जीन जैक्स रूसो की प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा क्या है(Jean Jacques Rousseau's concept of the state of nature)
प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा (Conception of State of Nature)
रूसो की प्राकृतिक अवस्था सम्बन्धी अवधारणा अपने पूर्ववर्ती (Predecessors) दोनों समझौतावादी विचारकों से भिन्न है। रूसो के प्राकृतिक अवस्था पर विचार 'असमानता की उत्पत्ति' नामक रचना में व्यक्त किये हैं। रूसो की प्राकृतिक अवस्था की कल्पना रूसो की अपनी कल्पना है। उसकी यह परिकल्पना ऐतिहासिक नहीं है। रूसो ने अपनी पुस्तक 'असमानता की उत्पत्ति' (Discourses on the Origin of Inequality) में जिस प्राकृतिक अवस्था की कल्पना की है। वह न तो पापमय है, न पुण्यमय । उसके अनुसार प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य पशुतुल्य, एकाकी, निष्पाप एवं निर्दोष होता है। मनुष्य के स्वभाव में विवेक की शक्ति होती है तथापि प्राकृतिक दशा में यह शक्ति अविकसित एवं सुप्तावस्था में रहती है। व्यक्ति अच्छे-बुरे का कोई ज्ञान नहीं रखता है। वह स्वाधीनता और समानता अनुभव करता है तथा वह आत्मसंतोषी व आत्मनिर्भर है। वह कोई सामाजिक प्राणी नहीं है। वह विवेक के कार्य न करके स्वार्थ की प्रवत्ति से कार्य करता है। सम्पत्ति व तर्क की भावना पैदा होने पर सामाजिक विषमताएँ पैदा हो गईं। इनसे स्वार्थ, घणा, द्वेष व हिंसा के अवगुणों का जन्म हुआ। इससे दास प्रणाली का जन्म हुआ। कष्टमय अवस्था से निकलने के लिए व्यक्तियों ने एक सामाजिक समझौता किया।
रूसो मानव को प्रकृति में वापिस चलने को कहता है । परन्तु उसकी यह प्राकृतिक अवस्था एक काल्पनिक और दार्शनिक विवेक की धारणा है। रूसो प्राकृतिक दशा को सामाजिक या नागरिक दशा से श्रेष्ठ मानता है। परन्तु उसके राज्य व नागरिक समाज के वास्तविक आधार व उद्देश्य को समझनेके लिए उसकी प्राकृतिक अवस्था की कल्पना को समझना आवश्यक है। रूसो की प्राकृतिक अवस्था एक कल्पना है, जो सम्भवतः कभी विद्यमान नहीं थी और न ही विद्यमान होगी।
रूसो की प्राकृतिक अवस्था के विवरण को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है :
(क) प्रकृति की अवस्था का प्रथम चरण (First Stage of State of Nature)
प्राकृतिक अवस्था के पहले चरण में मनुष्य उदात्त वन्य प्राणी (Novel Savage) था। मानव पशुओं की तरह जीवन व्यतीत करता था। वह अपना जीवन पशु की तरह भूख, प्यास, निद्रा, काम-वासना की मूल प्रव त्तियों के अनुसार व्यतीत करता था। वह स्वतन्त्र, सन्तुष्ट, आत्मकेन्द्रत, आत्मनिर्भर, शांत तथा एकाकी जीवन व्यतीत करता था। उसकी आवश्यकताएँ अति सीमित थीं और वह पूर्ण रूप से सुखी था। उसके अन्दर दुर्गुणों का सर्वथा अभाव था, परन्तु सभ्यता के न होने से वह जंगली व पशु तुल्य था। रूसो के अनुसार प्राकृतिक अवस्था के प्रथम चरण से व्यक्ति शांतिमय व निष्पाप जीवन बिताता था ।
(ख) प्रकृति की अवस्था का दूसरा चरण (Second Stage of State of Nature)
रूसो के अनुसार जैसे ही जनसंख्या की व द्धि हुई तथा तर्क का उदय हुआ। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक प्रगति हुई। इससे मनुष्य में सम्पत्ति रखने की चाह जाग त हुई। इससे मनुष्य का दूसरे पर आधिपत्य, भौतिकवाद और गर्व का प्रादुर्भाव हुआ । अब प्राकृतिक अवस्था में जाना मुश्किल था। रूसो के अनुसार "वह पहला व्यक्ति नागरिक समाज का वास्तविक जन्मदाता था जिसने भूमि के टुकड़े को घेर कर कहा कि यह भूमि मेरी है और जिसे इस कथन पर विश्वास करने के लिए सीधे-सादे व्यक्ति मिल गए। " जनसंख्या में व द्धि और तर्क के उदय ने सामाजिक समानता को नष्ट कर दिया और मेरे तेरे का भाव पैदा हुआ। अब मनुष्य जंगली जीवन को छोड़कर एक स्थान पर रहकर कृषि करने लगा। इससे समाज में असमानता बढ़ी जब कृषि के उद्भव तथा पशु इत्यादि के स्वामित्व ने मनुष्यों में धनी निर्धन की भावना उत्पन्न कराई। समाज में प्रतियोगिता की भावना का जन्म हुआ। अमीर-गरीब के भेदभाव ने स्वार्थ, द्वेष, घ णा और हिंसा को जन्म दिया। रूसो के अनुसार- "निजी सम्पत्ति के साथ परिवारों ने परस्पर वैमनस्य और संघर्ष पैदा किया जिसके कारण असमानता का जन्म हुआ और दूसरे के अधिकार को सबल के द्वारा छीना जाना एक स्वीकृत सिद्धान्त बन गया।" इससे समाज में गरीबों का शोषण होने लग गया। परस्पर लड़ाई शुरू हो गई। शक्तिशालियों द्वारा कमजोर पर कब्जा करने की प्रथा शुरू हो गई। कृषि, उद्योग, आर्थिक गतिविधियों तथा जीवन की जटिलता ने वातावरण को संघर्षमय बना दिया। समाज की शान्ति व सौम्य जीवन प्रभावित हुआ। मनुष्य का जीवन पापमय बन गया व मनुष्य स्वार्थी और अहंकारी बन गया। रूसो के अनुसार “कुछ महत्त्वाकांक्षी लोगों ने सम्पूर्ण मानवता को एक निरन्तर श्रम, गुलामी और दरिद्रता की अवस्था में धकेल दिया । "
(ग) प्रकृति की अवस्था का त तीया चरण (Third Stage of State of Nature)
इस अवस्था में कृषि कार्य, पशुपालन तथा धातु शोधन कार्यों की खोज हुई। इससे मनुष्यों को आपसी सहयोग की आवश्यकता पड़ी और लोग आर्थिक कार्यों को पूरा करने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने लगे। अमीर और गरीब के बीच में खाई और चौड़ी हो गई। इस तीव्र आर्थिक असमानता के कारण मनुष्यों में संघर्ष, कलह, चोरी, कपट, भय, हत्या जैसे दुर्गुणों की शुरुआत हुई। रूसो के अनुसार- "सामाजिक विषमता ने अन्य बुराइयों को जन्म दिया। सभ्य समाज के उदय होने से निर्धनता और दुःख का प्रादुर्भाव हुआ । सभ्यता की व द्धि के साथ-साथ दरिद्रता, शोषण, हत्या और बीमारी बढ़ती गई।" मनुष्यों ने अपनी शक्ति, योग्यता एवं चालाकी के आधार पर अन्य मनुष्यों से अधिक सम्पत्ति एकत्रित की। भूमि पर निजी स्वामित्व के कारण, मनुष्यों के बीच स्थायी असमानता हो गई और गरीब व अमीर तथा दास व स्वामी वर्ग बने। प्राकृतिक अवस्था की असहनीय स्थिति ने अत्याचार को जन्म दिया तथा मनुष्यों को पतन की ओर धकेल दिया। इससे व्यक्ति का जीवन दरिद्र, अपवित्र तथा क्षणिक बन गया। रूसो की यह अवस्था हॉब्स की प्राकृतिक दशा के समान थी। रूसो के अनुसार- "इस अवस्था में समाज में मनुष्य का जीवन कष्टमय बन गया तथा कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मनुष्यों ने एक सामजिक समझौता किया और नई समाज-व्यवस्था की स्थापना की।" इस अवस्था की अराजकता को देखकर रूसो ने मनुष्यों को "प्रकृति की ओर लौट चलने " की सलाह दी।
रूसो की प्राकृतिक अवस्था की विशेषताएँ (Characteristics of Rousseau's State of Nature)
रूसो की प्राकृतिक अवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :
1. यह अवस्था आदिम अवस्था थी, जिसमें मनुष्य का जीवन पशुवत था। मानव जंगलों में रहता था और असभ्य था ।
2. इस अवस्था में मनुष्य का जीवन शांतिमय था और व्यक्ति सुखी था।
3. प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य आत्मकेन्द्रित अर्थात् वह स्वयं में लीन रहता था। वह एकाकी जीवन व्यतीत करता था। उसका जीवन सहज एवं प्राकृतिक था तथा वह दुर्गुणों से रहित था ।
4. इस अवस्था में कोई सभ्यता नहीं थी। इसमें सामाजिक नियम व संस्थाओं का अभाव था ।
5.इस अवस्था में निजी सम्पत्ति व तर्क का अभाव था।
6. इस अवस्था में व्यक्ति की आवश्यकताएँ सीमित थीं और वह आत्मनिर्भर था।
7. प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को पूरी स्वतन्त्रता थी और इस स्वच्छन्द वातावरण में व्यक्ति निर्वाध जीवन बिताता था।
8. इस अवस्था में परिवार जैसी कोई संस्था भी नहीं थी।
9. व्यक्ति को अच्छे बुरे का कोई ज्ञान नहीं था।
हॉब्स व लॉक से तुलना (Comparison with Hobbes and Locke)
रूसो की प्राकृतिक अवस्था हॉन्स व लॉक की प्राकृतिक अवस्थाओं से भिन्न है। हॉब्स द्वारा वर्णित प्राकृतिक अवस्था युद्ध, आतंक एवं अशान्ति की अवस्था थी जिसमें मानव का जीवन दरिद्र, एकाकी, अपवित्र तथा क्षणिक था। वह पशु तुल्य जीवन व्यतीत करता था। लॉक के अनुसार, प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति परस्पर सहयोग, सद्भावना, शान्ति और सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहता था। मनुष्यों के बीच मित्रता एवं प्रेम था। रूसो के अनुसार प्राकृतिक अवस्था के प्रथम चरण में व्यक्ति आनन्द व सुख से रहता था मानव आत्मनिर्भर एवं आदर्श जीवन व्यतीत करते थे। परन्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति के उदय होने से यह अवस्था संघर्ष, ईर्ष्या, द्वेष आदि से परिपूर्ण हो गई। समाज में असमानता बढ़ी तथा उसके आदर्श का पतन हो गया।
हॉब्स की प्राकृतिक अवस्था अराजकता और युद्ध की अवस्था है। रूसो की प्राकृतिक अवस्था परमानन्द की अवस्था है। लॉक की प्राकृतिक अवस्था शान्ति व पारस्परिक सहयोग की अवस्था है। अतः रूसो की प्राकृतिक अवस्था लॉक की प्राकृतिक अवस्था के समान है। हॉब्स व रूसो की प्राकृतिक अवस्था असामाजिक है, जबकि लॉक की प्राकृतिक अवस्था सामाजिक है। हॉन्स व रूसो की प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक दशा के दोषों को दूर करने के लिए केवल एक ही बार समझौता होता है, जबकि लॉक दो बार समझौते की बात कहता है।
उपर्युक्त असमानताओं के बावजूद भी तीनों विचारकों के विचारों में कुछ समानताएँ भी दिखाई देती है। तीनों समझौते की अनिवार्यता को स्वीकारते हैं। तीनों व्यक्ति के जीवन को शांतमय बनाने के लिए समझौते की अनिवार्यता स्वीकार करते हैं तीनों प्राकृतिक अवस्था का अन्त करने के लिए समझौता करने की बात मानते हैं। अतः हॉब्स व लॉक व रूसो की तुलना करने पर तीनों में कुछ समानताएँ व असमानताएँ उभरती हैं।
प्राकृतिक अवस्था की आलोचनाएँ (Criticisms of State of Nature)
रूसो की प्राकृतिक अवस्था की निम्न आधारों पर आलोचना की गई है
1. आलोचकों के अनुसार प्रकृति की अवस्था में मनुष्य अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। विपरीत भौतिक परिस्थितियों के विरुद्ध मानव अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। अर्थात् रूसो का यह मानना कि प्राकृतिक अवस्था मानव इतिहास का स्वर्णकाल है, एकदम भ्रमपूर्ण एवं असत्य है।
2. रूसो ने काल्पनिक प्राकृतिक अवस्था को सिद्ध करने के लिए बुद्धि, तर्क, अनुमान तथा सामान्य ज्ञान से इसका मेल नहीं किया।
3. प्राकृतिक अवस्था में रूसो ने मानव को आत्मकेन्द्रित तथा आत्मनिर्भर प्राणी माना है। मनुष्य के इन गुणों की कल्पना अनुमान एवं तथ्य की द ष्टि से गलत है।
4. भौतिक दष्टि से प्रकृति की अवस्था के प्रथम चरण की तुलना में द्वितीय चरण अधिक विकसित अवस्था वाला है और द्वितीय चरण की तुलना में त तीय चरण अधिक विकसित भौतिक अवस्था को प्रकट करता है। परन्तु रूसो के अनुसार ततीय चरण मानवता के पतन को प्रकट करता है। रूसो प्रकृति की अवस्था के प्रथम चरण को आदर्श अवस्था मानता है। इस प्रकार प्रथम चरण को आदर्श एवं असभ्य अवसी दोनों ही माना है। अर्थात् रूसो असभ्यता को आदर्श मानता प्रतीत होता है। वाल्टेयर ने इस आधार पर रूसो को असभ्यता के युग का विचारक कहा है।
5. रूसो के विचारों में स्पष्टता का अभाव है। उदाहरण के लिए सम्पत्ति सम्बन्धी विचार स्पष्ट नहीं है। कहीं वह सम्पत्ति की सभी बुराइयों की जड़ मानते हुए, 'डिकसोर्सिस में उसकी आलोचना करता है तो कहीं वह सम्पत्ति को पवित्र मानते हुए 'पोलिटिकल इकोनोमी' में इसका समर्थन करता है।
6. रूसो की 'वापिस प्रकृति और लौट चलो' की उक्ति प्रगति विरोधी है। उसकी यह अपील भावनाओं पर आधारित है तर्क पर नहीं। अतः रूसों में तार्किकता का अभाव है।