हीगल और काण्ट के राजनीतिक विचारों की तुलना (Comparison of Hegel's Political Thinking with that of Kant)

हीगल और काण्ट के राजनीतिक विचारों की तुलना (Comparison of Hegel's Political Thinking with that of Kant)

काण्ट और हीगल दोनों जर्मन विचारक हैं और दोनों की विचारधाराओं में कई साम्यताएँ हैं। काण्ट और फिक्टे के प्रभाव में हीगल ने अंग्रेजी विचारधारा कि इन्द्रियों से प्राप्त संवेदना तथा परीक्षण द्वारा ही ज्ञान की प्राप्ति होती है, का खण्डन किया। इन दोनों दार्शनिकों की भांति हीगल का भी विश्वास था कि अन्तिम सत्य तथा इस विश्व से सम्बन्धित समस्याओं का निराकरण केवल दार्शनिक चिन्तन द्वारा ही किया जा सकता है। दोनों आदर्शवादी विचारधारा से सम्बन्धित महान् दार्शनिक हैं, किन्तु दोनों के विचारों में काफी अन्तर है। हीगल के विचारों पर काण्ट का प्रभाव है, किन्तु वह काण्टवादी नहीं है। 

बार्कर के शब्दों में " काण्ट के विरुद्ध हीगल ने वैयक्तिक स्वतन्त्रता की अधिक विधेयात्मक और तथ्य प्रधान परिभाषा प्रस्तुत की है और राज्य की कम व्यक्तिवादी धारणा व्यक्त की है। "

1. काण्ट में एक प्रकार का द्वैतवाद है। उसने केवल दृश्य जगत् की वस्तुओं को ही बुद्धिगम्य माना था। उसके अनुसार इस जगत के मूल में जो सत्य है वह बुद्धिगम्य नहीं है। उसका आभास हमें व्यावहारिक बुद्धि द्वारा ही होता है। हीगल ने इस विचारधारा का खण्डन किया। उसके अनुसार यदि मूल वस्तु अज्ञात है तो उसकी कल्पना करना ही व्यर्थ है तथा उसका आभास हो ही कैसे सकता है? साथ ही यह कहना कि कोई वस्तु अज्ञात है इस बात को सूचित करता है कि वह वस्तु पूर्ण अज्ञात नहीं है, अन्यथा यह कहा ही नहीं जा सकता कि वह वस्तु अज्ञात है। हीगल ने इस तर्क द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सभी कुछ बुद्धि द्वारा जाना जा सकता है। संक्षेप में, हीगल अद्वैतवादी था, वह जड़ जगत की पृथक् सत्ता नहीं मानता। वह जड़-चेतन सभी वस्तुओं को विश्वात्मा का रूप मानता है।

2. दोनों की पद्धतियां भिन्न-भिन्न हैं। काण्ट ने विश्लेषणात्मक तथा निगमनात्मक (deductive) पद्धति द्वारा ज्ञान पर बल दिया था, जबकि हीगल ने ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक पद्धति का सहारा लिया। 

3. काण्ट आदर्शवादी होते हुए भी व्यक्तिवादी विचारक है। वह व्यक्ति को स्वशासित इकाई मानता है और वह नैतिक नियमों के अनुसार आचरण करके ही सच्ची स्वतन्त्रता का उपयोग कर सकता है। अतः काण्ट, व्यक्ति को राज्य के अधीन न बनाकर राज्य की सदस्यता को अनिवार्य नहीं मानता। दूसरी तरफ हीगल राज्य को साध्य और व्यक्ति को साधन मानता है। उसने व्यक्ति के हितों और अधिकारों को राज्य के लिए बलिदान कर दिया है। 

4. काण्ट राज्य की उत्पत्ति का कारण सामाजिक अनुबन्ध मानता है। इसके विपरीत, हीगल राज्य की उत्पत्ति का कारण सामाजिक अनुबन्ध न मानकर राज्य को विश्वात्मा के आध्यात्मिक पक्ष का द्वन्द्वात्मक पद्धति से होने वाला चरम विकास मानता है।

5. काण्ट के अनुसार राज्य में तीन सत्ताएँ हैं- विधानमण्डल, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतन्त्रता के लिए वह विधानमण्डल और कार्यपालिका के पृथक्करण का समर्थक था। इसके विपरीत, हीगल के अनुसार राज्य में तीन सत्ताएँ - विधायिका, कार्यपालिका और सम्राट होता है और वह उनकी एकता बनाये रखना चाहता है। उसके अनुसार तीनों शक्तियां एक-दूसरे की पूरक तथा एक महान् समष्टि के विभिन्न अंग हैं। उसने तीनों में सम्राट को विशिष्ट महत्व दिया जो विधायिका और कार्यपालिका में समन्वय स्थापित करके उन्हें एक बनाता है।

6. काण्ट के अनुसार सच्चे अर्थों में वही व्यक्ति स्वतन्त्र हैं जो नैतिक रूप में स्वाधीन है। उसके अनुसार स्वतन्त्रता व्यक्ति की इच्छा का अधिकार है जिसे आत्मारूपित आदेशात्मक कर्तव्य भी कहा जा सकता है। इसके विपरीत, हीगल के अनुसार स्वतन्त्रता का अर्थ है राज्य की आज्ञाओं का पालन करना ।

7. काण्ट राज्य को सीमित कार्य सौंपता है। उसके अनुसार राज्य का कार्य उत्तम जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। दूसरी तरफ हींगल राज्य को पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार मानता है। अतः उसकी राज्य सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान है, उसके कार्यों का कोई अन्त नहीं है।

8. काण्ट विश्वशान्ति का जबर्दस्त पोषक था। उसके अनुसार स्वतन्त्र राज्यों का एक विशाल संघ निर्मित होना चाहिए जिनके बीच अन्तर्राष्ट्रीय कानून का प्रयोग वांछित है। इसके विपरीत, हीगल राष्ट्र के विकास के लिए युद्ध को अनिवार्य आवश्यकता मानता था। उसके अनुसार बन्दूक और बारूद सभ्यता को उन्नत करने वाले आविष्कार थे। वह अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था और अन्तर्राष्ट्रीय कानून का समर्थक नहीं था। नैतिकता के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राज्य पर कोई बन्धन नहीं लगाया जा सकता।

इस प्रकार हीगल और काण्ट दोनों आदर्शवादी विचारक हैं, किन्तु दोनों में मौलिक अन्तर है। वाहन के शब्दों में, " काण्ट ने अपना चिन्तन व्यक्तिगत चेतना से आरम्भ किया था, लेकिन हीगल ने बाह्य ज्ञान और संगठित संस्थाओं की दुनिया से।" सेबाइन के अनुसार, “व्याख्यात्मक आलोचना काण्ट के दर्शन का मुख्य विचार है और हींगल की सफलता का केन्द्र बिन्दु है विकास। "

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