जातिवाद क्या है ? What is racism? भारतीय राजनीति में जातिवाद का क्या योगदान है ?

जातिवाद क्या है ? What is racism?  भारतीय राजनीति में जातिवाद का क्या योगदान है ?


जातिवाद का अर्थ

जब एक वर्ग पूर्णत है अनुवांशिकता पर आधारित होता है तो हम उसे जाति कहते हैं जाति एक ऐसा सामाजिक समूह होता है जो दूसरों से अपने आपको अलग मानता है जिसकी अपनी अपनी विशेषताएं होती है अपनी परिधि में ही वैवाहिक संबंध करते हैं इनका कोई एक परंपरागत व्यवसाय होता है |


 अपनी जाति के प्रति उग्र लगाओ की भावना को जातिवाद कहते हैं अर्थात व्यक्ति को अपनी जाति के प्रति अत्यधिक लगाओ अपने आप को अन्य जातियों से पूर्णतया अलग समझने की प्रवृत्ति प्रशासन एवं राजनीति में भी जाति के आधार पर आचरण ही जातिवाद कहलाता है|

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका -

 भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका महत्वपूर्ण है इस संदर्भ में जयप्रकाश नारायण ने कहा था "जाति  भारत की एक अत्यधिक महत्वपूर्ण दल है |''

भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका को निम्न रूप में देखा जा सकता है -


 

1. निर्णय प्रक्रिया में जाति भूमिका -

 भारत में जाति पर आधारित संगठन संगठन शासन की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं अनुसूचित जाति व जनजाति के संगठनों को प्राप्त आरक्षण की समय सीमा को मिटाना चाहते हैं जिन जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ पे प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रही है कुछ जातियां अपने आप को आरक्षित जातियों की सूची में शामिल करने के लिए प्रयत्नशील है अतः सभी जातियां अपनी अपनी मांगों को मनवाने के लिए विभिन्न प्रकार से शासन को प्रभावित करने का प्रयास करती है जातीय संगठन अपने हितों के अनुसार निर्णय करने तथा अपने हितों के प्रतिकूल होने वाले निर्णय को रोकने के लिए निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं |

2. राजनीतिक दलों में जातिगत आधार पर प्रत्याशियों का निर्णय -

 राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों का चयन करते समय जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर निर्णय करते हैं जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुल्य होता है वहां उसी जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने  का प्रयास किया जाता है कई बार क्षेत्र विशेष में दो दलों द्वारा चयन करने के बाद भी श्रद्धा क्षेत्र में दूसरे स्थान पर आने वाली जाति की उम्मीदवार को उतारता है ताकि पहले दो के वोट पड़ने का लाभ तीसरे प्रत्याशी को मिल सके भारत में लगभग सभी राजनीतिक दल लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चुनाव करते समय जातिगत आधार पर निर्णय लेते हैं|

3.जातिगत आधार पर मतदान व्यवहार -

 भारत में चुनाव अभियान में प्रत्याशी किस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहा है उस निर्वाचन क्षेत्र में जातिवाद की भावनाओं को उभार कर संबंधित प्रत्याशी के जाति के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है

4. मंत्रिमंडल के निर्माण जातिगत प्रतिनिधित्व -


सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में बनाए रखें तो मत प्राप्त होने पर सरकार निर्माण के लिए मंत्रिमंडल का निर्माण करते समय दी जाति संतुलन का विशेष ध्यान रखा जाता है केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार यहां तक कि स्थानीय सरकार तक दायित्व प्रदान करते हैं समय जातिगत लाभ हानि को ध्यान में रखा जाता है

5. जातिगत दबाव समूह-

 जातीय संगठन राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव समूह के रूप में कार्य करते हैं अपने जाति के हितों के अनुसार निर्णय करने एवं जाति हितों के विरुद्ध होने वाले निर्णयों को रोकने या बदलते हुए नीतियों पर सरकार पर दबाव डालते हैं आरक्षण से वंचित जातियों के संगठन आरक्षण को बनाए रखने हेतु सरकार पर निरंतर दबाव डालते रहते हैं अनेक जातियां संगठन और समुदाय जैसे तमिलनाडु में ना डर जाती संघ गुजरात में छत्रिय महा समूह और बिहार में कार्यरत सभा आदि अपने-अपने संगठित बल के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी भी करते हैं

6. जाति एवं प्रशासन -

भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं के अलावा प्रशासन में भी जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गई है अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों को भी 27% आरक्षण दिया गया है सामान्यतः यह माना जाता है कि भारत में स्थानीय स्तर की प्रशासनिक अधिकारी निर्णय करते समय क्षेत्र की प्रधान एवं संगठित जातियों के नेताओं से प्रभावित हो जाते हैं जाति के आधार पर आरक्षण की मांग की जा रही है वर्तमान में हरियाणा राजस्थान गुजरात में विभिन्न जातीय संगठन साथी के आधार पर आरक्षण की मांग कर रही हैं

7. राज्य राजनीति में जाति -

केंद्रीय राजनीति की बजाय राज्य की राजनीति में भी जाति की ज्यादा सक्रिय भूमिका रहती है उत्तर प्रदेश बिहार तमिलनाडु केरल आंध्र प्रदेश राजस्थान आदि की राजनीति का विश्लेषण बिना जातिगत की गणित की बिना किया ही नहीं जा सकता उत्तर प्रदेश इन बिहार में तो जातिगत राजनीति की मिसाल बन चुके |

8. चुनाव प्रचार में जाति का सहारा -

 राजनीतिक दल एवं उम्मीदवार चुनाव प्रचार में जाति का खुलकर प्रयोग करता है चुनाव के समय जातीय समीकरण बढ़ाए जाते हैं प्रत्येक राजनीतिक दल क्षेत्र विशेष में किस जाति का बाहुल्य है उसमें उसी जाति के बड़े नेता को चुनाव प्रचार हेतु भेजने का प्रयास करते है । 

■  जातिगत राजनीति की विशेषताएं - 



● जातीय सबको तथा संगठनों में जातिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बढ़ाया है जातीय नेतृत्व में जातीय हितों के मुद्दों को उठाकर जाति से अपना समर्थन उठाकर राजनीतिक लाभ उठाते हैं |


● शिक्षा शहरी औद्योगीकरण तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद जातिवाद की भावना एकीकृत को बल मिला है |


● क्षेत्र विशेष में कोई जाति विशेष राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली एवं शक्तिशाली होती है |


● जाति की राजनीति करण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर छाती का राजनीतिकरण हो रहा है |


 ■ जातिवाद के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव को स्पष्ट कीजिए -

◆ सकारात्मक प्रभाव ◆

● जातिवाद से लोगों की सामाजिकता एवं एकता की भावना का विकास होता है |


● जाति एवं राजनीति के संबंधों में लोगों को एकता के सूत्र में बांधने का काम किया है दूर-दूर रहने वाले लोग जातीय पंचायती में एक दूसरे के संपर्क में आते हैं |


 ● जाति की राजनीति में अधिक लोगों को राजनीतिक सक्रिय पैदा की गई साथियों संगठन में सक्रिय लोग राजनीति में भी सक्रिय हो जाते हैं |


 ● जातिवाद के कारण सामाजिक संरचना में परिवर्तन आया है |


●  जाति की राजनीति ने समाज की संस्कृति को प्रभावित किया समाज की सभी जातियों की खान पान रहन सहन विश्व पशु आहार विचार में निम्न जातियों उनसे जातियों का अनुसरण करती है इससे समाज में सांस्कृतिक एकता की स्थापना होती है |

 ◆ नकारात्मक प्रभाव ◆

 ● जाति के आधार पर चुनाव लड़ना एवं जातिगत आग्रह के आधार पर मतदान कसना जातिवाद का ही परिणाम है |
 ● जातिवादी भावना के कारण नागरिकों की श्रद्धा घट जाती है लोग शब्द हितों की बजाए जाती हो जाती है |

 ● जातिवादी सोच रूढ़िवादिता को बढ़ावा देती है जिसमें वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं हो पाया |

● जातिवाद के कारण सरकारी बड़ी शक्तिशाली ने जातीय संगठनों के दबाव में कार्य करती है |

● जातिवाद स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की मूल्यों को नुकसान पहुंचाता है समाज में फूट संकीर्ण हितों को जातिवाद से समाज में संघर्ष बनिया की भावना उत्पन्न हो जाती है ।


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