सम्प्रभुता / राजसत्ता / प्रभुसत्ता का अर्थ , सम्प्रभुता के प्रकार , परिभाषाएं , सम्प्रभुता के प्रकार , सम्प्रभुता के लक्षण या विशेषताएं

सम्प्रभुता / राजसत्ता / प्रभुसत्ता का अर्थ , सम्प्रभुता के प्रकार , परिभाषाएं , सम्प्रभुता के प्रकार , सम्प्रभुता के लक्षण या विशेषताएं 


                         -: प्रभुसता या सम्प्रभुता  :-


प्रभुसता का अर्थ – 

प्रभुसता को हिंदी में राजसता या सम्प्रभुता भी कहा जाता है | अंग्रेजी में इसको सावरेन्टी कहा जता है | जो लैटिन भाषा के सुप्रेंस से निकला है | जिसका अर्थ है – सर्वोच्च शक्ति होता है | राजसता , राज्य का विशेष लक्षण होता है | और राज्य को बनाने वाले चार तत्वों ( जनसंख्या , सरकार , निश्चित भू – भाग एंव सम्प्रभुता ) में से सबसे महत्वपूर्ण तत्व है | 

सम्प्रभुता राज्य का अनिवार्य तत्व होता है |
 
जीन बोंदा के अनुसार  :-  “ सम्प्रभुता नागरिकों तथा प्रजा के ऊपर वह परम शक्ति है जो कि कानूनों से नियत्रित नही है ’’ |
 
गार्नर के अनुसार :-  “ प्रभुसता राज्य की एक ऐसी विशेषता है जिसके कारण वह अपनी इच्छा के आलावा और किसी चीज से नही बंधा रहता है और अपने आप के अलावा किसी अन्य शक्ति से सीमित नही होता है ” |   

सम्प्रभुता की परिभाषाएं :-


जेलिनेक के अनुसार – 
“ प्रभुसता राज्य का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी इच्छा के अतिरिक्त किसी दुसरे की इच्छा या बाहरी शक्ति के आदेश से नही बांधता है ” |

लास्की के अनुसार -  
“ प्रभुसताधारित  वैधानिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति व् समुदाय से उच्चतर है | वह सभी को अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य कर सकता है ” |

ग्रोशियस के अनुसार – 
“ प्रभुसता वह राजनितिक शक्ति है जिसके कार्य किसी दुसरे के अधीन न हो , तथा जिसकी इच्छा का कोई उल्लघंन न कर सके ” |

बोडिन के अनुसार – 
“ प्रभुसता नागरिकों तथा प्रजा के उपर वह परम शक्ति है जो की कानूनों से नियत्रित नही है ” |

बोंदा के अनुसार – 
“ यह नागरिकों तथा प्रजाजनों के ऊपर एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति की घोतक है जो कानून के बन्धनों से न बंधी होती है ” |
  

सम्प्रभुता के प्रकार या पहलु  :- 


  सम्प्रभुता के दो प्रकार या पहलु होते है | जिन्हें आंतरिक सम्प्रभुता व बाहरी सम्प्रभुता के नाम से जाना जाता है |

1.आन्तरिक सम्प्रभुता :-


आंतरिक सम्प्रभुता का अर्थ है – राज्य के अंदर रहने वाले सभी व्यक्ति तथा संस्थाएं उसके पूर्ण अधीन होती है यदि वे राज्य की आज्ञा का पालन नही करे तो राज्य को उन्हें दंड देने का पूरा अधिकार होता है |

2.बाहरी सम्प्रभुता  :- 


बाहरी सम्प्रभुता का अर्थ है कि राज्य किसी बाहरी देश या संस्था के अधीन नही है उसे व्यापारिक संधियों व सैनिक समझौते करने का पूर्ण अधिकार होता है | इस प्रकार वह पूर्ण सूप से बाहरी दबाव से स्वतंत्र होता है | इससे तात्पर्य राष्ट्रिय स्वतंत्रता से है |
                             इस प्रकार सम्प्रभुता बाहरी तथा आन्तरिक दोनों रूपों से सर्वोच्च होती है | यह असीमित होती है तथा इस प्रकार  इस पर सैद्वान्तिक रूप से कोई रूकावट नही लगाई जा सकती है |

प्रभुसता के लक्षण या विशेषताएं  :-


 1.पूर्णता ( Absoluteness ) –


सम्प्रभुता एक पूर्ण और असीमित शक्ति है | यह अन्य  किसी शक्ति पर निर्भर नही है | राज्य के अंदर सभी व्यक्ति एंव अनेक समूह प्रभुसताधारी के अधीन होते है |  राज्य के बाहर भी प्रभुसताधारी  को अपने राज्य के सन्दर्भ में सर्वोच्च माना जाता है | अन्य कोई राज्य उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नही कर सकता है | और न ही उसे किसी बात के लिए बाध्य कर सकता है | 

2. सार्वभौमिकता (Universality) :- 


  प्रभुसत्ता राज्य के भीतर सभी व्यक्तियों संस्थाओं तथा अन्य वस्तुओं में सर्वोच्च होती है । राज्य स्वयं किसी विषय को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर रख सकता है , परंतु कोई व्यक्ति या संगठन राज्य के अधिकार क्षेत्र से मुक्ति की मांग नहीं कर सकता है । अतः राज्य के क्षेत्र के अंतर्गत प्रभुसत्ता एक सर्वव्यापक , सार्वभौम व एक सर्वोच्च शक्ति है |

3.अदेयता :- 


प्रभुसत्ता अखंड होती है । इस कारण यह किसी ओर को नहीं सौंपी जा सकती है । यदि प्रभुसत्ता संपन्न राज्य अपनी प्रभुसत्ता किसी ओर को हस्तांतरित करना चाहे तो उसका अपना अस्तित्व ही मिट जाएगा ।

गार्नर ने कहा है  कि 
   " प्रभुसत्ता , राज्य का व्यक्तित्व और उसकी आत्मा है "। 
                जिस प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व अदेय है वह उसे किसी दूसरे को नहीं दे सकता है । इसी प्रकार राज्य की संप्रभुता भी किसी अन्य को नहीं दी जा सकती । 

लीवर ने कहा है कि - 
                           " जिस प्रकार आत्महत्या के बिना मनुष्य अपने जीवन को या वृक्ष अपने फलने फूलने के गुण को प्रथक नहीं कर सकता उसी प्रकार संप्रभुता को भी राज्य से प्रथक नहीं किया जाता है " ।

4. स्थायित्व :- 


प्रभुसत्ता स्थाई रहती है । जब तक प्रभुसत्ता है तब तक राज्य का अस्तित्व है दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है ।

5. अविभाज्यता :- 


प्रभुसत्ता पूर्ण रूप से सर्वव्यापक होती है । अतः इसके टुकड़े नहीं किए जा सकते , प्रभु सत्ता के टुकड़े करते ही राज्य के भी टुकड़े हो जाएंगे । संघीय व्यवस्था के अंतर्गत की प्रभुसत्ता बंट नहीं पाती है बल्कि निर्दिष्ट विषयों के संबंध में अनेक अधिकार क्षेत्र बंटे हुए हैं । अधिकार क्षेत्रों का यह वितरण उनमे कोई संशोधन भी प्रभुसत्ता के प्रयोग से ही संपन्न होता है ।

6. अनन्यता :- 


इसका अर्थ यह है कि राज्य में दो प्रभु सत्ताधारी नहीं हो सकते क्योंकि यदि एक राज्य में दो प्रभुसत्ताधारी मान लिए चाहे तो उससे राज्य की एकता नष्ट हो जाती है ।  एक प्रभुत्व संपन्न राज्य के अंदर दूसरा प्रभुत्व संपन्न राज्य नहीं रह सकता है ।

राज्यसत्ता के विभिन्न रूप :- 


1. नाममात्र तथा वास्तविक प्रभुसत्ता - 


पहले अनेक देशों में राजा या सम्राट निरंकुश होते थे । उनके हाथों में वास्तविक शक्तियां होती थी।  और संसद उनके हाथों की कठपुतली होती थी।  उस समय वे वास्तविक प्रभुसत्ता का प्रयोग करते थे । अतः उन्हें वास्तविक प्रभुसत्ताधारी कहा जाता था ।  जैसे इंग्लैंड में 15 वीं शताब्दी से पूर्व , रूस में 18वीं व 19वीं सदीं से पूर्व तथा फ्रांस में 1789 ई. के पूर्व सम्राट सर्वोपरि थे । इंग्लैंड में 1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रांति के बाद यह स्थिति बदली । अब वहां सम्राट की नाममात्र की शक्तियां रह गई है । व्यवहार में उसे अपने मंत्रियों को चेतावनी देने , सूचना देने , सलाह देने और प्रोत्साहन देने का अधिकार है । इन साधारण शक्तियों के अतिरिक्त ब्रिटिश सम्राट की सभी शक्तियों का प्रयोग मंत्री ही करते हैं , इसलिए यह कहा जाता है कि ब्रिटिश सम्राट या महारानी के पास नाममात्र की प्रभुसत्ता होती है ।

2. वैधानिक सम्प्रभुता :- 


किसी भी देश में वहां की सर्वोच्च कानून बनाने वाली शक्ति को वैधानिक राज्य सत्ताधारी कहते हैं । उसको उस देश में कानून बनाने व संविधान में संशोधन करने का पूर्ण अधिकार होता है । इंग्लैंड में सम्राट सहित संसद या पार्लियामेंट वहां की प्रभु सत्ताधारी है । इंग्लैंड में संसद को साधारण तथा संवैधानिक दोनों प्रकार के कानूनों में एक समान प्रक्रिया से संशोधन करने का अधिकार होता है । वैधानिक प्रभुसत्ता स्पष्ट , निश्चित , संगठित एवं सर्वोच्च होती है । तथा इसे न्यायालय द्वारा मान्यता दी जाती है ।

3. राजनीतिक प्रभुसत्ता :- 


राजनीतिक प्रभुसत्ता का अर्थ है - राज्य में कानून के पीछे रहने वाले लोकमत । आधुनिक प्रतिनिधितात्मक सरकारों में ऐसे लोगों की इच्छा या लोगों का मत कहा जाता है । अतः राजनीतिक संप्रभुता से आशय है मतदाताओं एवं राज्य में उन समस्त अन्य प्रभावों से हैं जो लोकमत का निर्माण करते हैं । लोकतंत्र में मतदाता , समाचार - पत्र , सभाओं,  विरोध प्रदर्शन , प्रतिनिधिमंडलों , संगठनों , हड़ताल एवं दबाव समूह आदि के माध्यम से कानून निर्माण करने वाली सत्ता के ऊपर प्रभाव डालते हैं एवं उसे नियंत्रित करते हैं । इस प्रकार लोकमत की शक्ति को राजनीतिक प्रभुसत्ताधारी कहा जा सकता है । 

4. लौकिक प्रभुसत्ता :- 


लौकिक प्रभुसत्ता का अर्थ है की जनता की शक्ति सबसे बड़ी होती है । प्राचीन काल में कई विचारको ने इस सिद्धांत को राजाओं की निरंकुशता का खंडन करने के लिए अपनाया था ।
गार्नर के अनुसार - " लौकिक प्रभुसत्ता का अभिप्राय है केवल यही है कि जिन राज्यों में वयस्क को वोट देने का अधिकार है । उनमें मतदाताओं को अपनी इच्छा प्रकट करने और उस पर अमल करवाने की सत्ता प्राप्त है " ।

5. विधित और वस्तुत प्रभुसत्ता :- 


अनेक बार ऐसा होता है कि राज्य की वास्तविक एवं वैतय प्रभुत्व शक्ति में अंतर होता है । विधित प्रभुसत्ताधारी वह होता है जो कानूनी दृष्टि से राज्य के सर्वोच्च आदेश जारी कर सकता है । कानून के अनुसार उसे शासन करने का अधिकार है और वह अपनी आज्ञा का पालन करवा सकता है कई बार जब किसी देश में क्रांति या आक्रमण हो जाता है तो विधित प्रभुसत्ताधारी अपनी आज्ञा का पालन करवाने में असमर्थ रहता है ।  वह कोई नया क्रांतिकारी नेता अथवा आक्रमणकारी नेता वस्तुतः प्रभु सत्ताधारी बन जाता है वस्तुतः प्रभु सत्ताधारी कोई जनरल , तानाशाह , सम्राट अथवा जननायक हो सकता है ।

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