आंकड़े
आंकड़ो को एक ऐसी संख्याओ के रूप में परिभाषित किया गया है जो यथार्थ विश्व के मापन को प्रदर्शित करती है | आधार सामग्री एकमात्र माप है | संख्यात्मक सूचना आंकड़ा कहलाती है |
उदाहरण – बाड़मेर में लगातार 20 सेमी वर्षा अथवा 24 घंटों में बांसवाडा में निरंतर 35 सेमी वर्षा अथवा सूचना जैसे – रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली – मुबई की दुरी , वाया कोटा – वडोदरा -1305 किमी है | ये सभी संख्यात्मक सूचना आंकड़ा कहलाती है |
आंकड़ो के प्रकार –
मौलिकता के आधार पर भी आंकड़ो को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है | आंकड़ों के प्रकारों या स्वरूपों का यह विभाजन सामाजिक विज्ञानों से अधिक मान्य है |
!) प्राथमिक आंकड़े
!!) द्वितीयक आंकडें
!) प्राथमिक आंकड़े –
प्राथमिक तथ्य वे मौलिक सूचनाएं या आंकड़े होते है जो की एक अनुसन्धान- कर्ता वास्तविक अध्ययन स्थल में जाकर विषय व् समस्या से सम्बन्धित जीवित व्यक्तियों से साक्षात्कार करके अथवा प्रश्नावली / अनुसूची की सहायता से एकत्रित करता है अथवा प्रत्यक्ष निरिक्षण के द्वारा प्राप्त करता है |
वे आंकड़े जिन्हें अनुसधान-कर्ता प्रथम बार निरिक्षण करके एकत्रित करता है वे प्राथमिक आंकड़े कहलाते है | प्राथमिक तथ्यों को एकत्रित करने के दो मुख्य स्रोत है –
प्रथम स्रोत – एक तो जीवित व्यक्तियों से | इस स्रोत के अंतर्गत व्यक्ति आते है जो कि अध्ययन विषय के अंतर्गत व्यक्ति आते है जो की अध्ययन विषय या समस्या के सम्बन्ध में ज्ञान रखते है | अथवा दीर्घ समय से उसके घनिष्ठ सम्पर्क है |
दूसरा स्रोत – प्रत्यक्ष निरिक्षण द्वारा | इस प्रकार के निरीक्षणों द्वारा एक समुदाय या समूह के जीवन सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया जा सकता है यदि निरिक्षण के दौरान अनुसन्धान कर्ता ने पक्षपात या मिथ्या झुकाव का कोई चश्मा न पहन रखा हो | व्यक्ति के व्यवहार से सम्बन्धी तथ्यों को एकत्रित करने के लिए प्रत्यक्ष निरिक्षण एक उतम स्रोत है |
द्वितीयक आंकड़े / तथ्य –
द्वितीयक आंकड़े /तथ्य / सुचनाए , वे सुचनाए है जो अनुसन्धान कर्ता को प्रकाशित व् अप्रकाशित प्रलेखों , रिपोर्टो , सांख्यिकी , पाण्डुलिपि , पत्र –डायरी आदि से प्राप्त होते है , वे द्वितीयक आंकड़े कहलाते है |
द्वितीयक तथ्यों की उल्लेखनीय विशेषता यह होती है कि ये तथ्य , सूचनाएं या आंकड़े स्वयं अनुसन्धान कर्ता अपने कार्य में उपयोग करने के लिए एकत्रित कर लेता है |
द्वितीयक आंकड़े के भी दो प्रमुख स्रोत है –
पहला – व्यक्तिगत प्रलेख जैसे आत्मकथा , डायरी , पत्र आदि |
दूसरा – सार्वजनिक प्रलेख – जैसे रिकॉर्ड पुस्तके , जनगणना रिपोर्ट , विशिष्ट कमेटियो की रिपोर्ट , समाचार –पत्र व् पत्रिकाओ में प्रकाशित सुचनाए आदि |
प्राथमिक एंव द्वितीयक आंकड़ो में अंतर –
प्राथमिक एंव द्वितीयक की प्रकृति के विवेचन से स्पष्ट होता है की इनके बिच कुछ मौलिक भिन्नताए है | इन भिन्नता को संक्षेप में निम्नाकित रूप से स्पष्ट क्र सकते है –
1) प्राथमिक आंकड़े एक कच्चे माल की तरह है जिसके आधार पर अध्ययन को एक स्वरूप दिया जा सकता है | जबकि द्वितीयक आंकड़े एक तैयार माल के समान है लेकिन आवश्यकतानुसार उसमे परिवर्तन नही किया जा सकता है |
2) प्राथमिक आंकड़े मौलिक आंकड़े है | इसका कारण यह की अनुसंधानकर्ता द्वारा इसका संकलन स्वयं करने के कारण उसकी प्रमाणिकता में संदेह नही किया जा सकता है | इसके विपरीत द्वितीयक आंकड़े में मौलिकता का अभाव इस कारण होता है की इसका पहले से ही विश्लेष्ण और निर्वचन किया जा चूका होता है |
3) प्राथमिक आंकड़ो के संकलन के लिए अधिक धन , समय और श्रम की आवश्यकत होती है | जबकि द्वितीयक आंकड़े के संकलन में सीमित साधनों के द्वारा भी किया जा सकता है | इसका तात्पर्य है की द्वितीयक सामग्री तुलनात्मक रुप से मितव्ययी होती है |
4) प्राथमिक आंकड़ो के संकलन के लिय जिन प्रविधियों का उपयोग किया जाता है जबकि द्वितीयक आंकड़ो में इन प्रविधयों का उपयोग नही किया जाता है |
5) प्राथमिक आंकड़ो में द्वितीयक आंकड़ो की तुलना में सत्यापन का गुण अधिक होता है क्योकि एक बार संकलित किये गये प्राथमिक आंकड़ों के अध्ययन दोषपूर्ण दिखाई देते है तो उस क्षेत्र में जाकर उसका पुन: संकलन किया जा सकता है | जबकि द्वितीयक आंकड़े जिस रूप में होते है उनका उपयोग उसी रूप में करना होता है |
6) प्राथमिक व् द्वितीयक आंकड़े का मुख्य अन्तर समय कारक से सम्बन्धित है | इसका तात्पर्य है कि कोई विशेष तथ्य एक समय में एक व्यक्ति के लिए प्राथमिक हो सकता है| जबकि कुछ समय बाद वही तथ्य दुसरे अध्ययनकर्ता के लिए द्वितीयक बन जाता है |
उदाहरण- 1981 में जनगणना सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त आंकड़े , भारत के रजिस्ट्रार जनरल के लिए प्राथमिक आंकड़ों के रूप में होगे , जबकि अन्य अध्ययनकर्ता के लिए यही आंकड़े कुछ समय बाद द्वितीयक आंकड़े बन जाते है |