सुचना का अधिकार अधिनियम 2005 की मुख्य धाराएँ , निजता का अधिकार क्या है ?

सशक्तिकरण : सूचना का अधिकार अधिनियम 2005: सिद्धान्त और व्यवहार

'सशक्तिकरण को एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है लोग, संगठन और समुदाय अपने जीवन में महारत हासिल करते हैं।' - जूलियन रैपापोर्ट (1984)

भूमिका

15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद भारत ने 26 जनवरी 1950 में अपना संप्रभुता संपन्न गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक संविधान लागू किया। भारत को पारदर्शी शासन प्रणाली के प्रभाव में आने में तकरीबन 55 साल लग गए हैं, औपनिवेशिक आधिकारिक राज अधिनियम द्वारा वैध नागरिक सूचना के अधिकार की मांग कर सकता है।

 सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, नागरिकों तक सूचना की अधिक पहुंच के लिए सरकार की सामुदायिक आवश्यकताओं के प्रति जवाबदेही अधिक होगी। 

संविधान में व्यक्तियों और नागरिकों के लिए तीसरे भाग में मौलिक अधिकारों का प्रावधान था किन्तु इन मौलिक अधिकारों में सूचना का अधिकार शामिल नहीं था। यह सच्चाई थी कि उस समय दुनिया के विकसित पूंजीवादी लोकतांत्रिक देशों में भी सिर्फ एक दो देशों में ही नागरिकों को सूचना का अधिकार प्राप्त था। 

यूरोप का स्वीडन पहला देश था जिसने सबसे पहले नागरिकों को सूचना का अधिकार दिया। 

उपनिवेशवाद से जर्जर अर्थव्यवस्था, अशिक्षा, गरीबी से ग्रस्त भारत की विशाल जनसंख्या में संविधान निर्माताओं ने नागरिकों के लिए सूचना के अधिकार का तब कोई महत्व नहीं समझा किन्तु जैसे जैसे एक ओर शिक्षितों की संख्या बढ़ी और मध्यम वर्ग का आकार बढ़ा, तथा दूसरी ओर शासन और प्रशासन के कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के अभाव के परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार बढ़ा, तब नागरिक समाज से नागरिकों के लिए सूचना के अधिकार की मांग उठने लगी। 

सूचना के अधिकार की मांग को लेकर एनसीपीआरआई (NCPRI) जिसका गठन 1996 में हुआ, और आंदोलन किया। मजदूर किसान शक्ति संगठन तथा कॉमन कॉज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही कारण है कि अंततः आजादी के 58 वर्षों के बाद संसद ने 15 जून 2005 को सूचना के अधिकार का विधेयक पारित किया जो 12 अक्टूबर 2005 को सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के रूप में जम्मू एवं कश्मीर को छोड़ कर शेष भारत में लागू हुआ था। 

सूचना का अधिकार और लोकतंत्र

सूचना का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा नागरिक अधिकार है जो न सिर्फ नागरिक की शासन में भागीदारी सुनिश्चित करता है बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली एवं नीति निर्माण प्रक्रिया में भी पारदर्शिता लाता है जो अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन और प्रशासन दोनों को ही जनता के प्रति जिम्मेदार बनाता है। तंत्र पर लोक अंकुश वो मंत्र हैं जो लोकतंत्र में सत्ता पर लोक संप्रभुता की सैद्धांतिक स्थापना करता है। 

लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक कितने सजग और सक्रिय हो कर राजनीतिक प्रकिया में भागीदारी करते हैं। नागरिकों में अधिकार के प्रति चेतना और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कितनी प्रतिबद्धता है, साथ ही शासन तथा प्रशासन की कार्यप्रणाली की कितनी जानकारी है। यद्यपि विभिन्न संचार माध्यमों से नागरिकों को सूचना मिलती है किन्तु सरकार के कार्यालयों में कार्य कैसे होता है, लालफीताशाही के कारण नागरिकों के कार्यों में निर्णय लेने में विलम्ब क्यों होता है, साथ ही सरकारी सेवा में कर्मचारी के उत्तरदायित्व का अभाव, ऐसे कारण हैं जिनके विषय में जानकारी बिना सूचना के अधिकार के संभव नहीं। 

सरकार के द्वारा किए गए जनकल्याण के कार्यों में विलम्ब और भ्रष्टाचार ऐसे कारण हैं जिनके कारण जनता तक कल्याण के कार्य का अपेक्षित फायदा नहीं पहुंचता है। नागरिकों की निरक्षरता का फायदा लेकर ठेकेदारों द्वारा उन्हें कार्य के बदले उचित पारिश्रमिक नहीं देना और नौकरशाहों द्वारा ऐसे ठेकेदारों को संरक्षण देना प्रायः आम बात हो गई है। धीरे धीरे नागरिक समाज के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों को लगने लगा कि अब एक ऐसे अधिकार की जरूरत है जो नागरिकों को सरकार और किसी लोक अधिकारी से सीधे सवाल पूछकर जानकारी मांगने का अधिकार विधि के द्वारा दे। 

राजस्थान के मजदूर किसान शक्ति संघटन ने इस अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन प्रारम्भ कर दिया और धीरे धीरे इस आंदोलन के कारण कुछ राज्य सरकारों जिसमें गोवा, कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश आदि ने सूचना के अधिकार को विधि बनाया किन्तु जब तक केंद्र के द्वारा कोई विधि नहीं बनता है तब तक सूचना का अधिकार एक राष्ट्रव्यापी अधिकार नहीं बनता। 

यही कारण है इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ 2002 में एक विधि सेंट्रल फ्रीडम आफ इन्फॉर्मेशन एक्ट बना और फिर उसे हटाकर अंततः संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में पारित कर दिया।

सूचना का अधिकार सरकार के कार्य में पारदर्शिता तथा कार्य करने वाले की जिम्मेदारी तय करने का साधन है।

 सूचना का अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य -
नागरिक सशक्तिकरण
सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करना 
तथा सरकारी अधिकारियों में भ्रष्टाचार को समाप्त करना है ताकि लोकतंत्र में लोकहित को प्रमुखता मिले।

 लोकतंत्र में सूचित नागरिक ही एक सजग व सक्रिय नागरिक बन सकता है जिससे कि लोकतात्रिक व्यवस्था में सरकार अपने नागरिकों के प्रति अधिक जिम्मेदार बन सके।

सूचना का अधिकार की व्यापकता

यदि सूचना के अधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद के भारत का एक अच्छे शासन के रूप में अध्ययन और विश्लेषण किया जाए तो पाया जाता है कि पहले की तुलना में आज सूचना के अधिकार के कारण नागरिकों में शासन के कार्यों में अधिक भागीदारी बढ़ी है और इसका प्रमाण यह है कि लगातार नागरिकों के द्वारा सूचना के अधिकार का प्रयोग करके सरकारी संस्थाओं से आवश्यक सूचनाएं मांगी जा रही है और लगातार सूचनाओं के आवेदन लाखो की संख्या में बढ़ते चले गये हैं और इन सूचनाओं के कारण बहुत ऐसी जानकारियां मिली जो नागरिकों की जानकारी में नहीं थी और इसका परिणाम यह निकला कि नागरिक अधिक सूचित व जानकार नागरिक बने हैं।

इतना ही नहीं सूचना के अधिकार का लगातार क्षेत्राधिकार बढ़ता गया है। 

राष्ट्रीय सूचना आयोग के प्रयासों का परिणाम यह निकला कि अबतक सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरों से बाहर के क्षेत्र भी इनके दायरे में आए हैं और इसके कारण नागरिक अधिक सशक्त हुआ है और उनकी जिज्ञासा सरकार के कार्यों में लगातार बढ़ी है। परिणामस्वरूप सरकारी संस्थाओं की कार्य क्षमता में वृद्धि हुई है और सरकारी कर्मचारियों में जिम्मेदारी बढ़ी है।

अधिनियम के मुख्य प्रावधान

इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत भारत का कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकता है, 

यह सूचना 30 दिनों के अंदर उपलब्ध कराई जाने की व्यवस्था की गई है। 

यदि मांगी गई सूचना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है तो ऐसी सूचना को 48 घंटे के भीतर ही उपलब्ध कराने का प्रावधान है। 

इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने दस्तावेजों का संरक्षण करते हुए उन्हें कंप्यूटर में सुरक्षित रखेंगे। 

प्राप्त सूचना की विषयवस्तु के संदर्भ में असंतुष्टि, निर्धारित अवधि में सूचना प्राप्त न होने आदि जैसी स्थिति में स्थानीय से लेकर राज्य एवं केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की जा सकती है।

इस अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद व राज्य विधानमंडल के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और निर्वाचन आयोग (Election Commission) जैसे संवैधानिक निकायों व उनसे संबंधित पदों को भी सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया गया है। 

इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र स्तर पर एक मुख्य सूचना आयुक्त और 10 या 10 से कम सूचना आयुक्तों की सदस्यता वाले एक केंद्रीय सूचना आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। 

इसी के आधार पर राज्य में भी एक राज्य सूचना आयोग का गठन किया गया है। 

यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत में लागू है। इसके अंतर्गत सभी संवैधानिक निकाय. संसद अथवा राज्य विधानसभा के अधिनियमों द्वारा गठित संस्थान और निकाय शामिल हैं। राष्ट्र की संप्रभुता, एकता-अखण्डता, सामरिक हितों आदि पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली सूचनाएँ प्रकट करने की बाध्यता से मुक्ति प्रदान की गई है।

सूचना प्राप्ति की प्रक्रिया

1. आप सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत किसी लोक प्राधिकरण (सरकारी संगठन या सरकारी सहायता प्राप्त गैर सरकारी संगठनों) से सूचना प्राप्त कर सकते हैं।

2. आवेदन हस्तलिखित या टाइप किया होना चाहिए। आवेदन प्रपत्र भारत विकास प्रवेशद्वार पोर्टल से भी डाउनलोड किया जा सकता है। आवेदन प्रपत्र डाउनलोड संदर्भित राज्य की वेबसाईट से प्राप्त कर सकते हैं।

3. आवेदन अँग्रेजी, हिन्दी या अन्य प्रादेशिक भाषाओं में तैयार होना चाहिए। 
अपने आवेदन में निम्न सूचनाएँ दें-

1. सहायक लोक सूचना अधिकारी/ लोक सूचना अधिकारी का नाम व उसका कार्यालय पता,

2. विषयः सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 6 (1) के अंतर्गत आवेदन

3. सूचना का ब्यौरा, जिसे आप लोक प्राधिकरण से प्राप्त करना चाहते हैं,

4. आवेदनकर्त्ता का नाम,

5. पिता/पति का नाम,

6. आवेदन शुल्क

7. क्या आप गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवार से आते हैं- हाँ/नहीं, 

8. मोबाइल नंबर व ई-मेल पता (मोबाइल तथा ई-मेल पता देना अनिवार्य नहीं)

9. पत्राचार हेतु डाक पता

10. स्थान तथा तिथि

11. आवेदनकर्त्ता के हस्ताक्षर

12. संलग्नकों की सूची

13. आवेदन जमा करने से पहले लोक सूचना अधिकारी का नाम, शुल्क, उसके भुगतान की प्रक्रिया आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें। 

14. सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना प्राप्त करने हेतु आवेदन पत्र के साथ शुल्क भुगतान का भी प्रावधान है। परन्तु अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति या गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के सदस्यों को शुल्क जमा नहीं करने की छूट प्राप्त है।

15. जो व्यक्ति शुल्क में छूट पाना चाहते हों उन्हें अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / बीपीएल प्रमाणपत्र की छायाप्रति जमा करनी होगी।

16. आवेदन डाक द्वारा या ई-मेल के माध्यम से भेजा जा सकता है। 

17. यदि आप आवेदन डाक द्वारा भेज रहे हैं तो उसके लिए केवल पंजीकृत (रजिस्टर्ड डाक सेवा का ही इस्तेमाल करें। संदेशवाहक सेवा का प्रयोग कभी न करें।

18. आवेदन ई-मेल से भेजने की स्थिति में जरूरी दस्तावेज का स्कैन कॉपी अटैच कर भेज सकते हैं। लेकिन शुल्क जमा करने के लिए आपको संबंधित लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में भुगतान है। शुल्क करने की तिथि से ही सूचना आपूर्ति के समय की गणना की जाती

19. आगे उपयोग के लिए आवेदन पत्र (अर्थात् मुख्य आवेदन प्रपत्र आवेदन शुल्क का प्रमाण, स्वयं या डाक द्वारा जमा किये गये आवेदन की पावती) की 2 फोटोप्रति बनाएं और उसे सुरक्षित रखें।

20. यदि अपना आवेदन स्वयं लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाकर जमा कर रहे हों, तो कार्यालय से पावती पत्र अवश्य प्राप्त करें जिसपर प्राप्ति की तिथि तथा मुहर स्पष्ट रूप से अंकित हों। यदि आवेदन रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज रहे हों तो पोस्ट ऑफिस से प्राप्त रसीद अवश्य प्राप्त करें और उसे संभाल कर रखें।

21. सूचना आपूर्ति के समय की गणना लोक सूचना अधिकारी द्वारा प्राप्त आवेदन की तिथि से आरंभ होती है।वांछित जानकारी उपलब्ध नहीं कराने पर जुर्माना

यदि कोई उचित कारण के बिना, संबंधित अधिकारी सूचना के लिए एक आवेदन पत्र प्राप्त करने से इनकार करता है या निर्दिष्ट समय के भीतर जानकारी को प्रस्तुत नहीं करता है या गलत तरीके से सूचना के अनुरोध को अस्वीकार करता हैं या जानबूझकर गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी दी जाती हैं या नष्ट कर दी जाती है और सूचना प्रस्तुत करने में किसी भी तरीके से अनुरोध या बाधा, आवेदन प्राप्त होने तक प्रत्येक दिन दो सौ पचास रुपये का जुर्माना या जानकारी दी गई है इसलिए इस तरह के दंड की कुल राशि पच्चीस हजार रुपये से अधिक नहीं होगी और संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

सूचना के अधिकार अधिनियम के उद्देश्य (Objectives of Act)

1. पारदर्शिता लाना

2. जवाबदेही तय करना

3. नागरिकों को सशक्त बनाना

4. भ्रष्टाचार पर रोक लगाना

5. लोकतंत्र की प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना

सूचना का अधिकार : चुनौतियाँ 

सूचना का अधिकार जहां व्यक्ति को सशक्त करता है वही उसके पालन, क्रियान्वयन में असंख्य मुश्किलें भी आती है।

1. जागरूकता की कमी: 

एक सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ हैं कि भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों में से मात्र 15 प्रतिशत ही सूचना के अधिकार अधिनियम के बारे में जानते थे। सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आई थी कि अधिकतर लोगों को इस बारे में या तो मीडिया से पता चला या फिर किसी अन्य व्यक्ति से जानकारी मिली। इसका अर्थ यह हुआ कि सूचना के अधिकार संबंधी जागरूकता को लेकर उसकी नोडल एजेंसी का कार्य काफी सीमित है।

2. प्रदान की जाने वाली सूचना की खराब गुणवत्ता -

 सूचना के अधिकार दाखिल करने वाले 75 प्रतिशत कार्यकर्त्ता प्राप्त सूचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते हैं। आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के क्रमश: 91 और 96 प्रतिशत याचिकाकर्ताओं ने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त सूचना के संबंध में असंतुष्टि जाहिर की है। साथ ही कई याचिकाकर्ताओं ने अनावश्यक जानकरी प्राप्त होने की बात भी स्वीकार की है।

3. समय पर सूचना प्राप्त न होना -

अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी सामान्य परिस्थिति में सूचना को 30 दिनों के भीतर प्रदान करना आवश्यक है, परंतु उपरोक्त सर्वेक्षण में सामने आया कि सूचनाओं के कुप्रबंधन के कारण 50 प्रतिशत याचिकाकर्ताओं को इस अवधि के भीतर आवश्यक सूचना प्राप्त नहीं होती है।

सूचना का अधिकारः समस्याएँ

2005 में इस अधिनियम के लागू होने के बाद ऐसा लगा कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के नए युग की शुरुआत हुई हैं। 

एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष 40 लाख से 60 लाख सूचना अधिकार के तहत आवेदन द्वारा जानकारी मांगी जाती है किन्तु लगभग 45 प्रतिशत लोगों को ही अपेक्षित सूचनाएं मिल पाई हैं, अर्थात आधे से ज्यादा लोगों को सूचना नहीं मिलती। इतना ही नहीं उसमें से 10 प्रतिशत लोग ही अपील करते हैं। 

सूचना के उन अधिकारियों के विरुद्ध जो नागरिकों को अधिनियम के अनुसार सूचना नहीं देते हैं, उनके विरुद्ध भी उचित कार्रवाई नहीं होती है। 

केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्यों की सूचना आयोगों में समय पर नियुक्ति न होने से नागरिकों के अपीलों पर यथासमय सुनवाई भी नहीं होती है और परिणाम स्वरूप अपीलों के आवेदन का अंबार लगा है। 

सूचना अधिकार अधिनियम को गुड गवर्नेस के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया था और यह अपेक्षा थी कि नागरिकों को अपेक्षित सूचना मिलने से शासन के प्रति उनमें विश्वास बढ़ेगा और यह शासन की वैधता को बढ़ाने वाला कारगर कदम होगा किन्तु सरकार से मांगी गई सूचनाओं के ना मिलने से नागरिकों में यह संदेश भी जाता है कि सरकार ने लोक दबाव में तो सूचना का अधिकार अधिनियम तो बनाए है किन्तु निरंतर ऐसी कोशिश होती है कि सूचना आयोग के निर्णयों को विवादों या न्यायालयों में उलझा कर रखा जाए। 

सूचना अधिकार के तहत राजनीतिक दलों के आय के संबंध में नागरिकों के द्वारा जानकारी मांगे जाने पर राजनीतिक पार्टियों का नजरिया नकारात्मक रहा हैं। 

रिजर्व बैंक द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के तहत नागरिकों के द्वारा सूचना मांगे जाने पर रिजर्व बैंक का उत्तर नकारात्मक व्यवहार सामने आया है। और यह कहकर सूचना देने से इंकार करना कि ऐसी सूचना देना देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए उचित नहीं हैं। इतना ही नहीं जब केन्द्रीय सूचना आयोग ने बैंकों के कर्ज ना चुकाने वालों की सूची रिजर्व बैंक से मांगी तो रिजर्व बैंक न्यायालय चली गई और अंततः सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही रिजर्व बैंक ने सूची जारी की। 

सर्वोच्च न्यायालय का भी सूचना अधिकार अधिनियम के संबंध में मुकदमों में कई बार बहुत सकारात्मक रुख नहीं रहा है। सूचना आयोगों के पास आधारभूत सुविधाओं की कमी तथा पर्याप्त कर्मचारियों का भी ना होना सूचना अधिकार के संबंधित अपीलों के निस्पादन में व्यवधान पैदा करते हैं। 

नागरिकों के द्वारा अकारण सूचना मांगना और अनावश्यक सूचनाएं मांगने के कारण भी सूचना आयोगों के ऊपर कार्यभार बढ़ता है जो सूचना अधिकार की उपयोगिता पर सवाल खड़ा करता है। 

इन सब के अलावा सूचना अधिकार का जनहित में प्रयोग करने वाले कार्यकर्ताओं को धमकी मिलना और उन पर निरंतर जानलेवा हिंसक आक्रमण होने की घटनाएं भी चिंता की बात है। 

2020 तक 86 लोगों की जान जा चुकी है। वर्ष 25 जुलाई, 2019 को संसद ने सूचना के अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित किया। 

केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त तथा अन्य सदस्यों के कार्यकाल में कमी करना तथा उनकी सेवा शर्तों में परिवर्तन से सूचना आयोग की कार्यक्षमता तथा स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है। 

सूचना आयोग में पूर्व नौकरशाहों की बढ़ती उपस्थिति भी कार्यपालिका के द्वारा नागरिकों को दी जाने वाली सूचनाओं के लिए शुभ संकेत नहीं हैं क्योंकि नौकरशाही सूचना अधिकार के प्रति सामान्यतः संवदेनशील नहीं रहती है, जो सरकार को मुख्य सूचना आयुक्तों और सूचना आयुक्तों सहित वैधानिक निकाय प्रमुख और उसके सदस्यों के वेतन और सेवा शर्तें तय करने का अधिकार देता है। 

राजनीतिक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि सरकार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों को धमकाने या लालच दे सकती है और सत्तारूढ़ वितरण के लिए उनकी उपयुक्तता के आधार पर वेतन में वृद्धि या कटौती कर सकती है। 

सूचना के अधिकार के अंतर्गत नागरिक कुछ भी जानकारी सरकार से मांग सकते हैं जो सरकार संसद में बता सकती है। किन्तु आंतरिक सुरक्षा, विदेशी देशों के साथ संबंधों, बौद्धिक संपदा अधिकारों, संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन और जांच में बाधा डालने वाली सूचनाओं को जनता के साथ साझा नहीं किया जा सकता है। जब तक कोई निर्णय लागू नहीं हो जाता है तब तक कैबिनेट के कागजात साझा नहीं किये जा सकते हैं। हालांकि, मंत्रिमंडल के भीतर चर्चा का कभी खुलासा नहीं किया जाता है।

निजता का महत्त्व (Importance of Privacy)

निजता वह अधिकार है जो किसी व्यक्ति की स्वायत्ता और गरिमा की रक्षा के लिये जरूरी है। वास्तव में यह कई अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारों की आधारशिला है। दरअसल निजता का अधिकार हमारे लिये एक आवरण की तरह है, जो व्यक्ति के जीवन में होने वाले अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप से बचाता है। यह व्यक्ति को अवगत कराता है कि उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हैसियत क्या है और वह स्वयं को दुनिया से किस हद तक बाँटना चाहते हैं। वह निजता ही है जो व्यक्ति को यह निर्णित करने का अधिकार देती है कि उसके शरीर पर किसका अधिकार है?

आधुनिक समाज में निजता का महत्त्व और भी बढ़ गया है फ्रांस की क्रांति के बाद समूची दुनिया से निरंकुश राजतंत्र की विदाई शुरू हो गई और समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित लोकतंत्र ने पैर पसारना शुरू कर दिया। अब राज्य लोगों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ चलाने लगे तो यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठा कि जिस गरिमा के भाव के साथ जीने का आनंद लोकतंत्र के माध्यम से मिला उसे निजता के हनन द्वारा छिना क्यों जा रहा है?

 तकनीक और अधिकारों के बीच हमेशा से टकराव होता आया है और 21वीं शताब्दी में तो तकनीकी विकास अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है। ऐसे में निजता को राज्य की नीतियों और तकनीकी उन्नयन को दोहरी मार झेलनी पड़ी। 

आज सभी स्मार्टफोन का प्रयोग करते हैं। जब कोई भी एप डाउनलोड करता हैं, तो यह फोन के कॉन्टेक्ट गैलरी और स्टोरेज आदि के प्रयोग की मांगता है और इसके बाद ही वह एप डाउनलोड किया जा सकता है। ऐसे में यह खतरा है कि यदि किसी गैर-अधिकृत व्यक्ति ने उस एप के डाटाबेस में सेंध लगा दी तो उपयोगकर्ताओं की निजता खतरे में पड़ सकती है। 

तकनीक के माध्यम से निजता में दखल, राज्य की दखलंदाजी से कम गंभीर है। आज तकनीक का उपयोग करमा व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है, किन्तु राज्य प्रायः निजता के उल्लंघन में लोगों की इच्छा की परवाह नहीं करता। 

आधार का मामला इसका जीता जागता उदाहरण है। जब पहली बार आधार का क्रियान्वयन आरंभ किया गया तो कहा यह गया कि यह सभी भारतीयों को एक विशेष पहचान संख्या देने के उद्देश्य से लाई गई है। 

जल्द ही मनरेगा सहित कई बड़ी योजनाओं में बेनिफिट ट्रान्सफर के लिये आधार अनिवार्य कर दिया गया। यहाँ तक कि आधार पर किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श से किनारा करते हुए इसे मनी बिल यानी धन विधेयक के तौर पर संसद में पारित कर दिया गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि निजता जो कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिये आवश्यक है।

मामलों की पृष्ठभूमि

वर्ष 1954 में एम.पी. शर्मा मामले में 8 जजों की और वर्ष 1962 में खड़क सिंह मामले में 6 जजों की खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना था। अतः इसी वर्ष जब इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई आरंभ की तो न्यायालय के नौ जजों की खंडपीठ बैठाई गई। 

दरअसल, सबसे पहले वर्ष 2013 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने 11 अगस्त 2015 को निर्णय दिया कि आधार का इस्तेमाल केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और एलपीजी कनेक्शनों के लिये ही किया जाए। कुछ ही दिनों के बाद तत्कालीन कई अन्य योजनाओं में आधार के इस्तेमाल की इजाजत दे दो। तत्पश्चात शीर्ष मुख्य न्यायाधीश एच.एल दत्तु की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मनरेगा सहित न्यायालय में एक और याचिका दायर की गई कि क्या आधार मामले में निजता के आधार का उल्लंघन हुआ है और क्या निजता एक मौलिक अधिकार है? संविधान भाग 3 जो कुछ अधिकारों को 'मौलिक' मानता है में निजता के अधिकार का जिक्र नहीं किया गया है।

 इन सभी बातों का संज्ञान लेते हुए इस वर्ष जुलाई में नौ जजों की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई आरम्भ कर दी और निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करना शुरू कर दिया। 
1. निजता के अधिकार का दायरा क्या है?

2. निजता का अधिकार सामान्य विधि द्वारा सरक्षित अधिकार है या एक मौलिक अधिकार है?

3. निजता की श्रेणी कैसे तय होगी?

4. निजता पर क्या प्रतिबंध हैं?

5. निजता का अधिकार, समानता का अधिकार है या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का?

न्यायिक दृष्टिकोण

सर्वोच्च अदालत ने न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत) और अन्य बनाम भारतीय संघ एवं अन्य के अपने फैसले में कहा है कि जीने का अधिकार, निजता के अधिकार और स्वतंत्रता के अधिकार को अलग-अलग करके नहीं बल्कि एक समग्र रूप देखा जाना चाहिये। 

न्यायालय के शब्दों में निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग हैं और यह सही है कि सविधान में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन निजता का अधिकार वह अधिकार है, जिसे संविधान में बनाया नहीं गया बल्कि मान्यता दी है। 

निजता के अधिकार को संविधान संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक भाग या कहे एक पहलु है। 

निजता का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के सहचर्य में लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। 

निजता की श्रेणी तय करते हुए न्यायालय ने कहा कि निजता के अधिकार में व्यक्तिगत रुझान और पसंद को सम्मान देना, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी करने का फैसला, बच्चे पैदा करने का निर्णय, जैसी बातें शामिल हैं। 

किसी का अकेले रहने का अधिकार भी उसकी निजता के तहत आएगा। निजता का अधिकार किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्ता की सुरक्षा करता है और जीवन के सभी अहम पहलूओं को अपने तरीके से तय करने की आजादी देता है। 

न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो ये इसका अर्थ यह नहीं कि वह निजता का दावा नहीं कर सकता। अन्य मूल अधिकारों की तरह ही निजता के अधिकार में भी युक्तियुक्त निर्बन्धन की व्यवस्था लागू रहेंगी, लेकिन निजता का उल्लंघन करने वाले किसी भी विधि को उचित और तर्कसंगत होना चाहिये। 

न्यायालय ने यह भी कहा है कि निजता को केवल सरकार से ही खतरा नहीं है बल्कि गैरसरकारी तत्वों द्वारा भी इसका हनन किया जा सकता हैं। अतः सरकार डेटा संरक्षण का पर्याप्त प्रयास करें। 

न्यायालय ने सूक्ष्म अवलोकन करते हुए कहा है कि 'किसी व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाना उस पर काबू पाने की प्रक्रिया का पहल कदम है'। 

निष्कर्ष

अंत में इसमें कोई संदेह नहीं कि सूचना अधिकार अधिनियम ना सिर्फ लोकतंत्र को मजबूत करने में तथा नागरिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बल्कि विगत वर्षों में यह सरकार के कार्य में पारदर्शिता लाने और गुड गवनेंस को धरातल पर उतारने में सकारात्मक कदम साबित हुआ है। 

सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 को सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेहिता जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु लाया गया है, परंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सूचना के अधिकार तंत्र की विफलता के कारण यह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल रहा है। यह आवश्यक है कि सरकार तथा नागरिक संस्थानों को मिलकर सूचना के अधिकार अधिनियम को और अधिक मजबूत करने का प्रयास करना चाहिये, जिससे प्रशासन में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के साथ लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.