मतदान अनुसंधान में भविष्यवाणी की संभावनाएं


मतदान अनुसंधान 

सामान्य रूप से नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया गया क्रमबद्ध प्रयास ही अनुसंधान कहलाता है । परंतु सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान शब्द का प्रयोग न केवल ज्ञान प्राप्त करने के लिए बल्कि ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ इसमें संशोधन करने के रूप में भी किया जाता है । जैसा कि विद्वान रेडमैन एंव मोरी का कथन है " नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किए गए व्यवस्थित प्रयत्न  को अनुसंधान कहते हैं " ।


अनुसंधान शब्द अंग्रेजी के Research शब्द का हिंदी रूपांतर है जो दो शब्दों से बना है Re तथा Search , Re का अर्थ है - पुनः या दोबारा , Search का अर्थ है - खोजना । अतः नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए किए गए व्यवस्थित प्रयत्न  को हम अनुसंधान कहते है ।

आधुनिक समय में विश्व के अधिकांश देश शासन प्रणाली के रूप में लोकतांत्रिक प्रणाली को बना रहे हैं । लोकतांत्रिक प्रणाली अर्थात ऐसी प्रणाली जिसमें देश के सामान्य व्यस्क नागरिक मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं । अतः मतदाताओं के मतदान व्यवहार एवं रुख को नापना  एवं उसके संबंधित नए तथ्यों सूचनाओं को सामने लाना ही मतदान अनुसंधान कहलाता है । सामान्य नागरिकों के मतदान व्यवहार को जनमत सर्वेक्षण के माध्यम से पता चलता है , तथा इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया में अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त सीटों के पूर्व अनुमानों को बताना । अब चुनाव के दौरान एक नियमित व जरूरी प्रक्रिया बन गई है ।

मतदान अनुसंधान में पूर्व अनुमान लगाना -


 मतदान अनुसंधान के अंतर्गत पूर्व अनुमान लगाने हेतु व्यक्तियों के मतदान व्यवहार का अध्ययन आवश्यक होता है । मतदान व्यवहार के माप का अर्थ है -  पंजीकृत मतदाताओं के नमूना सर्वेक्षण के आधार पर संख्यात्मक परिपेक्ष्य में चुनाव में संबंधित अनेक मुद्दों पर मतदाताओं की राय व विचारों का अनुमान लगाना ।

मतदान अनुसंधान में मनुष्यों का मत व्यवहार दो प्रकार से नापा जाता है - 
 जनमत सर्वेक्षण - चुनाव पूर्व सर्वेक्षण मतदानोत्तर सर्वेक्षण - चुनाव के बाद सर्वे

जनमत सर्वेक्षण


सामान्य जनता की किसी चुनाव से संबंधित मुद्दों पर राय जानना  जनमत सर्वेक्षण कहलाता है । इसके अंतर्गत कुछ लोगों की जाति , धर्म आय , लिंग ,आयु  इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नमूना लेकर चुनाव से संबंधित मुद्दों पर मतदाताओं की विचारों को जानने के लिए एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया जाता है एवं प्राप्त तथ्यों का सांख्यकीय विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं , क्योंकि यह चुनाव से पूर्व किया जाता है इसलिए इसे चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भी कहते हैं ।

मतदानोत्तर सर्वेक्षण 


मतदान करके बाहर निकलने मतदाताओं पर मतदान के तुरंत बाद किया गया सर्वेक्षण निर्गम मत अनुमान या मतदानोत्तर सर्वेक्षण कहलाता है ।
 जनमत सर्वेक्षण मतदान से पूर्व किया जाता है और एग्जिट पोल मतदान के तुरंत बाद किया जाता है ।
 एग्जिट पोल करते समय भी वोट देकर आए लोगों की जाति , धर्म , आयु , लिंग , आय इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नमूना लेकर लोगों से चुनाव संबंधी प्रश्न पूछे जाते ।  एंव विभिन्न राजनीतिक दलों  व उनके उम्मीदवारों के विषय में आंकलन किए जाते हैं । जैसा कि हम जानते हैं कि मतदान होने के पश्चात वास्तविक नतीजे आने में कुछ दिन लग जाते हैं । क्योंकि यह एक चुनावी प्रक्रिया होती है , जो कि चुनाव आयोग की निगरानी में चल रही होती है किंतु एग्जिट पोल से अनुमानित नतीजे मतदान खत्म होने के एक-दो घंटे में ही आ जाते हैं ।

प्राय:  कुछ निजी कंपनियां , समाचार पत्रों एवं समाचार चैनलों के लिए मतदानोत्तर सर्वेक्षण करती है । जिससे मतदान की वास्तविक रूख  व रुझानों का पता लगाया जा सकता है । 
जिनमें कुछ इस प्रकार से है इंडिया टुडे - एकिसस , टाइम्स नाउ -  सी एन एक्स , एबीवीपी - सीएसडीएस , रिपब्लिक - सी वॉटर , न्यूज 24 - चाणक्य

मतदान अनुसंधान में भविष्यवाणी की संभावनाएं 


भारत में मतदान अनुसंधान के क्षेत्र में भविष्यवाणी को किए जाने को लेकर नई संभावनाओं को स्थान मिला है । भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत 1980 में भारतीय मीडिया से हुई । इसी के बाद भारतीय मीडिया चुनाव के बाद सर्वे करने लगा । दूरदर्शन ने 1996 में एग्जिट पोल शुरू किया । वर्तमान स्थिति यह है कि अब कोई भी चुनाव बिना एग्जिट पोल के संभव ही नहीं हो सकते । वर्तमान में अधिकांश पोलिंग एजेंसी अपने अध्ययनों के आधार पर साँख्यकीय  विश्लेषण के आधार पर विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त सीटों का पूर्वानुमान बिल्कुल सटीक लगा लेती है । एंव अधिकांशत एग्जिट पोल के माध्यम से की गई सीटों की भविष्यवाणी सच साबित होती है या फिर वास्तविक परिणामों की संख्या करीब - करीब वही होती है जितना कि पूर्व अनुमान लगाया गया होता है ।

मतदान अनुसंधान में कठिनाई 


मतदान अनुसंधान में सीटों का पूर्व अनुमान लगा लेना जहां एक ओर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक तार्किक एवं वैज्ञानिक बनाने में मदद कर रहा है । वहीं दूसरी और इसमें कुछ कठिनाइयां भी है ।  
जैसे :- 

* पूर्व अनुमान गलत साबित होने की आशंका लगातार बनी रहती है ।

* भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में कोई भी चुनावी पूर्व अनुमान लगाना एक कठिन व  चुनौतीपूर्ण कार्य है ।

* व्यक्तियों के मत व्यवहार का पता लगाना एक कठिन कार्य है क्योंकि मनुष्य अपना व्यवहार प्रतिफल बदलते रहते हैं । 

* विभिन्न वैज्ञानिक व संख्यिकीय तरीके अपनाने के बावजूद भी विश्वसनीयता का अभाव बना रहता है । 

* अतः हम कह सकते हैं कि मतदान अनुसंधान वास्तव में दैनिक राजनीतिक घटनाओं को अधिक वैज्ञानिक बनाने में मददगार तो साबित हो ही गया है लेकिन इसके बावजूद मनुष्य के मतदान व्यवहार के विषय में अध्ययन हेतु इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता ।

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