हीगल के राजनीतिक दर्शन की पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति सम्बन्धी विचार (Methodology of Hegel's Political Thought: Dialectical Method)

 

हीगल के राजनीतिक दर्शन की पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति (Methodology of Hegel's Political Thought: Dialectical Method)

इस ब्लॉग पोस्ट में फ्रेडरिक हीगल के राजनीतिक दर्शन की पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति से सम्बन्धित निम्नलिखित बिन्दुओं पर चर्चा की गयी है -

हीगल के राजनीतिक दर्शन की पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति क्या है ?
हीगल की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को निम्नलिखित रेखाचित्रों से समझा जा सकता है |
द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा समाज तथा राज्य के विकास का अध्ययन |
द्वन्द्वात्मक पद्धति की विशेषताएँ |
द्वन्द्वात्मक पद्धति की आलोचना |
द्वन्द्वात्मक पद्धति के गुण |

हीगल के राजनीति क दर्शन की पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति

हींगल के दर्शन का आधार स्तम्भ है- 'विश्वात्मा की अवधारणा' (The Concept of Weltgeist of Spirit) और विश्वात्मा की विशेषताएँ हैं सतत् गतिशीलता। अतः 'विश्वात्मा' की इस स्वतः प्रेरित गतिशीलता को अभिव्यक्त करने वाली पद्धति को उसने 'द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया' का नाम दिया है। उसने अपने समस्त दार्शनिक और राजनीतिक सिद्धांतों को द्वन्द्वात्मक पद्धति की पृष्ठभूमि पर आधारित किया।

द्वन्द्वात्मक पद्धति का विचार हीगल के दर्शन का मूल तत्व अवश्य है, किन्तु यह उसका मौलिक विचार नहीं है। वस्तुतः इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सुकरात ने किया था। प्राचीन यूनान में वाद-विवाद द्वारा सत्य का अन्वेषण करने की प्रवृत्ति बहुत प्रचलित थी और सत्य का अन्वेषण करने के लिए सुकरात, प्लेटो आदि विद्वानों ने इसी पद्धति का प्रयोग किया था। यूनानी भाषा में 'डायलेक्टिक' शब्द 'डाइलेगो' (Dialego) से बना है जिसका अर्थ होता है- 'वाद-विवाद' या 'तर्क-वितर्क'। यूनानी विचारकों का विश्वास था कि वाद-विवाद तथा तर्क-वितर्क द्वारा सत्य तक पहुंचा जा सकता हैं, परन्तु हीगल ने द्वन्द्वात्मक पद्धति का प्रयोग सुकरात के अनुरूप न करके अरस्तू के 'राज्य चक्र' के विचार की तरह किया। अरस्तू का यह विचार था कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, हर वस्तु अति मात्रा में पहुंचकर स्वयमेव अपनी विरोधी वस्तु को उत्पन्न करती है। उसके अनुसार जब राजतन्त्र स्वार्थ सिद्धि में लिप्त हो जाता है तो निरंकुशतन्त्र में, जब कुलीनतन्त्र भ्रष्ट हो जाता है तो धनिकतन्त्र में और जब सर्वजनतन्त्र की दूषित हो जाता है तो जनतन्त्र में परिवर्तन हो जाता है और इस प्रकार 'परिवर्तन चक्र' चलता रहता है। हीगल ने इसी 'द्वन्द्व' का लाभ उठाया।

हीगल ने यूनानियों से द्वन्द्वात्मक पद्धति को ग्रहण करते हुए उसमें मौलिक परिवर्तन कर दिए और इसे वाद-विवाद के स्तर से उठाकर, वाद, प्रतिवाद और संवाद के स्तर पर ले गया। हीगल के अनुसार यूनानियों के विचार में द्वन्द्व की प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाता है और उसका मत है कि यह प्रक्रिया तीन चरणों में चलती है। 

हीगल के अनुसार किसी वस्तु की वास्तविकता की पहचान में तीन चरण होते हैं-

(1) उसका होना (Being)

(2) उसका प्रतिरोध अर्थात् वह क्या नहीं है (Non-being) और ,

(3) दोनों का संश्लेषण अर्थात् उसका बन जाना (Becoming )

हीगल के मतानुसार 'विश्वात्मा' के विकास क्रम राज्य का एक विशिष्ट स्थान है, पर विश्वात्मा के विकास की प्रक्रिया किस प्रकार होती है, उसके प्रमुख सोपान कौन-कौन से हैं तथा राज्य का किसलिए विशिष्ट स्थान है, ये सब बातें द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से ही जानी जा सकती हैं। 

हीगल का कहना है कि मानव सभ्यता का विकास सीधा और सपाट नहीं है, वह टेढ़ा-मेढ़ा है जिसे आध्यात्मिक चिन्तन या बुद्धि द्वारा जाना जा सकता है। विकास की प्रक्रिया गतिशील तथा द्वन्द्वात्मक है साथ ही यह आन्तरिक विरोध के द्वारा संचालित होती है। इसका प्रत्येक सोपान वाद ( Thesis), प्रतिवाद (Antithesis) तथा संवाद (Synthesis) से बनी त्रयी के रूप में दिखायी देता है।

यहां एक बात समझ लेने की है और वह यह कि आन्तरिक और बाह्य विकास प्रक्रिया का वर्णन मानव बुद्धि के अनुसार होता है और क्योंकि मानव बुद्धि अपूर्ण है, अतः उसके द्वारा आशिक सत्य का बोध होता है। मानव बुद्धि धीरे-धीरे सत्य की ओर उन्मुख होती हैं। किसी भी विषय के सत्य की जो प्रथम झलक मानव बुद्धि को मिलती है, वही 'वाद' (Thesis) है। 

आगे चलकर जब मनुष्य को उसकी अपूर्णता का आभास होता है और वह नए सत्य की खोज करता है तो वह 'प्रतिवाद' (Antithesis) को जन्म देता है, परन्तु वाद की भांति यह प्रतिवाद की आंशिक सत्य ही रहता है, पूर्ण सत्य नहीं। अत: शीघ्र ही उसकी असत्यता का आभास भी मानव बुद्धि को होने लगता है और उसके विरुद्ध भी प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

 मनुष्य फिर वाद और प्रतिवाद के आंशिक सत्यों का मेलकर संवाद (Synthesis) के रूप में एक नवीन सत्य की खोज करता है। इस प्रकार मनुष्य प्रत्येक त्रयी द्वारा सत्यान्वेषण की एक सीढ़ी चढ़कर उच्च स्तर पर पहुंचने का प्रयास करता है। आगे चलकर संवाद, पूर्ण सत्य होने के अभाव में, स्वयं वाद बन जाता है तथा विकास प्रक्रिया में एक नवीन त्रयी को जन्म देता है। इस प्रकार वाद, प्रतिवाद और संवाद का क्रम अबाध गति से चलता रहता है। यह क्रम सदैव आगे की ओर बढ़ता रहता है और तब तक बढ़ता रहेगा जब तक कि विकास की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो जाती और पूर्ण सत्य की प्राप्ति नहीं होती।

सभ्यता के विकास क्रम को द्वन्द्वात्मक पद्धति के अनुसार समझाते हुए हीगल कहता है कि सबसे पहले प्रत्येक वस्तु का मौलिक रूप होता है जो वाद के रूप में होता है। विकसित होने की प्रकृति के कारण धीरे-धीरे यह विकसित होकर अपने में निहित अन्तर्विरोधों के कारण अपने विपरीत रूप को जन्म देता है जो उसके प्रतिवाद का रूप ग्रहण कर लेता है; विकास की प्रक्रिया बराबर जारी रहती है, अतः प्रारम्भ में इन दोनों रूपों में संघर्ष होता है जिससे अन्ततः उसमें समन्वय एवं सन्तुलन स्थापित होता है और वह संवाद के रूप में प्रकट होता है। यह संवाद, वाद और प्रतिवाद दोनों का समन्वित रूप होने के कारण इन दोनों से विकास की उच्च स्थिति का द्योतक होता है, लेकिन विकास की प्रक्रिया यहां आकर रुकती नहीं वरन् निरन्तर जारी रहती है। 

अतः कालान्तर में यह संवाद पुनः वाद में अपने आपको परिवर्तित कर लेता है और पुनः अपने प्रतिवाद को जन्म देता है जिससे पुनः संवाद की स्थिति पैदा होती है। इस तरह वाद, प्रतिवाद और संवाद की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और सभ्यता अपने विकास के मार्ग पर अग्रसर होती रहती है। अतः हीगल के अनुसार सभ्यता के विकास का मार्ग त्रिकोणात्मक है।

हीगल की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को निम्नलिखित रेखाचित्रों से समझा जा सकता है-. 

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इस प्रकार रेखाचित्र से स्पष्ट है कि विकास की प्रक्रिया सरल या सीधी रेखा में नहीं होती, यह पहले आगे बढ़ती है. फिर कुछ पीछे हटती है, पुनः आगे बढ़ती है, किन्तु आगे बढ़ने और पीछे हटकर आगे बढ़ने में हम उस स्थान पर कभी नहीं आते जहां से हम चले थे किन्तु हम सदैव उससे अधिक ऊंचे स्थान पर ही रहते हैं। 

 हीगल के अनुसार विश्वात्मा की विकास श्रृंखला वाद प्रतिवाद एवं संवाद के अनेक त्रयी समूहों (Triads) से बनी है। प्रत्येक त्रयों की व्यापकता में अन्तर है। कोई त्रयी काफी लम्बी, कोई उससे कम व्यापक रही। सर्वव्यापक त्रयी, तर्क, प्रकृति और आत्मा है जिसके अन्तर्गत अन्य त्रयी समूह भी आ जाते हैं।

 नीचे हम सर्वव्यापक त्रयी के विस्तार को समझने का प्रयास करेंगे-

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इस श्रृंखला का क्रम तर्क संगत है- समय के अनुसार नहीं, अर्थात् यह जरूरी नहीं कि पहले तर्क था फिर प्रकृति और फिर आत्मा आई। इसका अर्थ यह है कि यदि हम विचार करना प्रारम्भ करते हैं तो सबसे पहले तर्क पर आते हैं। इससे हमें किसी वस्तु की सत्ता (Being) का ज्ञान होता है। फिर उस वस्तु के विचार का सार समझ में आने लगता है और अन्त में हम उसके बारे में अपने विचार बनाते हैं। विचारों को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए हम प्रकृति के उदाहरणों का सहारा लेते हैं तथा इससे यन्त्र विज्ञान, भौतिक विज्ञान एवं प्राणीशास्त्र के सिद्धांतों का ज्ञान होता है। इन प्राणियों एवं भौतिक वस्तुओं में आत्मा नहीं होती है। विकास क्रम में आगे ऐसी त्रयी आती है जब हमें आत्मा का भी बोध होता है। पहले हमें अपनी ही आन्तरिक आत्मा का ज्ञान होता है, फिर बाह्यात्मा का जिसके अन्तर्गत आचारशास्त्र, राजनीति और विधानशास्त्र आते हैं और अन्त में मनुष्य को निरपेक्ष आत्मा अर्थात् कला. धर्म, दर्शन, आदि का ज्ञान होता है। 

हीगल इस सिद्धांत को जीवशास्त्र, तर्कशास्त्र, बुद्धिशास्त्र आदि सब सांसारिक प्रक्रियाओं में लागू करता है। 

निम्नलिखित उदाहरणों से द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को समझा जा सकता है-

हीगल के अनुसार जीव एक संघर्ष का परिणाम है। यह वीर्य (वाद) और रज (प्रतिवाद) के संयोग से गर्भाशय में नौ माह बाद शिशु का रूप (संवाद) धारण करता है। शिशु उस समय तक संवाद रहते हैं जब तक उनमें प्रजनन के लिए वीर्य या रज का उत्पादन नहीं हो जाता। इसे अण्डे के उदारहण से भी समझा जा सकता है। यदि अण्डे को वाद स्वीकार कर लिया जाए तो चूजे से लेकर मुर्गी तक संवाद माना जा सकता है। मुर्गी जब अण्डा देती है तो वह पुनः वाद बन जाता है। वनस्पति जगत में इसे बीज के उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। मटर के एक दाने का खेत में बोना वाद है; धरती में इस दाने का रूपान्तर होकर अंकुर बनना प्रतिवाद है। पौधे के रूप में विकसित होने की तीसरी दशा संवाद हुई। इसमें वाद और प्रतिवाद के आवश्यक तत्वों ने मिलकर एक नई स्थिति का निर्माण किया जो दोनों से भिन्न एवं उत्कृष्ट है।

सामाजिक विधान के क्षेत्र में कानून को वह वाद मानता है। इसका स्वरूप बाह्य है। इसका निर्माण करने वाली त्रयी सम्पत्ति, संविदा तथा अपराध की है। इन्हीं की व्यवस्था के लिए कानून बनता है, परन्तु कानून में भी विरोधाभास है, वह पूर्ण नहीं है। कानून का अभिप्राय, उसका इरादा तथा उसकी भलाई या बुराई उसमें अन्तर्विरोध उत्पन्न करते हैं। इन अन्तर्विरोधी तत्वों का स्रोत नैतिकता है जो आन्तरिक स्वरूप अर्थात् प्रतिवाद है। कानून तथा नैतिकता के तत्वों के सम्मिश्रण से संवाद के रूप में सामाजिक नीतिशास्त्र का अभ्युदय होता है। यह बाह्य तथा आन्तरिक दोनों तत्वों का सम्मिश्रण है।

द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा समाज तथा राज्य के विकास का अध्ययन

द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल समाज और राज्य के विकास का अध्ययन करता है। सामाजिक विकास क्रम में परिवार सर्वप्रथम सामाजिक व्यवस्था है। परिवार वाद के रूप में उपस्थित होता है जहां से हीगल राज्य का विश्लेषण करना प्रारम्भ करता है। परिवार का आधार पारस्परिक विश्वास और स्नेह है। इसमें एकत्व की भावना रहती है तथा पति-पत्नी, सन्तान, आदि सभी एकत्व का अनुभव करते हैं। उनके हितों में परस्पर विरोध नहीं होता, किन्तु धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते हैं तथा उनके विचारों का क्षेत्र व्यापक होता जाता है, वे परिवार को अपनी प्रगति में बाधक मानने लगते हैं। अतः परिवार से निकलकर वे व्यापक सामाजिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं। इस सामाजिक व्यवस्था को हीगल 'बुर्जुआ समाज' का नाम देता है तथा यह व्यवस्था परिवार की प्रतिक्रियास्वरूप 'प्रतिवाद' (Antithesis) के रूप में सामने आती है। इस व्यवस्था में व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है और सबको अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है। इस व्यवस्था में उद्योग तथा व्यापार की पर्याप्त उन्नति होती है तथा व्यापारिक क्षेत्र में प्रतिस्पद्ध का श्रीगणेश होता है। आगे चलकर मनुष्यों को यह व्यवस्था भी असन्तोषपूर्ण दिखाई देती है। इसका कारण है व्यक्तिगत संघर्ष की तीव्रता। जब व्यक्तिगत संघर्ष बहुत बढ़ जाता है तब वह व्यक्ति के विकास का साधन न रहकर बाधक बन जाता है। अतः इस संघर्ष को नियमित और सीमाबद्ध करने के लिए राज्य प्रादुर्भाव होता है। राज्य परिवार और समाज का सामंजस्य (संवाद) है। राज्य व्यक्तियों की रक्षा भी करता है तथा उन्हें पारस्परिक संघर्ष करके आगे बढ़ने का अवसर भी देता है। हींगल के अनुसार राज्य सभी संस्थाओं से उच्चतर संस्था है जिसमें परिवार तथा व्यवस्थित समाज दोनों के गुणों का समावेश है। 

द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल का मुख्य उद्देश्य जर्मन राष्ट्रवाद के पूर्णत्व को प्रमाणित करना था क्योंकि उस समय जर्मनी अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था और राष्ट्रीय भावनाएँ लगभग मिटती-सी जा रही थीं। अतः उनका कहना था कि यूनानी राज्य वाद थे, धर्मराज्य उसके प्रतिवाद और राष्ट्रीय राज्य उनका एक संवाद (Synthesis) होगा। हीगल की कामना थी कि जर्मनी में राष्ट्रीय राज्य का उदय होगा। जर्मन जाति जो विश्व की सर्वश्रेष्ठ जाति थी, एक सुदृढ़ राष्ट्र के रूप में संगठित होकर एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरेगी जो विश्व में अद्वितीय हो और जिसे ईश्वर की इच्छा का प्रतीक कहा जा सके।

द्वन्द्वात्मक पद्धति की विशेषताएँ- हीगल द्वारा प्रतिपादित द्वन्द्वात्मक पद्धति की निम्न विशेषताएँ हैं-

1. संघर्ष ही विकास का निर्धारक है- द्वन्द्वात्मक पद्धति की मूल मान्यता है कि प्रगति या विकास दो परस्पर विरोधी वस्तुओं या शक्तियों में द्वन्द्व या संघर्ष का परिणाम है। वस्तुतः व्यक्ति और समाज का विकास सीधी रेखा में नहीं होता। होगल के शब्दों में "मानव सभ्यता की प्रगति एक सीधीरेखा के रूप में नहीं हुई है। इसकी प्रगति लगभग बवण्डर के धक्के खाते हुए जलपोत की तरह टेढ़ी-मेढ़ी है। "

2. स्वतः प्रेरित और स्वतः संचालित - इस पद्धति की प्रमुख विशेषता इसमें स्वतः संचालित होने का गुण है। इसकी स्वतः चलायमान होने की शक्ति का आधार इसमें निहित अन्तः विरोधी संघर्ष की प्रवृत्ति है। वाद धीरे-धीरे स्वत: प्रतिवाद बन जाता है और प्रतिवाद स्वतः ही संवाद बन जाता है। संवाद नया वाद बनकर प्रतिवाद को जन्म देने के लिए बाध्य होता है। हीगल ने इसे ऐतिहासिक आवश्यकता' कहा है।

3. सत्य के अन्वेषण का अद्वितीय तरीका - द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल ने सत्य के अन्वेषण का व्यवस्थित नियम बतलाया है। हीगल ने यही दर्शाया कि किसी भी वस्तु की वास्तविकता एक वस्तु को उसकी प्रतिकूल वस्तु से तुलना के द्वारा ही की जा सकती है। अतः भलाई का अस्तित्व इसलिए है क्योंकि बुराई का अस्तित्व है, गर्मी का इसलिए क्योंकि सर्दी का है।

द्वन्द्वात्मक पद्धति की विशेषता बतलाते हुए राइट ने ठीक ही लिखा है- "द्वन्द्ववाद विशुद्ध तर्क की अत्यन्त निराकार धारणा से प्रारम्भ होता है और इसकी समाप्ति विचार के अत्यन्त साकार रूप अपनी पूर्ण व्यापकता तथा साकारता के साथ निरपेक्ष बुद्धि के दर्शन में होती है।" 

डॉयल के अनुसार, "द्वन्द्वात्मक प्रणाली द्वारा हीगल ने ऐसी व्यवस्था को लागू किया है जिसके द्वारा मस्तिष्क विकास की प्रक्रिया का अध्ययन कर सकता है।"

द्वन्द्वात्मक पद्धति की आलोचना- 

यद्यपि बौद्धिक प्रक्रियाओं को समझने की दृष्टि से हीगल की इस पद्धति को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन इसकी विभिन्न दृष्टिकोणों से आलोचना की गई है और इसके विभिन्न दोषों की ओर संकेत कर इसे एक मनगढन्त पद्धति सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। आलोचकों के तर्क अग्रलिखित हैं-

1. विभिन्न वस्तुओं में विरोध की अनावश्यक कल्पना - द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा हीगल ने विभिन्न वस्तुओं में विरोध की अनावश्यक कल्पना कर ली हैं। हीगल जहां कहीं थोड़ी भिन्नता देखता है वहां तुरन्त द्वन्द्वात्मक विरोध की कल्पना कर लेता है और वाद प्रतिवाद व संवाद के त्रिकोण की स्थापना में लग जाता है। बटूण्ड रसेल के अनुसार, "निर्धनता और सम्पन्नता दो परस्पर विरोधी नहीं वरन् दो विभिन्न स्थितियां भी हैं, लेकिन वह इन्हें परस्पर विरोधी मान लेता है।"

2. अस्पष्ट पद्धति - आलोचकों के अनुसार होगल की पद्धति अस्पष्ट एवं क्लिष्ट है। उसके द्वन्द्व की अस्पष्टता को उसके द्वारा प्रस्तुत (अ) समाज और परिवार (ब) कला और धर्म के उदाहरणों में देखा जा सकता है। उसके अनुसार परिवार का प्रतिवाद समाज है. जबकि परिवार के समस्त गुण प्रेम, स्नेह, एकत्व, आदि समाज में जाकर नष्ट नहीं होते। समाज तो परिवार का विकसित ही नहीं विराट् रूप है। इसी प्रकार कला का विरोधी धर्म का होना पूर्ण अनुचित लगता है। यह कहना बहुत कठिन है कि कला और धर्म आपस में विरोधी तत्व हैं।

3. पारिभाषिक शब्दों का अस्पष्ट प्रयोग - द्वन्द्वात्मक पद्धति की आलोचना करते हुए सेबाइन ने लिखा है कि हीगल ने विभिन्न पारिभाषिक शब्दों का जिनकी परिभाषा करना कठिन है, बड़ी अस्पष्टता से प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए, हम दो शब्दों 'विचार' और 'अन्तर्विरोध' को ले सकते हैं। 

हीगल के अनुसार प्रत्येक प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन-धर्म, दर्शन, अर्थशास्त्र, विधि अथवा राजनीति का परिवर्तन-'विचार' में उन्नति के कारण होता है। यह प्रयोग संयोगवश ही नहीं किया गया था, प्रत्युत उसकी तत्वमीमांसा और द्वन्द्वात्मक पद्धति के कारण आवश्यक था। उसका आदर्शवाद मस्तिष्क की प्रक्रिया को प्रकृति की प्रक्रिया के साथ समीकृत करने पर निर्भर था। उसकी द्वन्द्वात्मक पद्धति इस बात पर निर्भर थी कि विचार के नियम को ऐसे समस्त विषयों के ऊपर लागू कर दिया जाए जिनमें प्रक्रिया एक अनिवार्य विशेषता होती है। समस्त परिवर्तन विचार की प्रेरणा के फलस्वरूप होते हैं। उनका उद्देश्य अन्तर्निहित अन्तर्विरोधों का निवारण करना होता है जिससे कि सामरस्य अथवा तार्किक संगति के एक उच्चतर धरातल को प्राप्त कर लिया जाए। यदि इन शब्दों को ठीक-ठीक अर्थ दिया जाए तो फिर सिद्धांत ठीक नहीं बैठता। विज्ञान अथवा दर्शन में जो भी नए-नए परिवर्तन होते हैं. उनका कारण यह नहीं कहा जा सकता कि वे आरम्भिक सिद्धांतों के अन्तर्विरोधों के कारण सम्भव हुए हैं। जब विज्ञान और दर्शन के बारे में ही यह बात है, तो अन्य कम बौद्धिक समाज शास्त्रों के बारे में क्या कहा जा सकता है? न्यायमूर्ति होम्स ने विधि के बारे में कहा था कि उसमें विधि की अपेक्षा अनुभव का अधिक महत्व होता है। हीगल ने विचार को सार्वभौम रूप देने की जो कोशिश की. उसका उसकी शैली के इतिहास लेखन पर दो तरह से असर पड़ा या तो असंगत तथ्यों को मनमाने ढंग से तर्कसम्मत माना गया या सामरस्य या सुसंगति जैसे शब्दों को ऐसा अस्पष्ट अर्थ दिया गया कि उनका कोई उपयोग ही नहीं रहा। इसी प्रकार हीगल द्वारा प्रयुक्त 'अन्तर्विरोध' शब्द का कोई सटीक अर्थ नहीं था। होगल ने उसका बड़ी अस्पष्ट रीति से विरोध अथवा वैपरीत्य के अर्थ में प्रयोग किया था। कभी-कभी इसका अर्थ ऐसी भौतिक शक्तियां होता था जो विरोधी दिशाओं अथवा कारणों की ओर संचालित होती हैं तथा जिनके फलस्वरूप विरोधी परिणाम सामने आते हैं। उदाहरण के लिए, हम जीवन और मरण को ले सकते हैं। कभी-कभी विरोध का अभिप्राय नैतिक गुणावगुण होता था। वास्तविक व्यवहार में द्वन्द्वात्मक पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न पारिभाषिक शब्दों का मनमाने ढंग से प्रयोग किया गया था।

4. वैज्ञानिकता का अभाव - आलोचकों के अनुसार द्वन्द्वात्मक पद्धति में वैज्ञानिकता का अभाव है। इसमें किसी भी वस्तु को मनमाने ढंग से वाद और किसी को प्रतिवाद के रूप में माना जा सकता है। अतः इस पद्धति के अनुसार किसी भी अच्छी व्यवस्था को बुरी और बुरी व्यवस्था को अच्छी सिद्ध किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, इस पद्धति का प्रयोग करके स्वयं हीगल ने निरंकुश राजतन्त्र को विश्व की सर्वश्रेष्ठ शासन व्यवस्था सिद्ध किया था। 

वेपर के शब्दों में, “हीगल की यह पद्धति नाममात्र के लिए ही वैज्ञानिक है क्योंकि इसका विकास विज्ञान के उद्यान में नहीं वरन् प्रशिया के शासन की दासता के रोड़े पर हुआ है। "

हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति की अलोचना करते हुए केटलिन ने कहा है कि अपने विभिन्न अनुभवों को वाद प्रतिवाद और त्रयी के रूप में विभक्त करना एक मनोरंजक बौद्धिक व्यायाम है। 

सेबाइन के अनुसार हीगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति में ऐतिहासिक अन्तर्दृष्टि और यथार्थवाद, नैतिक अपील, स्वच्छन्द आदर्शीकरण और धार्मिक रहस्यवाद का पुट था ...... द्वन्द्वात्मक पद्धति ने नैतिक निर्णयों को भी तार्किक आधार पर प्रतिष्ठित किया। नैतिक निर्णय नैतिक अन्तर्दृष्टि पर निर्भर होते हैं जो हर एक के लिए खुली होती है। इन दोनों को मिलाने की कोशिश में द्वन्द्वात्मक पद्धति किसी के भी अर्थ को स्पष्ट न कर सकी बल्कि उसने दोनों के अर्थ को उलझा दिया।

द्वन्द्वात्मक पद्धति के गुण-

उपर्युक्त आलोचना और कमियों के बावजूद द्वन्द्वात्मक पद्धति के अग्रलिखित गुण हैं-

1. इस पद्धति द्वारा वस्तुओं के यथार्थस्वरूप को समझने में मदद मिलती है। वस्तुओं के विरोधी तत्वों-वाद - प्रतिवाद को समझने से असली स्वरूप उभरकर सामने आता है।

2. इस पद्धति से स्पष्ट होता है कि मानव सभ्यता का विकास कोई आकस्मिक घटना नहीं है। हीगल का द्वन्द्ववाद मानव सभ्यता के विकास की एक नवीन धारणा प्रस्तुत करता है।

3. द्वन्द्वात्मक पद्धति द्वारा प्रतिपादित विकास का नियम अधिक तार्किक है। पूर्व में यह माना जाता था कि सभ्यता का विकास सरल रेखा में निरन्तर उन्नति के पथ पर होता रहता है। हीगल ने यह प्रतिपादित किया कि प्रगति में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं और प्रगति की रेखा सपाट न होकर टेढ़ी-मेढ़ी होती है।

4. हीगल की यह पद्धति मानव की बौद्धिक क्रियाओं के मनोविज्ञान को समझने में बहुत ही सहायक है। रसेल के अनुसार, " हीगल की पद्धति मानव मन की कार्य-प्रणाली को सुचारु रूप से चित्रित करती है क्योंकि कई बार मानव मन इसी प्रकार के विरोधों के मार्ग से आगे बढ़ता है।"



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