Understanding The Power Of Public Opinion : A Comprehensive Guide || जनमत क्या है , जनमत का सही अर्थ क्या है ?

जनमत का क्या अर्थ है , जनमत का क्या महत्व है ? जनता  की राय की शक्ति को समझाना 

जनमत का अर्थ  (Public opinion)

बोलचाल की भाषा में जनमत का अर्थ जनता के मत से है, परन्तु समभवतः ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिस पर समूची जनता का एक ही द ष्टिकोण हो । अतः यह कहा जाता है कि ऐसी स्थिति में बहुमत को ही जनमत माना जाता है। यर्थाथ में ऐसा भी कार्य नहीं होता क्योंकि अधिकांश जनता में चिन्तन और मनन की क्षमता कम होती है, अतः महत्वपूर्ण समस्याओं के बारे में उसकी अपनी कोई राय नहीं होती। वस्तुतः जिसे लोग अपना मत बताते है, वह उनका अपना मत नहीं होता, वह तो वास्तव में उनका दूसरों से उधार लिया हुआ तथा दूसरों के मुंह से सुना-सुनाया हुआ मत होता है। समाज में सोचने का काम तो | कुछ चिन्तनशील व्यक्तियों के द्वारा सम्पादित होता है अतः जब इनके द्वारा विचारा गया मत समाज के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है तो वही जनमत के नाम से जाना जाने लगता है।

जनमत की कसौटी सार्वजनिक हित को बताया गया है। जिस मत की रचना किसी वर्ग विशेष अथवा किसी सम्प्रदाय विशेष के हितों को ध्यान में रखकर हुई हों ध्यान में रखकर हुई हो, उसे जनमत की संज्ञा नही दी जा सकती । वस्तुतः यह कसौटी भी ऐसी है जिसके आधार पर जनमत को पहचाना नहीं जा सकता। 'सार्वजनिक हित' शब्दावली अत्यधिक स्पष्ट है। यथार्थ में जनसाधारण अपने अपने द ष्टिकोण के आधार पर 'सार्वजनिक हित की कल्पना करते हैं और यह द ष्टिकोण एक बड़ी सीमा तक उनके वर्ग सम्बन्धों से प्रभावित होता है। स्पष्टतः 'सार्वजनिक हित' के सम्बन्ध में एक पूंजीपती की जो कल्पना हैं, वह एक साधारण मजदूर की कल्पना नहीं हो सकती। लॉवेल ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि किसी भी समुदाय का एक मत नही होता, बहुधा किसी भी प्रश्न पर विभिन्न मत होते हैं। किसी मत को हम केवल उसी स्थिति में जनमत का नाम दे सकते हैं जबकि उसे बहुसख्यक लोग स्वीकार कर ले।

जनमत का महत्व

लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में जनमत के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता हमारा युग अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र का युग है। आज के विशालकाय राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र तो सम्भव ही नहीं है। अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र के सफल परिचालन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि प्रतिनिधियों और निर्वाचकों के प्रति बराबर सम्पर्क बना रहे। सरकार का यह दायित्व है कि प्रत्येक महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेने से पूर्व जनता की इच्छा को जानने का प्रयास करे, जनमत सरकार को इस इच्छा से अवगत कराता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जनमत कभी स्थायी नहीं होता, उसमें आये दिन परिवर्तन होते रहते है। अतः सरकार के लिए उचित और वांछनीय यह है कि वह इस प्रकार के सभी परिवर्तनों की जानकारी रखे। यदि सरकार का आचरण जनमत के प्रतिकूल है तो वह सरकार स्थायी नही हो सकती। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में सरकार के लिए लोकमत का आदर करना आवश्यक है।

जनमत सरकार के ऊपर हमेशा एक अकुंश की भाँति काम करता है। उसके भय से स्वार्थी तथा बेईमान राजनीतिज्ञ सरकार को अपने स्वार्थ साधन का यन्त्र नहीं बना सकते। अतः यह आवश्यक हैं कि प्रत्येक देश मे स्वतन्त्र एवं प्रबुद्ध जनमत पाया जायें । लोकतान्त्रिक प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भरन करती है।

भारत में जनमत :

स्वस्थ जनमत के निमार्ण के लिए जिन बातों को आवश्यक निर्माण के लिए जिन बातों को आवश्यक माना गया है, भारत में वे बातें आमतौर पर अनुपस्थित है। यहाँ की जनता अभी भी निरक्षर है तथा उसकी सार्वजनिक विषयों मे कोई अधिक रूचि नहीं है। यहाँ के अशिकांश लोग अपने ही जगत में रहते हैं। देश में नाना प्रकार के धर्म पाये जाते हैं। यहाँ का समाज जाति-बिरादरी और प्रान्तियता की भावना से ग्रसित है। अतः इस स्थिति में सार्वजनिक समस्याओं पर यहां मतैक्य पाये जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। समाचार पत्र एकाधिकारी पूँजीपतियों के नियन्त्रण में हैं, अतः जनता को सूचना प्रदान करने वाले साधन ईमानदार और निष्पक्ष नहीं है। देश में ऐसे अनेक दल हैं जिनका आधार साम्प्रदायिक है। इन सब बातों का स्वस्थ जनमत के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। फिर भी पिछले वर्षो में देश की स्थिति तेजी के साथ बदली है। आज देश में पहले की अपेक्षा साक्षरों की संख्या कही अधिक है तथा देश के औधोगिकरण के साथ स्थानीयता और धर्म के बन्धन भी कुछ ढीले हो रहे है। फलतः अनेक समस्याओं के ऊपर जनमत की अभिव्यक्ति बहुत अधिक स्पष्ट रूप से हो सकी है।

भारत में जनमत की रचना में राजनीतिक दलों, दबाव समूहों तथा समाचार पत्र का विशेष योगदान रहा है। राजनीतिक दल लोकमत को अपने पक्ष में बनाने के लिए पार्टी के समाचार पत्र निकालते हैं, अपना साहित्य वितरित करते हैं, सार्वजनिक सभाओं का आयोजन करते हैं तथा चुनावों में भाग लेते हैं। दबाव समूह भी चुनाव लड़ने को छोड़कर अन्य सभी उपायों को काम में लाते हैं। जनमत के निर्माण में अराजनीतिक संगठनों तथा व्यक्तियों का भी हमारे देश में एक योगदान रहा है। वस्तुतः राननीतिक और अराजनीतिक संगठन इस द ष्टि से एक दूसरे के पूरक की भूमिका अदा करते है। उदाहरणार्थ, यदि आर्चाय विनोबा भावे के भूदान यज्ञ ने भूमि के असमान वितरण की समस्या की और जनसाधारण और सरकार का ध्यान आकर्षित किया तो कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा संचालित 'भूमि हथियाओं' आन्दोलन ने इस बात को भली भांति व्यक्त कर दिया कि भूमि - सुधार की समस्या का समाधान अत्यन्त आवश्यक है।

आधुनिक काल में प्रैस एक शक्तिशाली सामाजिक संस्था का रूप धारण कर चुका है। यह बात इस तथ्य से प्रमाणित है कि उसे चतुर्थ वर्ग (Fourths Estate) के नाम से गौरवान्ति किया गया है। प्रेस के माध्यम से आधुनिक जीवन की समस्त जटिल प्रक्रियाओं का न केवल व्यक्त किया जाता है, अपितु उन्हें एक निश्चित दिशा भी प्रदान की जाती है। उसके माध्यम से अलग समय में ही बड़े पैमाने पर विचारों का आदान-प्रदान सम्भव बनाया जा सकता है। उसकी सहायता से विवादों का निराकरण किया जा सकता है, आन्दोलन संगठित किये जा सकते हैं तथा संस्थाओं का निर्माण किया जा सकता है। प्रेस के द्वारा शासन के ऊपर लोकतान्त्रिक नियन्त्रण कायम किया जा सकता है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि देश में जनमत के निर्माण में प्रेस एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करे।

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