जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के अनुसार राज्य और नागरिक समाज सम्बन्धी विचार (Hegel on the State and The Civil Society)
हीगल के अनुसार राज्य और नागरिक समाज (Hegel on the State and The Civil Society)
हीगल नागरिक समाज और राजनीतिक राज्य में भेद करते हैं। इस प्रश्न पर उनके विचार अपनी सारी मौलिकता के बावजूद पूर्ववर्ती संकल्पनाओं से प्रभावित हैं। समाज के मुकाबले राज्य की प्रमुखता और उनके सहसम्बन्धों के स्वरूप विषयक हीगलीय मान्यता पर प्लेटो और अरस्तू की इस प्रस्थापना की छाप है कि राज्य व्यक्ति से पहले आता है, ठीक वैसे ही कि जैसे समष्टि अंश से पहले आती है। हीगल इन प्लेटोवी और अरस्तूई अवधारणाओं का रूसो की इस अवधारणा से समन्वय करते हैं कि राज्य का मूल तत्व इच्छा है।
हीगल के अनुसार राज्य में निहित सामान्य इच्छा एक ऐसी नैतिक समष्टि है जो अपने सभी अंगों व्यक्ति, परिवार तथा समाज की तुलना में सर्वोपरि है। हीगल ने नागरिक समाज को विशेष जीवनीय सम्बन्धों का विशिष्ट क्षेत्र बताया और उनकी यह मान्यता उस युग के एडम स्मिथ, डी. रिकार्डों जैसे बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के विचारों से प्रभावित थी।
नागरिक समाज से हीगल का आशय बुर्जुआ समाज से था। वह लिखते हैं-" प्रसंगतः, नागरिक समाज आधुनिक विश्व में ही साकार बन पाया है क्योंकि केवल आधुनिक विश्व ही प्रत्यय की हर परिभाषा को उसका उचित अर्थ प्रदान करता है।" नागरिक समाज अलग-अलग व्यक्तियों के विशेष निजी हितों तथा उद्देश्यों की पूर्ति का क्षेत्र है। अधिकार के बोध के विकास की दृष्टि से यह एक आवश्यक चरण है क्योंकि यहां विशिष्ट और सामान्य का परस्पर सम्बन्ध और परस्पर निर्भरता प्रदर्शित होते हैं।
हीगल के अनुसार, नागरिक समाज में वास्तविक स्वतन्त्रता अभी अप्राप्य रहती है, क्योंकि निजी हितों के टकरावों की शक्ति पर सामान्य की आवश्यक सत्ता का विवेक पर आधारित अंकुश नहीं, अपितु सांयोगिक अंकुश रहता है। वह लिखते हैं- “ इन विलोमों और उनके अन्तर्गुम्फन से हमारे सामने नागरिक समाज का जो चित्र उपस्थित होता है, वह उतना ही असामान्य विलासिता तथा अतिरेक से परिपूर्ण हैं जितना कि दरिद्रता और शारीरिक तथा नैतिक, दोनों ही दृष्टियों से सर्वव्यापी भ्रष्टता से परिपूर्ण है। "
हीगल नागरिक समाज को विरोधी हितों द्वारा संघर्षपूर्ण समाज के रूप में, सबके विरुद्ध सबके युद्ध के रूप में चित्रित करते हैं। उनके अनुसार नागरिक समाज के लक्षण हैं-
आवश्यकताओं का तन्त्र,
न्याय प्रशासन,
पुलिस और निगम।
नागरिक समाज की संरचना में हीगल तीन श्रेणियों का उल्लेख करते हैं-
1. बुनियादी (भूमिधर, कुलीनवर्गीय तथा किसान)
2. औद्योगिक (कारखानेदार, व्यापारी और शिल्पी) तथा
3 सामान्य (कर्मचारी वर्ग )
सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों की चर्चा करते हुए हीगल स्वीकार करते हैं कि नागरिक समाज कितना भी समृद्ध क्यों न हो, वह अत्यधिक गरीबी से और कंगालों के पैदा होने से लड़ने की अवस्था में नहीं होता है। हीगल का विश्लेषण दिखाता है कि नागरिक समाज मात्र अपनी आन्तरिक क्षमताओं के आधार पर ही गरीबी की समस्या को हल नहीं कर सकता और गरीबी की द्वन्द्वात्मकता उसे अपनी सीमाओं से बाहर निकलने, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और उपनिवेशीकरण के रूप में नई क्षमताएँ खोजने को बाध्य करती हैं। उपनिवेशीकरण के आधुनिक रूपों के प्रति, जिनका अन्त पिछड़े हुए देशों और जातियों को गुलाम बनाने में होता है, हीगल का रवैया बुनियादी तौर पर नकारात्मक है। वह लिखते हैं- " उपनिवेशों की मुक्ति उपनिवेश स्वामी के लिए ठीक वैसे ही बहुत बड़ा वरदान है, जैसे दासों की मुक्ति उनके मालिकों के लिए बहुत बड़ा वरदान होती है। "
नागरिक समाज के ही प्रसंग में हीगल सकारात्मक विधि, न्याय प्रशासन और पुलिस कार्य का भी विवेचन करते हैं, यद्यपि अधिकार के बोध के मूर्तिकरण की दृष्टि से इस विषय को अधिकार के दर्शन' के उस भाग में उठाया जाना चाहिए था, जहां राज्य की चर्चा की गयी है। हीगल ने इसका जो कारण बताया है, उसका प्रत्यक्ष सामाजिक-राजनीतिक महत्व है। हीगल यह मानकर चलते हैं कि सम्पत्ति का वास्तविक कार्य क्षेत्र नागरिक समाज है। सम्पत्ति की शक्ति की पुष्टि कानून, न्याय व्यवस्था और पुलिस द्वारा उसकी रक्षा में ही होनी चाहिए। इन संस्थाओं का उद्देश्य निजी हितों के जंगल में समाज के सामान्य हितों की रक्षा करना है।
हीगल कानूनों की सार्वजनिक घोषणा, सार्वजनिक विधिक कार्यवाही और जूरी न्यायालय की आवश्यकता पर जोर देते हैं। वह सर्वव्यापी पुलिस राज्य की संकल्पना की आलोचना करते हैं, किन्तु निजी मामलों में पुलिस के हस्तक्षेप की क्या सीमाएँ होनी चाहिए, इस बारे में स्पष्टतः कुछ नहीं बताते। हीगल के दर्शन के अनुसार, कानून, न्यायालय और पुलिस द्वारा नागरिक समाज में परिरक्षित सर्वोच्च हितों का प्रश्न हमें नागरिक समाज से राज्य के क्षेत्र में ले आता है। हीगल के अनुसार नागरिक समाज के विकास के लिए राज्य का उसकी बुनियाद के तौर पर मौजूद होना आवश्यक है, किन्तु राज्य के बोध का वैज्ञानिक प्रमाण' यही है कि बोध की अन्तर्वर्ती गति में, परिवार और नागरिक समाज के विकास में राज्य को उनकी समन्वयकारी एकता के रूप में हासिल कर लिया जाये, जो यद्यपि परिणाम के तौर पर सामने आता है, किन्तु वास्तव में उनकी वास्तविक बुनियाद ही होता है। हीगल लिखते हैं, “इसलिए वास्तव में राज्य सर्वोपरि है और उसकी सीमाओं के भीतर ही परिवार बढ़कर नागरिक समाज बनता है और स्वयं राज्य का प्रत्यय भी अपने को इन दो पहलुओं में विभाजित करता है। "
संक्षेप में
नागरिक समाज का हीगल का विश्लेषण काफी सारगर्भित है। उसका राज्य सिद्धांत राज्य तथा नागरिक समाज के सम्बन्धों के विशिष्ट स्वरूप पर आधारित था। यह सम्बन्ध विरोध का भी है और पारस्परिक निर्भरता का भी । हीगल के विचार से राज्य कोई ऐसी उपयोगितावादी संस्था नहीं है जो सार्वजनिक सेवाओं, विधि के प्रशासन, पुलिस कर्तव्यों के पालन और औद्योगिक तथा आर्थिक हितों के सामंजस्य में लगी हो। ये सारे कार्य नागरिक समाज के हैं। राज्य आवश्यकतानुसार उनका निर्देशन और विनियमन कर सकता है, लेकिन वह खुद इन कार्यों को नहीं करता। नागरिक समाज बुद्धिमत्तापूर्ण पर्यवेक्षण और नैतिक महत्व के लिए राज्य के ऊपर निर्भर रहता है। यद्यपि नागरिक समाज और राज्य दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं, फिर भी एक-दूसरे से अलग-अलग हैं। राज्य साधन नहीं है, बल्कि साध्य है। वह विकास में विवेकयुक्त आदर्श को और सभ्यता में आध्यात्मिक तत्व को प्रकट करता है। इस दृष्टि से वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नागरिक समाज का प्रयोग करता है।
नोट;- हीगल की संकल्पना के तर्क के अनुसार, समाज और राज्य के बीच चेतना और विवेक जैसा सम्बन्ध है। समाज 'चेतना का राज्य' है और वास्तविक राज्य विवेक युक्त होता है। इसलिए दार्शनिक और तार्किक दृष्टि से हीगल समाज को एक पक्ष अथवा ऐसी चीज कहते हैं, जो राज्य में विलीन हो जाती है।