संघात्मक शासन व्यवस्था - अर्थ , परिभाषाए , लक्षण
संघीय व्यवस्था
प्रस्तावना
संघीय व्यवस्था का विकास यूरोप में उभरे शुरुआती आधुनिक राज्य पूर्ण रूप से राजतंत्र थे । 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियों के बाद राजशाही को एक झटका दिया और सरकार के गणतन्त्रात्मक एवं लोकतांत्रिक रूपों को प्रस्तुत किया । यहां तक कि उन देशों में लोकतांत्रिक विचारों को लोकप्रियता नहीं मिली । तब शासन ने महसूस किया कि हुकूमत को एक केंद्रीयकरण प्राधिकरण द्वारा प्रबंधन नहीं किया जा सकता है । इसलिए विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है। इस प्रकार राज्य की विभिन्न राजनीतिक इकाइयों के बीच सत्ता के वितरण के आधार पर उभरी प्रमुख राजनीतिक व्यवस्थाएं संघीय थी ।
संघीय व्यवस्था का विकास 18 वीं शताब्दी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका में सरकार का पहला संघीय रूप अस्तित्व में आया , जब अमेरिकी स्वतंत्रता युद्ध में 13 उपनिवेश ब्रिटिश औपनिवेशिक नियंत्रण से मुक्त हो गए । उसके बाद अमेरिका की तर्ज पर कनाडा (1867) पहला देश बना इस व्यवस्था को लागू करने वाला । 1901 में आस्ट्रेलिया , यूरोप में स्विस के कुछ केंटनो में , सोवियत रूस , भारत में भारत सरकार अधिनियम 1935 के बाद प्रयास हुआ ।
संघात्मक शासन का अर्थ
संघ शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द में फेडरेशन ( Federation ) का अनुवाद है । फेडरेशन शब्द लेटिन भाषा के शब्द फोड़स Foedus से लिया गया है । फोडस का अर्थ है - " संधि या समझौता " ।
अर्थात संघ सार्वभौम राज्य के पारस्परिक समझौतों का परिणाम है । जब दो या दो से अधिक राज्य मिलकर एक संधि या समझौते द्वारा एक नए राज्य का निर्माण करते हैं तो उस राज्य को संघ की संज्ञा दी जाती है । जैसा कि हैमिल्टन ने कहा कि "संघ कुछ राज्यों का मेल है जो एक नए राज्य का निर्माण करते हैं । "
संघात्मक शासन का अर्थ
संघात्मक शासन प्रणाली में शासन की शक्तियां संविधान द्वारा केंद्र तथा इकाइयों में विभाजित रहती है , उसे संघात्मक शासन कहते हैं ।
दोनों इकाइयों इस शासन में अपने - अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रहती है । दोनों की सता मौलिक रहती है । दोनों का अस्तित्व संविधान पर निर्भर रहता है ।
भारत , कनाडा , अमेरिका , स्वीटजरलैंड आदि देशों में संघात्मक शासन व्यवस्था ही प्रचलित है ।
संघात्मक शासन परिभाषाएं
विभिन्न विद्वानों ने संघात्मक शासन व्यवस्था की परिभाषाएं इस प्रकार से दी है -
* डॉक्टर गार्नर के अनुसार-
" संघ एक ऐसी प्रणाली है जिसमें केंद्रीय तथा स्थानीय सरकारें एक ही प्रभुत्व शक्ति के अधीन होती है । यह सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में , जिसे संविधान तथा संसद का कोई कानून निश्चित करता है , सर्वोच्च होती है।
* डॉक्टर फाइनर के अनुसार -
" यह एक शासन है जिसमें सत्ता और शक्ति का एक भाग स्थानीय क्षेत्रों में निहित होता है और दूसरा भाग केंद्र में " ।
* डायसी के अनुसार -
" संघीय राज्य एक ऐसी राजनीतिक रचना है जिसमें राष्ट्रीय एकता और शक्ति तथा प्रदेशों के अधिकारों की रक्षा करते हुए दोनों में सामंजस्य स्थापित किया जाता है "।
* विलोबी - " संघ बहुशासनतंत्रवादी राज्य है "।
संघात्मक शासन के लक्षण / विशेषताएं
संघात्मक शासन के प्रमुख लक्षण निम्न है इसके अभाव में संघात्मक शासन की स्थापना नहीं की जा सकती
लिखित निर्मित कठोर एवं सर्वोच्च संविधान इस व्यवस्था में संविधान लिखित निर्मित कठोर एवं सर्वोच्च संविधान होता है । लिखित संविधान में केंद्र और इकाइयों के बीच उनके अधिकारों व शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । इस व्यवस्था में संविधान के प्रावधान सभी सरकारों पर बाध्यकारी है अर्थात कोई भी शक्ति संविधान के ऊपर नहीं होती है ।
इस शासन व्यवस्था में सरकारों के मध्य शक्तियों का विभाजन होता है । राष्ट्रीय महत्व के विषय केंद्रीय सरकार या संघीय सरकार को और स्थानीय महत्व के विषय स्थानीय इकाइयों को सौंप दिया जाते हैं । भारतीय संविधान द्वारा भी संघ और राज्यों के मध्य शक्ति का विभाजन किया गया है ।
स्वतंत्र न्यायपालिका
संघात्मक व्यवस्था के लिए सर्वोच्च न्यायालय आवश्यक है । जिसका कार्य संविधान की व्याख्या व रक्षा करना होता है । स्वतंत्र व सशक्त न्यायपालिका संघात्मक व्यवस्था की प्रहरी है । हस्किन के शब्दों में " संघीय शासन में सर्वोच्च न्यायालय शासन तंत्र में संतुलन रखने वाला पहिया है ।"
संघात्मक शासन के गौण लक्षण
* संघात्मक शासन में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था होती है ।
* संघीय शासन व्यवस्था में केंद्रीय व्यवस्थापिका दिवसदनात्मक होती है ।
* संघात्मक शासन में संप्रभुता का दौरा उपयोग होता है ।
* संघात्मक राज्य में दोनों प्रकार की सरकारें ( केंद्र + राज्य ) अपने - अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होती है , और एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करती ।
संघात्मक शासन के गुण
* वर्तमान समय में संघात्मक शासन सर्वाधिक प्रचलित शासन व्यवस्था है । विश्व के छोटे बड़े राज्यों ने इसे अपनाया है ।
* सिजविक का मत है कि " संघवाद ने राज्यों को हड़पने या राज्य विस्तार की समस्या का अंत कर दिया है , यह राज्यों के एकीकरण की शांतिपूर्ण पद्धति है यह स्थानीय स्वशासन एवं राष्ट्रीय स्वाधीनता का आश्वासन है " ।
संघात्मक शासन के निम्नलिखित गुण
राष्ट्रीय एकता एवं स्थानीय स्वायत्तता
इस शासन व्यवस्था में ये दोनों गुण पाए जाते हैं । छोटे-छोटे राज्य मिलकर अपने आप को एक बड़े राज्य में बदल लेते हैं और शक्तिशाली राज्य के लाभों को प्राप्त करते हैं । साथ में वह अपने स्वतंत्र एवं पृथक अस्तित्व को भी सुरक्षित रखते हैं । संघीय शासन में राष्ट्रीय विषयों में एकरूपता और स्थानीय विषयों में विविधता पाई जाती है ।
केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण का समन्वय
संघात्मक शासन में राष्ट्रीय महत्व के विषय केंद्रीकृत कर दिए जाते हैं और स्थानीय महत्व के विषय विकेंद्रीकृत । अतः यह शासन प्रणाली दोनों प्रकार के लाभों से युक्त होती है ।
प्रशासनिक दक्षता
जन कल्याणकारी राज्य की धारणा के कारण वर्तमान समय में सरकार के कार्यों में बहुत वृद्धि हो गई है । शक्तियों का विभाजन होने से केंद्र सरकार का कार्यभार हल्का हो जाता है और उसकी प्रशासनिक दक्षता और कुशलता में वृद्धि हो जाती है ।
विशाल राज्यों के लिए नितांत उपयुक्त
विशाल राज्यों में विभिन्न भाषा , धर्म और संस्कृति के लोग रहते हैं । जिनके हितों में विभिन्नताए पाई जाती है । ऐसे राज्यों में विविधताओं के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता स्थापित करनी होती है , जो संघात्मक व्यवस्था में ही संभव है ।
निर्बल राज्यों को शक्तिशाली बनाने की पद्धति
संघीय शासन व्यवस्था में छोटे-छोटे है राज्य मिलकर एक शक्तिशाली संगठन का निर्माण करते हैं , जिससे वे स्वयं को सुदृढ़ एवं सुरक्षित समझने लगते हैं । आंतरिक क्षेत्र में उनकी शक्ति बढ़ जाती है और कोई शक्तिशाली राज्य उन पर आक्रमण करने का दुस्साहस नहीं करता है ।
राजनीतिक चेतना
संघीय शासन अपने नागरिकों को श्रेष्ठ राजनीतिक प्रशिक्षण प्रदान करता है । इसमें स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को अधिक शक्ति प्राप्त होती है । यह संस्थाएं नागरिकों में राजनीतिक समस्याओं के प्रति रुचि जागृत करती है । इससे नागरिकों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश होगा और उनमें राजनीतिक चेतना विकसित होगी ।
शासन निरंकुश नहीं होता
संघ शासन प्रणाली में शक्तियों का विभाजन होने के कारण शासन निरकुंश नहीं होता है । लार्ड ब्राइस के शब्दों में " संघ में एक निरंकुश शासक द्वारा जनता के अधिकार हड़प लिए जाने का खतरा नहीं रहता है " ।
समय और धन की बचत
शक्ति विभाजन से केंद्रीय सरकार का कार्यभार कुछ हल्का हो जाने के परिणामस्वरूप लालफीताशाही की प्रवृत्ति कमजोर हो जाती है । जिसे समय की बचत होती है । राज्यों द्वारा अपनी पृथक सेनाएं रखने , विदेशों में राजदूत नियुक्त करने और प्रदेशिक विभागों का गठन से संबंधित खर्चे की बचत होती है ।
लोकतंत्र के अनुकूल
संघीय व्यवस्था ने लोकतंत्र को लोकप्रिय बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है । गेटेल के शब्दों में " विशाल राज्यों में लोकतंत्र की स्थापना करने में संभवत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के अतिरिक्त संघीय व्यवस्था ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किया है " ।
* अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में प्रतिष्ठा ।
* विश्व संघ की ओर कदम
संघात्मक शासन के दोष
कमजोर शासन
शक्ति विभाजन के कारण सुदृढ़ शासन की स्थापना नहीं हो सकती । डॉ आशीर्वादम के अनुसार " यह शक्ति विभाजन आंतरिक और बाह्य यह दोनों क्षेत्रों में बाधा उपस्थित करता है , केंद्र तथा इकाइयों की सरकारों में परस्पर झगड़े और मतभेद बने रहते हैं " ।
अकुशल शासन
संघ व्यवस्था में दोहरी शासन प्रणाली होने के कारण सरकार की कार्य क्षमता में कमी आ जाती है । शासन संबंधी निर्णय लेने में विलंब होता है ।
संघर्ष की स्थिति
शक्ति विभाजन के कारण केंद्र और इकाइयों की सरकारों के बीच निरंतर विवाद होते रहते हैं । इससे संघ की इकाइयों में कटुता पैदा हो जाती है ।
संकटकाल में अनुपयुक्त
संघ व्यवस्था संकट काल की स्थिति में अनुपयुक्त है । युद्ध व संकट के समय निर्णय तुरंत लेने पड़ते हैं , परंतु संघीय व्यवस्था के कारण कहीं विषयों पर संघ को राज्य से मंत्रणा करनी पड़ती है , क्योंकि उनके विचार विमर्श किए बिना दृढ़ता से निर्णय नहीं लिए जा सकते है ।
अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में दुर्बलता
संघ राज्य अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी कमजोर होता है । विदेशी सरकारों से संधियाँ एवं समझौते करना केंद्र सरकार का विषय होता है , यदि इकाइयां उन संधियों और समझौतों को स्वीकार नहीं करे , तो गृह युद्ध जैसी स्थिति बनती है । आंतरिक विभेद विदेश नीति को प्रभावित करते हैं ।
इकाइयों द्वारा होने की आशंका
संघात्मक शासन में संघ राज्य के सुदृढ़ एवं कुशल नेतृत्व के अभाव में संघ की इकाइयों की प्रथक होने की संभावना बनी रहती है ।
न्यायपालिका का रूढ़िवादी होना
संघात्मक शासन में न्यायपालिका संविधान की सरंक्षक होती है और उसे व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानूनों को गैर संवैधानिक घोषित करने का अधिकार होता है । कभी-कभी न्यायपालिका की यह रूढ़िवादिता विकास एवं प्रगतिशील परिवर्तन में बाधक होती है ।