जॉन लॉक का जीवन परिचय , रचनाएँ एंव अध्ययन पद्धतियाँ ( Life introduction, works and study methods of John Locke )
जॉन लॉक के प्रमुख राजनीतिक विचार देखने के लिए Click करे
जॉन लॉक का जीवन परिचय , रचनाएँ एंव अध्ययन पद्धतियाँ
जॉन लॉक सरकार का सिद्धान्त: सीमित सरकार
जॉन लॉक एक व्यक्तिवादी के रूप में
लॉक क्रान्ति के दार्शनिक के रूप में
जॉन लॉक राज्य का सिद्धान्त: सीमित राज्य
जॉन लॉक की प्राकृतिक अवस्था सम्बन्धी अवधारणा
जॉन लॉक की मानव स्वभाव संबंधी अवधारणा
जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धान्त )
जॉन लॉक प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त
जॉन लॉक का राजनीतिक दर्शन में योगदान
परिचय (Introduction )
हाब्स के बाद लॉक इंगलैण्ड के राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक है। हॉब्स की तरह लॉक भी राज्य के सामाजिक समझौता सिद्धान्त का प्रतिपादक है। लेकिन दोनों के दर्शन में मौलिक अन्तर है। जहाँ हॉब्स एक निरंकुशवादी राज्य तथा सम्प्रभु का समर्थक है, लॉक निरंकुशवाद के हर रूप का विरोधी है। लॉक एक ऐसा उदारवादी तथा व्यक्तिवादी विचारक है जिसमें राज्य और सरकार के कार्यक्षेत्र एवं शक्तियों को सीमित किया है। लॉक अपने दर्शन में प्रजातन्त्र, संविधानवाद (Constitutionalism), कानून का शासन (Rule of Law) का समर्थन करता है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण लॉक ने व्यक्ति की स्वतन्त्रता और प्राकृतिक अधिकार एवं सरकार के विरुद्ध क्रान्ति के अधिकार को व्यक्ति के जन्मजात अधिकार और पवित्र अधिकार माना है। आज के युग में लॉक के विचार आधुनिक प्रजातन्त्र और संविधान के प्रेरणा-स्रोत हैं।
जीवन परिचय (Life History)
सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रतिपादक जॉन लॉक का जन्म 29 अगस्त, 1632 में सामरसेंट शायर के रिंग्टन नामक स्थान पर एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। जब लॉक का जन्म हुआ, उस समय हॉब्स की आयु 43 वर्ष थी और ब्रिटिश संसद अपने अधिकारों के लिए राजा के साथ संघर्ष कर रही थी। जब लॉक की आयु 12 वर्ष थी, इंगलैण्ड में ग हयुद्ध शुरू हो गया। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त करके लॉक ने 15 वर्ष की आयु में वेस्ट मिन्स्टर स्कूल में प्रवेश किया। लॉक ने 1652 ई. में 20 वर्ष की आयु में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की प्राप्ति हेतु गया। उसने वहाँ यूनानी भाषा, दर्शनशास्त्र तथा अलंकारशास्त्र का अध्यापक कार्य किया, परन्तु उस समय के संकीर्ण अनुशासन ने औपचारिक अध्ययन के लिए उसके उत्साह को मन्द कर दिया। उसने 1656 में बी. ए. तथा 1658 में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में यूनानी भाषा, काव्यशास्त्र और दर्शनशास्त्र के अध्यापक के रूप में कार्य किया। इसके बाद लॉक ने एक चर्च में बिशप बनने का प्रयास किया, लेकिन उसको सफलता नहीं मिली। 1660 में डेविड टॉमस नामक डॉक्टर के सम्पर्क में आने पर उसने चिकित्साशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करके इस क्षेत्र में अपनी रुचि बढ़ाई और एक सफल चिकित्सक बन गया। चिकित्सक के नाते सन् 1666 में उसके सम्बन्ध उस समय के सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और विग दल के संस्थापक लार्ड एश्ली से हुए। इसके बाद आगामी 15 वर्षों तक लॉक उनका निजी डॉक्टर रहा। उसने इस दौरान एश्ली के विश्वस्त सचिव के रूप में भी कार्य किया। इससे उसको ब्रिटिश राजनीति और राजनीतिज्ञों को जानने का मौका मिला। 1672 में एश्ली चांसलर बने तथा लॉक ने उनकी कृपा से कतिपय महत्त्वपूर्ण शासकीय पदों पर कार्य किया। परन्तु रोमन कैथोलिक चर्च का पक्ष लेने की राजा की प्रवत्ति का विरोध करने के कारण उसे 1673 में चांसलर के पद से हटा दिया गया। लॉक पर भी इसका प्रभाव पड़ा। लॉक इसके बाद 1675 में स्वास्थ्य लाभ हेतु फ्रांस चला गया और 1679 तक वहाँ रहा। वापिस लौटने पर उसे पुराने पद पर बिठाया गया। इस दौरान इंगलैण्ड में राजनीतिक विद्रोह की आग फिर से भड़क गई और राजा ने एश्ली से नाराज होकर 1681 में उसे पद से हटा दिया और प्रोटैस्टैण्ट धर्म का समर्थ करने के कारण उसे राजद्रोह का दोषी मानकर उस पर मुकद्दमा चलाया गया। बाद में मुक्त होकर वह हालैण्ड पहुँचा और 1688 तक वहीं रहा। इस दौरान उसने हालैण्ड में देश निर्वासित राजनीतिज्ञों से भेंट की। इस दौरान वह विलियम ऑफ ऑरेंज के सम्पर्क में आया। 1688 में इंगलैण्ड की रक्तहीन क्रान्ति (Bloodsell Revolution) के सफल होने पर तथा विलियम ऑफ ऑरेंज द्वारा निमन्त्रण भेजे जाने पर वापिस इंगलैण्ड लौट आया। वहाँ पर लॉक को 'कमिश्नर ऑफ अमील्स' का पद दिया गया। 1700 में स्वास्थ्य की कमजोरी के कारण उसने इस पद से त्याग-पत्र दे दिया और 1704 में 72 वर्ष की उम्र में इस महान दार्शनिक की म त्यु हो गई।
महत्त्वपूर्ण रचनाएँ (Important Works)
हालैण्ड से लौटकर लॉक ने लेखन कार्य प्रारम्भ किया। लॉक ने राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षा, दर्शनशास्त्र आदि विषयों पर 30 से अधिक ग्रन्थ लिखे यद्यपि उसकी सारी कृतियाँ 50 वर्ष की आयु के पश्चात् प्रकाशित हुई। उसके महत्त्वपूर्ण लेखन कार्य के कारण उसकी गिनती इगलैण्ड के महान् लेखकों में की जाती है।
लॉक के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ निम्नलिखित हैं :-
1. मानव स्वभाव के सम्बन्ध में निबन्ध (Essay Concerning Human Understanding, 1690) :
इस पुस्तक की रचना लॉक ने 1687 में की लेकिन यह 1690 में प्रकाशित हुई।
2. शासन पर दो निबन्ध (Two Treatise on Government, 1690) : यह रचना लॉक की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना है। पहले निबन्ध में लॉक ने फिल्मर द्वारा प्रतिपादित राजा के दैवीय अधिकारों का खण्डन किया है। दूसरे निबन्ध में राजा की निरंकुशता का विरोध किया गया है। इस ग्रन्थ में लॉक ने हॉब्स के निरंकुशवाद का विरोध तथा 1688 की रक्तहीन क्रान्ति (Bloodless Revolution) के बाद इंगलैण्ड के सिंहासन पर राजा विलियम के सत्तारूढ़ होने के औचित्य को सिद्ध करने का प्रयास किया है।
वाहन ने लॉक की इस रचना को दोनाली बन्दूक कहा है, जिसकी एक नली फिल्मर द्वारा लिखित पुस्तक 'पेट्रो आर्का' में प्रतिपादित राजा के दैवी अधिकारों का खण्डन करने के लिए तथा दूसरी नली हॉन्स द्वारा लिखित 'लेवियाथन' में प्रतिपादित निरंकुशवाद का विरोध करने के लिए है। लॉक का दूसरा निबन्ध राजनीतिक चिन्तन की द ष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सरकार के मूल प्रश्नों को उठाया गया है तथा राजसत्ता व कानून के औचित्य को सिद्ध करके बताया गया है कि राज्य की आज्ञा का पालन क्यों अनिवार्य है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रो. पीटर लॉस्लेट ने कहा है कि यह पुस्तक 1683 में ही लिखी गई लेकिन स्टुअर्ट सम्राटों के दण्ड के भय से प्रकाशित नहीं की गई। यह ग्रन्थ 1688 ई. की इंगलैण्ड की गौरवपूर्ण क्रान्ति (Glorious Revolution) को सैद्धान्तिक आधार प्रदान करती है। लॉक स्वयं इस ग्रन्थ के प्राक्कथन में लिखा है- "यह पुस्तक विलियम ऑफ ऑरेंज के सत्तारूढ़ होने का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास है।"
3. सहिष्णुता पर पहला पत्र (First letter on Toleration, 1689 ) : 1689 ई. में लॉक ने हालैण्ड में ही लैटिन भाषा में यह पुस्तक प्रकाशित करवाई।
4. सहिष्णुता पर दूसरा पत्र ( Second letter on Toleration, 1690)
15. सहिष्णुता पर तीसरा पत्र (Third letter on Toleration, 1692)
6. सहिष्णुता पर चौथा पत्र (Fourth letter on Toleration, 1692)
7. कैरोलिना का मौलिक संविधान (The Fundamentals of Constitution of Caroline, 1692)
शिक्षा से सम्बन्धित कतिपय विचार (Some Thoughts Concerning Education, 1693) : यह लॉक की अन्तिम रचना है।
उपर्युक्त सभी ग्रन्थों में लॉक की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना 'शासन पर दो निबन्ध' है ।
अध्ययन पद्धति (Method of Study)
जहाँ हॉब्स की पद्धति तार्किक, दार्शनिक एवं चिन्तनात्मक है, वहाँ लॉक की पद्धति अनुभववादी व बौद्धिक है। लॉक के अनुसार मानव ज्ञान, अनुभव द्वारा सीमित होता है। अनुभव के बिना ज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। लॉक के अनुसार अनुभव ज्ञान का स्रोत है और अनुभव से ही ज्ञान की उत्पत्ति होती है। लॉक के अनुसार मानव मस्तिष्क एक कोरे कागज की तरह है, जिसमें जन्मजात कोई विचार नहीं होता।
सभी विचारों की उत्पत्ति दो स्रोतों से होती है :
(1) संवेदना (Sensation) से और (2) प्रत्यक्ष बोध से (Perception)।
इन स्रोतों द्वारा प्राप्त अनुभव मनुष्य के मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं जो उसमें चेतना तथा प्रतिबिम्ब उत्पन्न करते हैं। बुद्धि द्वारा मस्तिष्क में तब उन विचारों का विश्लेषण होता है एवं तुलना होती है। फलस्वरूप जटिल विचार उत्पन्न होकर ज्ञान का साधन बनते हैं। ज्ञान तब उत्पन्न होता है जब बुद्धि अपने विचारों की परस्पर तुलना करके उनके परस्पर मतैक्य तथा मतवैभिन्य देखती है। यही ज्ञान लॉक की अनुभववादी पद्धति का आधार है।
लॉक की अनुभववादी पद्धति में तीन मुख्य बातें हैं।
(i) ज्ञान की उत्पत्ति का एक मात्र स्रोत अनुभव है। कोई भी विचार अंतर्जात नहीं होता स्वतः साक्ष्य विश्वसनीय नहीं है। विचार इन्द्रिय सापेक्ष होता है और उसकी उत्पत्ति अनुभव से होती है।
(ii) ज्ञान का स्वभाव विवेकसम्मत होता है। वास्तविक ज्ञान तभी प्राप्त होता है जबकि बुद्धि विचारों में पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करती है।
(iii) ज्ञान का क्षेत्र उसके अज्ञान के क्षेत्र से बहुत छोटा है। लॉक के अनुसार मनुष्य एक ससीम प्राणी है जो इस अनंत, असीम और महान् ब्रह्माण्ड की सभी बातों को जान नहीं सकता है। इसलिए व्यक्ति का ज्ञान उसके अज्ञान की तुलना के स्वल्प है।
लॉक की अध्ययन पद्धति हॉब्स की अध्ययन पद्धति से भिन्न थी। लॉक हॉब्स की तरह एक दार्शनिक नहीं है। उसमें हॉब्स की तरह मौलिकता नहीं है। लॉक का विचार न तो गहन अध्ययन का प्रतिफल है, न तर्क का वह सिर्फ व्यावहारिक बुद्धि का धनी है। जहाँ हॉब्स ने वैज्ञानिक, भौतिक, मनोवैज्ञानिक तथा तार्किक पद्धति को अपनाया, वहीं लॉक की अध्ययन और विचार पद्धति अनुभवजन्य, मनोवैज्ञानिक तथा बुद्धिपरक है। लॉक ने प्रबुद्ध विचारकों के विचारों व विश्वासों को सरल, गम्भीर और हृदयग्राही वाणी दी है। इसके बाद भी लॉक की पद्धति में कुछ दोष हैं। प्रथम, यद्यपि लॉक ने यह बताया है कि विचार की उत्पत्ति अनुभव से होती है, तथापि उसने समपूर्ण अनुभूतिजन्य ज्ञान की निश्चितता को स्वीकार नहीं किया। द्वितीय, लॉक की पद्धति की मौलिक त्रुटि यह भी है कि वह संगत नहीं है। शुद्ध तर्क की दष्टि से उसके विचार पूर्णतया असंगत हैं। इस प्रकार लॉक ने ज्ञान के क्षेत्र को उसके अज्ञान के क्षेत्र से बहुत छोटा माना है। यदि अनुभव आधारित ज्ञान का क्षेत्र सीमित है, तो उस पर विश्वास क्यों किया जाए। लॉक ने बहुत सी अनुभव प्रधान मान्यताओं को स्वयंसिद्ध मानकर गलती की है। अतः उसके विचार अपूर्ण तथा असंगत होने के दोषी हैं। लेकिन संगीत के अभाव में भी विचार पूर्णतः गलत नहीं हो सकता। लॉक की अनुभववादी पद्धति अपने दोषों के बाद भी एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है।
समकालीन परिस्थितियाँ (Contemporary Situations )
किसी भी विचारक के दर्शन या चिन्तन पर उसके आस-पास की घटनाओं, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव अवश्य पड़ता है। लॉक भी हॉब्स की तरह इंगलैण्ड की तत्कालीन परिस्थितियों से पूरी तरह प्रभावित दिखाई देता है। लॉक ने अपने शैशव में ग हयुद्ध, यौवन में क्रामवैल का शासन तथा राजतन्त्र की पुनः स्थापना एवं बुढ़ापे में 1688 की गौरवपूर्ण क्रान्ति की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ देखीं। इनका उसके विचारों पर काफी प्रभाव पड़ा।
इनका विस्तारपूर्वक वर्णन निम्नलिखित है :-
(1) गौरवपूर्ण क्रान्ति (Glorious Revolution) :
हॉब्स के समय में इंगलैण्ड में ग हयुद्ध के कारण अराजकता, हिंसा और अव्यवस्था की स्थिति बनी हुई थी। इसलिए हॉब्स ने व्यक्ति के जान और माल की सुरक्षा के लिए एक निरंकुशवादी व्यवस्था का समर्थन किया। लेकिन लॉक के समय में इंगलैण्ड में शांति का वातावरण था। उसने 1688 में इंगलैण्ड में रक्तहीन क्रान्ति (Bloodless Revolution) या गौरवमय क्रान्ति (Glorious Revolution) को देखा था। उसने देखा कि इस क्रान्ति में बिना हिंसा, रक्तपात सत्ता सम्राट से इंगलैण्ड की संसद के हाथों में चली गई। इस क्रान्ति से लॉक ने यह महसूस किया कि सत्ता में परिवर्तन शांतिमय व प्रजातन्त्रीय तरीके से भी हो सकता है। इसलिए हॉब्स के विपरीत उसने प्रजातन्त्रीय व्यवस्था का समर्थन किया।
(2) नवीन बौद्धिक क्रान्ति (New Intellectual Revolution) :
17 वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में यूरोप में आने वाली नवीन बौद्धिक क्रान्ति का लॉक पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस क्रान्ति का उद्देश्य धार्मिक व राजनीतिक कट्टरता का विरोध और सहिष्णुता तथ उदारवाद का समर्थन करना था ।
(3) विग विचारधारा (Whig Ideology) :
लॉक का पारिवारिक वातावरण अत्यन्त उदावादी था। उसके पिता संसदीय दल विग के समर्थक थे। यह दल इंगलैण्ड में उदारवादी सिद्धान्तों के लिए प्रसिद्ध था। लॉक का पूरा परिवार इस दल के कार्यक्रम व नीतियों से प्रभावित था। लॉक स्वयं इसके प्रभाव से कैसे बच सकते थे। अतः इस दल की विचारधारा का लॉक के दर्शन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
(4) पूर्ववर्ती विचारकों का प्रभाव (Influence of Predecessors) :
लॉक ने हूकर के जनसहमति के सिद्धान्त को शासन का आधार माना। लॉक ने स्वीकार किया कि शासक का उद्देश्य जन-कल्याणकारी होना चाहिए। उसका सम्पूर्ण चिन्तन सिडनी व हूकर के जन सहमति के सिद्धान्त पर आधारित है।
यह माना जाता है कि लॉक का चिन्तन मौलिक नहीं है। किन्तु लॉक अपने युग की राजनीतिक प्रवत्ति, घटना चक्र एवं सामाजिक उतार-चढ़ाव की जटिलता उसके दूरगामी प्रभाव को समझने में पूर्ण सफल रहा। सामन्तवादी व्यवस्था के अस्त होने एवं पूंजीवादी के उदय से उत्पन्न हुई राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन ही समझ उसे थी और यही उसके चिन्तन का आधार बने । फ्रेडरिक एंग्लेस ने लॉक के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि "लॉक धर्म और राजनीति दोनों में ही 1688 के वर्गीय समझौते की सन्तान है।" लॉक का सम्पूर्ण चिन्तन उसके पारिवारिक वातावरण, तत्कालीन धार्मिक व्यवस्था, राजनीतिक वातावरण तथा उस समय के नवीन बौद्धिक क्रान्ति के प्रभाव से ग्रस्त है।