जीन जैक्स रूसो का राजनीतिक दर्शन में योगदान | Contribution of Jean-Jacques Rousseau to Political Philosophy

जीन जैक्स रूसो का राजनीतिक दर्शन में योगदान( Contribution of Jean-Jacques Rousseau to Political Philosophy)

रूसो का महत्त्व और योगदान(Importance and Contribution of Rousseau)


रूसो का राजनीतिक दर्शन में इतिहास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसे फ्रांस की क्रान्ति का अग्रदूत और आवारा मसीहा कहा जाता है। जी. डी. एच. कोल ने उसे 'राजदर्शन का पिता' कहा है। रूसो महान् विचारों का महान् भविष्यवक्ता है। उनकी प्रतिभा सर्वव्यापी थी और उसे आधुनिक युग में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। आधुनिक युग के सभी महान् राजनीतिक विचारों की उत्पत्ति किसी न किसी रूप में रूसो में पाई जाती है। समाजवाद, लोकतन्त्र, सर्वसत्तावाद, उपयोगितावाद एवं आदर्शवाद जैसे आधुनिक विचार रूसो की ही देन हैं। इसलिए उन्हें आधुनिक युग का सबसे प्रभावशाली विचारक माना जाता है। वेपर के अनुसार- "उसने राजनीतिक शिक्षा, धर्म एवं साहित्य के क्षेत्र में अपनी सुद ढ़ तथा मौलिक प्रतिभा की छाप छोड़ी है।” लैन्सन के अनुसार- "वह आधुनिक युग की ओर जाने वाले प्रत्येक द्वार पर उपस्थित है।" प्रो. डनिंग के अनुसार- "रूसो के चिन्तन ने जनता को माण्टेस्क्यू को संतुलित तर्क तथा गम्भीर पर्यवेक्षण की अपेक्षा अधिक प्रभावित किया है।" इस प्रकार रूसो का राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में बहुत महत्त्व है।

यद्यपि रूसो का चिन्तन विरोधाभासी व अस्पष्ट है, फिर भी रूसो ने राजनीतिशास्त्र को महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त दिए हैं। उनके दर्शन में अधिनायकवाद और रुमानी तत्त्वों का समावेश होने के बावजूद भी उसके महत्त्व को कम नहीं आंका जा सकता।  
 
उसकी राजनीतिक दर्शन को महत्त्वपूर्ण देन निम्नलिखित हैं :-

1. सामान्य इच्छा का सिद्धान्त यह रूसो की सबसे अधिक मौलिक देन है। सामान्य इच्छा सिद्धान्त ने राजनीतिक जीवन में 'समुदाय' के महत्त्व की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। काण्ट, ग्रीन तथा बोसांके ने रूसो के सामान्य इच्छा सिद्धान्त को अपना आधार बनाया हीगल की 'निरपेक्ष आत्मा का विचार रूसो के दर्शन पर ही आधारित है।

2. लोकप्रिय सम्प्रभुता का विचार जनता की प्रभुसत्ता सम्बन्धी सिद्धान्त रूसो का मौलिक विचार है। रूसो से पहले भी हॉब्स ने इस विचार को प्रस्तुत किया था, लेकिन उन्होंने राजा या शासन की प्रभुसत्ता की ही बात सोची थी। रूसो से पहले किसी विचारक ने सारी जनता को या सामान्य इच्छा को प्रभुसत्ता नहीं माना। सम्प्रभुसत्ता को स्थापित करके लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का शिलान्यास किया। रूसो ने घोषणा की "जनवाणी देववाणी के सद श हैं।" रूसो ने शासन का आधार जनता की सहमति को बताकर प्रजातान्त्रिक विचारों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार रूसो जनता की प्रभुता के विचार को सामान्य रूप में जनता तथा विशेष रूप में बुद्धिजीवियों के निकट लाए।

3. राष्ट्रवाद का प्रणेता रूसो की राष्ट्र-राज्य की धारणा का विचार उनकी एक महत्त्वपूर्ण देन है। सामान्य भलाई, सामान्य : हित तथा सामान्य इच्छा इन विचारों पर दिया गया उनका जोर जनता की एकता तथा एक प्रणता से संयोजित होकर राष्ट्र-राज्य के रूप में विकसित हुए। रूसो ने सामान्य इच्छा के सिद्धान्त द्वारा राष्ट्रवाद के नैतिक पक्ष को प्रस्तुत किया। आगे चलकर हीगल ने राष्ट्र की आत्मा के रूप में रूसो की सामान्य इच्छा को ग्रहण करके जिस आदर्शवाद का प्रतिपादन किया, वह उग्र-राष्ट्रवाद में परिणत हुआ । यद्यपि वह स्वयं राष्ट्रवादी नहीं था, परन्तु समूह की एकता की भावना को महत्त्व देना तथा उसकी लोकप्रिय प्रभुसत्ता के विचार ने राष्ट्रवादियों पर गहरा प्रभाव डाला। आधुनिक राष्ट्र-राज्य अपने अस्तित्व के लिए रूसो के ही विचारों के ऋणी हैं। राष्ट्र निर्माण के सभी संघटक रूसो की विचारधारा में मिलते हैं। सेबाइन ने लिखा है- “स्वयं एक राष्ट्रवादी न होते हुए भी रूसो ने नागरिकता के प्राचीन आदर्श को एक ऐसा रूप देने में सहायता दी कि राष्ट्रीय भावना उसे अपना सके। "

4. राज्य का महत्त्व : अन्य यूनानी विचारकों की तरह रूसो ने भी राज्य के खिलाफ व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं दिए। रूसो का मानना है कि मनुष्य के हित राज्य में ही सुरक्षित हैं। व्यक्ति राज्य के अन्दर ही अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास. कर सकता है। रूसो के मतानुसार राज्य अपने आप में साध्य न होकर सामान्य हित को प्राप्त करने का साधन है। राज्य का लक्ष्य व्यक्तियों को सदाचारी बनाना है। इस प्रकार रूसो का राज्य चाहे कितना ही शक्तिशाली हो, लेकिन वह जन-कल्याण का एक उपकरण मात्र ही है।

5.आदर्शवादी विचारधारा पर प्रभाव: रूसो के सामान्य इच्छा सिद्धान्त का हीगल, काण्ट जैसे विचारकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। काण्ट का 'निरपेक्ष आदेश' हीगल की 'राष्ट्र की आत्मा' का विचार रूसो से ही प्रभावित है। रूसो के कारण आदर्शवादी विचारधारा में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इसने आदर्शवाद को अमूर्त बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया।

6. उपयोगिता का अग्रदूत रूसो ने अच्छाई और बुराई का निर्णय करने के लिए सही मापदण्ड प्रदान किया है। रूसो का कहना है कि यदि सामान्य हित साधना के मार्ग से हटकर कोई काम होता है तो वह बुरा है परन्तु यदि वह काम सार्वजनिक हित के लिए होता है तो वह अच्छा है। उसका सामान्य हित का विचार ही किसी अच्छे या बुरे का मापदण्ड है। किसी कार्य की उपयोगिता इसी कसौटी पर परखी जाती है। सामान्य हित के इस विचार ने बेन्थम और मिल जैसे उपयोगितावादियों को अत्यन्त प्रभावित किया । इसलिए रूसो को उपयोगितावाद का अग्रदूत कहा जाता है।

7.समाजवाद का पोषक समाजवाद का प्रमुख आधार यह है कि समाज ही प्रमुख है। रूसो व्यक्तिगत हितों की तुलना में समाज या समुदाय के हितों को ही प्राथमिकता देता है। रूसो का सामान्य इच्छा में व्यक्ति अपना हित देखता है। अतः यह सिद्धान्त समाजवाद का पोषक है।

8. सर्वसत्ताधिकार का प्रणेता रूसो ने राज्य के व्यक्तित्व को इतना ऊँचा उठा दिया है कि व्यक्ति और उसके सारे अधिकार राज्य में ही समा जाते हैं। राज्य ही लोगों के हितों का संरक्षक बन जाता है। राज्य से बाहर व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। रूसो ने राज्य को व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता व सम्पत्ति को निर्बाध शक्ति देकर राज्य को सर्वसत्ताधिकारवादी बना दिया है। आगे चलकर यह सिद्धान्त हिटलर तथा मुसोलिनी जैसे तानाशाहों के लिए प्रेरणा-स्रोत बन गया।

10. फ्रांस की क्रान्ति का अग्रदूत नेपोलियन के अनुसार- "यदि रूसो न होता, तो फ्रांस में क्रान्ति न होती।” वस्तुतः फ्रांस

9. रूसो ने राज्य व सरकार में स्पष्ट भेद किया है। रूसो का यह भेद राजनीति विज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण देन है। की क्रान्ति के मूल मन्त्र 'स्वतन्त्रता, समानता और भ्रात त्व' का शंखनाद करने वाला रूसो ही है। उनके कथन- "मनुष्य स्वतन्त्र पैदा हुआ है, लेकिन सर्वत्र बेड़ियों से जकड़ा हुआ है" ने क्रान्ति की ज्वाला को तीव्र करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वयं क्रान्ति का समर्थक न होते हुए भी उसके सिद्धान्त को फ्रांस की क्रान्ति का प्रेरणा-स्रोत माना जाता है।

11. रोमांसवाद का जनक रूसो की एक महत्त्वपूर्ण देन यह भी है कि उसने तर्क एवं युक्ति पर जोर देने वाले बुद्धिवाद के युग में रोमांसवाद का भी बीजारोपण किया। उसने विवेक की जगह भावना को महत्त्व दिया। इसलिए रूसो को रोमांसवाद का जनक कहा जाता है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रूसो बहुमुखी प्रतिभा का धनी विचारक था। उसका सामान्य इच्छा का सिद्धान्त राजनीति शास्त्र को एक अमूल्य एवं महत्त्वपूर्ण देन है। उनके दर्शन ने आधुनिक विचारकों के मानव मस्तिष्क को पूरी तरह प्रभावित किया है। उसने ही फ्रांस की क्रान्ति का मन्त्र फूँका और लोकप्रिय प्रभुसत्ता का सिद्धान्त पेश किया। उनकी पुस्तक 'सोशल काण्ट्रेक्ट' आधुनिक राजनीतिक चिन्तन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण निधि है। आधुनिक राजनीतिक विचारधाराओं व्यक्तिवाद, समष्टिवाद, सर्वसत्तावाद, निरंकुशवाद, समाजवाद एवं लोकतन्त्र के विकास में रूसो का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वेपर के अनुसार "रूसो ने अपनी सबल और मौलिक प्रतिभा की छाप राजनीति, शिक्षा, धर्म, साहित्य, सभी पर छोड़ी और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वर्तमान तक आने वाले सभी मार्गों के प्रवेश द्वार पर उसे खड़ा पाया जाता है।" इसी प्रकार कोल के अनुसार- "रूसो का राजनीतिक प्रभाव समाप्त होने की बजाय प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।" जे. एल. टैतमान ने उसे बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिकारवाद का बौद्धिक अग्रदूत कहा है। अतः निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि रूसो के राजनीतिक दर्शन का राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक अमूल्य और बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

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