जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के स्वतन्त्रता संबंधी अवधारणा (Hegel's Conception of Freedom)
हीगल की स्वतन्त्रता संबंधी अवधारणा (Hegel's Conception of Freedom)
हीगल ने व्यक्तिवाद की दो आधारों पर आलोचना की थी। सर्वप्रथम उसने व्यक्तिवाद को उस प्रान्तवाद तथा संकीर्ण मनोवृत्ति से समीकृत किया था जिसने जर्मनी को आधुनिक राष्ट्रीय राज्यत्व प्राप्त करने से रोक रखा था। उसने इस राष्ट्रीय प्रवृत्ति के लिए लूथर के प्रभाव को उत्तरदायी ठहराया था, लूथर ने ईसाई स्वतन्त्रता की भावना को एक रहस्यात्मक रूप दे दिया था और उसे लौकिक दशाओं से निरपेक्ष ठहराया था। दूसरे हीगल ने व्यक्तिवाद को जैकोविनवाद समीकृत किया था। जैकोबिनवाद फ्रांस की क्रान्ति के आतंकवाद, नास्तिकता और हिंसा का प्रतीक था । हीगल इस तरह के व्यक्तिवाद को दार्शनिक बुद्धिवाद का परिणाम मानता था। उसके विचार से इन दोनों प्रकारों में समान भ्रांति यह थी कि उन्होंने मनुष्य को संगठित समाज (राज्य) से अलग करके देखा था। उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि व्यक्ति की समाज में एक स्थिति होती है, उसे अपने कुछ कर्तव्यों का पालन करना पड़ता है और कुछ भूमिका निभानी पड़ती है। यदि हम व्यक्ति पर एकाकी दृष्टि से विचार करें तो वह एक पशु मात्र है। उसके एकमात्र नियम अपनी चंचल प्रवृत्तियां, स्वार्थ भावनाएँ और मन की तरंगें हैं। यदि हमें व्यक्ति को ठीक तरह से समझना है तो हमें उसे समाज और राज्य के एक सदस्य के रूप में देखना चाहिए।
हीगल के अनुसार राष्ट्रीय राज्य आधुनिक सभ्यता की एक अनुपम सिद्धि है। उसने यह सीख लिया है कि उच्चतम सत्ता का नागरिकों की स्वतन्त्रता के उच्चतम प्रकार और रूप के साथ किस प्रकार समन्वय स्थापित किया जाए। फिलोसफी ऑफ राइट में हीगल ने लिखा है "आधुनिक राज्य का तत्व यह है कि वह अंशों की सत्ता का अंश की स्वतन्त्रता के साथ सामंजस्य स्थापित करता है। "
हीगल के अनुसार स्वतन्त्रता मनुष्य का एक विशेष गुण है। स्वतन्त्रता को छोड़ने का अर्थ मानवता का परित्याग करना है। अतः स्वतन्त्र न होना मनुष्य द्वारा अपने मानवीय अधिकारों तथा कर्तव्यों का परित्याग करना है। हीगल के अनुसार स्वतन्त्रता को एक सामाजिक व्यापार समझना चाहिए। वह उस सामाजिक व्यवस्था की एक विशेषता है जो समुदाय के नैतिक विकास के आधार पर उत्पन्न होती है। वह व्यक्तिगत प्रतिभा की चीज नहीं है। वह तो एक प्रकार की स्थिति है जो व्यक्ति को समुदाय की नैतिक और वैधानिक संस्थाओं के माध्यम से दी जाती है। फलतः उसे स्वेच्छा अथवा व्यक्तिगत प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता । स्वतन्त्रता व्यक्तिगत इच्छा और व्यक्तिगत क्षमता को सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्य के निष्पादन में लगा देने में है। इसी बात को एफ. एच. ब्रेडले ने 'मेरा पद और उसके कर्तव्य' सूत्र में व्यक्त किया था। ये बातें ही इच्छा को नैतिक मूल्य देती हैं। स्वतन्त्रता अथवा सुख के किसी दावे का नैतिक दृष्टि से उस समय तक समर्थन नहीं किया जा सकता जब तक वह सामाजिक हित के किसी न किसी पहलू को पुष्ट न करता हो और सामान्य इच्छा द्वारा समर्थित न हो। व्यक्ति के अधिकार और स्वतन्त्रताएँ वे हैं जो समाज में उसके पद द्वारा आरोपित कर्तव्यों से साम्य रखती हैं। व्यक्तिगत सुख-दुःख में भी कुछ न कुछ समाज का भाव निहित रहता है। जब हम सामाजिक दृष्टि से उपयोगी किसी कार्य को करते हैं तो हमें सुख की अनुभूति होती है। हींगल का सदैव विश्वास था कि आत्म चेतना की भावना सदैव ही दुःखदायी होती है, वह निराशा और निष्फलता को प्रकट करती है। इस प्रकार प्लेटो और अरस्तू की भांति हीगल का भी स्वतन्त्र नागरिकता विषयक सिद्धांत व्यक्तिगत अधिकारों पर नहीं बल्कि सामाजिक कार्य पर आधारित था। आधुनिक राज्य में व्यक्ति राज्य की सेवा करके उच्चतम आत्मसिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। आत्म इच्छा की नकारात्मक स्वतन्त्रता के स्थान पर राज्य में नागरिकता की वास्तविक स्वतन्त्रता स्थापित होती है।
हीगल की स्वतन्त्रता संबंधी धारणा वैयक्तिक न होकर सामाजिक नीतिशास्त्र पर आधारित है। हीगल ने इसे भी राज्य की धारणा की ही भांति आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया है। उसके मत से स्वतन्त्रता का अभिप्राय ऐसी इच्छा है। जो कि विवेकपूर्ण है, अर्थात् जिसे दैवात्मा चाहती है। चूंकि राज्य दैवात्मा की अभिव्यक्ति है, अतः जैसा राज्य चाहता है वैसा करने में ही स्वतन्त्रता निहित है। हीगल के शब्दों में, “स्वतन्त्रता विवेक के आदेश का पालन करने में हैं, परन्तु एक व्यक्ति का विवेक सदा विश्वसनीय नहीं होता। कभी-कभी वह तात्कालिक और अस्थायी कारणों से प्रभावित हो जाता है और किसी विशिष्ट हित की ओर झंका रहता है। राज्य के कानूनों द्वारा जो विवेक व्यक्त होता है उसमें यह दोष नहीं होते। वह सार्वभौम होता है, विशिष्ट नहीं। इस कारण सच्ची स्वतन्त्रता राज्य के कानून का पालन करने में ही है।" चूंकि हीगल ने व्यक्तिगत इच्छा को चंचलता, भावनात्मकता अथवा धर्मान्धता के साथ समीकृत किया था, इसलिए उसके अनुसार स्वतन्त्रता से तात्पर्य अपनी वैयक्तिक इच्छा के अनुसार कार्य करना नहीं है; अपितु राज्य की बुद्धि के अनुसार कार्य करना है। राज्य विश्वात्मा के विकास का चरम रूप है, अतः उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना ही सच्ची स्वतन्त्रता है।
हीगल के अनुसार विश्व का इतिहास स्वतन्त्रता की चेतना की प्रगति से भिन्न और कुछ नहीं है और चूंकि विश्वात्मा स्वतन्त्र हैं, यह स्वयं परिपूर्ण है, अतः उसकी आत्मपूर्णता ही स्वतन्त्रता का मूल तत्व है। इसके विपरीत, भौतिक जगत् गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अधीन रहने के कारण स्वतन्त्र नहीं है। वे विश्वात्मा का विकास ही स्वतन्त्रता का विकास है और मानव इतिहास स्वतन्त्रता का इतिहास है। मानव इतिहास की इति राज्य में होती है जिसमें विश्वात्मा अपनी पूर्ण अभिव्यक्ति कर लेती है। अतएव जो राज्य पूर्णता को प्राप्त हो चुका है, वही वास्तव में स्वतन्त्र राज्य है और जो व्यक्ति एक पूर्णता प्राप्त राज्य के पूर्णता प्राप्त कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, वही व्यक्ति वास्तव में पूर्ण स्वतन्त्र है।
हीगल के अनुसार राज्य 'सामान्य इच्छा' की अभिव्यक्ति है। वह प्रत्येक व्यक्ति की सइच्छा के अनुकूल ही कार्य करता है। यहां तक कि जब चोर जेल की ओर ले जाया जाता है तो राज्य का यह कार्य उसकी सद्इच्छा के अनुसार ही होता है। वह जेल जाने में अपनी स्वतन्त्रता की प्राप्ति करता है क्योंकि स्वतन्त्रता राज्य के कानूनों का पालन करने में है।
हीगल के अनुसार राज्य के भय से यदि व्यक्ति कानूनों का पालन करता है तो वह स्वतन्त्र नहीं है प्रत्युत बाह्य शक्ति के अधीन है। व्यक्ति तभी स्वतन्त्र है जब वह अपनी इच्छा से राज्य के आदेशों का पालन करें। इस प्रकार हीगल ने राज्य को वस्तुगत (Objective) तथा आत्मगत (Subjective) स्वतन्त्रता कहा है। वह व्यक्ति की सच्ची स्वतन्त्रता तथा आदर्श इच्छा का प्रतिनिधित्व ही नहीं करता वरन् उन्हें सुरक्षित भी करता है, अतः राज्य और व्यक्ति के उद्देश्य समान हैं। राज्य की इच्छा में सदैव व्यक्ति की वास्तविक अथवा आदर्श इच्छा निहित रहती है, अतः दोनों में किसी प्रकार का विरोध नहीं है। जब कभी राज्य की इच्छा और व्यक्ति की इच्छा में विरोध दिखाई देता है, तब वास्तव में वह विरोध दोनों ही वास्तविक इच्छाओं से नहीं होता, व्यक्ति की स्वार्थपरता तथा अपूर्णता के कारण हमें दोनों में विरोध प्रतीत होता है। हीगल यद्यपि व्यक्ति की स्वतन्त्रता का पोषक था फिर भी उसकी दृष्टि में व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता का उपभोग राज्य में रहकर तथा उसके नियमों का पालन करके ही कर सकता है। उसके अनुसार " राज्य स्वतन्त्रता का मूर्तिमान रूप है" (State is an actualisation of Freedom)। अपनी इच्छानुसार कुछ भी कार्य करने को हीगल स्वतन्त्रता नहीं मानता।
वस्तुतः हीगल का उद्देश्य फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति की भूलों को सुधारना था, जिसमें उसके अनुसार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया गया था। प्रारम्भ से ही हींगल इस बात के लिए जागरूक था कि अत्यधिक व्यक्तिवाद जर्मनी के राष्ट्रीय चरित्र का सबसे बड़ा दुर्गुण था। वह यह कहा करता था। कि यद्यपि जर्मनी के लोग एक स्वतन्त्र राष्ट्र निर्मित करने के लिए लालायित हैं, पर वे भूलते हैं कि स्वतन्त्र राष्ट्र की स्थापना से पूर्व किस प्रकार उसके लिए सर्वप्रथम एक संगठित राष्ट्र के रूप में कार्य करना है। जब तक जर्मनी के लोग अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को उत्सर्ग करके एक संगठित राष्ट्र के रूप में कार्य करना आरम्भ नहीं करते तब तक उनकी स्वतन्त्र जर्मन राष्ट्र की कल्पना निर्मूल है । अतः हीगल के अनुसार नागरिकों का कर्तव्य है कि वे संगठित रूप से कार्य करना सीखें तथा सामाजिक नियमों का विधिवत् पालन करें। व्यक्तिगत इच्छा केवल भावात्मक उद्दण्डता ही है, वह बनावटी भी है। इसलिए व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य राज्य के आदेशों का पालन करना है।
हीगल और काण्ट की स्वतन्त्रता संबंधी अवधारणाओं में अन्तर -
बार्कर का कथन है कि काण्ट की स्वतन्त्रता - की धारणा को नकारात्मक, सीमित और आत्मगत बताते हुए हीगल ने वैयक्तिक स्वतन्त्रता की अधिक विधेयात्मक और तथ्य प्रधान परिभाषा प्रस्तुत की है तथा राज्य के सिद्धांत का कम व्यक्तिवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। " हीगल काण्ट की स्वतन्त्रता की धारणा को नकारात्मक (Negative) कहता था। हीगल के अनुसार काण्ट व्यक्ति के अन्तःकरण की स्वतन्त्रता पर अधिक बल देता। वह स्वतन्त्रता का अर्थ व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रधान रूप से कई प्रकार के प्रतिबन्धों से मुक्त करने पर उसकी गतिविधि, विचारों की अभिव्यक्ति, आदि पर नियन्त्रण न लगाने से लेता था। जबकि हीगल स्वतन्त्रता को नकारात्मक ( बन्धनों का अभाव ) न मानकर विधेयात्मक (Positive) अर्थात् राज्य के कानूनों का पालन करना मानता था।
हीगल काण्ट की स्वतन्त्रता की धारणा को व्यक्तिवादी एवं सीमित (Limited and subjective) मानता है। काण्ट का स्वतन्त्रता का विचार व्यक्ति तक ही सीमित था काण्ट की स्वतन्त्रता व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धों पर कोई ध्यान नहीं देती। काण्ट व्यक्ति को साध्य मानता है और उसके सामाजिक दायित्वों को गौण मानता है। जबकि हीगल का मानना है कि स्वतन्त्रता की प्राप्ति समाज के नैतिक जीवन में भाग लेने से ही सम्भव है। स्वतन्त्रता का अभिप्राय वैयक्तिक इच्छा के अनुसार कार्य करना नहीं है; अपितु राज्य की इच्छा के अनुसार कार्य करना है। इस प्रकार हीगल का स्वतन्त्रता संबंधी विचार व्यक्ति तक ही सीमित न होने से आत्मगत (Subjective) नहीं था। इसी प्रकार काण्ट का विचार व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाता है इसलिए सीमित (Limited) है जबकि हीगल द्वारा प्रतिपादित स्वतन्त्रता का दृष्टिकोण है राज्य के परिप्रेक्ष्य में स्वतन्त्रता की व्याख्या करता है इसलिए अधिक व्यापक है।
संक्षेप में,
काण्ट का स्वतन्त्रता संबंधी दृष्टिकोण व्यक्ति के चारों ओर घूमता है, व्यक्ति को साध्य मानता है इसलिए हीगल उसे 'नकारात्मक, सीमित और आत्मगत' कह कर आलोचना करता है। दूसरी तरफ होगल का दृष्टिकोण राज्य और समाज की दृष्टि से स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करता है इसलिए वह इसे अधिक व्यापक सकारात्मक और वस्तुगत' मानता है। हीगल के अनुसार व्यक्ति स्वार्थपूर्ण इच्छाओं से नियन्त्रित होता है और सामाजिक प्रेरणाओं से वंचित रहता है। चूंकि राज्य नैतिक प्रयोजनों की साक्षात मूर्ति है, इसलिए व्यक्ति नैतिक गरिमा और स्वतन्त्रता केवल उसी समय प्राप्त करता है जबकि वह अपने को राज्य की सेवा में लगा देता है। " वस्तुनिष्ठ आत्मा के क्षेत्र में स्वतन्त्रता पहली बार यथार्थ का विद्यमान सत्व का रूप ग्रहण करती है। आत्मा अपनी आत्मनिष्ठता से निकलकर अपनी स्वतन्त्रता की बाह्य यथार्थता का ज्ञान तथा वास्तवीकरण करती है, यानी आत्मा की वस्तुनिष्ठता बाकायदा स्थापित हो जाती है। "