जॉन स्टुअर्ट मिल का स्वतंत्रता का सिद्धांत ( John Stuart Mill's theory of liberty )
स्वतन्त्रता का सिद्धान्त (Theory of Liberty )
जॉन स्टुअर्ट मिल के स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार उनके राजनीतिक चिन्तन को एक महत्त्वपूर्ण व अमूल्य देन है। मिल द्वारा लिखा या ग्रन्थ 'आन लिबर्टी' (On Liberty) उसके स्वतन्त्रता विषयक विचारों का विस्त त लेखा है। इस पुस्तक में उसने स्वतन्त्रता के स्वरूप एवं महत्त्व पर व्यापक रूप में चर्चा की है। उसकी इस पुस्तक की तुलना मिल्टन की 'एरोपेजिटिका' (Aeropagitiaca) से की जाती है। इस पुस्तक में स्वतन्त्रता के मूल्यों को सर्वसमर्थित मिल की भावना के कारण उसे स्वतन्त्रता के उपासकों की श्रेणी में अभूतपूर्व स्थान प्राप्त हुआ है। इस पुस्तक में धारा प्रवाह भाषा और तार्किक शैली का भरपूर प्रयोग हुआ है। यह पुस्तक सभी तरह के निरंकुशवाद के विरुद्ध एक मुखर आवाज है। इसलिए इस पुस्तक को एक सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है और मिल को एक सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक चिन्तक ।
स्वतन्त्रता के प्रकार (Types of Liberty)
मिल के अनुसार स्वतन्त्रता के दो प्रकार हैं :-
(i) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (Freedom of Thought and Expression)
(ii) कार्यों की स्वतन्त्रता (Freedom of Action)
विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (Freedom of Thought and Expression)
मिल का मानना है कि व्यक्ति को विचार व अभिव्यक्ति की पूरी स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए ताकि व्यक्ति और समाज दोनों का सम्पूर्ण विकास हो सके। समाज में परिवर्तन का आधार स्वतन्त्र विचार एवं स्वतन्त्र अभिव्यक्ति ही होते हैं। इनके अभाव में समाज की प्रगति रुक जाती है। समाज की प्रगति के लिए वह सनकी व्यक्तियों की भी पूरी स्वतन्त्रता देने का पक्षधर है। लेकिन उसने मानसिक रूप से विकलांग, पिछड़ी जातियों व बच्चों को स्वतन्त्रता देने का विरोध किया है, क्योंकि इन पर दूसरों के विवेक का प्रभुत्व रहता है। उसका कहना है कि यदि स्वतन्त्र विचार उत्पन्न न हो तो समाज शीघ्र ही अपरिवर्तनशील व रूढ़िवादी हो जाता है। उसके अनुसार किसी व्यक्ति के विचारों पर प्रतिबन्ध लगाने का अधिकार न तो समाज को है और न ही किसी व्यक्ति को ऐसा प्रतिबन्ध व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर है। मिल ने कहा है- "यदि एक व्यक्ति को छोड़कर सारी मानव जाति का मत एक हो तो भी मानव जाति को उस एक व्यक्ति को बलपूर्वक चुप करने का कोई अधिकार नहीं है। जैसे यदि उस एक व्यक्ति के पास शक्ति होती है, तो उसे मानव जाति को चुप कराने का अधिकार नहीं होता।" मिल ने अपने विचार के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत किए हैं।
विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of freedom of Thought and Expression):
1. मिल का विश्वास है कि प्रत्येक समाज की कुछ धारणाएँ व परम्पराएँ होती हैं। उनका एकमात्र आधार समाज का विश्वास होता है। व्यक्ति को ऐसे विश्वास पर आधारित परम्पराओं व धारणाओं के प्रति उन्मुक्त विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए। यदि उसे स्वतन्त्रता से वंचित किया जाएगा तो नई विचारधारा का प्रचार नहीं होगा। ऐसा न होना समाज के लिए घातक होता है। अक्सर यह सम्भव हो सकता है कि प्राचीन विचारधारा की जगह नवीन विचारधारा सत्य हो मिल ने कहा है कि- “यदि केवल एक व्यक्ति को छोड़कर समूची मानव-जाति एक विचार को मानने वाली हो तो भी मानव जाति के लिए यह न्यायसंगत नहीं है कि वह विरोधी मत रखने वाले व्यक्ति का दमन करे या वह एक व्यक्ति शक्ति सम्पन्न होने पर मानव जाति के विचार का दमन करे।" मिल के इतिहास को साक्षी बनाकर सुकरात और ईसा के ऐतिहासिक द ष्टान्तों के द्वारा इस बात को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया है कि इन दोनों की उपेक्षा करके तत्कालीन समाज ने नवीन सत्यों का दमन किया है। मिल ने कहा है- "मानव जाति को बार-बार यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि किसी जमाने में यूनान में सुकरात नाम का एक व्यक्ति था जिसके विचारों तथा तत्कालीन समाज के प्रचलित कानूनों के मध्य एक संघर्ष हुआ था। उसके विरोधी किन्तु सत्य विचारों के बावजूद भी उसे ही म त्युदण्ड दिया था।" इसी तरह ईसा मसीह का उदाहरण देते हुए वह कहता है- "मानव जाति को बार-बार यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि येरूशलम से जीसस क्राइस्ट को समाज ने सूली पर चढ़ा दिया था, क्योंकि वह समाज द्वारा मान्य विचारों के प्रतिकूल विचार व्यक्त करता था। परन्तु इतिहास साक्षी है कि उसके विचार समाज के विचारों की तुलना में अधिक अच्छे थे।" इसलिए सत्य का रूप निखारने के लिए उसका दमन करना न्यायसंगत नहीं है। यदि ईसा और सुकरात का दमन न किया जाता तो समाज को आधुनिक बनाने वाली परिस्थितियाँ पहले ही उत्पन्न हो जातीं। इसलिए यदि सामाजिक प्रगति की इच्छा रखनी है तो सत्य को पुष्ट करने के लिए विचारों एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करनी चाहिए, उसका दमन समाज की प्रगति रोकता है।
2. सत्य के दमन का भ्रम विचारों की स्वतन्त्रता न देने का एक दुष्परिणाम सत्य का दमन है। इसका अर्थ समाज की उपयोगिता का दमन करना है। जब हम कानूनी दण्डविधान द्वारा या सार्वजनिक निन्दा द्वारा किसी के विचार को दबाते हैं तो यह सम्भव है कि हम सत्य का दमन कर रहे हैं। मिल का कहना है कि यह विचार भ्रान्तिपूर्ण है कि जिस बात को बहुमत मानता हो वह सत्य हो। उसने गैलिलियो के विचार का उदाहरण दिया है। गैलिलियो के विचार में पथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। लेकिन तत्कालीन समाज के अधिकांश व्यक्तियों के मत में सूर्य पथ्वी के चारों ओर घूमता है। इस विषय में समाज द्वारा प्रचलित नियम व मान्यताएँ असत्य हो सकते हैं। इन विचारों के स्थान पर सत्य को स्थापन करने वाले व्यक्तियों के विचारों के प्रयत्नों को महत्त्व न देना समाज की प्रगति को रोकता है। इसलिए इन सत्य विचारों को पूरा महत्त्व प्रदान करना चाहिए।
3. परस्पर विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति सत्य को समुचित रूप में स्पष्ट करने के लिए विचार की स्वाधीनता आवश्यक है। वाद-विवाद से सत्य का स्वरूप निखरता है। यह स्वाभाविक ही है कि एक ही समय एक विषय पर अनेक मत होते हैं जो परस्पर विरोधी हो सकते हैं। हर मत के समर्थकों की द ष्टि में उनका अपना मत सम्पूर्ण सत्य और दूसरों का मत अर्द्ध सत्य या असत्य होता है। विरोधी विचारों का उत्तर देने के लिए उसे तर्क पर कसना आवश्यक हो जाता है। इससे सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है। अन्धविश्वास समाज की प्रगति के लिए घातक होते हैं। अतः स्वतन्त्र विचार तथा तर्क द्वारा सत्य को सुदढ़ बनाया जा सकता है। मिल का विश्वास है कि वही विचार सत्य का रूप धारण करता है जो तर्क रूपी संघर्ष में विजय प्राप्त करता है। अतः राज्य को विचार और भाषण की स्वतन्त्रता देनी चाहिए।
4. सत्य के विभिन्न पहलू होते हैं मिल का मानना है कि सत्य किसी एक व्यक्ति की धरोहर नहीं है। सत्य का रूप विराट है और उसके अनेक पहलू हैं। सत्य की खोज में मनुष्य की स्थिति अन्धों जैसी होती है। हम सत्य के समग्र रूप का दर्शन नहीं कर सकते, किन्तु अपने अनुभव के आधार पर आंशिक रूप को ही पूर्ण समझने का आग्रह करते हैं। अतः सत्य के वास्तविक रूप को समझने के लिए उसे जितने अधिक द ष्टिकोणों से देखने की व्यक्तियों को स्वतन्त्रता प्रदान की जाएगी, हम उतना ही सत्य को अधिक अच्छे रूप में समझने में समर्थ होंगे। ये विभिन्न द ष्टिकोण एक-दूसरे के विरोधी न होकर पूरक ही हैं। इनको समझनेके लिए व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करनी चाहिए।
5. विचारों की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध हानिकारक होता है मिल का मानना है कि सत्य की खोज एक निरन्तर प्रक्रिया है। विचारों की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध से न केवल इस खोज में विघ्न पड़ता है, अपितु इस पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे व्यक्ति का बौद्धिक, मानसिक एवं चारित्रिक विकास का मार्ग अवरुद्ध होता है। विचारों की स्वतन्त्रता से समाज की प्रगति तथा व्यक्ति के नैतिक चरित्र का विकास होता है। इसलिए विचारों की स्वतन्त्रता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए लाभदायक है।
इस प्रकार उपर्युक्त तर्कों के आधार पर मिल ने विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर किसी भी प्रकार के प्रतिबन्ध का खण्डन किया है। उसने विचारों की स्वतन्त्रता को मानव जाति की प्रगति का आधार बताया है।
कार्यों की स्वतन्त्रता
मिल का कहना है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तभी सार्थक हैं जब व्यक्ति को कार्य करने की स्वतन्त्रता प्रदान की जाए। स्वतन्त्र कार्य के अभाव में स्वतन्त्र चिन्तन की तुलना ऐसे पक्षी से की जा सकती है जो उड़ना तो चाहता है लेकिन उसके पर कुतर दिये गये हों। मिल का मानना है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास तभी सम्भव है जब व्यक्ति को कार्यों की स्वतन्त्रता प्राप्त हो। कार्यों की स्वतन्त्रता सामाजिक जीवन की प्रगति के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी व्यक्तिगत जीवन के लिए। मिल का कहना है- "सम्पूर्ण मानव जाति के विकास के लिए जिस प्रकार विचारों की स्वतन्त्रता लाभदायक है; उसी प्रकार जब तक दूसरों को हानि नहीं पहुँचती हो तब तक विभिन्न व्यक्तियों को विभिन्न रूपों से कार्य करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए जिससे वे अपने चरित्रों का विकास विभिन्न रूपों से कर सकें। "
कार्यों की स्वतन्त्रता के सन्दर्भ में मिल ने कार्यों को दो भागों में बाँटा है :-
(i) स्व-विषयक कार्य (Self-ragarding Action)
(ii) पर विषयक कार्य (Other-regarding Action ) मिल का कहना है कि ऐसे कार्य जिनका प्रभाव करने वाले पर ही पड़ता है, दूसरों पर नहीं पड़ता, स्वविवेक के अन्तर्गत आते हैं। खाना, पीना, सोना, नहाना आदि स्व-विषयक कार्य हैं। शराब पीना व जुआ खेलना भी इस श्रेणी में आते हैं। ऐसे कार्य जो दूसरे व्यक्तियों पर अपना प्रभाव डालते हैं, पर-विषयक कार्यों के अन्तर्गत आते हैं। इन्हें सामाजिक कार्य भी कहा जाता है। चोरी करना, शोर मचाना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना, शान्ति भंग करना आदि कार्य इस श्रेणी में आते हैं।
मिल का कहना है कि आत्म-विषयक या स्व-कार्यों के सम्बन्ध में व्यक्ति को पूर्ण स्वतन्त्रता दी जानी चाहिए। इसमें राज्य का हस्तक्षेप ठीक नहीं है। उसने कहा है कि व्यक्ति का आहार, वेशभूषा, रहन-सहन समाज में प्रचलित पद्धति से भिन्न हो तो भी उसको पूर्ण स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। परन्तु यदि उसके कार्यों से समाज को हानि पहुँचती हो तो उस पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। यदि एक व्यक्ति शराब पीकर झगड़ा करता है तो उस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। मिल का कहना है कि "किसी व्यक्ति को अपने आपको दूसरों के लिए दुःखदायी नहीं बनाना चाहिए।" मिल ने कार्य करने के क्षेत्र में व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने का समर्थन किया है।
कार्यों की स्वतन्त्रता के पक्ष में तर्क
मिल ने कार्य की स्वतन्त्रता का समर्थन तीन तर्कों के आधार पर किया है :-
1 मिल ने वैयक्तिक अनुभव द्वारा चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व के विकास की बात स्वीकार की है। उसने एक शराबी का उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि एक शराबी शराब पीना दो तरीकों से छोड़ सकता है। प्रथम यदि सरकार शराबबन्दी कानून बनाकर लागू कर दे। दूसरा वह स्वयं समझ जाए कि इससे उसका व उसके परिवार का अहित हो रहा है। इनमें से उसका अनुभव पर आधारित शराब छोड़ने का निर्णय ही अधिक उत्कृष्ट है। जब व्यक्ति आत्मसंघर्ष द्वारा बुराई का त्याग करता है तो उससे उसके चरित्र का निर्माण होता है। इसलिए व्यक्ति को अन्य नागरिकों को हानि न पहुँचाने वाले कार्यों को करने की अधिक से अधिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए।
2. मिल ने मनुष्यों को सामाजिक रीति-रिवाजों और परम्पराओं से मुक्त करने का समर्थन इसलिए किया है कि वे सामाजिक विकास में बाधा डालते हैं। इसलिए व्यक्तित्व के विकास के लिए राज्य द्वारा व्यक्ति को कार्यों की पूरी स्वतन्त्रता प्रदान करनी चाहिए।
3. व्यक्तियों को पूर्ण स्वतन्त्रता देने का एक प्रबल तर्क नवीनता और आविष्कार का है। मिल का कहना है कि जनता प्रायः लकीर की फकीर होती है। समाज का विकास नवीन आविष्कारों के कारण होता है। इसलिए व्यक्तियों को नवीन परीक्षण करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देनी चाहिए। समाज की उन्नति स्वतन्त्रतापूर्ण वातावरण में ही सम्भव है।
स्वतन्त्रता पर सीमाएँ (Limitations on Freedom)
मिल ने इस बात को स्वीकार किया है कि विशेष परिस्थितियों में व्यक्ति की स्वतन्त्रता को सीमित किया जा सकता है। मिल के अनुसार ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हो सकती हैं :-
1. स्वतन्त्रता का दुरुपयोग : -
यदि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता से दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता को कोई हानि पहुँचने की सम्भावना हो तो इस पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति चोरी करता है तो उसे इस कार्य से रोका जा सकता है, क्योंकि इससे दूसरे को हानि होती है और चोरी करने वाले का स्वयं का भी नैतिक पतन होता है। इसी तरह यदि मदिरा पीकर कोई व्यक्ति दंगा करता है तो उस पर प्रतिबन्ध लगाना उचित है। अतः राज्य को सामाजिक प्रगति की द ष्टि से अहितकर कार्यों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए।
2. राज्य व समाज की सुरक्षा :-
जब राज्य व समाज की सुरक्षा को कोई खतरा हो तो व्यक्ति की स्वतन्त्रता का कुछ अंश प्रतिबन्धित किया जा सकता है। राज्य पर आक्रमण के समय सभी नागरिकों से अनिवार्य सैनिक सेवा की व्यवस्था की माँग की जा सकती है। यदि किसी नगर में चोरी का भय हो तो राज्य नागरिकों को पहरा देने के लिए कह सकता है, किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध विशेष परिस्थितियों में ही लगाए जाने चाहिएं।
3. कर्त्तव्यपालन से विमुखता :-
यदि कोई व्यक्ति अपने कर्त्तव्य के प्रति विमुख हो जाए तो उसकी स्वतन्त्रता पर रोक लगाई जा सकती है। यदि कोई पुलिस कर्मचारी अपनी ड्यूटी के समय पर मदिरापान करके जनता को परेशान करता है तो राज्य उसके इस स्व-कार्य पर पर कार्य समझकर प्रतिबन्ध लगा सकता है, क्योंकि इससे शान्ति भंग होती है। इसलिए कोई व्यक्ति स्व-कार्य की आड़ में दूसरों के हित में बाधा नहीं पहुँचा सकता ।
4. स्व-अहित की दष्टि से किए गए कार्यों पर यदि कोई व्यक्ति आत्म हत्या का प्रयास करता है तो उसे समाज के द्वारा रोका जा सकता है, क्योंकि आत्म-हत्या करना एक पाप है। यह सामाजिक मानदण्डों के विरुद्ध है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति टूटे हुए पुल को पार करना चाहे तो राज्य उसकी सुरक्षा की द ष्टि से उसे पुल पार करने से रोक सकता है।
स्वतन्त्रता- सिद्धान्त के अपवाद (Exception of Theory of Freedom)
मिल के स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों के निम्न अपवाद हैं :-
1. पिछड़ा वर्ग : मिल का मानना है कि इस वर्ग में शिक्षाका अभाव और मानसिक अपरिपक्वता होती है। इसलिए इस वर्ग के उत्थान के लिए राज्य को कार्यशील होना चाहिए। जब तक वे अन्य वर्गों के समान न हो जाएँ उनकी स्वतन्त्रता में लगातार व द्वि करते रहना चाहिए। जब तक वे पिछड़े रहें, उनको उक्त स्वतन्त्रताएँ प्रदान नहीं की जानी चाहिएं।
2. नाबालिग : मिल का कहना है कि अव्यस्क व्यक्ति मानसिक तौर पर विकसित नहीं होते। उन्हें दूसरों के विवेक पर ही कार्य करने पड़ते हैं। दूसरों के विवेक पर आश्रित रहने के कारण वे स्वतन्त्रता का सदुपयोग नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की जा सकती ।
3. मानसिक रूप से विकलांग : मिल मानसिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों को भी स्वतन्त्रता देने का विरोध करता है। उसका कहना है कि इन व्यक्तियों में अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता। इसलिए ये समाज अहित के कार्य कर सकते हैं। अतः इनको स्वतन्त्रता प्रदान नहीं करनी चाहिए।
4. दुश्चरित्र व्यक्ति : मिल दुश्चरित्र व्यक्तियों की स्वतन्त्रता प्रदान करने के विरुद्ध हैं। उनका मानना है कि इस तरह के व्यक्ति समाज की प्रगति में बाधक होते हैं। यदि इन्हें हर तरह की स्वतन्त्रता प्रदान की जाए तो ये समाज में विघटन को ही बढ़ावा देते हैं, विकास को नहीं।
आलोचनाएँ (Criticisms)
मिल के स्वतन्त्रता मिल के स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार निस्सन्देह राजनीतिक दर्शन के इतिहास में महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अनेक आलोचनाओं का शिकार हुए हैं। अनेक विद्वानों ने विभिन्न दार्शनिक एवं व्यावहारिक द ष्टिकोणों से उसकी आलोचना की है। बार्कर, लिंडसे, सेबाइन, डेविडसन आदि आलोचकों ने उसके विचारों को अमान्य व अनुपयुक्त बताया है। बार्कर ने उसे रिक्त स्वतन्त्रता' तथा 'अपूर्ण व्यक्ति का मसीहा' कहा है।
उसके स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों की आलोचना के निम्न आधार हैं:-
1. समानता का अभाव (Absence of Equality) मिल ने स्वतन्त्रता पर तो जोर दिया है, लेकिन समानता की उपेक्षा की है। स्वतन्त्रता की सार्थकता के लिए समानता आवश्यक है। इसके अभाव में स्वतन्त्रता को स्थायित्व प्रदान नहीं किया जा सकता।
2. सीमित द ष्टिकोण मिल ने पिछड़े वर्ग, बच्चों, मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को अपनी स्वतन्त्रता की परिधि से बाहर रखा है। ऐसा करने से इनका विकास का मार्ग रुक जाएगा और समाज की आमधारा से कट जाएँगे।
3. अधिकारों का अभाव ( Absence of Rights): मिल ने केवल स्वतन्त्रता पर तो जोर दिया है लेकिन अधिकारों की उपेक्षा की है। स्वतन्त्रता के अर्थपूर्ण प्रयोग के लिए अधिकारों का होना आवश्यक है। स्वतन्त्रता और अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के अभाव में दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं। बार्कर के अनुसार "अधिकारों के बारे में मिल के पास कोई स्पष्ट दर्शन नहीं था, जिसके आधार पर स्वतन्त्रता की धारणा को कोई यथार्थ रूप प्राप्त होता।" अधिकारों के अभाव में व्यक्ति सच्ची स्वतन्त्रता का उपभोग नहीं कर सकता।
4. व्यक्ति अपने हितों का श्रेष्ठ निर्णायक नहीं मिल की यह मान्यता है कि व्यक्ति अपने हित का स्वयं निर्णायक होता है। किन्तु आधुनिक जटिल आर्थिक समाज में एक सामान्य व्यक्ति अपने हितों को सही रूप में नहीं समझ सकता। इसके लिए उसे दूसरों की मदद की आवश्यकता पड़ती है।
5. अवैज्ञानिकता मिल ने कहा है कि व्यक्ति अपने मन और शरीर का स्वामी है। इस धारणा को वैज्ञानिक आधार पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। सत्य तो यह है कि व्यक्ति स्वार्थी और अज्ञानी है। वह अपना स्वामी न होकर अपनी प्रकृति का दास हैं
6. अल्पमतको बहुमत से अधिक महत्त्व मिल ने बहुमत की निरंकुशता की तुलना में अल्पमत को अधिक महत्त्व दिया है। उसने बहुमत को गलत धारणाओं के आधार पर स्वेच्छाचारी मानने की भूल की है। बहुमत सदा आततायी नहीं होता। आधुनिक युग में बहुमत का शासन सर्वश्रेष्ठ है।
7. कार्य- स्वतन्त्रता का भ्रामक विभाजन मिल द्वारा कार्य करने की स्वतन्त्रता के सन्दर्भ में व्यक्ति के कार्यों को स्व-विषयक (Self-regarding) तथा पर-विषयक (Othe-regarding) में बाँटना भ्रान्तिपूर्ण और असम्भव है। व्यवहार में व्यक्ति के कार्यों में ऐसा भेद नहीं किया जा सकता। मिल के अनुसार शराब पीना स्व-विषयक कार्य है क्योंकि इससे पीने वाले पर ही प्रभाव पड़ता है। किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसका प्रभाव समाज के दूसरे व्यक्तियों पर भी पड़ता है। ऐसा कोई भी स्व-विषयक कार्य नहीं होता जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में दूसरों पर न पड़ता हो। इसलिए मिल के स्वकार्य पर पर कार्य सम्बन्धी विचार दोषपूर्ण हैं।
8. सनकी व्यक्तियों की स्वतन्त्रता मिल ने सनकी व्यक्तियों को भी पूरी स्वतन्त्रता देने का समर्थन किया है उसका मानना है कि ये व्यक्ति ही समाज की प्रगति का मार्ग खोलते हैं। इसलिए वह इन व्यक्तियों में सुकरात व ईसा मसीह का रूप देखता है। सत्य तो यह है कि सभी सनकी व्यक्ति सुकरात या ईसा मसीह नहीं हो सकते। सनकीपन चरित्र की दुर्बलता का प्रतीक होता है, न कि उत्कृष्टता का सनकी व्यक्ति प्रायः मनोविज्ञान के प्रयोगों से विकृत मानसिकता वाले ही सिद्ध हुए हैं। इसलिए इन्हें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करना समाज व राज्य दोनों के लिए अहितकर है।
9. खोखली और नकारात्मक स्वतन्त्रता: बार्कर ने मिल को 'खोखली स्वतन्त्रता का पैगम्बर' कहा है। उसके पास अधिकारों के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट दर्शन नहीं था। मिल ने 'बन्धनों के अभाव' को स्वतन्त्रता का नाम दिया है। दूसरी तरफ वह राज्य के हस्तक्षेप का भी समर्थन करता है।
10. विरोधाभास मिल एक तरफ तो कहता है कि व्यक्ति अपने शरीर और विचार का एकमात्र स्वामी है और इसलिए उसे किसी भी मनचाहे कार्य को करने की पूरी स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर सामाजिक नियन्त्रण का पक्ष लेता है। इससे पहले विचार का विरोध होता है।
11. वाद-विवाद की पवित्रता मिल का कहना है कि सत्य की खोज के लिए वाद-विवाद जरूरी होते हैं। लेकिन सत्य तो यह है कि वाद-विवाद में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थवश ऐसा करता है। प्रत्येक संगठन तथा राजनीतिक दल, समचार पत्र, श्रमिक संगठन आदि वाद-विवाद के माध्यम से अपने हितों की रक्षा करते हैं, न कि सत्य की खोज सत्य की खोज वाद-विवाद द्वारा नहीं, अपितु चिन्तन के द्वारा की जा सकती है। महात्मा गांधी, ईसा, सुकरात, गौतम बुद्ध आदि महापुरुषों ने चिन्तन एवं आत्मानुभूति के द्वारा ही सत्य की खोज की, न कि वाद-विवाद द्वारा ।
मिल के स्वतन्त्रता विषयक विचारों की चतुर्दिक आलोचना हुई। बार्कर ने उसे 'खोखली स्वतन्त्रता का मसीहा' कहा। बेवर, मैक्सी, लिंडसे आदि विद्वानों ने उसे 'निरंकुश स्वतन्त्रता का प्रतिपादक' बताया। लेकिन इससे मिल का महत्त्व कम नहीं हुआ है। आज राज्य व्यक्ति के सम्पूर्ण कार्यों का नियमन करता है। मनुष्य के जन्म से लेकर म त्यु तक राज्य का नियन्त्रण होता है। मिल की स्वतन्त्रता की पुकार मानव व्यक्तित्व की गरिमा की रक्षा के लिए एक अमोघ अस्त्र प्रतीत होती है। मिल का कथन आज भी सत्य है कि स्वतन्त्रता के वातावरण में ही मनुष्य का सर्वागीण विकास सम्भव है। मिल के स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार राजनीतिक दर्शन के इतिहास में उसकी शाश्वत व अमूल्य देन हैं। मैक्सी ने कहा है कि- "मिल ने वही उत्कृष्टता प्राप्त की है, जो मिल्टन, स्पिनोजा, वाल्टेयर, रूसो, पेन, जैफरसन के विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के विचारों से प्राप्त हुई है। "