जॉन स्टुअर्ट मिल के प्रतिनिधि शासन पर विचार || John Stuart Mill's Thoughts on Representative Government

जॉन स्टुअर्ट मिल के प्रतिनिधि शासन पर विचार || (John Stuart Mill's Thoughts on Representative Government )

 

मिल के प्रतिनिधि शासन पर विचार : एक असन्तुष्ट प्रजातान्त्रिक के रूप में (Mill's Ideas on Representative Government : As a Reluctant Domocrat )


मिल ने प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था पर अपने विचार अपनी पुस्तक 'प्रतिनिधि शासन' (Representative Government) में व्यक्त किए हैं। मिल ने शासन की उस प्रणाली को ही श्रेष्ठ माना है जो नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाये और जनसाधारण को अधिकारों और कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने में सक्षम हो। उसकी द ष्टि में राज्य का लक्ष्य व्यक्ति की शक्तियों का अधिकतम विकास करना है और वही शासन प्रणाली श्रेष्ठ होती है जो इनका अधिकतम विकास करे। उसके अनुसार श्रेष्ठ शासन की प्रथम विशेषता यह है कि "वह जनता के गुणों और बुद्धि का विकास करने वाली हो। शासन की उत्तमता की प्रथम कसौटी यह जाँचना है कि वह नागरिकों में मानसिक एवं नैतिक गुणों का कहाँ तक संचार करती है, उनके चारित्रिक. 
एवं बौद्धिक विकास के लिए कितना प्रयास करती है।" इसी प्रकार मिल ने आगे कहा है कि "आदर्श की दष्टि से सर्वोत्तम सरकार वह है जिसमें प्रभुसत्ता समुदाय के समूचे व्यक्तियों में निहित है, प्रत्येक नागरिक को न केवल इस अन्तिम प्रभुसत्ता का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है, अपितु सार्वजनिक कार्यों में व्यक्तिगत रूप से भाग लेने का अधिकार प्राप्त है।" मिल का कहना है कि जहाँ शासन की बागडोर एक ही व्यक्ति या विशेष वर्ग के लोगों के हाथ में होती है, वहाँ बहुमत के हितों की रक्षा कर पाना सम्भव नहीं है। उसके अनुसार प्रजातन्त्र ही एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें सभी के हित सुरक्षित करने का समान अवसर प्राप्त होते हैं। इसमें व्यक्ति अपने हितों के साथ-साथ दूसरों के हितों का भी ध्यान रखता है।

मिल ने प्रजातन्त्र को शासन सर्वश्रेष्ठ प्रणाली मानते हुए उसे अन्य शासन प्रणालियों से अलग माना है। उसके अनुसार आधुनिक युग । में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की बजाय अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही सर्वोत्तम शासन है। मनुष्य इस शासन को अच्छा या बुरा बना सकते हैं। उसने बेन्थम के विपरीत यह कहा है कि प्रजातन्त्र सभी देशों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। यह जहाँ भी सम्भव हो, उपयोगी व सर्वोत्तम होता है। मिल ने प्रजातन्त्र या प्रतिनिधि शासन को स्पष्ट करते हुए कहा है कि- "प्रतिनिधि शासन या सरकार का अर्थ है कि सम्पूर्ण नागरिक या उनके अधिकतर भाग समय-समय पर स्वयं द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा शासन चलाते हैं और शासन की सत्ता जिसे प्रत्येक शासन में रहना अनिवार्य है, अपने नियन्त्रण में रखते हैं।" अर्थात् इसमें जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा शासन की सर्वोच्च शक्ति पर नियन्त्रण रखा जाता है। उसने कहा है कि इस शासन प्रणाली में सभी लोगों को शासन में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास होता है। इसलिए यह शासन प्रणाली सबसे अच्छी होती है।

प्रजातन्त्र के पक्ष में तर्क

मिल ने प्रतिनिधि शासन का समर्थन कई आधारों पर किया है। इससे उसके प्रजातांत्रिक होने के विचार को बल मिलता है। ये तर्क निम्नलिखित हैं :

1. किसी मनुष्य के अधिकार और हित प्रजातन्त्र में ही सम्भव हैं।
2. प्रजातन्त्र के द्वारा ही लोगों का कल्याण हो सकता है। इसमें सभी की समानता व स्वतन्त्रता सुरक्षित रह सकती है। 
3. इसमें सभी व्यक्तियों के बौद्धिक और नैतिक विकास की सम्भावना अधिक रहती है।
4. यह प्रणाली मनुष्यों में सहयोग और आत्मनिर्भरता की प्रवत्ति जगाती है।
5.यह लोगों में देश-प्रेम की भावना पैदा करता है। इससे राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है।
6. इसमें स्त्री-पुरुष सभी वयस्कों को समान मताधिकार प्राप्त होता है।

मिल का मानना है कि अन्य सभी शासन-प्रणालियाँ विशेष वर्गों के स्वार्थ सिद्धि का साधन होती हैं । लोकतन्त्र ही एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें सभी वर्गों के हित सुरक्षित रहते हैं। लेकिन यह प्रणाली सभी के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती। जिन व्यक्तियों में सार्वजनिक कर्त्तव्यों का पालन करने की उपयुक्त भावना और चरित्र न हो तो उनके लिए यह व्यवस्था हितकर नहीं हो सकती। इस प्रकार मिल ने बेन्थम के लोकतन्त्र सम्बन्धी विचारों से भिन्न लोकतन्त्र को परिस्थितियों के आधार पर श्रेष्ठ माना है।

प्रजातन्त्र के प्रकार (Types of Democracy)

मिल ने अपनी पुस्तक 'प्रतिनिधि शासन' (Representative Government) में प्रजातन्त्र के दो रूपों 'नकली प्रजातन्त्र' (False Democracy) तथा 'असली प्रजातन्त्र' (True Democracy) का वर्णन किया है। उसने कहा है कि असली प्रजातन्त्र गुणों पर आधारित होता है, जबकि नकली प्रजातन्त्र संख्या पर आधारित होता है। उसने गुणों पर आधारित असली प्रजातन्त्र ( True Democracy) का ही पक्ष लिया है। लेकिन दोनों प्रजातन्त्र के रूपों को मिलाकर (संख्या तथा गुण) विशुद्ध लोकतन्त्र के निर्माण का प्रयास भी किया है।

प्रतिनिधि शासन का सिद्धान्त (Principle of Representative Government)

मिल के अनुसार- "प्रतिनिधि सरकार व शासन वह व्यवस्था है, जिसमें सम्पूर्ण जन-समुदाय या उसका अधिकांश अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा अन्तिम नियन्त्रण-शक्ति का प्रयोग करता है।" उसने प्रतिनिधि शासन के लिए तीन शर्तें निर्धारित की हैं। जो सरकार इन तीन शर्तों को पूरा करती हो, प्रतिनिधि सरकार है।

1 वे लोग जिनके लिए ऐसी सरकार का निर्माण किया जाए, जो ऐसी सरकार को स्वीकार करने के इच्छुक हों या इतने अनिच्छुक न हों कि इसकी स्थापना में बाधाएँ पैदा करें।
 
2. ऐसी सरकार के स्थायित्व के लिए जो कुछ भी करना आवश्यक हो वह सब करने के लिए इच्छुक और योग्य हो ।

3. ऐसी सरकार के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ऐसे लोगों में जो कुछ सरकार चाहे वह करने के लिए तत्पर और योग्य हों। शासन की जो आवश्यक शर्तें हों वे उन्हें पूरा करने के लिए तैयार हों ।

सरकार के कार्य (Functions of Government )

मिल ने प्रतिनिधि सरकार के निम्नलिखित कार्य निर्धारित किए हैं :-

1. सरकार को व्यक्तियों के विकास के लिए उपर्युक्त वातावरण का निर्माण करना चाहिए।
2. सरकार द्वारा कानूनों का निर्माण कम से कम होना चाहिए क्योंकि कानून व्यक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं और नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करते हैं ।
3. सरकार को आपत्तिजनक कार्यों की समीक्षा करके उनके औचित्य को सिद्ध करना चाहिए।
4. उसे विश्वासघाती शासक गणों को पदच्युत करके उनके उत्तराधिकारियों को नियुक्त करना चाहिए ।
5. उसे बुरे कार्यों की निन्दा करनी चाहिए अर्थात् बचना चाहिए।
6. लोगों को राजनीतिक शिक्षा देनी चाहिए।
7. उसे जनकल्याण के कार्यों पर नियन्त्रण रखना चाहिए।

सच्चे प्रजातन्त्र के लिए सुझाव (Suggestion for a True Democracy) 

 
मिल का विश्वास है कि सभी परिस्थितियों में प्रजातन्त्र सफल नहीं हो सकता। प्रजातन्त्र वहीं सफल हो सकता है, जहाँ नागरिकों में पारस्परिक सष्णुिता, राजनीतिक परिपक्वता, राष्ट्रीय एकता एवं उत्तरदायित्व की भावना हो। लेकिन प्रजातन्त्र सर्वथा दोषमुक्त नहीं होता। इसमें बहुत निरंकुश बन सकता है। शासक जन विरोधी नीतियाँ बनाकर उन्हें जनता पर थोप सकते हैं। सामाजिक दबाव भी मानवीय गुणों को नष्ट कर सकता है। मिल प्रजातन्त्र के सभी दोषों से परिचित था। इसलिए उसने

प्रजातन्त्र को सुद ढ़ बनाने के लिए कुछ दोषों को दूर करने के सुझाव दिए हैं। उसके महत्त्वपूर्ण सुझाव निम्नलिखित हैं :-

1. बहुल मतदान (Plural Voting) :- 

मिल ने समानता के सिद्धान्त पर आधारित 'एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धान्त को एक बुराई माना है। समाज में गुणी व्यक्ति निकृष्ट व्यक्तियों से ज्यादा महत्त्व रखते हैं। अतः उन्हें अधिक वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। उसके अनुसार राज्य की रक्षा बुद्धि और चरित्र से ही हो सकती है। इसलिए उसने प्रजातन्त्र को सच्चे अर्थ में प्रजातन्त्र बनाने के लिए योग्य एवं शिक्षित व्यक्तियों को अशिक्षित एवं मूढ़ व्यक्तियों की तुलना में अधिक महत्त्व दिया है। उसने अल्पसंख्यकों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के साथ-साथ बहुमत के योग्य, शिक्षित एवं पक्षपात रहित विधायकों की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। उसने वयस्क मताधिकार का समर्थन किया है। मिल के अनुसार- "बुद्धिमान, गुणी एवं शिक्षित नागरिकों को बुद्धिहीन, गुणहीन एवं अशिक्षित नागरिकों से अधिक मत देने का अधिकार होना चाहिए।" उसका विश्वास है कि बुद्धिमान, चरित्रवान एवं शिक्षित व्यक्तियों द्वारा ही प्रजातन्त्र की रक्षा की जा सकती है।

2. आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Poportional Representation) :- 

मिल ने लोकतन्त्रात्मक प्रतिनिधि शासन का सबसे बड़ा दोष बहुमत का अत्याचार और अल्पसंख्यकों की घोर उपेक्षा को माना है। इसलिए अल्पसंख्यकों को बहुमत के अत्याचार से मुक्त रखने के लिए साधारण बहुमत के स्थान पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त का समर्थन किया है। उसका कहना है कि साधारण बहुमत प्रणाली में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की कभी आशा नहीं की जा सकती। उनके प्रतिनिधित्व के अभाव में उनके हित असुरक्षित रहते हैं। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा अल्पसंख्यकों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है। उसने इस प्रणाली की उपयोगिता पर विचार करते हुए कहा है कि- "अल्पमत भी बहुमत के समान अधिकार रखते हैं और अल्पमतों की बात देश के शासन संचालन के सम्बन्ध में नहीं सुनी जाती है तो जनतन्त्र की स्थिति को स्वस्थ या सन्तोषजनक नहीं माना जा सकता।" इसलिए जनतन्त्र के दोषों को दूर करने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था होनी आवश्यक है।

3. शैक्षिक योग्यता (Educational Qualifications) :- 

 मिल ने बहुसंख्यकों के शासन को अज्ञानी व निरक्षर लोगों का शासन माना है। उसका कहना है कि देश में अधिकतर संख्या ऐसे लोगों की ही होती है। यदि वोटरों की योग्यता और गुणों को बढ़ाने का प्रयास न किया जाए तो लोकतन्त्र में अल्पबुद्धि और कम योग्यता वाले व्यक्ति ही हावी हो जाएंगे। लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए ऐसे व्यक्तियों को मताधिकार से वंचित कर देना चाहिए। उसने निरक्षर व्यक्तियों को वोट देने के अधिकार का विरोध करते हुए कहा है कि "मैं इस बात को पूर्ण रूप से अस्वीकार करता हूँ कि जो व्यक्ति पढ़ने-लिखने में और गणित के सामान्य सवाल हल करने में समर्थ नहीं है, उसे मतदान में हिस्सा न लेने दिया जाए।" उसने विधायकों के सम्बन्ध में भी ऐसे बुद्धिमान, शिक्षित तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों की आवश्यकता पर बल दिया है, जिन्हें विशिष्ट ज्ञान हो, जो विधायक का अर्थ जानते हों और जिनकी राज्य निष्पक्ष तथा तर्क-सम्मत हो। इस प्रकार लोकतन्त्र को सच्चा व सुदढ़ बनाने के लिए नागरिक व प्रतिनिधियों का शिक्षित होना जरूरी है।

4.सम्पत्ति की योग्यता (Property Qualifications) :- 

मिल ने सम्पत्ति की योग्यता को भी उतना ही महत्त्व दिया है जितना शैक्षिक योग्यता को उसका विचार है कि सम्पत्ति रखने वाले व्यक्ति के पास सम्पत्ति न रखने वाले व्यक्ति की तुलना में उत्तरदायित्व की भावना अधिक होती है। मिल ने कहा है- "यह महत्त्वपूर्ण बात है कि जो सभा कर लगाती है, वह केवल उन्हीं लोगों की होनी चाहिए जो इन करों का भार सहन करते हों। यदि कर न देने वालों को दूसरों पर कर लगाने का अधिकार दिया गया तो वे व्यक्ति आर्थिक मामलों में खूब खर्च करने वाले तथा कोई बचत न करने वाले होंगे।" इस प्रकार के लोगों के हाथ में कर लगाने की शक्ति देना स्वतन्त्रता के मौलिक सिद्धान्त को चुनौती देना होगा। इसलिए कर लगाने का अधिकार उन्हीं व्यक्तियों को मिलना चाहिए जो स्वयं कर अदा करते हों।

5. खुला मतदान (Open Ballot) :- 

मिल के समय में गुप्त मतदान प्रणाली का बोलबाला था। गुप्त मतदान के समर्थकों का मत था कि इससे भ्रष्टाचार कम होता है। लेकिन मिल का मानना है कि गुप्त मतदान से व्यक्ति की स्वार्थमयी प्रव त्तियों का विकास होता है। उसका मानना है कि मतदान का अधिकार सार्वजनिक कर्त्तव्य है। इसलिए उसने मतदान को लोकतान्त्रिक दायित्व मानते हुए खुले मतदान का समर्थन किया है। उसका कहना है कि मतदान एक पवित्र धरोहर है। इसलिए इसका प्रयोग खूब सोच-समझकर और सामान्य हित की भावना को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। यदि गुप्त मतदान प्रणाली के दोषों को दूर करना हो तो नागरिकों को किसी अन्य आधार पर मत का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

6. विधि-निर्माण (Law Making) :- 

मिल का मानना है कि विधि-निर्माण का कार्य योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों के हाथ में ही होना चाहिए। यह कार्य विधान सभा का नहीं है। इस कार्य के लिए विधि आयोग को करना चाहिए और इसके सदस्य सिविल सर्विस के व्यक्ति होने चाहिएं। इन कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखने व उन्हें पद से हटाने का अधिकार विधान-सभा के पास हो सकता है। कानूनों को पास करने का कार्य विधानसभा का हो सकता है। इस व्यवस्था द्वारा मिल ने शासन के कार्यों का संचालन योग्य व्यक्तियों द्वारा तथा कानून बनाने का अधिकार भी इन्हीं व्यक्तियों के हाथों में सौंपने का समर्थन किया है। इस प्रकार मिल ने श्रेष्ठ शासन में प्रजातन्त्र और कार्यकुशलता के बीच समन्वय स्थापित करने का समर्थन किया है। उसने लोकतन्त्र के स्वरूप को विशुद्ध बनाने का प्रयास किया है।

7. द्वितीय सदन (Second Chamber) :- 

मिल ने द्वितीय सदन की स्थापना का समर्थन किया है। उसने इसकी स्थापना हित प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के आधार पर करने का प्रयास किया है। उसका मानना है कि इससे निम्न सदन की निरंकुशता पर रोक लगती है। इस सदन के सदस्य बुद्धिमान, शिक्षित, सभ्य और राजनीति में निपुण होते हैं। ये व्यक्ति निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सार्वजनिक हित में कार्य करते हैं। ये निम्न सदन द्वारा पारित विधियों में सुधार लाते हैं। अतः यह सदन लोकतन्त्र की नींव को मजबूत आधार प्रदान करता है।

8. वेतन और भत्ता निषेध (No Salary and no Allowance) :- 

मिल का मानना है कि यदि संसद सदस्यों को वेतन और भत्ते दिए गए तो लोग आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए संसद सदस्य बनने का प्रयास करने लग जाएँगे। संसद में असक्षम व अयोग्य व्यक्तियों का प्रवेश शुरू हो जाएगा। लोगों की निष्काम सेवा की भावना संसद सदस्यों से दूर हो जाएगी। संसद महत्त्वाकांक्षी लोगों का अखाड़ा बन जाएगी। इसलिए मिल ने संसद सदस्यों के लिए वेतन व भत्तों की व्यवस्था से इंकार किया है।

9. चुनाव पद्धति (Election Method) :- 

मिल का कहना है कि बौद्धिक दष्टि से योगय व्यक्तियों को ही चुनाव लड़ने का अधिकार मिलना चाहिए। अच्छे लेखक या सामाजिक कार्यकर्ता तथा किसी दल के सदस्य न होने पर भी ख्याति प्राप्त व्यक्तियों को चुनाव में चुन लिया जाना चाहिए। चुनाव पूरे राज्य में एक साथ ही कराए जाने चाहिएं। चुनावों का खर्च उम्मीदवार पर नहीं डालना चाहिए। उसका मत है कि मतों की केवल गिनती ही नहीं, बल्कि उनका वजन भी होना चाहिए।

10. महिला मताधिकार (Women Suffrage) :- 
मिल ने महिला मताधिकार का पूरा समर्थन किया है। उसका कहना है कि न्याय की माँग है कि महिलाओं और पुरुषों दोनों पर शासन केवल पुरुष द्वारा ही संचालित नहीं होना चाहिए। उसका मानना है कि यदि महिलाओं पर से पुरुषों का स्वामित्व समाप्त कर दिया जाए तो वे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। इसलिए उसने कहा है- "मैं राजनीतिक अधिकारों के सम्बन्ध में लिंग भेद को उसी प्रकार सर्वथा अनुचित मानता हूँ जिस प्रकार बालों के रंग को यदि दोनों में कोई भेद हो भी तो महिलाओं को पुरुष की अपेक्षा अधिक अधिकारों की आवश्यकता है, क्योंकि वे शारीरिक द ष्टि से अबला है और अपनी रक्षा के लिए कानून तथा समाज पर ही आश्रित है।" इस तरह मिल ने महिला मताधिकार व महिला शिक्षा का जोरदार समर्थन करके इंगलैण्ड में महिलाओं के सुधार की वकालत की है।

उपर्युक्त तर्कों से यह सिद्ध हो जाता है कि मिल अपने समय के असन्तुष्ट लोकतन्त्रवादी विचारक थे। उन्होंने तत्कालीन शासन-व्यवस्था में जो बुराइयाँ देखीं, उनसे वे काफी असन्तुष्ट थे। उन सभी बुराइयों को दूर करने के लिए ही उसने अपने सुधारवादी सुझाव प्रस्तुत किए। उसने लोकतन्त्र की रक्षा के जो उपाय बताए, उनसे उसके महत्त्व में और अधिक व द्धि हुई। उसके सुझावों को अनेक देशों में अपनाया गया। इसलिए उसके सुझाव शाश्वत मूल्यों पर आधारित माने जा सकते हैं। उसके विचारों का महत्त्व आज भी है।

आलोचनाएँ (Criticisms)

तर्कपूर्ण और बौद्धिकता के गुण पर आधारित होते हुए भी मिल के शासन सम्बन्धी विचारों की व्यावहारिक आधार पर अनेक आलोचनाएँ हुई हैं। उसकी आलोचना के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं :-

1. यदि मिल के मतदाता की योग्यता का मापदण्ड लागू किया जाए तो भारत जैसे बड़े देश में कुछ ही प्रतिशत लोगों को यह अधिकार प्राप्त होगा क्योंकि यह सम्भव नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को इतिहास, भूगोल और गणित की जानकारी हो। अतः इस सिद्धान्त को लागू करना न्यायसंगत नहीं हो सकता।

2. मिल का बहुल मतदान का सिद्धान्त भी व्यवहार में लागू नहीं हो सकता क्योंकि राजनीतिक योग्यता का कोई औचित्यपूर्ण आधार तलाशना कठिन कार्य होता है।

3. मिल ने संसद सदस्यों के लिए वेतन और भत्तों का निषेध किया है। इससे अमीर व्यक्ति ही संसद सदस्य बनेंगे। गरीब व्यक्ति या मध्यम वर्ग के व्यक्ति प्रतिनिधि बनना नहीं चाहेंगे। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि आर्थिक कारणों से भी व्यक्ति राजनीतिक कार्यकलापों में भाग लेते हैं। मनुष्य सदैव धन सम्पत्ति में व द्धि करना चाहता है।

4. मिल का यह विचार कि मतों की गणना के साथ-साथ उनका वजन भी किया जाए, बड़ा उचित प्रतीत होता है। परन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब जनता का नैतिक स्तर ऊँचा हो। लोगों में स्वार्थ की भावना के रहते इसे लागू करन कठिन कार्य है ।

5. मिल ने मतदाता के लिए शैक्षिक योग्यता को आवश्यक माना है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करती है। परन्तु व्यावहारिक अनुभव का भी विशेष महत्त्व है। सूरदास व कबीर के पास कोई शैक्षणिक योग्यताएँ न होने पर भी उनके ज्ञान के आगे संसार नतमस्तक होता है।

6. मिल ने आनुपातिक प्रतिनिधित्व का समर्थन किया है। इससे किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होने के कारण स्थायी सरकार की स्थापना कर पाना असम्भव है।

7. मिल का खुले मतदान का समर्थन करना सामाजिक द्वेष को जन्म देता है। इसको अपनाने से समाज में सामाजिक सद्भाव समाप्त हो सकता है। इससे प्रजातन्त्र आतंकवादी ओर वर्गतन्त्रीय व्यवस्था का रूप ले सकता है।

8. मिल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से प्रत्येक दल को कुछ न कुछ सीटें अवश्य प्राप्त हो जाती हैं। इससे राजनीतिक दलों में अनावश्यक व द्धि होती है। असीमित राजनीतक दल राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देते हैं।

9. मिल ने संसद के कार्यों को सीमित करके उसे वाद-विवाद का केन्द्र बना देना उचित नहीं है। इससे संसद का कानून बनाने और प्रशासन करने के अधिकारों में कमी आती है।

10. मिल का यह सिद्धान्त प्रजातन्त्र की भावना के विपरीत है कि धनी व्यक्तियों को तो अनेक मत का अधिकार दे दिया जाए और अशिक्षितों को एक वोट का अधिकार भी प्राप्त न रहे। मिल ने लोकतन्त्र के आधार 'समानता के सिद्धान्त' पर ही कुठाराघात कर दिया है। अतः मिल का यह सिद्धान्त अप्रजातान्त्रिक है।

इन आलोचनाओं के बावजूद भी मिल को लोकतन्त्र का सशक्त समर्थक और वफादार सेवक माना जाता है। उसने प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत चरित्र पर बल देकर प्रजातन्त्र को जो आध्यात्मिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया है, वह आधुनिक राजनीतिक वातावरण में मुख्य माँग है। उसने मानव-कल्याण की भावना पर आधारित लोकतन्त्र को सच्चा लोकतन्त्र माना है। उसने लोकतन्त्र को सुद ढ़ बनाने के लिए जो सुझाव दिए हैं, वे आज भी प्रासंगिक हैं। उसने प्रजातन्त्रीय और प्रशासनिक दक्षता के तत्त्वों का समन्वय करने का जो सुझाव दिया है, वह उसकी राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचायक है। उसके द्वारा महिला मताधिकार का समर्थन भी नितान्त औचित्यपूर्ण है। उसके विचारों का महत्त्व शाश्वत है।

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