लोकतंत्र का अर्थ एंव परिभाषाएं , लोकतंत्र के भेद एंव गुण और भारत में लोकतंत्र की सम्भावनाएं exampolsci.blogspot.com

लोकतंत्र का अभिप्राय

 परिचय (Introduction)

लोकतंत्र, प्रजातंत्र अथवा जनतंत्र का अभिप्राय जनता के शासन से है। यह वह शासन है जिसमें प्रत्येक नागरिक राजशक्ति के प्रयोग में हाथ बँटाता है। इसका अंग्रेजी पर्याय Democracy है जो दो यूनानी शब्दों से मिलकर बना है - Demos जनता और Cracy शासन | 

यूनानी विचारकों के मत से लोकतंत्र का अभिप्राय ऐसे शासन से था जो राजतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के विपरीत हो। राजतंत्र में राज्य की सत्ता एक व्यक्ति तथा कुलीनतंत्र में कुछ व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित रहती है।

अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions)

लोकतंत्र में राज्य की सत्ता एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों के हाथों में नहीं, प्रत्युत् जनसाधारण के हाथों में केंद्रित मानी जाती है।

इस प्रकार हेरीडोट्स ने लोकतंत्र की परिभाषा उस शासन के रूप में की है जिसमें राज्य की सर्वोच्च शक्ति संपूर्ण समाज के हाथों में रहती है। 

डायसी के अनुसार, "लोकतंत्र वह शासन पद्धति है, जिसमें शासन करने वाला समुदाय संपूर्ण जनसंख्या का एक बड़ा भाग होता है।" 

सीली के मत से, "लोकतंत्र वह शासन पद्धति है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का भाग होता है।" 

लार्ड ब्राइस  ने लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए कहा है कि, "यह वह शासन प्रणाली है जिसमें शासन-शक्ति पर किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग का अधिकार नहीं होता, अपितु समाज के सभी सदस्यों का उस पर समान अधिकार होता है।" 

इस प्रकार लोकतंत्र वह शासन प्रणाली है जिसमें संपूर्ण जनता का ही परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रीति से कुछ-न-कुछ भाग रहता है इसी आशय को दृष्टि में रखते हुए लिंकन ने लोकतंत्र की परिभाषा "जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शासन" शब्दों में की है।

लोकतंत्र का राजनीतिक पक्ष लोकतंत्र की उक्त परिभाषाओं से उसके केवल एक ही पहलू पर प्रकाश पड़ता है और वह पहलू है राजनीतिक संगठन अथवा शासन के रूप में लोकतंत्र । लोकतंत्र के राजनीतिक पहलू में राजनीतिक समानता के आदर्श को स्वीकार किया जाता है और राजनीतिक शक्ति पर किसी एक वर्ग विशेष का एकाधिकार नहीं माना जाता है। इसमें शासन का संचालन बहुमत के सिद्धांत के अनुसार होता है और केवल वे विधियाँ ही लागू की जाती हैं जिन्हें बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त रहता है।

लोकतंत्र का सामाजिक आदर्श-परंतु लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली ही नहीं हैं वह एक सामाजिक आदर्श भी है। एक सामाजिक आदर्श के रूप में लोकतंत्र सब मनुष्यों और स्त्रियों की समानता का प्रतिपादन करता है। जिस समाज का संगठन लोकतंत्रात्मक है, उसमें न तो कोई सुविधासंपन्न वर्ग विशेष ही हो सकता है और न जाति, धर्म, वर्ण, वंश, धन और लिंग आदि के आधार पर व्यक्ति, व्यक्ति के बीच भेदभाव की दीवारें खड़ी की जाती है। 
फलतः हम ऐसे किसी समाज को, जिसमें कि छुआछूत हो, स्त्रियों को घर की चारदीवारी में कैद रखा जाए, अर्थात् सब लोगों को अपने विकास के लिए समान अवसर न मिल सकें. लोकतंत्रात्मक समाज नहीं कह सकते। लोकतंत्र के लिए दैनिक व्यवहार में कतिपय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की आवश्यकता हुआ करती है। जब तक समाज में इन मूल्यों का विकास नहीं होता, वह लोकतंत्र के आदर्श से कोसों दूर रहता है।

लोकतंत्र एक मानसिक दृष्टिकोण के रूप में एक राजनीतिक आदर्श और सामाजिक संगठन होने के साथ-साथ लोकतंत्र एक नैतिक आदर्श एवं मानसिक दृष्टिकोण भी है। लोकतंत्र इस बात को स्वीकार करता है कि औसतन प्रत्येक ईमानदार नागरिक में यह योग्यता होती है कि वह शासन कार्यों में भाग ले सके। शासन का आधार यह विश्वास है कि प्रत्येक व्यक्ति में अपना शासन आप करने की और औसत नागरिक में समाज के हित की दृष्टि से शासन करने वाले शासकों को चुनने की योग्यता रहती है। लोकतंत्र जन साधारण की महिमा और गरिमा पर भरोसा रखता है वह मान व्यक्तित्व का मान के रूप में आदर करने की माँग करता है। 

दार्शनिक काँट के इस कथन में इस आदर्श का सार आ जाता है, इस प्रकार काम करो कि मानवता के साथ प्रत्येक मामले में, चाहे तुम्हारे व्यक्तित्व की बात हो या दूसरे के व्यक्तित्व की इस प्रकार व्यवहार हो कि वह एक साध्य है, एक ध्येय है उसे साधन मानकर कभी व्यवहार मत करो। 

बेंथम के निम्नलिखित सूत्र में भी यही विचार निहित है "प्रत्येक व्यक्ति को एक गिनना चाहिए और किसी को एक से अधिक नहीं गिनना चाहिए।"

लोकतंत्र का आर्थिक आधार लोकतंत्र के उक्त पहलुओं के साथ हमें उसका आर्थिक पक्ष भी नहीं भूलना चाहिए। लोकतंत्र के आर्थिक पक्ष का अभिप्राय यह है कि सार्वभौम मताधिकार के प्रचलन से ही लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो जाती। लोकतंत्र की वास्तविक स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि समाज में आर्थिक शक्ति का ऐसा समतायुक्त वितरण हो जिससे प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सुखी व समृद्ध हो सके और वह आत्म-विकास के लिए पर्याप्त अवसर पा सके।

लोकतंत्र जीवन का एक समग्र दर्शन है- उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र जीवन का एक समग्र दर्शन है और हम उसे थोड़े से शब्दों की परिभाषाओं द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते। लोकतंत्र की व्यापक परिधि में मानव जीवन के सभी पहलू आ जाते हैं। अपनी इसी व्यापकता के कारण लोकतंत्र इतना अधिक प्रचलित शब्द हो गया है और वह कभी-कभी इतने भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है कि सामान्य पाठक मत-विभ्रम में पड़ जाता है।

लोकतंत्र की आधारभूत धारणाएँ - ऐसी स्थिति में हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम लोकतंत्र की कुछ आधारभूत धारणाओं को समझ लें। लोकतंत्र की प्रमुख आधारभूत धारणाएं पाँच हैं। 1 स्वतंत्रता 2 समानता. 3] भ्रातृता, 4 व्यक्ति की महत्ता और 5 सहिष्णुता अपने मनोनुकूल जीवन निर्वाह की छूट होनी चाहिए। 

लेकिन स्वतंत्रता का अभिप्राय उच्छृंखलता कदापि नहीं है। एक व्यक्ति स्वतंत्रता का उपभोग उसी सीमा तक कर सकता है जिस सीमा तक कि वह समाज के अन्य सदस्यों की स्वतंत्रता में कोई अवरोध पैदा नहीं करता । समानता का अभिप्राय यह है कि धर्म, जाति, लिंग, जन्म या वंश आदि के आधार पर समाज के विभिन्न सदस्यों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और सभी नागरिकों को आत्म-विकास के समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए।

लोकतंत्र के भेद (Types of Democracy)

लोकतंत्र के दो भेद हैं- 1 प्रत्यक्ष या विशुद्ध और 2 परोक्ष या प्रतिनिधिक लोकतंत्र । 

1. प्रत्यक्ष या सहभागी लोकतंत्र -  प्रत्यक्ष लोकतंत्र में निर्वाचित विधान सभाएँ नहीं होती जहाँ जन प्रतिनिधि शासन की नीति का निर्धारण या विविध विधियों का निर्माण करते हों। इस प्रकार की व्यवस्था के अंतर्गत राज्य के समस्त नागरिक एक स्थान पर एकत्रित होकर शासन संबंधी समस्त कार्यों को निबटाते हैं और सार्वजनिक पदाधिकारियों को चुनते हैं। 

प्रत्यक्ष लोकतंत्र की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि यह वह शासन व्यवस्था है "जिसमें राज्य की इच्छा का निर्माण या अभिव्यक्ति प्रत्यक्षतः, प्रमुखतः अथवा तुरंत ही एक जनसभा में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा नहीं अपितु स्वयं जनता द्वारा होता है।"

प्राचीन यूनान के नगर राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रणाली के अनुसार शासन होता था । एथेन्स में - यह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। यूनान के नगर राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की सफलता के कुछ स्पष्ट कारण थे। क्षेत्रफल की दृष्टि से ये राज्य बहुत छोटे-छोटे थे। इनकी जनसंख्या भी बहुत थोड़ी थी। यूनान के नगर - राज्यों में मुख्य विशेषता यह थी कि सारा शारीरिक श्रम दासों को करना पड़ता था और नागरिकों के पास राजनीतिक कार्यों में भाग लेने के लिए पर्याप्त अवकाश रहता था। 

आजकल प्रत्यक्ष लोकतंत्र केवल स्विट्जरलैंड के कुछ कैण्टनों और अमरीका के कुछ छोटे नगरों में ही प्रचलित है। इसका कारण यह है कि आधुनिक राष्ट्रीय राज्य क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों की दृष्टि से बहुत बड़े हैं और उनमें प्रत्यक्ष लोकतंत्र के अनुसार शासन चलाना असंभव है।

2. परोक्ष या प्रतिनिधि लोकतंत्र - आधुनिक राष्ट्रीय राज्यों में प्रत्यक्ष अथवा शुद्ध लोकतंत्र की अव्यावहारिकता के कारण परोक्ष अथवा प्रतिनिधिक लोकतंत्र के अनुसार शासन होता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत जनता समय-समय पर अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करती है और ये प्रतिनिधि विधानसभाओं में जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार विधियों का निर्माण और शासन का संचालन प्रत्यक्षतः जनता द्वारा नहीं प्रत्युत् परोक्षतः जनता के प्रतिनिधियों द्वारा होता है। 

प्रतिनिधिक लोकतंत्र इस विचार पर आधारित है कि "जनता के सभी सदस्य राजधानी में स्वयं उपस्थित नहीं हो सकते किंतु वे अपने प्रतिनिधियों द्वारा उपस्थित माने जाते हैं।" 

जॉन स्टुअर्ट मिल के शब्दों में, 'प्रतिनिधिक लोकतंत्र वह शासन है जिसमें, "संपूर्ण जनता या फिर उसका बहुसंख्यक भाग शासन सत्ता का अपने नियत काल पर निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा प्रयोग करता है।"

यद्यपि आजकल प्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रायः बिलकुल समाप्त हो गया है और लोकतंत्र का अभिप्राय ही परोक्ष या प्रतिनिधिक लोकतंत्र माना जाता है, फिर भी इसे संतोषजनक स्वीकार करने में कई विद्वानों को आपत्ति है। इसका कारण यह है कि चुनाव के समय अपने मतदान के अतिरिक्त जनता शासन प्रबंध में कोई सीधा भाग नहीं लेती।

रूसो जो प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का पक्षपाती था, कहा करता था कि, "अंग्रेज तो केवल चुनाव के समय ही स्वतंत्र होते हैं।"

परोक्ष लोकतंत्र की त्रुटियों को दूर करने के लिए जनमतसंग्रह और प्रत्यावर्तन आदि उपायों का प्रयोग किया जाता है। इन उपायों द्वारा कतिपय मामलों पर जनता प्रत्यक्षतः अपने मत की अभिव्यक्ति करती रहती है और उसका चुनावों के पश्चात् भी अपने प्रतिनिधियों पर नियंत्रण बना रहता है। 

जनमत-संग्रह का आशय यह है कि कुछ विधियों पर विशेषकर संविधान से संबंध रखने वाली विधियों पर जनता की सम्मति अवश्य ली जानी चाहिए। 

उपक्रम का अभिप्राय यह है कि यदि जनता कुछ नई विधियाँ बनवाना चाहे और मतदाताओं की एक निश्चित जनसंख्या से हस्ताक्षर करवा कर अपना आवेदन-पत्र विधान सभा के पास भेज दे तो विधान सभा उस विधि को अवश्य बना देगी। 

प्रत्यावर्तन का तात्पर्य यह है कि "यदि कोई प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों की इच्छाओं के विपरीत आचरण करता है, तो जनता को उसे वापिस बुला लेने या हटा देने का अधिकार होता है। व्यक्ति को शेष समाज की इच्छानुसार जीवन-यापन करने के लिए बाध्य करता है, तो इसमें उसकी ही हानि है।"

लोकतंत्र के गुण (Merits of Democracy)

संतुलित मूल्यांकन की आवश्यकता - लोकतंत्र का सही-सही मूल्यांकन करना भी एक दुरूह समस्या है। एक ओर तो विचारकों का ऐसा वर्ग है जो लोकतंत्र को सर्वथा निर्दोष और पूर्ण शासन प्रणाली मानता है और उसकी श्रेष्ठता में धार्मिक अंध-विश्वास जैसी भावना रखता है। दूसरी ओर ऐसे विचारकों का भी कोई अभाव नहीं है जिन्हें लोकतंत्र में निरी त्रुटियाँ दिखाई देती हैं और जो यह समझते हैं कि लोकतंत्र मृत्यु का और कुलीनतंत्र जीवन का वाहक है। 

ऐसी स्थिति में लोकतंत्र के गुण-दोषों का विवेचन करते समय हमें काफी सावधानी और संतुलित दृष्टिकोण रखने की आवश्यकता है। संक्षेपतः लोकतंत्र के पक्ष में अधोलिखित युक्तियाँ उपस्थित की जा सकती हैं।

1. जनसाधारण की हित साधना-लोकतंत्र की शायद सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह समानता के सिद्धांत पर आधारित है। वह इस विचार का खंडन करता है कि कुछ लोग तो आदेश देने के लिए और कुछ लोग आदेश पालन के लिए जन्म लेते हैं। 

प्रजातंत्र वर्ग विशेष को सुविधाएँ देने का निषेध करता है। वह जनसाधारण के महत्त्व का प्रतिपादक है। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को जाति, वंश, धन या वर्ग के आधार पर उसके स्वाभाविक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। वह राज्य की सर्वोच्च शक्ति जनसाधारण के हाथों में समर्पित कर देता है और इस प्रकार सभी व्यक्तियों को राजनीतिक अधिकारों की समानता प्रदान करता है। 

लोकतंत्र में इस बात का विश्वास रहता है कि जनसमुदाय की इच्छानुसार कार्य किया जाएगा और शासन कार्यों में किसी व्यक्ति की उपेक्षा न की जाएगी। 

प्रो. हॉकिंग (Prof. Hocking) का यह कहना बिलकुल सही है कि, "लोकतंत्र राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति में तंतुबंधन के समान पारस्परिक संबंध स्थापित कर देता है। 

लोकतंत्र के अतिरिक्त अन्य चाहे कोई सी शासन प्रणाली हो, चाहे वह राजतंत्र हो, चाहे कुलीनतंत्र उसमें जनसाधारण का माथा सदैव झुका ही रहता है। लोकतंत्र ही एक मात्र वह शासन प्रणाली है जिसमें जनसाधारण अपना मस्तक गर्व से ऊँचा कर सकता है और जिसमें छोटे-से-छोटे व्यक्ति भी यह नहीं कह सकता कि मेरी नहीं सुनी गई।

2. स्वतंत्रता का प्रसार - लोकतंत्र का एक अन्य बड़ा गुण यह है कि वह नागरिक समुदाय के बीच स्वतंत्रता की भावना का प्रसार करता है। चूँकि लोकतंत्र में लोग अपना शासन अपने आप करते हैं, अतः वे दास नहीं हो सकते। इस व्यवस्था के अंतर्गत जनता को शास्वत विचार और विश्वास की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है और जनता के ऊपर राज्य की ओर से कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता। यदि शासन जनता के मनोनुकूल नहीं है, तो जनता उसकी आलोचना कर सकती है और यदि चाहे तो शांतिपूर्ण एवं वैधानिक उपायों द्वारा उसे बदल भी सकती है। 

लोकतंत्रात्मक देशों में नागरिक अधिनायकवादी देशों की तुलना में कहीं अधिक वैयक्तिक स्वाधीनता का उपभोग करते हैं। अधिनायकवादी देशों में तो गुप्त पुलिस और समाहार शिविरों की प्रधानता रहती है तथा जनसाधारण की वैयक्तिक स्वतंत्रताओं को बुरी तरह दबा दिया जाता है। 

मानव जाति के लिए स्वतंत्रता का क्या महत्त्व है यह मिल के इस कथन से स्पष्ट है कि, "जिस समाज में इन स्वतंत्रताओं (नागरिक स्वतंत्रताओं) का आदर नहीं होता। वह आजाद नहीं होता, चाहे उसकी कुछ भी शासन प्रणाली हो । एक मात्र वांछनीय स्वतंत्रता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने ढंग से उस समय तक अपना हित साधन करने में स्वतंत्र हो जब तक कि वह दूसरों को उनकी हित साधना से वंचित न करे । यदि मनुष्य जाति प्रत्येक व्यक्ति को अपने ढंग से जीवन यापन की स्वतंत्रता देती है, तो उसे विशेष लाभ होता है। यदि वह प्रत्येक व्यक्ति को शेष समाज की इच्छानुसार जीवन यापन करने के लिए बाध्य करता है, तो इसमें उसकी - ही हानि है।"

3. मनोवैज्ञनिक आधार - लोकतंत्र के पक्ष में मनोवैज्ञानिक युक्तियाँ भी उपस्थित की जा सकती हैं। लोकतंत्र जनता की सहमति का शासन है। इसके अंतर्गत स्वतंत्र निर्वाचन होते हैं और जनता अपने प्रतिनिधियों को अपने आप चुनती है। ये प्रतिनिधि जिन विधियों का निर्माण करते हैं, वे जनता की इच्छाओं के अनुसार होती हैं और उन्हें जनता का समर्थन प्राप्त रहता है। 

"लोकप्रिय शासन का मूल्य यह है कि वह उन साधनों को प्रदान करता है जिनके द्वारा जनता की इच्छाओं का ज्ञान और अनुभव प्राप्त किया जा सकता है और इस प्रकार राज्य के व्यवहार को तदनुकूल बनाया जा सकता है।" 

लोकतंत्रात्मक शासन में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने प्रत्येक कदम पर इस बात का ध्यान रहता है कि उसकी जनता के ऊपर क्या सम्भाव्य प्रतिक्रिया होगी। फलतः वे अपनी नीति पर्याप्त सोच-विचार के उपरांत और जनता की नस नाड़ी पर हाथ रखकर बनाते हैं।

4. व्यावहारिक लाभ - तथापि, लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी सैद्धांतिक श्रेष्ठता में नहीं, प्रत्युत् उसकी व्यावहारिक उपयोगिता में निहित है। वृक्ष का ज्ञान उसके फलों से होता है। लोकतंत्र इस कसौटी पर बिलकुल खरा उतरता है। लोकतंत्रात्मक देशों में देशभक्ति की भावना अन्यान्य शासन प्रणालियों की तुलना में काफी अधिक रहती है। चूँकि लोकतंत्र में शासन जनता की कृति होता है। अतः उसके प्रति जनता में निष्ठा भी होती है। इस प्रकार, लोकतंत्र हिंसात्मक क्रांतियों की संभावनाओं को कम कर देता है।

5. नैतिक गुण - लोकतंत्र का नैतिक पक्ष भी बहुत शक्तिशाली है। लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना हीन क्यों न हो, पवित्र माना जाता है और उसके आत्म सुधार का प्रयास किया जाता है। लोकतंत्र मनुष्यों में उच्चतम नैतिक गुणों का विकास करता है और उन्हें आत्म-निर्भरता, उपक्रम, उत्तरदायित्व तथा सहिष्णुता का पाठ पढ़ाता है।

6. नागरिक शिक्षा की प्रयोगशाला - लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली जनसाधारण को नागरिकता की शिक्षा प्रदान करती है। उसे एक प्रकार से नागरिक शिक्षा की सर्वश्रेष्ठ प्रयोगशाला माना जा सकता है। लोकतंत्र जनता की बैद्धिक और आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता है। चूँकि लोकतंत्र में जनता समय-समय पर निर्वाचनों में भाग लेती है और उसे चाहे परोक्ष रीति से ही सही शासन में योगदान देना पड़ता है, अतः वह समय की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को अच्छी तरह से समझने लगती है। 

स्वशासन और सार्वजनिक कार्यों में योगदान देने से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास का भाव जाग्रत होता है और वह स्वार्थ की संकुचित सीमाओं से बाहर निकलता है। नागरिक यह समझता है कि वह संपूर्ण समाज का एक अंग है और वह अपनी संपूर्ण शक्तियों और योग्यताओं द्वारा समग्र समाज के कल्याण का प्रयास करता है।

भारत में लोकतंत्र की संभावनाएँ (Possibilities of Democracy in India)

एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न - भारत में लोकतंत्र का क्या भविष्य है, यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। प्रत्येक विचारवान् भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह इस प्रश्न पर गंभीरता पूर्वक चिंतन करे, सोचे कि क्या भारत में लोकतंत्र के सफल होने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं? यदि नहीं तो उसकी सफलता के मार्ग में क्या बाधाएँ हैं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?

भारत में लोकतंत्र की परम्परा- सिद्धांत और व्यवहार दोनों की दृष्टि से भारत के लिए लोकतंत्र का आदर्श नूतन नहीं है। यह ठीक है कि आज भारत में लोकतंत्र जिस व्यापक स्तर पर है, प्राचीन काल में कभी नहीं रहा। फिर भी इतिहास साक्षी है कि हमारे यहाँ लोकतंत्र की परम्परा शताब्दियों पुरानी हैं प्राचीन भारतीय चिंतन परम्परा में लोकतंत्र की भावना सदैव विद्यमान रहती थी। तत्कालीन जनता की जागरूकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यदि शासक अपने दायित्वों का निर्वहन निष्ठापूर्वक नहीं कर पाता था, तो जनता उसका वध तक करने में नहीं हिचकी थी। 

हिंदू राजशास्त्रियों के अनुसार कर राजा का वेतन हैं। शासन जनता की सेवा करता है और जनता इसके बदले में उसे कर प्रदान करती है। 

शुक्र के शब्दों में राजा जनता की अनवरत रक्षा तथा उन्नति करने के उपलक्ष्य में अपने जीवन निर्वाह के लिए करों के रूप में अपना पारिश्रमिक पाता है। 

करारोप के इस सिद्धांत का एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकलता था कि यदि राजा जनता की उन्नति तथा रक्षा करने में असफल सिद्ध होता, तो प्रजा को यह अधिकार रहता था कि वह उसे करों से वंचित कर दे। 

बौद्ध ग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनसे प्राचीन भारत में जनसत्तात्मक शासन की परंपरा अचूक रूप से पुष्ट होती है। बौद्ध संघों के संगठन का आधार विशुद्ध रूप से लोकतंत्रात्मक था | 

यूनानी यात्रियों और इतिहासकारों के विवरणों से पता चलता है कि जिस समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर सौभूति, यौधेय, क्षुद्रक, मालव्य और मुचकर्ण आदि शक्तिशाली गणराज्य स्थापित थे। इन गणराज्यों की शासन व्यवस्था लोकतंत्र पर आधारित थी। कालान्तर में कतिपय सामाजिक और शासनिक दुर्बलताओं, आपसी लाग डाट और चक्रवर्ती शासकों की राज्यलिप्सा के फलस्वरूप इन गणराज्यों का अंत हो गया। 

प्राचीन भारत में मानव जीवन का विकास विभिन्न स्थानीय संस्थाओं के आधार पर हुआ था और इन स्थानीय संस्थाओं के फलस्वरूप जनता को लोकतंत्रात्मक शासन की कठिन कला की शिक्षा मिलती थी। कुटुम्ब, ग्राम, निगम, श्रेणी, गण और संघ आदि संस्थाएँ प्राचीन भारत में लोकतंत्र की आधारशिलाओं का कार्य करती हैं। यद्यपि भारत में बड़े-बड़े साम्राज्यों का उत्थान-पतन हुआ, लेकिन यहाँ ग्राम पंचायतों की परम्परा ब्रिटिश शासन की स्थापना होने तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही थी इन ग्राम पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण जनता अपने स्थानीय मामलों का स्वतंत्रतापूर्वक निदान करती थी।

स्वतंत्रता के पश्चात् - इसलिए जब स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के नए संविधान ने सार्वभौम वयस्क मताधिकार के प्रवर्तन द्वारा देश में लोकतंत्र की स्थापना कर दी तो यह कोई जल्दबाजी या विचारहीनता का कार्य नहीं था। भारत के संविधान ने देश में लोकतंत्र की स्थापना के सभी आवश्यक उपकरण प्रदान किए हैं।

भारत का संविधान पूरी तरह लोकतंत्रात्मक हैं संविधान की उद्देशिका में भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प व्यक्त किया गया है और उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, समता, प्रतिष्ठा और समान अवसर को प्राप्त कराने का वचन दिया गया है। संविधान ने व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने का भी आश्वासन दिया है। संविधान की उद्देशिका में निहित राष्ट्रीय आदर्श, स्वतंत्र भारत के नए राष्ट्रीय जीवन मूल्य हैं। संविधान गत छह दशकों से इन जीवन-मूल्यों को चरितार्थ करने का प्रयत्न करता रहा है।

भारतीय संविधान ने नागरिकों को व्यापक मूल अधिकार दिए हैं। ये अधिकार निम्न 6 वर्गों में विभाजित हैं- 1. समता अधिकार 
2 स्वातंत्र्य अधिकार 
3. शोषण के विरुद्ध का अधिकार 
4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार 
5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार और 
6. संविधानिक उपचारों का अधिकार ।

भारतीय संविधान ने नागरिकों के मूल अधिकारों की गणना के साथ नागरिकों के कुछ मूल कर्त्तव्य भी गिनाए हैं। ये कर्त्तव्य अनुच्छेद 51 क में दिए गए हैं और इस प्रकार हैं-

"भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह-

(क) संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में सँजोए रखे और उनका पालन करे।
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे। 
(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
(ड) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं।
(च) हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझे और उसका परिरक्षण करे।
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत, वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखे।
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें। 
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।
(ङ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाईयों को छू ले ।" 

संविधान के भाग 4 में राज्य नीति के निर्देशक तत्वों का उल्लेख है ये तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं लेकिन देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्त्तव्य है। इन तत्वों में कहा गया है कि राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था को, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करें, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोककल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा। राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व है-

(क) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो । 
(ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बँटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो ।
(ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन साधनों का अहितकारी संकेंद्रण न हो । 
(घ) पुरुषों और स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन हो ।
(ङ) पुरुषों और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक विवशता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु और शक्ति के अनुकूल न हो।
(च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ और बालकों और अल्पवयस्क व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।

भारतीय संघ की कार्यपालिका के अंतर्गत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद्, महान्यायवादी तथा सिविल सेवाओं का विवेचन है।

राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचकगण के सदस्य करते हैं जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य करते हैं। जहाँ तक साध्य हो, राष्ट्रपति के निर्वाचन में भिन्न-भिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता रखी जाती है।

राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष है वह दुबारा निर्वाचित हो सकता है। भारत का एक उपराष्ट्रपति है। वह राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। उसका निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।

संविधान ने राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद् का प्रावधान किया है मंत्रिपरिषद् का प्रधान प्रधानमंत्री होता है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार कार्य करता है।

राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अहर्हित किसी व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करता है। महान्यायवादी का यह कर्तव्य है कि वह भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप में ऐसे अन्य कर्त्तव्यों का पालन करे जो राष्ट्रपति उसको समय- समय पर निर्देशित करें या सौंपे और उन कर्त्तव्यों का निर्वहन करे जो उसको संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किए गए हों।

भारत सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की जाती है। प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान-विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद् के सभी विनिश्वय राष्ट्रपति को संसूचित करे।

संघ के लिए एक संसद है जो राष्ट्रपति तथा राज्य सभा और लोकसभा नामक दो सदनों से मिलकर बनती है। राज्य सभा राष्ट्रपति द्वारा नाम निर्देशित बारह सदस्यों और राज्यों के और संघ राज्यक्षेत्रों के 238 से अधिक प्रतिनिधियों से मिलकर बनती है। राष्ट्रपति उन 12 व्यक्तियों के नाम निर्देशित करता है जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज-सेवा विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हैं। राज्य सभा में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधानसभा के विनिर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है।

लोकसभा राज्यों में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए पाँच सौ तीस से अनधिक सदस्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के 20 से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनती है।

राज्यसभा का विघटन नहीं होता लेकिन उसके सदस्यों में से एक तिहाई सदस्य प्रत्येक द्वितीय वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को अधिवेशन के लिए आहूत करता है। वह सदनों का या किसी सदन का सत्रावसान कर सकता है और लोकसभा का विघटन कर सकता है। लोकसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित अध्यक्ष लोकसभा की कार्यवाही का संचालन करता है।

संसद के दोनों सदनों ने अपने कार्य संचालन और प्रक्रिया संबंधी नियमों का निर्माण कर लिया है। संसद ने धन विधेयकों और वित्तीय विधेयकों के बारे में भी प्रक्रिया निश्चित कर दी है। संसद के सदस्यों को सदन अथवा उसकी समितियों की बैठकों में अपने विचार व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है। मंत्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। संसद प्रश्नों तथा विविध प्रकार की चर्चाओं द्वारा सरकार पर नियंत्रण रखती है। संसद की समितियाँ लघु संसदों के रूप में कार्य करती हैं और उसके बहुत से काम को निपटाती हैं।

अमरीका जैसी अन्य संघात्मक प्रणालियों की भाँति भारत में संघ तथा राज्यों के न्यायालयों के अलग- अलग अधिक्रम नही है। भारत के समूचे गणराज्य के लिए एकीकृत न्यायिक प्रणाली है। सर्वोच्च तथा चोटी के न्यायालय के रूप में उच्चतम न्यायालय है। यह संघ तथा राज्यों के बीच के तथा राज्यों के आपसी संबंधों के मामलों के निपटारे के लिए एकमात्र मध्यस्थ है संविधान के किसी उपबंध का क्या अर्थ है इस विषय में भी अंतिम निर्णायक है।

भारत के संविधान में न केवल संघ का संविधान है, उसमें राज्यों का संविधान भी है। राज्यों के लिए उपबन्ध प्रायः संघ- शैली का अनुसरण करते है । 

भारत में संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवा आयोग संघ और राज्यों के अधीन सेवाओं का नियमन करते हैं। भारत का सेवातंत्र विश्व के सबसे प्रसिद्ध सेवातंत्रों में है। संविधान के भाग 15 अनुच्छेद 324-329 में निर्वाचनों की व्यवस्था है गत 60 वर्षों में लोकसभा के लिए 14 आम चुनाव तथा विभिन्न राज्यों के लिए अनेक आम चुनाव हो चुके हैं और कुछ कमियों के बावजूद यह पाया गया है कि चुनाव निष्पक्ष, स्वतंत्र और सफल रहे हैं।

स्वतंत्र भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। संविधान के कार्यकरण को 57 वर्ष हो चुके हैं। संविधान के अंतर्गत विधिवत् प्रथम निर्वाचन 1951-52 में हुए प्रथम लोकसभा का गठन 17 अप्रैल, 1952 को हुआ । उसकी पहली बैठक 13 मई, 1952 को हुई।

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