जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के राजनीतिक चिन्तन का दार्शनिक आधार विश्वात्मा का विचार (Philosophical Bases of Hegel's Political Thought : The Concept of Weltgist

जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के राजनीतिक चिन्तन का दार्शनिक आधार विश्वात्मा का विचार (Philosophical Bases of Hegel's Political Thought : The Concept of Weltgist)

इस लेख में हीगल के राजनीतिक चिन्तन का दार्शनिक आधार विश्वात्मा सम्बन्धी विचारों का उल्लेख किया गया है -

राजनीतिक चिन्तन का दार्शनिक आधार विश्वात्मा सम्बन्धी विचार -

काण्ट के ठीक विपरीत हीगल अद्वैतवादी विचारक है। काण्ट में एक प्रकार का द्वैतवाद था। उसने केवल दृश्यजगत की वस्तुओं को ही बुद्धिगम्य माना था। उसके अनुसार इस जगत के मूल में जो सत्य है वह बुद्धिगम्य नहीं है। उसका आभास हमें व्यावहारिक बुद्धि द्वारा ही होता है। हीगल ने इस विचारधारा का खण्डन किया। उसके अनुसार यदि मूल वस्तु अज्ञात है तो उसकी कल्पना करना ही व्यर्थ है तथा उसका आभास हो ही कैसे सकता है? साथ ही यह कहना कि कोई वस्तु अज्ञात है इस बात को सूचित करता है कि वह वस्तु पूर्ण अज्ञात नहीं है, अन्यथा यह कहा ही नहीं जा सकता कि वह वस्तु अज्ञात है। हींगल ने इस तर्क द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सभी कुछ बुद्धि द्वारा जाना जा सकता है।

अद्वैतवादी हीगल के राजनीतिक चिन्तन का दार्शनिक आधार उसके 'विश्वात्मा' (Weltgeist) की अवधारणा में खोजा जा सकता है। 'विश्वात्मा' की अवधारणा एक आध्यात्मिक विचार है। उसने विश्व इतिहास की विभिन्न घटनाओं को एक विकासक्रम में जोड़कर विकास के एक अनवरत क्रम का निर्माण किया और यह सिद्ध किया कि इतिहास 'विश्वात्मा' की अभिव्यक्ति की कहानी है। उसके अनुसार इतिहास में घटित होने वाली सभी घटनाएँ 'विश्वात्मा' के निरन्तर विकास के विभिन्न चरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

हीगल विशुद्ध अद्वैतवादी विचारक है और इस जगत में दिखाई देने वाली जड़ एवं चेतन सभी वस्तुओं का उद्भव 'विश्वात्मा' के रूप में देखता है। वेदान्तियों के 'तत्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' की भांति हीगल का दार्शनिक सूत्र है - " जो कुछ वास्तविक है वह बुद्धिगम्य है और जो कुछ बुद्धिगम्य है वह वास्तविक है। " (The real is rational and the rational is real)!

काण्ट के द्वैतवाद का सार था कि केवल दृश्य जगत ही बुद्धिगम्य है, इसके अन्तरंग में जो मूल तत्व है उसे हम नहीं जान सकते। हीगल ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि मूल वस्तु को अज्ञेय कहना ही यह दर्शाता है कि हम उसके बारे में थोड़ा बहुत जानते हैं।

हीगल के अनुसार जड़ और चेतन में, आत्मा और प्रकृति में अन्तर करना तर्क संगत नहीं है। ये सब विश्वात्मा के विभिन्न रूप हैं। वस्तुतः इस विश्व में जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सब विश्वात्मा के विशाल विस्तार में समा जाती हैं। यह सारा विश्व एक ही समष्टि है। इसकी सभी वस्तुओं में विश्वात्मा ओत-प्रोत है।

हीगल के अनुसार यह विश्वात्मा मकड़ी के जाले की भांति अपनी अन्तः प्रेरणा से अनेक रूपों और श्रेणियों में क्रमशः प्रस्फुटित होती हुई पुनः अपने प्रारम्भिक निर्विकार रूप में लौट आती है। यही सृष्टि का क्रम है। 

हीगल के अनुसार विश्वात्मा के विकास में अनेक सोपान हैं। प्रत्येक सोपान अगले सोपान का बोध कराता है। ये सोपान आन्तरिक तथा बाह्य जगत दोनों में पाए जाते हैं। आन्तरिक सोपान विचार जगत का बोध कराते हैं तथा बाह्य सोपान दृश्य जगत का | 

हीगल के अनुसार विश्वात्मा के विकास का प्रारम्भिक रूप भौतिक अथवा जड़ जगत है उसके बाद यह वनस्पतियों और प्राणियों में प्रकट होती हैं और इसका उच्चतम रूप मनुष्य में अभिव्यक्त होता है। इस विकास क्रम में मनुष्य की स्थिति सर्वोपरि है क्योंकि उसमें चेतन आत्मा रहती है। हीगल यह मानता है कि इसके बाद भी विश्वात्मा का विकास अवरुद्ध नहीं होता क्योंकि सम्पूर्ण विश्व विकास के क्रम से बंधा है तथा वह विश्वात्मा की ओर उन्मुख है। विश्वात्मा का बाह्य विकास विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के रूप में होता है। सामाजिक संस्थाओं में राज्य का स्थान सर्वोच्च है, क्योंकि वह अन्य सभी सामाजिक संस्थाओं का नियामक एवं रक्षक है। 

यही कारण है कि हीगल ने राज्य को विश्वात्मा का पार्थिव स्वरूप अथवा पृथ्वी पर विद्यमान ईश्वर (State is a march of God on earth) कहा है। इसी से राज्य एक नैतिक एवं आध्यात्मिक संस्था है। नैतिकता तथा विधि निर्माण सभी कुछ राज्य के अन्तर्गत है। वास्तव नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का बोध मनुष्य को राज्य के अन्तर्गत ही होना सम्भव है। इसी से राज्य का अपना निजी व्यक्तित्व है तथा उसकी अपनी इच्छा शक्ति है जिसका प्रभाव सभी के ऊपर समान रूप से रहता है। चूंकि राज्य एक नैतिक संस्था है तथा उसका स्थान सर्वोपरि है इसलिए उसे साधारण नैतिकता के नियमों से नहीं बांधा जा सकता।

हीगल द्वारा प्रतिपादित 'विश्वात्मा' शाश्वत् है, सतत् क्रियाशील और गतिशील है। इसका विकास द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से निरन्तर होता रहता है। द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया से 'विश्वात्मा' के विकास को हीगल तीन क्रमों में विभाजित करता है। पहली स्थिति पूर्वी देशों की थी दूसरी यूनानी और रोमन राज्यों की थी; तीसरी जर्मन राज्य के उत्थान की स्थिति होगी। उसने विश्वात्मा के विकास के इस क्रम का उल्लेख करते हुए घोषणा की कि "प्रशा (जर्मनी) शीघ्र ही एक प्रबल शक्तिशाली राज्य के रूप में विकसित होगा और वह यूरोप के समूचे महाद्वीप का अधीश्वर बन जाएगा। " 

हीगल के 'विश्वात्मा' के विचार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

1. 'विश्वात्मा' का विचार बहुनामी अवधारणा है- हीगल द्वारा प्रतिपादित 'विश्वात्मा' का विचार अनेक नामों से जाना जाता है। हीगल स्वयं इसे 'Weltgeist' कहता है। इसे 'विचार' (Idea ) आत्मा (Spirit), विवेक (Reason), दैवीय मानस (Divine mind), आदि नामों से पुकारा जाता है।

2. आध्यात्मिक अवधारणा है - यह एक आध्यात्मिक विचार है। काण्ट के द्वैतवाद एवं फिक्टे के विराट अहंवाद के बदले हीगल ने निरपेक्ष प्रत्ययवाद का मण्डन किया जिसके अनुसार जगत भी आध्यात्मिक है और मानव तथा जगत दोनों ही विश्वात्मा के प्रकाशन हैं।

3. पूर्ण सत्ता - हीगल के अनुसार विश्वात्मा जगत की सब वस्तुओं को अपने में ओत-प्रोत करने वाली स्वतः पूर्ण सत्ता है (Reason is the sovereign of the world)।

4. गतिशीलता - हीगल की विश्वात्मा अनन्त शक्ति का रूप है, वह सदैव सक्रिय और गतिशील बनी रहती है, इससे जगत में निरन्तर परिवर्तन आते रहते हैं।

5. द्वन्द्वात्मक पद्धति से विकास -  हीगल के अनुसार विश्वात्मा का विकास सीधा और सरल नहीं है, वह टेढ़ा-मेढ़ा है। उसने विश्वात्मा के विकास की एक विशेष पद्धति बताई जो आन्तरिक विरोध (Inner contradiction) द्वारा संचालित होती है। द्वन्द्वात्मक पद्धति कहते हैं। 

6. विश्वात्मा की चरम परिणति मनुष्य और राज्य - हीगल आध्यात्मिक क्षेत्र में विश्वात्मा के विकास का चरम रूप मनुष्य को मानता है और बाह्य क्षेत्र में विश्वात्मा की चरम परिणति 'राज्य' में मानता है। वह राज्य को पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार मानता है।


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