आगस्टाइन (St. Augustine): मध्ययुगीन ईसाई दर्शन के महान चिन्तक
परिचय (Introduction)
ईसाई दर्शन के इतिहास में सेण्ट अम्ब्रोज (St. Ambrose) के महान शिष्य सेण्ट आगस्टाइन का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। फोक्स जैक्सन के अनुसार चर्च के इतिहास में सेण्ट पाल के बाद सेण्ट आगस्टाइन सबसे महत्त्वपूर्ण हस्ती है। उसने मध्ययुग में चर्च और राज्य के सम्बन्ध में अपने विचार देते हुए 'चर्च की सर्वोच्चता' के सिद्धान्त की आधारशिला रखी। उन्होंने समकालीन तथा परवर्ती चिन्तन को भी विशेष रूप में प्रभावित किया। सेबाइन का मत है कि उनकी रचना *The City of God* एक ऐसी 'विचारों की खान' (A mine of Ideas) है, जिसको खोदकर परवर्ती ईसाई विचारकों ने मूल्यवान विचार रत्न निकाले।
जीवन परिचय (Life Sketch)
सेण्ट आगस्टाइन का जन्म उत्तरी अफ्रीका के रोमन प्रान्त न्यू मीडिया (अल्जीरिया) के थिगस्ते नामक स्थान पर 354 ई. में हुआ। उसके पिता एक मूर्तिपूजक (Pagan) थे और एक बड़े जमींदार थे। उसकी माँ ईसाई धर्म में विश्वास रखने वाली महिला थी। वह बचपन से ही एक प्रतिभाशाली बालक था। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उसके पिता ने उसे अच्छी शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध किया।
सेण्ट आगस्टाइन ने अपनी प्रतिभा के बल पर शीघ्र ही यूनानी और रोमन साहित्य में निपुणता प्राप्त कर ली। 370 ई. में उसने कार्थेज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ से अपनी पढ़ाई पूरी करके उसने अपनी मातृभूमि की सेवा का निश्चय किया और अपने प्रान्त में पढ़ाने लगा। कुछ समय बाद उसने कार्थेज विश्वविद्यालय में ही अलंकारशास्त्र पढ़ाना शुरू कर दिया। 384 ई. में उसने मीलान में अलंकारशास्त्र पढ़ाया, जहाँ उसका सम्पर्क सेण्ट अम्ब्रोज से हुआ। सेण्ट अम्ब्रोज की रोमन विरोधी विचारधारा के प्रभाव में आकर उसने उनको अपना गुरु स्वीकार कर लिया और 387 ई. में ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। 388 ई. में वह अफ्रीका वापिस लौटकर हिप्पो विशप बन गया और आजीवन इस पद को सुशोभित किया। 430 ई. में वण्डाल नामक बर्बर जाति द्वारा हिप्पो नगर पर आक्रमण के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
समकालीन परिस्थितियाँ (Contemporary Situations)
सेण्ट आगस्टाइन का जन्म ऐसे समय में हुआ जब दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप में बर्बरों के कारण ईसाई धर्म के लिए एक गम्भीर संकट पैदा हो गया था। सभ्यता और कैथोलिकवाद दोनों का भाग्य अधर में लटका हुआ था। वह एक ऐसे संक्रमणकाल का प्रतीक था, जब ब्रात्यवाद का अन्त हो रहा था और ईसाई धर्म का मध्ययुग प्रारम्भ हो रहा था।
410 ई. में गॉथों (Goths) और असभ्य बर्बरों (Barbarians) ने रोम के सुन्दर नगर को तहस-नहस कर दिया। चर्च के विरोधी इस प्रचार में लग गए कि रोम का पतन ईसाई धर्म के कारण हुआ है। गैर-ईसाई लेखकों का विश्वास था कि ईसाई धर्म ने परलोक सुधार पर अधिक बल दिया और सांसारिक लक्ष्यों की उपेक्षा की, इसलिए पतन हुआ। आगस्टाइन ईसाई धर्मावलम्बी होने के नाते इससे बहुत दुःखी हुआ और उसने ईसाई धर्म की आलोचना का विरोध करना शुरू कर दिया।
पूर्ववर्ती विचारकों का प्रभाव (Influence of Predecessors)
आगस्टाइन के दर्शन को प्लेटो, सिसरो, स्टोइको आदि विचारकों ने प्रभावित किया। उन्होंने पूर्ववर्ती लेखकों की विचारधारा को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं किया, बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से आवश्यकतानुसार अपने चिन्तन के अनुरूप ढाला। उन्होंने प्लेटो से न्याय का सिद्धान्त, सिसरो से राष्ट्रमण्डल की अवधारणा तथा स्टोइको से एक सार्वत्रिक (Universal) राज्य की नागरिकता की धारणा ग्रहण की। इस प्रकार उन्होंने अपने पूर्ववर्ती विचारकों से प्रभावित होकर ईसाई धर्म की सुरक्षा में अपने को लगा दिया।
महत्वपूर्ण रचनाएँ (Important Works)
आगस्टाइन ने ईसाई धर्म का दृढ़ और व्यवस्थित समर्थन किया। उसने बताया कि रोम का पतन दैवीय इच्छा का परिणाम है।
The City of God: 22 खण्डों वाला यह ग्रन्थ 413 ई. में लिखना शुरू किया गया और 426 ई. में पूरा हुआ। इसमें रोम के पतन के दुःखों से जनता को छुटकारा दिलाने का प्रयास किया गया।
Confessions: यह ग्रन्थ राजनीतिक चिन्तन की दृष्टि से ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है।
राजनीतिक विचार (Political Ideas)
1. इतिहास का दर्शन (Philosophy of History)
आगस्टाइन के अनुसार, रोम का पतन एक दैवी न्याय है जिसका प्रयोजन वास्तविक ईश-नगर की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त करना था। मानव इतिहास अच्छाई और बुराई की शक्तियों के मध्य संघर्ष है।
2. दो नगरियों का सिद्धान्त (The Theory of Two Cities)
सांसारिक नगरी (The City of Earth):** नश्वर और अस्थायी, जो वासनाओं का प्रतीक है।
ईश्वर की नगरी (The City of God):** ईश-नगर सार्वदेशिक व सार्वकालिक है। चर्च इसका पृथ्वी पर प्रतिनिधि है।
3. ईश्वरीय नगरी के दो सद्गुण
* **न्याय (Justice):** पूर्ण न्याय केवल सार्वत्रिक समाज (ईसाई राष्ट्रमण्डल) में सम्भव है।
* **शान्ति (Peace):** ईश्वर में लीन होने में एक-दूसरे का हाथ बँटाना ही वास्तविक शान्ति है।
4. राज्य का सिद्धान्त (Theory of State)
राज्य की उत्पत्ति मनुष्य के पापपूर्ण स्वभाव और समूह में रहने की प्रवृत्ति के कारण हुई है। राज्य स्वयं ईश्वर का प्रतिनिधि है, इसलिए उसकी आज्ञा का पालन अनिवार्य है, परन्तु यदि राज्य धर्म के विरुद्ध कार्य करे, तो उसकी अवज्ञा करनी चाहिए।
5. चर्च और राज्य में सम्बन्ध (Relation Between Church and State)
चर्च ईश्वर का प्रतिनिधि है, अतः उसकी सत्ता राज्य से ऊँची है। दोनों में परस्पर सहायता व सहयोग का सम्बन्ध होना चाहिए।
6. सम्पत्ति और दासता
* **सम्पत्ति:** यह कोई प्राकृतिक अधिकार नहीं, बल्कि राज्य द्वारा प्रदत्त व्यवस्था है।
* **दासता:** यह मूल पाप के कारण मनुष्यता के पतन का दण्ड है।
योगदान एवं प्रभाव (Contribution and Influence)
आगस्टाइन ने धर्मसत्ता (चर्च) को सर्वोच्च मानकर मध्ययुगीन विचारधारा का आधार तैयार किया। उनके प्रमुख योगदान:
1. पवित्र रोमन साम्राज्य का निर्माण।
2. चर्च की सर्वोच्चता का सिद्धान्त।
3. सार्वभौमवाद (Universalism) की अवधारणा।
4. राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धान्त।
5. द्वैधवाद (राजसत्ता और धर्मसत्ता का विभाजन)।
सेबाइन के अनुसार, उनकी रचनाएँ 'विचारों की खान' हैं। थॉमस एकवीनास, दाँते और ग्रोशियस जैसे विचारकों पर आगस्टाइन के दर्शन का अत्यधिक प्रभाव पड़ा।