सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 सिद्धांत और व्यवहार भारत में लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन कीजिए ?
सूचना का अधिकार अधिनियम - 2005 :-
भूमिका :-
15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद भारत ने 26 जनवरी 1950 में अपना संप्रभुता संपन्न गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक संविधान लागू किया । भारत को पारदर्शी शासन प्रणाली के प्रभाव में आने में तकरीबन 55 साल लग गए हैं । औपनिवेशिक आधिकारिक राज अधिनियम द्वारा वैद्य नागरिक सूचना अधिकार की मांग कर सकता है । सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का अधिनियम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है । नागरिकों तक सूचना की अधिक पहुंच के लिए सरकार की सामुदायिक आवश्यकताओं के प्रति जवाबदेही अधिक होगी । संविधान में व्यक्तियों और नागरिकों के लिए तीसरे भाग में मौलिक अधिकारों का प्रावधान था किंतु इन मौलिक अधिकारों में सूचना का अधिकार शामिल नहीं था । यह सच्चाई थी कि उस समय दुनिया के विकसित पूंजीवादी लोकतांत्रिक देशों में भी सिर्फ एक दो देशों में ही नागरिकों को सूचना का अधिकार प्राप्त था । " यूरोप का स्वीडन पहला देश था जिसने सबसे पहले नागरिकों को सूचना का अधिकार दिया था "। लेकिन उपनिवेशवाद से जर्जर अर्थव्यवस्था , अशिक्षा , गरीबी से ग्रस्त भारत की विशाल जनसंख्या में संविधान निर्माताओं ने नागरिकों के लिए सूचना के अधिकार का तब तक कोई महत्व नहीं समझा । किंतु जैसे - जैसे एक ओर शिक्षकों की संख्या बढ़ी और मध्यम वर्ग का आकार बढ़ा तथा दूसरी ओर शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के अभाव के परिणामस्वरुप भ्रष्टाचार बढ़ा । तब नागरिक समाज से नागरिकों के लिए सूचना के अधिकार की मांग उठने लगी । सूचना के अधिकार की मांग को लेकर एनसीपीआरआई (NCPRI)जिसका गठन 1996 में हुआ , और आंदोलन किया । मजदूर किसान शक्ति संगठन तथा कॉमन कॉज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । यही कारण है कि अंततः आजादी के 58 वर्षों के बाद संसद ने 15 जून 2005 को सूचना के अधिकार का विधेयक पारित किया जो 12 अक्टूबर 2005 को सूचना अधिकार अधिनियम 2005 , के रूप में उस समय जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर शेष भारत में लागू हुआ था । वर्तमान में यह अधिकार भारत के सभी राज्यों में लागू है ।
सूचना के अधिकार अधिनियम के मुख्य प्रावधान :-
इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत भारत का कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी प्राधिकरण से सूचना प्राप्त करने हेतु अनुरोध कर सकता है ।
यह सूचना 30 दिनों के अंदर उपलब्ध कराई जाने की व्यवस्था की गई है ।
यदि मांगी गई सूचना जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है तो ऐसी सूचना को 48 घंटे के भीतर ही उपलब्ध कराने का प्रावधान है ।
इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने दस्तावेजों का संरक्षण करते हुए उन्हें कंप्यूटर में सुरक्षित रखेंगे ।
प्राप्त सूचना की विषय वस्तु के संदर्भ में असंतुष्टि , निर्धारित अवधि में सूचना प्राप्त न होने आदि जैसी स्थिति में स्थानीय से लेकर राज्य एवं केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की जा सकती है ।
इस अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , प्रधानमंत्री , संसद में राज्य विधानमंडल के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय , उच्च न्यायालय , नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक निकायों व उनसे संबंधित पदों को भी सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया गया है ।
इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र स्तर पर एक मुख्य सूचना आयुक्त और 10 या 10 से कम सूचना आयुक्तों की सदस्यता वाले एक केंद्रीय सूचना आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है ।
इसी के आधार पर राज्य में भी एक राज्य सूचना आयोग का गठन किया गया है ।
यह अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू है इसके अंतर्गत सभी संवैधानिक निकाय संसद अथवा राज्य विधानसभा के अधिनियम द्वारा गठित संस्थान और निकाय शामिल है । राष्ट्र की संप्रभुता , एकता - अखंडता , सामरिक हितों आदि पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली सूचनाएं प्रकट करने की बाध्यता में मुक्ति प्रदान की गई है ।
सूचना प्राप्त की प्रक्रिया :-
A.आप सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत किसी प्राधिकरण ( सरकारी संगठन या सरकारी सहायता प्राप्त गैर सरकारी संगठनों ) से सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।
B. आवेदन हस्तलिखित या टाइप किया होना चाहिए । आवेदन प्रपत्र भारत विकास प्रवेशद्वार पोर्टल से भी डाउनलोड किया जा सकता है । आवेदन प्रपत्र डाउनलोड संदर्भित राज्य की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते हैं ।
3. आवेदन अंग्रेजी , हिंदी या अन्य प्रादेशिक भाषाओं में तैयार होना चाहिए ।
अपने आवेदन में निम्न सूचनाएं दे -
1.सहायक लोक सूचना अधिकारी / लोक सूचना अधिकारी का नाम व उसका कार्यालय पता ,
2. विषय : सूचना का अधिकार अधिनियम - 2005 की धारा 6(1) के अंतर्गत आवेदन
3. सूचना का ब्यौरा , जिसे आप लोक प्राधिकरण से प्राप्त करना चाहते हैं ,
4. आवेदनकर्ता का नाम , पिता / पति का नाम , आवेदन शुल्क
5. क्या आप गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवार से आते हैं - हां /नहीं
6. मोबाइल नंबर व ई-मेल पता ( मोबाइल तथा ईमेल पता देना अनिवार्य नहीं )
7. पत्राचार हेतु डाक पता
8. स्थान तथा तिथि , आवेदनकर्ता के हस्ताक्षर ,
9. संलग्नकों को की सूची
10. आवेदन जमा करने से पहले लोक सूचना अधिकारी का नाम , शुल्क , उसके भुगतान की प्रक्रिया आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर लें ।
11. सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना प्राप्त करने हेतु आवेदन पत्र के साथ शुल्क भुगतान का भी प्रावधान है । परंतु अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति या गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के सदस्यों को शुल्क जमा नहीं करने की छूट प्राप्त है ।
12. जो व्यक्ति शुल्क में छूट पाना चाहते हों उन्हें अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / बीपीएल प्रमाणपत्र की छायाप्रति जमा करनी होगी ।
13. आवेदन डाक द्वारा या ईमेल के माध्यम से भेजा जा सकता है ।
14. यदि आप आवेदन डाक द्वारा भेज रहे हैं तो उसके लिए केवल पंजीकृत डाक सेवा का ही इस्तेमाल करें । संदेशवाहक सेवा का प्रयोग कभी न करें ।
15. आवेदन ईमेल से भेजने की स्थिति में जरूरी दस्तावेज का स्कैन कॉपी अटैच कर भेज सकते हैं । लेकिन शुल्क जमा करने के लिए आपको संबंधित लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाना पड़ेगा । ऐसी स्थिति में शुल्क भुगतान करने की तिथि से ही सूचना आपूर्ति के समय की गणना की जाती है ।
16. आगे उपयोग के लिए आवेदन पत्र ( अर्थात मुख्य आवेदन प्रपत्र , आवेदन शुल्क का प्रमाण , स्वयं या डाक द्वारा जमा किए गए आवेदन की पावती ) की 2 फोटोप्रति बनाएं और उसे सुरक्षित रखें ।
17. यदि अपना आवेदन स्वयं लोक प्राधिकारी के कार्यालय जाकर जमा कर रहे हों , तो कार्यालय से पावती पत्र अवश्य प्राप्त करें जिस पर प्राप्ति की तिथि तथा मुहर स्पष्ट रूप से अंकित हों । यदि आवेदन रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज रहे हो तो पोस्ट ऑफिस से प्राप्त रसीद अवश्य प्राप्त करें और उसे संभाल कर रखें ।
18. सूचना आपूर्ति के समय की गणना लोक सूचना अधिकारी द्वारा प्राप्त आवेदन की तिथि से आरंभ होती है ।
वांछित जानकारी उपलब्ध नहीं कराने पर जुर्माना :-
यदि कोई उचित कारण के बिना , संबंधित अधिकारी सूचना के लिए एक आवेदन पत्र प्राप्त करने से इनकार करता है या निर्दिष्ट समय के भीतर जानकारी को प्रस्तुत नहीं करता है या गलत तरीके से सूचना के अनुरोध को अस्वीकार करता है या जानबूझकर गलत अधूरी या भ्रामक जानकारी दी जाती है या नष्ट कर दी जाती है और सूचना प्रस्तुत करने में किसी भी तरीके से अनुरोध या बांधा , आवेदन प्राप्त होने तक प्रत्येक दिन 250 ₹ का जुर्माना या जानकारी दी गई है इसलिए इस तरह के दंड की कुल राशि ₹25000 से अधिक नहीं होगी और संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है ।
सूचना के अधिकार अधिनियम के उद्देश्य -
1. पारदर्शिता लाना2. जवाबदेही तय करना
3. नागरिकों को सशक्त बनाना
4. भ्रष्टाचार पर रोक लगाना
5. लोकतंत्र की प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना
सूचना का अधिकार चुनौतियां :-
सूचना का अधिकार जहां व्यक्ति को सशक्त करता है वही उसके पालन क्रियान्वयन में असंख्य मुश्किलें भी आती है ।1. जागरूकता की कमी -
एक सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों में से मात्र 15% ही सूचना के अधिकार अधिनियम के बारे में जानते थे । सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आई थी कि अधिकतर लोगों को इस बारे में यहां तो मीडिया से पता चला या फिर किसी अन्य व्यक्ति से जानकारी मिली । इसका अर्थ यह हुआ कि सूचना के अधिकार संबंधी जागरूकता को लेकर उसकी नोडल एजेंसी का कार्य काफी सीमित है ।
2. प्रदान की जाने वाली सूचना की खराब गुणवत्ता -
सूचना के अधिकार का दाखिल करने वाले 75% कार्यकर्ता प्राप्त सूचना से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते हैं । आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के क्रमशः 91 और 96 प्रतिशत याचिकाकर्ताओं ने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त सूचना के संबंध में असंतुष्टि जाहिर की है । साथ ही कई याचिकाकर्ताओं ने अनावश्यक जानकारी प्राप्त होने की बात भी स्वीकार की है ।
3. समय पर सूचना प्राप्त नहीं होना :-
अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी सामान्य परिस्थिति में सूचना को 30 दिनों के भीतर प्रदान करना आवश्यक है परंतु उपरोक्त सर्वेक्षण में सामने आया कि सूचनाओं के कुप्रबंधन के कारण 50% याचिकाकर्ताओं को इस अवधि के भीतर आवश्यक सूचना प्राप्त नहीं होती है ।
सूचना का अधिकार समस्याएं :-
2005 में इस अधिनियम के लागू होने के बाद ऐसा लगा कि सरकार की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के नए युग की शुरुआत हुई है ।
एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 40लाख से 60 लाख सूचना अधिकार के तहत आवेदन द्वारा जानकारी मांगी जाती है किंतु लगभग 45% लोगों को ही अपेक्षित सूचनाएं मिल पाई है । अर्थात आधे से ज्यादा लोगों को सूचना नहीं मिलती इतना ही नहीं उसमें से 10% लोग ही अपील करते हैं ।
सूचना के उन अधिकारियों के विरुद्ध जो नागरिकों को अधिनियम के अनुसार सूचना नहीं देते हैं उनके विरुद्ध भी उचित कार्रवाई नहीं होती है ।
केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य की सूचना आयोग में समय पर नियुक्ति न होने से नागरिकों के अपीलों पर यथा समय सुनवाई भी नहीं होती है और परिणाम स्वरूप अपीलों के आवेदन का अंबार लगा है ।
सूचना अधिकार अधिनियम को गुड गवर्नेंस के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया था और यह अपेक्षा थी कि नागरिकों को अपेक्षित सूचना मिलने से शासन के प्रति उनमें विश्वास बढ़ेगा और यह शासन की वैधता को बढ़ाने वाला कारगर कदम होगा किंतु सरकार से मांगी गई सूचनाओं के ना मिलने से नागरिकों में यह संदेश भी जाता है कि सरकार ने लोक दबाव में तो सूचना का अधिकार अधिनियम तो बनाए हैं किंतु निरंतर ऐसी कोशिश होती है कि सूचना आयोग के निर्णय को विवादों या न्यायालयों
में उलझा कर रखा जाए ।
सूचना अधिकार के तहत राजनीतिक दलों के आय के संबंध में नागरिकों के द्वारा जानकारी मांगे जाने पर राजनीतिक पार्टियों का नजरिया नकारात्मक रहा है ।
रिजर्व बैंक द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के तहत नागरिकों के द्वारा सूचना मांगे जाने पर रिजर्व बैंक का उत्तर नकारात्मक व्यवहार सामने आया है और यह कहकर सूचना देने से इनकार करना कि ऐसी सूचना देना देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए उचित नहीं है इतना ही नहीं जब केंद्रीय सूचना आयोग ने बैंकों के कर्ज न चुकाने वालों की सूची रिजर्व बैंक से मांगी तो रिजर्व बैंक न्यायालय चली गई और अंततः सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही रिजर्व बैंक ने सूची जारी कीं ।
सर्वोच्च न्यायालय का भी सूचना अधिकार अधिनियम के संबंध में मुकदमों में कई बार बहुत सकारात्मक रुख नहीं रहा है ।
सूचना आयोगों के पास आधारभूत सुविधाओं की कमी तथा पर्याप्त कर्मचारियों का भी ना होना सूचना अधिकार के संबंधित अपीलों के निष्पादन में व्यवधान पैदा करते हैं ।
नागरिकों के द्वारा अकारण सूचना मांगना और अनावश्यक सूचनाएं मांगने के कारण भी सूचना आयोगों के ऊपर कार्यभार बढ़ता है जो सूचना अधिकार की उपयोगिता पर सवाल खड़ा करता है ।
इन सबके अलावा सूचना अधिकार का जनहित में प्रयोग करने वाले कार्यकर्ताओं को धमकी मिलना और उन पर निरंतर जानलेवा हिंसक आक्रमण होने की घटनाएं भी चिंता की बात है । 2020 तक 86 लोगों की जान जा चुकी है ।
25 जुलाई , 2019 को संसद ने सूचना के अधिकार संशोधन विधेयक 2019 पारित किया । केंद्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त तथा अन्य सदस्यों के कार्यकाल में कमी करना तथा उनकी सेवा शर्तो में परिवर्तन से सूचना आयोग की कार्यक्षमता तथा स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है ।
सूचना आयोग में पूर्व नौकरशाहों की बढ़ती उपस्थिति भी कार्यपालिका के द्वारा नागरिकों को दी जाने वाली सूचनाओं के लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि नौकरशाही सूचना अधिकार के प्रति सामान्यत संवेदनशील नहीं जाती है जो सरकार को मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों सहित वैधानिक निकाय प्रमुख और उसके सदस्यों के वेतन और सेवा शर्ते तय करने का अधिकार देता है ।
राजनीतिक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि सरकार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों को धमकाने या लालच दे सकती है और सत्तारूढ़ वितरण के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर वेतन में वृद्धि या कटौती कर सकती है ।
सूचना के अधिकार के अंतर्गत नागरिक कुछ भी जानकारी सरकार से मांग सकते हैं जो सरकार संसद में बता सकती है । किंतु आंतरिक सुरक्षा , विदेशी देशों के साथ संबंधों , बौद्धिक संपदा अधिकारों , संसदीय विशेषाधिकारो के उल्लंघन और जांच में बाधा डालने वाली सूचनाओं को जनता के साथ साझा नहीं किया जा सकता है । जब तक कोई निर्णय लागू नहीं हो जाता है तब तक कैबिनेट के कागजात साझा नहीं किए जा सकते हैं । हालांकि मंत्रिमंडल के भीतर चर्चा का भी खुलासा नहीं किया जाता है ।
सूचना का अधिकार और लोकतंत्र :-
सूचना का अधिकार लोकतांत्रिक
व्यवस्था में ऐसा नागरिक अधिकार है जो न सिर्फ नागरिक शासन में भागीदारी
सुनिश्चित करता है बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली एवं विधि निर्माण प्रक्रिया
में भी पारदर्शिता लाता है । जो अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन और
प्रशासन दोनों को ही जनता के प्रति जिम्मेदार बनाता है । तंत्र पर लोग
अंकुश वह मंत्र है जो लोकतंत्र में सत्ता पर लोक संप्रभुता की सैद्धांतिक
स्थापना करता है । लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक
कितने सजग और सक्रिय होकर राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी करते हैं।
नागरिकों में अधिकारों के प्रति चेतना और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए
कितनी प्रतिबद्धता है , साथ ही शासन तथा प्रशासन की कार्यप्रणाली की कितनी
जानकारी है । यद्यपि विभिन्न संचार माध्यमों से नागरिकों को सूचना मिलती है
किंतु सरकार के कार्यालयों में कार्य कैसे होता है । लालफीताशाही के कारण
नागरिकों के कार्यों में निर्णय लेने में विलंब क्यों होता है , साथ ही
सरकारी सेवा में कर्मचारी के उत्तरदायित्व का अभाव ऐसे कारण हैं जिनके विषय
में जानकारी बिना सूचना के अधिकार के संभव नहीं है । सरकार के द्वारा किए
गए जनकल्याण के कार्यों में विलंब और भ्रष्टाचार ऐसे कारण हैं जिनके कारण
जनता तक कल्याण के कार्य का अपेक्षित फायदा नहीं पहुंचता है । नागरिकों की
निरक्षरता का फायदा लेकर ठेकेदारों द्वारा उन्हें कार्य के बदले उचित
पारिश्रमिक नहीं देना और नौकरशाहों द्वारा ऐसे ठेकेदारों को संरक्षण देना
प्राय आम बात हो गई है । धीरे-धीरे नागरिक समाज के क्षेत्र में काम करने
वाले गैर सरकारी संगठनों को लगने लगा है कि अब एक ऐसे अधिकार की जरूरत है
जो नागरिकों को सरकार और किसी लोक अधिकारी से सीधे सवाल पूछ कर जानकारी
मांगने का अधिकार विधि के द्वारा दें ।
राजस्थान के मजदूर किसान शक्ति
संगठन में इस अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन प्रारंभ कर दिया और धीरे-धीरे
इस आंदोलन के कारण कुछ राज्य सरकारों जिसमें गोवा , कर्नाटक , असम ,
मध्यप्रदेश आदि ने सूचना के अधिकार को विधि बनाया । किंतु जब तक केंद्र के
द्वारा कोई विधि नहीं बनता तब तक सूचना का अधिकार एक राष्ट्रव्यापी अधिकार
नहीं बनता । यही कारण है कि 21वीं शताब्दी के प्रारंभ 2002 में एक विधि
सेंट्रल फ्रीडम ऑफ इनफॉरमेशन एक्ट बना फिर उसे हटाकर अंततः संसद ने सूचना
का अधिकार अधिनियम 2005 में पारित कर दिया ।
सूचना का अधिकार सरकार के कार्य में पारदर्शिता तथा कार्य करने वाले की जिम्मेदारी तय करने का साधन है ।
सूचना
का अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य - नागरिक सशक्तिकरण , सरकार की
कार्यप्रणाली में पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करना तथा
सरकारी अधिकारियों में भ्रष्टाचार को समाप्त करना है । ताकि लोकतंत्र में
लोकहित को प्रमुखता मिले । लोकतंत्र में सूचित नागरिक ही एक सजग और सक्रिय
नागरिक बन सकता है जिससे की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार अपने नागरिकों
के प्रति अधिक जिम्मेदार बन सके ।