीगल का राज्य सिद्धांत राज्य को एक महानतर प्राणी, एकात्मा तथा एक अतिव्यक्ति सत्ता मानता है जिसमें व्यक्ति, उनके अन्तःकरण, उनके दावे तथा अधिकार, उनका हर्ष, उनका दुःख ये सब केवल पराधीन तत्व हैं।
3. व्यक्ति को साधन मानना -
हीगल के अनुसार राज्य सर्वोपरि है और राज्य एवं व्यक्ति के हितों में कोई विरोध नहीं है। राज्य आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही जगतों का केन्द्र है। राज्य की सत्ता को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्पष्ट है कि हीगल का दर्शन राज्य को साध्य और व्यक्ति को साधन मानता है। वह व्यक्ति को राज्य का दास बना देता है, व्यक्ति को पूर्णतः राज्य के अधीन कर देता है।
4. राज्य की निरंकुशता का प्रतिपादक -
हीगल ने राज्य को ईश्वर का अवतार मानकर राजा के दैवी अधिकारों का समर्थन किया। उसने राज्य की निरंकुशता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उसके अनुसार व्यक्ति को सदैव राज्य की आज्ञाओं का आंख मूंदकर पालन करना चाहिए। जोड के अनुसार, “राज्य का निरपेक्ष सिद्धांत व्यक्ति की स्वतन्त्रता का शत्रु है क्योंकि जब भी व्यक्ति और राज्य में कोई संघर्ष उत्पन्न होता है तो इसके अनुसार राज्य अवश्य ही सही होना चाहिए।" आलोचकों के अनुसार जर्मन निरंकुशता और बर्बरतावाद हीगल के दर्शन का ही एक परिणाम था ।
5. अन्तर्राष्ट्रीयतावाद के प्रतिकूल युद्ध का दर्शन -
जोड़ के अनुसार हीगल के दर्शन से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में वर्तमान राज्यों के सिद्धांत विहीन कार्यों को मान्यता मिल सकती है। वास्तव में हीगल के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के विषय में विचार अराजकता की सीमा को छूते हैं। हींगल की विचारधारा का सहारा लेकर राज्य अपने अनैतिक एवं सिद्धांतहीन कार्यों को मान्यता मिलने का अनिवार्य परिणाम विश्वशान्ति और सहयोग का गला घोंट देना है। वह युद्ध को मानव सभ्यता के विकास एवं राज्य की सर्वशक्तिशालिता का परिचय देने के लिए परम उपयोगी साधन मानता है। युद्ध और अन्तर्राष्ट्रीय कानून की उपेक्षा की शिक्षा देने वाला उसका यह सिद्धांत मृत्यु विनाश एवं संहार की ओर ले जाने वाला है।
6. स्वतन्त्रता की महान् अवधारणा को परतन्त्रता में परिवर्तित कर देना -
हीगल के अनुसार स्वतन्त्रता का अर्थ है राज्य के आदेशों का पालन स्वतन्त्रता अपनी इच्छानुसार कार्य करना नहीं है अपितु राज्य की इच्छानुसार कार्य करना है । स्वतन्त्रता का अर्थ अपनी इच्छा के प्रतिकूल आदेशों को अपना कर्तव्य समझते हुए बिना किसी तर्क के पालन करना है। आलोचकों के अनुसार उसने स्वतन्त्रता के सिद्धांत को मरोड़कर उसे 'आज्ञाकारिता' बना दिया।
7. उग्र राष्ट्रवाद का सिद्धांत -
हीगल का दर्शन उग्र राष्ट्रवाद का दर्शन है जिसकी चरम परिणति जर्मन राज्य एवं जर्मन नस्ल की सर्वोपरिता में होती है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के नाम पर हीगल ने जर्मनी के सम्राट, सामन्तों और विशेषाधिकार प्राप्त कुलीन वर्ग की जनता से पूजा कराई और जातीयता के गुण गा-गाकर उसे और अधिक प्रोत्साहित किया।
8. पूर्वाग्रह पर आधारित दर्शन-
आलोचकों के अनुसार उसका दर्शन पूर्वाग्रहों पर आधारित है। उसकी विश्वात्मा के विकास एवं इतिहास की दार्शनिक व्याख्या को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता क्योंकि इनके द्वारा वह जर्मनी के गौरव में अभिवृद्धि करना चाहता था।
9. शक्ति के आदर्शीकरण का दर्शन-
हीगल का दर्शन शक्ति के आदर्शीकरण का दर्शन था। इसमें शक्ति से पृथक् अन्य किसी भी आदर्श के प्रति एक प्रकार की अवज्ञा का भाव था। इसमें शक्ति के आदर्श को एक प्रकार का नैतिक और न्याययुक्त आदर्श माना गया था। उसने राष्ट्र को एक ऐसे आध्यात्मिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया जो अन्तर्राष्ट्रीय विधि के नियन्त्रण से परे था और जिसकी नैतिक दृष्टि से आलोचना नहीं हो सकती थी।
10. अनुदारवादी दर्शन-
राजनीतिक निष्कर्षों की दृष्टि से हीगल का राज्य सिद्धांत उदारताविरोधी था। उसमें स्वतन्त्र के सत्तावाद को उदात्त रूप दे दिया गया था। इसमें राष्ट्रवाद ने राजवंशीय और सत्ता का रूप धारण कर लिया था। हीगल के दर्शन का सार था "राजनीति को ऐसे लोगों के हाथों में छोड़ दिया जाए जो वंश तथा व्यवसाय के द्वारा शासन करने के योग्य हैं। "
वेपर के अनुसार, “उसने व्यक्ति को राज्य की वेदी पर बलि चढ़ा दिया।"
बार्कर के अनुसार, “हीगल ने राष्ट्र राज्य को एक रहस्यात्मक स्तर तक पहुंचा दिया।"
एबेन्स्टाइन के शब्दों में, “यद्यपि हीगल ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों का प्रतिपादन बड़ी शब्दाडम्बरपूर्ण दार्शनिक परिभाषाओं में किया है, किन्तु उसमें फासीवाद के सभी तत्व मिलते ...... वह मैकियावेली से भी आगे बढ़ गया, उसने शक्ति और नैतिकता को अभिन्न वन दिया । "
मैकगवर्न के अनुसार, " बिस्मार्क का शक्ति पर आधारित मानव क्रिया के उच्चतम लक्ष्य के रूप में राष्ट्र राज्य पर बल देना, उसका यह विश्वास कि राज्य केवल व्यक्तियों का एक समूह मात्र नहीं है, अपितु एक सावयवी सम्पूर्ण है, उसक जनतन्त्र के विरोध में एक अतिशक्तिशाली राजतन्त्र तथा नौकरशाही का पोषण, आदि सब का मूल हीगल के चिन्तन में निहित था । "
गैटेल के अनुसार, “हीगल के विचारों से फासीवाद के विकास और आक्रामक आदर्शों को बड़ा प्रोत्साहन मिला।"
संक्षेप में -
20वीं शताब्दी में इटली में फासीवाद तथा जर्मनी में नाजीवाद दोनों हीगल की विचारधारा से ही निःसृत हुए। इन अधिनायकतन्त्रों के अन्तर्गत राज्य की सत्ता को चरम सीमा पर पहुंचाकर व्यक्ति को पूर्णतया राज्य का दास बना दिया गया। फासीवाद सर्वाधिकारवादी राज्य हीगल की विचारधारा का सर्वसत्तावान राज्य माना जाता था जिसे हीगल ने 'पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार' कहा था।