लोकतंत्र का अर्थ ? प्रकार , विशेषताए , लोकतंत्र के गुण- दोष , लोकतंत्र के सफल के लिए शर्तें
-: लोकतंत्र :-
लोकतंत्र राजनीति विज्ञान की अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है । इस अवधारणा से तात्पर्य राज्य व्यवस्था में जनता की भागीदारी से है । अर्थात जनता का शासन संप्रभुता का वास शब्द संपूर्ण जनता में होता है तो उसे लोकतंत्र या प्रजातंत्र या जनतंत्र कहा जाता है । लोकतंत्र में केवल शासन का एक स्वरूप है वरन जीवन के प्रति एक दर्शन है । वह एक राजनीतिक आदर्श भी है ।
लोकतंत्र का अर्थ :-
लोकतंत्र शब्द अंग्रेजी भाषा के डेमोक्रेसी शब्द का हिंदी रूपांतरण है । जो ग्रीक या यूनानी भाषा के Demos या Cratea से मिलकर बना है । Demos का अर्थ है - जनता या लोक तथा Cratea का अर्थ है - जनता की शक्ति है ।
इस तरह से शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर लोकतंत्र शासन का वह रूप है जिसमें शासन की सत्ता स्वयं जनता के पास रहती है और जिसका प्रयोग जनता स्वयं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करती है।
लोकतंत्र की परिभाषाएं :-
अब्राहम लिंकन के अनुसार - " लोकतंत्र जनता का जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन होता है। "
डायसी के अनुसार - " लोकतंत्र शासन का वह स्वरूप है जिसमें शासक वर्ग संपूर्ण राष्ट्र का एक वृहद भाग होता है । "
हेरोडोटस के अनुसार - " लोकतंत्र उस शासन का नाम है जिसमें राज्य की सर्वोच्च सत्ता संपूर्ण जनता में निवास करती है । "
सीले के अनुसार - " लोकतंत्र में शासन व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का एक भाग होता है ।"
इस प्रकार उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि लोकतंत्र शासन में जनता का प्रतिनिधित्व होता है । सरकार का अस्तित्व जनता के हितों की पूर्ति के लिए होता है तथा सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है ।
लोकतंत्र के रूप :-
अरस्तु ने लोकतंत्र के दो स्वरूपों की व्याख्या की है -
* विशुद्ध लोकतंत्र
* विकृत लोकतंत्र
अरस्तु लोकतंत्र के विकृत रूप के संबंध में लिखता है कि "लोकतंत्र इस प्रकार का होता है ' धनिक तंत्र में लुटेरों का तंत्र ' होता है जबकि लोकतंत्र उससे से भी अधिक लुटेरों का तंत्र होता है । " आधुनिक समय में विशुद्ध लोकतंत्र के स्थान पर विकृत लोकतंत्र का विस्तार होता जा रहा है ।
आधुनिक समय की अवधारणा के साथ-साथ लोकतंत्र के रूप भी बदलते जा रहे हैं । लोकतंत्र को व्यापक अर्थों में दर्शन एवं जीवन पद्धति के रूप में समझने का प्रयास किया जा रहा है फिर भी इसके चार रूप है -
1. राजनीतिक लोकतंत्र :-
यह लोकतंत्र का प्रमुख रूप है । लोकतंत्र की स्थापना के पीछे राजनीतिक समानताएं स्थापित करने के लिए मुख्य लक्ष्य रखा गया है । इसके अंतर्गत राजनीतिक प्रणाली में जनता की भागीदारी समान रूप से रखी गई है । जनता को राजनीतिक क्षेत्र में समान अधिकार प्रदान किए गए हैं । ताकि राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना हो सके ।
राजनीतिक लोकतंत्र के अंतर्गत लोगों को निम्न अधिकार प्रदान किए गए हैं -
- सभी नागरिकों को निश्चित आयु प्राप्त करने पर व्यस्क मतदान का अधिकार समान रूप से दिया गया है ।
- सभी नागरिकों को शासन की आलोचना करने का अधिकार दिया गया है ।
- नागरिकों को चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने का समान अधिकार दिया गया है ।
- नागरिकों को राजनीतिक समानता , स्वतंत्रता तथा न्याय की स्थापना के लिए राजनीतिक लोकतंत्र में सहभागिता रखने का अधिकार किया गया है ।
- नागरिकों को किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण व प्रचार करने का अधिकार दिया गया है ।
2. सामाजिक लोकतंत्र :-
लोकतंत्र सामाजिक समानता स्थापित करने के दृष्टिकोण के आधार पर समाज में सद्भावना , एकता व भ्रातृत्व की भावना का विकास करने के लिए अत्यंत आवश्यक है , क्योंकि लोकतंत्र की जड़ें समाज से ही मजबूत होती है । यदि समाज में वर्ग संघर्ष में समानताएं फैली रहेगी तो लोकतंत्र ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाएगा । अतः समाज में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है । समाज में जाति , धर्म , भाषा , रंग व लिंग के भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प लिया जाता है । लोकतंत्र समाज में महिलाओं के हितों की सुरक्षा प्रधान करने का पूरा प्रयास करता है । ताकि महिलाओं को पुरुषों के बराबर समानता प्राप्त हो सके ।
3. आर्थिक लोकतंत्र :-
आर्थिक लोकतंत्र के अंतर्गत अमीरी व गरीबी के बीच का अंतर समाप्त किए जाने का प्रयास किया जाता है । लोगों को आर्थिक स्वतंत्रता दी जाती है । रोजगार के साधनों में समान अवसर की समानता प्रदान की जाती है । पुरुष व महिलाओं को रोजगार देने के प्रयास किए जाते हैं । इसके अतिरिक्त शोषण , बंधुआ मजदूरी व बाल मजदूरी जैसी समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जाता है। इसमें जीवन को कुछ इस तरह की ओर ले जाने के लिए व्यक्तिगत आय तथा राष्ट्रीय आय के साधनों में वृद्धि की जाती है । आर्थिक लोकतंत्र में बड़े बड़े उद्योगों व लघु उद्योगों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है । इसमें पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के आर्थिक कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है । आर्थिक लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया जाता है । राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए देश में आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना बहुत जरूरी है । अतः वर्तमान समय में आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जा रहा है ।
4. धार्मिक लोकतंत्र :-
लोकतंत्र धार्मिक स्वतंत्रता को कायम रखने का प्रयास करता है । किसी भी धर्म को मानने स्वीकार करने , धार्मिक संगठन , पूजा अर्चना करने से किसी भी नागरिक को लोकतंत्र मना नहीं कर सकता । लोकतंत्र सहनशीलता , त्याग व बलिदान करना सिखाता है । धर्म सच्चाई के मार्ग का अनुसरण करता है । इसलिए आधुनिक युग में आध्यात्मिकता लोकतंत्र के रूप में इसकी मान्यता प्राप्त होती जा रही है , उसका मूल उद्देश्य सांस्कृतिक लोकतंत्र की स्थापना का उद्देश्य बनता जा रहा है ।
लोकतंत्र का वर्गीकरण :-
लोकतंत्र के दो प्रकार के वर्गीकरण किए जा सकते हैं जिनमें प्रमुख है -
(i) प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लोकतंत्र ।
(ii) संवैधानिक राजतंत्र एवं गणतंत्रवादी लोकतंत्र ।
(i)प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लोकतंत्र :-
प्रत्यक्ष लोकतंत्र:-
प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह है जिसमें जनता अप्रत्यक्ष रूप से शासन का संचालन स्वयं करती है । स्वयं ही सभा के रूप में एकत्रित होकर कानून बनाती है । तथा शासन का संचालन करने वालों पर पूर्ण नियंत्रण रखती है । वर्तमान में स्विट्जरलैंड के कुछ केंटनो में तथा अमेरिका के कुछ राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रचलित है । वर्तमान समय में प्रत्यक्ष लोकतंत्र को इसलिए नहीं अपनाया जा सकता क्योंकि जनसंख्या की अधिकता के कारण जनता को एक निश्चित स्थान पर एकत्रित करना संभव नहीं है । केवल मात्र छोटे-छोटे राज्य जिन की भौगोलिक स्थिति या क्षेत्रफल कम है और जहां कम जनसंख्या पाई जाती है , वहां पर प्रत्यक्ष लोकतंत्र की सफलता की संभावना अधिक रहती है ।
प्रत्यक्ष लोकतंत्र की सफलता के लिए दो प्रकार के जनमत संग्रह की आवश्यकता रहती है -
- ऐच्छिक जनमत संग्रह व
- अनिवार्य जनमत संग्रह
वर्तमान स्वीटजरलैंड प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रयोगशाला है ।
अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (प्रतिनिधित्यात्मक लोकतंत्र):-
अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनौती है । यह चुने हुए प्रतिनिधि व्यवस्थापिका , कार्यपालिका के रूप में सरकार चलाते हैं , वह न्यायपालिका के सदस्यों का चुनाव भी करते हैं । वर्तमान में विश्व के अधिकांश देशों ने अप्रत्यक्ष लोकतंत्र के रूप में प्रतिनिधित्यात्मक लोकतंत्र को अपनाया है । इसका मुख्य कारण यह था कि विशाल जनसंख्या व भौगोलिक दृष्टि से प्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया जाना संभव नहीं है ।
अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में दो प्रकार की शासन प्रणाली अपनाई जाती है जिनमें से एक को अध्यक्षीय व दूसरी को संसदीय शासन प्रणाली के नाम से जाना जाता है ।
(ii) संवैधानिक राजतंत्र व गणतंत्रवादी लोकतंत्र :-
- संवैधानिक राजतंत्र :-
संवैधानिक राजतंत्र में राज्य का मुख्य वंशानुगत आधार पर नियुक्त होता है । इसमें सैद्धांतिक रूप से राजतंत्र पाया जाता है । लेकिन व्यवहारिक रूप से अप्रत्यक्ष लोकतंत्र पाया जाता है । सम्राट की शक्तियों का प्रधानमंत्री , मंत्रीमंडल , संसद व लोक सेवा प्रयोग करती है । राजा राज करता है शासन नहीं राजा स्वयं अपने कार्यों के प्रति उत्तरदायी नहीं रहता है , बल्कि राजा के कार्यों के लिए प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल उत्तरदायी होते है ।
ब्रिटेन में संवैधानिक राजतंत्र पाया जाता है ।
- गणतंत्र वादी लोकतंत्र :-
गणतंत्रवादी व्यवस्था वह है जिसमें राज्य के अध्यक्ष का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए किया जाता है उसे गणतंत्र वादी लोकतंत्र कहते हैं ।
अमेरिका में ऐसी ही गणतंत्र वादी व्यवस्था को अपनाया गया है ।
गणराज्य :-
जब राज्य का प्रधान वंशानुगत न होकर जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है तो उसे गणराज्य कहते हैं ।
लोकतंत्र की विशेषताएं या लक्षण :-
1. सर्वव्यापी लोकतंत्र -
लोकतंत्र में सर्वव्यापकता पाई जाती है । यह शासन व्यवस्था प्रत्येक नागरिक के भाग लेने , लोकतंत्र में भाग लेने व विश्वास रखने व्यक्तिगत स्वतंत्रता रखने , समान अवसर की उपलब्धि एवं जनता के सुख के लिए कार्य करती है । इसमें आम जनता की इच्छा ही संप्रभुता की प्रतीक मानी जाती है ।
2. वयस्क मताधिकार -
लोकतंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों में गुप्त मतदान प्रणाली के आधार पर जनता अपना मत देती है । जनता अपनी इच्छा अनुसार निर्भीक होकर मतदान करती है । लोकतंत्र में शासन चलाने के लिए उम्मीदवारों का चयन करने के लिए जनता अपने राजनीतिक अधिकारों का उपयोग करती है ।
3.विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता -
लोकतंत्र की आलोचना करने के लिए नागरिक अपने विचार स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त कर सकता है । शासन व शासक दोनों की आलोचना करने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता भी नागरिकों को प्राप्त होती है ।
4. सामाजिक व राजनीतिक समानता -
लोकतंत्र में सामाजिक व राजनीतिक समानता स्थापित की जाती है । इसमें कोई भी नागरिक छोटा या बड़ा नहीं होता है । कानून के समक्ष समानता स्थापित की जाती है । लोकतंत्र में सामाजिक समानता के अंतर्गत सद्भावना , भाई - चारे का विकास किया जाता है । यह किसी भी प्रकार का भेदभाव उत्पन्न नहीं करता। बल्कि समाज में जो असमानताएं हैं उसको कम करने का प्रयास करता है ।
5. मौलिक अधिकार व कर्तव्य :-
लोकतंत्र नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है । लोगों को घूमने - फिरने , निवास करने , निजी संपत्ति रखने , रोजगार चुनने , संघ - संगठन बनाने , धर्म को मानने आदि के संबंध में नागरिकों को समान मौलिक अधिकार दिए जाते हैं । यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है , तो वह न्यायालय की शरण लेकर अपने अधिकारों की रक्षा करता है । लोकतंत्र में नागरिकों के कुछ कर्तव्य भी निर्धारित किए गए हैं , जैसे सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा , राष्ट्रीय झंडे का सम्मान करना , भाईचारे की भावना का विकास व राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखना ।
6. लिखित संविधान -
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में एक लिखित संविधान होता है । जिसके द्वारा सभी की शक्तियों का बंटवारा कर दिया जाता है । केंद्र एवं राज्यों के मध्य जब कोई विवाद उत्पन्न होता है , तो संविधान के दायरे में उन विवादों का समाधान निकालने का प्रयास किया जाता है । संविधान के द्वारा शासन के अंग समान रूप से समान शक्तियों का प्रयोग करते हैं । कोई भी अंग एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता है ।
7. उत्तरदायित्व -
लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के सदन अर्थात संसद को जनता का प्रतीक माना जाता है । जो उम्मीदवार जनता द्वारा चुने जाते हैं । वे उम्मीदवार जनता के प्रति उत्तरदायित्व रखते हैं इसलिए लोकतंत्र उत्तरदायित्व प्रणाली का निर्वाह करता है । लोकतंत्र में जब कोई राजनीतिक दल या चुने हुए उम्मीदवार शासन करने के उत्तरदायित्व को निर्वाह करने में असफल रहते हैं तो जनता शांतिपूर्ण तरीके से निर्वाचन के माध्यम से बिना किसी हिंसा का प्रयोग करते हुए सत्ता परिवर्तन कर देती है ।
8. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका :-
लोकतंत्र में न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से कार्य करने के लिए स्थापित किया जाता है । लोकतंत्र में न्यायपालिका संविधान की रक्षा व नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने का कार्य करती है । यदि कार्यपालिका या संसद संविधान के दायरे से बाहर जाकर कानून बनाने का प्रयास करती है अथवा बना लेती है तो न्यायपालिका उसे अवैध या निरस्त घोषित कर देती है ।
9. बहुमत का शासन :-
लोकतंत्र चुनाव पर आधारित होता है । और चुनाव में जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है उसी को शासन करने का अधिकार प्राप्त होता है । शासन चलाने के लिए बहुमत दल के नेता द्वारा कार्यपालिका का गठन किया जाता है तथा बहुमत के आधार पर नीति निर्माण किया जाता है । बहुमत का शासन लोकतंत्र की कसौटी पर रखे जाने पर अनुचित भी सिद्ध होता है ।
लोकतंत्र के गुण :-
लोकतंत्र के गुण निम्नलिखित है -
1.जनहित :-
शासन के लिए जितने भी रूप विद्यमान है। उनमें लोकतंत्र ही ऐसा शासन है जिसका मूल आधार जनकल्याण माना जाता है । इस शासन व्यवस्था में सबके हित सुरक्षित रहते हैं । लोकतांत्रिक सरकार जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती है । ये प्रतिनिधि निश्चित समय के लिए चुने जाते हैं । वह अपने - अपने क्षेत्र में जनता की समस्याओं को सुनते हैं । क्योंकि अगले चुनाव में उन्हें जनता की अदालत में जवाब देना पड़ता है । अतः लोकतंत्र में शासन की नीतियों , कार्यक्रमों व आदेशों के माध्यम से सर्वसाधारण का अधिक से अधिक जनहित करने का प्रयास किया जाता है ।
2. नैतिकता का विकास :-
लोकतंत्र में नागरिकों में राष्ट्रीय चरित्र एवं नैतिकता का विकास होता है । राष्ट्र-प्रेम , देशभक्ति , त्याग , बलिदान , सेवा , सहनशीलता आदि गुणों का विकास नागरिकों को राष्ट्र से जोड़े रखने का प्रयास करता है । नैतिकता लोकतंत्र को भ्रष्ट होने से रोकती है । नैतिकता से नागरिकों में आत्मविश्वास की भावना जागृत होती है । अतः लोकतंत्र में अच्छे आदर्शों का संकल्प दोहराया जाता है ।
3.राजनीतिक प्रशिक्षण :-
लोकतंत्र नागरिकों को राजनीतिक प्रशिक्षण प्रदान करता है । लोकतंत्र सरकार नागरिकों को अधिकार देकर उन में प्रशासनिक कार्यों के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं , जिससे वे सरकार के कार्यों में भाग लेना चाहते हैं । स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से प्रारंभ से ही उन्हें राजनीतिक पद संभालने की शिक्षा मिलती है । लोकतंत्र में संचार के साधनों प्रेस व दूरदर्शन आदि का भी व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है । लोकतंत्र में राजनीतिक दल , राजनेता , दबाव समूह व संगठन भी सक्रिय रूप से कार्य करते हैं ।
4. क्रांति का अभाव -
लोकतंत्र में लोकतांत्रिक पद्धतियों को महत्व दिया जाता है । जनता के आपसी विवादों मनमुटाव झगड़े आदि हल करने के लिए लोकतांत्रिक पद्धतियों का ही सहारा लिया जाता है । इसमें हिंसा , खून - खराबा और असंवैधानिक तरीकों का प्रयोग वर्जित है । लोकतंत्र में यदि शासक वर्ग जनता पर लंबे समय तक अत्याचार करता है तो जनता लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता का परिवर्तन करती है अर्थात सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा का प्रयोग नहीं किया जाता है ।
5. सांस्कृतिक एकता :-
लोकतंत्र अनेक जातियों , समुदायों वर्गो व संगठनों के मध्य सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रयास करता है । लोकतंत्र सभी नागरिकों के हितों की रक्षा करता है । सभी के कल्याण के बारे में सोचता है । सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की बात ही सांस्कृतिक लोकतंत्र की स्थापना का आधार है । इसमें कला साहित्य व संस्कृति को समान दृष्टि से बरकरार रखने का प्रयास किया जाता है ।
6. जन सहयोग -
लोकतंत्र में जन सहयोग के बिना कोई कार्य संपन्न नहीं होता । जनता आर्थिक विकास के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करती है । राष्ट्र के रचनात्मक विकास एवं निर्माण के लिए श्रमदान करती है । लोकतंत्र जनता में जन - सहयोग की भावना उत्पन्न करने का एकमात्र साधन है । लोकतंत्र में राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करने के लिए जन - सहयोग की उम्मीद की जाती है ।
लोकतंत्र के दोष :-
1.राजनीति का राजनीतिकरण -
लोकतंत्र में जो राजनेता जिन आदर्शों व मूल्यों की स्थापना के लिए राजनीति में आता है । वह शासन व्यवस्था में आने के बाद राजनीतिकरण का शिकार हो जाता है । एक बार शासन व्यवस्था में आने के बाद शासन व्यवस्था से अलग नहीं होना चाहता है । वह जीवनपर्यंत लोकतंत्र से जुड़े रहना चाहता है । जनता के आदर्शों मूल्यों के लिए दिखावे का व्यवहार करता है , जबकि सार्वजनिक जीवन में वह सब कुछ करना चाहता है । ऐसी स्थिति में लोकतंत्र सबका नहीं होकर कुछ ही लोगों के हाथों में सिमट कर रह जाता है । लोकतंत्र में सार्वजनिक राजनीति के स्थान पर व्यक्तिकरण की राजनीति बढ़ती चली जाती है ।
2. व्यवहारिक समानता का अभाव :-
जिन देशों में लोकतंत्र की स्थापना हुई है उनमें
अधिकांश रूप से यह देखने को मिलता है कि व्यवहारिक रूप से उनमें सामाजिक समानता कायम नहीं रहती है । ऊच्च- नीच , गरीबी - अमीरी , वर्ग - संघर्ष , आर्थिक असमानताओं के कारण सामाजिक समानता कभी भी स्थापित नहीं होती है ।
3. अयोग्य व्यक्तियों का शासन -
अरस्तु ने लोकतंत्र को शासन का विकृत रूप मानते हुए इसे अयोग्य लोगों का शासन माना था । लोकतंत्र में जो व्यक्ति या नेता राजनीति में शामिल होते हैं । वे अयोग्य इसलिए माने जाते हैं क्योंकि उन्हें राजनीति का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं होता । मात्र साधारण योग्यता के आधार पर शासन व्यवस्था में शामिल अयोग्यता का सूचक है ।
लेकी के अनुसार - " लोकतंत्र में गुणों की अपेक्षा मतों की संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है । मत गिने जाते हैं , तोले नहीं जाते हैं । लोकतंत्र में शासन अज्ञानियों , अशिक्षितों एवं अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में होता है । यह भीड़ का शासन है ।
4. शासन में भ्रष्टता :-
लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल अपनी इच्छा अनुसार शासन करता है , इसलिए वह भ्रष्ट हो जाता है । जिस दल का शासन होता है वह अपने दल के व्यक्तियों को उच्च पदों पर आसीन करता है । शासन की प्रतिदिन के कार्यों में भी उन्हें भ्रष्ट व्यक्तियों का हाथ रहता है । यह भ्रष्टता यहीं तक सीमित न रहकर व्यवस्थापन विभाग तक पहुंच जाती है । विधायक भी दलीय हितों को ध्यान में रखकर कानूनों का निर्माण करता है ।
डॉ आशिर्वादम के अनुसार - "घूसखोरी और भ्रष्टाचार लोकतंत्र की सामान्य बुराइयां मानी जाती है ।"
5. जनता की उदासीनता :-
धीरे-धीरे लोकतंत्र में जनता उदासीनता का दृष्टिकोण अपनाने लगती है । इसका कारण यह है कि लोकतंत्र शब्दों के आडंबर का खेल सिद्ध होते चला जाता हैं । अनैतिकता बढ़ती जाती है । स्वार्थ और हितों की पूर्ति में नेता ही लोकतंत्र का वास्तविक लाभ प्राप्त करते हैं । तब जनता उदासीनता के दृष्टिकोण पर चलने लग जाती है क्योंकि आर्थिक समानता स्थापित नहीं होती है । वह अमीर व गरीब का अंतर बढ़ता चला जाता है ।
6. धन व समय का अपव्य्य :-
लोकतंत्र में धन व समय का बहुत अपव्यय होता है । इसमें कानून निर्माण की प्रक्रिया में बहुत समय बर्बाद हो जाता है । तथा चुनाव की प्रक्रिया में बहुत धन खर्च हो जाता है ।
7. दलीय व्यवस्था दोषपूर्ण -
लोकतंत्र में राजनीतिक दल दोषपूर्ण दलीय व्यवस्था को उत्पन्न करते हैं जैसे कहीं पर दो दलीय प्रणाली , तो कहीं पर बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है । राजनीतिक दल एक दूसरे से हमेशा ही असहयोग व संघर्ष की स्थिति में रहते हैं । राजनीतिक दलों का असहयोग लोकतंत्र की असफलता को बढ़ावा देता है ।
8. राजनीतिक तंत्र :-
लोकतंत्र बहुसंख्यक जनता पर अल्पसंख्यकों का शासन माना जाता है । चुनाव में शासन चलाने के लिए जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अल्पसंख्यक होते हैं , क्योंकि लोकतंत्र में पेशेवर राजनीतिज्ञ ही शासन में रहते हैं । ये ही निरंतर शासन चलाने का प्रयास करते हैं ।
हर्टमान ने लिखा है - "शोर मचाने वाले , गप्पियों , बातों में बात निकालने वालों , चापलूसों एवं अमीरों के प्रशंसकों के लिए लोकतंत्र स्वर्ग है ।
लोकतंत्र की सफलता की शर्तें :-
लोकतंत्र का महत्व बढ़ाने के लिए इस को सफल बनाया जाना आवश्यक है तभी लोकतंत्र की सार्थकता सिद्ध होती है । इसके लिए निम्न आवश्यक बिंदु इस प्रकार हैं -
1. शिक्षा का प्रचार और प्रसार -
देश में जब शत-प्रतिशत जनता शिक्षित होगी तो उसमें लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा व विश्वास की भावना उत्पन्न होगी । राष्ट्र के अंतर्गत अनिवार्य रूप से शिक्षा व्यवस्था लागू होनी चाहिए । शिक्षा ग्रहण करने से जीवन के मूल्यों , आदर्शों , विश्वासों में परिवर्तन आता है । शिक्षा जाति , धर्म व संप्रदाय से ऊपर उठकर मानवता से जोड़ने का प्रयास करती है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा का प्रसार कर लोकतंत्र को सफल बनाया जा सकता है । शिक्षा से अधिकारों के प्रति नागरिकों की समझ उत्पन्न होती है ।
2. राजनीतिक चेतना -
लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता का होना आवश्यक है । लोकतंत्र में नागरिक जागरूकता से तात्पर्य है कि चुनाव में जनता अपने विवेक से निर्णय लेकर मतदान के माध्यम से ही योग्य उम्मीदवार को ही शासन के लिए चुने । साधारण से साधारण नागरिक राजनीति एवं शासन में अपनी भूमिका समझे । इसमें सहयोगपूर्ण रवैया अपनाते हुए अपना विचार अभिव्यक्त करें , जनमत तैयार करें तथा जनता के निर्णयों में सहभागिता का निर्वाह करें तभी लोकतंत्र सफल हो सकता है । जनता उदासीनता के दृष्टिकोण का परित्याग करें , नेताओं के व्यवहार व भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखने के लिए यह आवश्यक है कि जनता सार्वजनिक नैतिकता का पालन करें । जनता का प्रभाव नेताओं पर भी पड़ना चाहिए ताकि जनता के नियंत्रण में रहकर शासन चलाने के लिए नेताओं को बाध्य किया जा सके ।
3. आर्थिक लोकतंत्र :-
आर्थिक लोकतंत्र के अभाव में राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा माना जाता है । नागरिकों में आर्थिक समानता रोजगार के पर्याप्त उपलब्धता गरीबी और अमीरी वेतन की समानताएं एवं पदों की समानताएं आर्थिक लोकतंत्र की पूर्व शर्त है । आर्थिक विषमताओं में लोकतंत्र सफल नहीं हो पाता है । इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि जिस तरह राजनीतिक लोकतंत्र में व्यक्ति को अधिकार प्राप्त है उसी तरह आर्थिक स्वतंत्रता ही होनी चाहिए तब ही लोकतंत्र सच्चे अर्थों में सफल हो सकता है ।
4. राजनीति आचार संहिता -
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाओं में प्राय देखा जाता है कि राजनीतिक दल एवं राजनीतिज्ञ राजनीतिक आचार संहिता का पालन नहीं करते । लोकतंत्र की सफलता के लिए इसका पालन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए । आचार संहिता की मुख्य बातें लोकतंत्र में ईमानदार व चरित्रवान नेताओं का होना तथा नैतिकता राजनीतिक परंपराओं और मर्यादाओं का विशेष रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए । पद व धन के लालच में इनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए । नेताओं को दल एवं शासन के लिए कार्य करने की इच्छा होनी चाहिए । व्यक्तिगत लाभ एवं संपत्ति संग्रह की भावना से ऊपर उठकर लोकतंत्र की सफलता के लिए समर्पित होना चाहिए ।
5. प्रजातंत्र के प्रति समर्पण -
राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक में देश प्रेम की भावना उच्च कोटि की होनी चाहिए । लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाओं में प्राय देखा जाता है कि जिस पीढी के द्वारा इसकी स्थापना की जाती है इसके पश्चात आगे आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र के प्रति समर्पित में होकर विघटनकारी व अलगाववादी शक्तियों को जन्म देने लगती है । यह नागरिकों को व राष्ट्र के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए भी घातक सिद्ध होता है ।