यह कहानी उस महिला कि जिसका जन्म छोटी जाति ( दलित ) में , लेकिन सपना था हिरोइन बनने का , सिर्फ अपने नाम और दलित हिरोइन होने की वजह से , जातिवाद की आग में घर , सपना और पहचान सब कुछ एक ही दिन में ख़त्म हो गया |
कम उम्र में पिता की मौत, घास बेचकर चलाया घर
कहानी शुरू होती है 1903 के गुलाम भारत से । अंग्रेजों की गुलामी तो थी ही, साथ ही जातिवाद, छुआछूत और जातिभेद भी काफी था ।
पीके रोजी (राजाम्मा) का जन्म नंदकोड़े, तिरुवनंतपुरम में एक गरीब दलित परिवार में हुआ। घर में थे मां-बाप और एक छोटी बहन ।
जैसे-तैसे घर का गुजारा होता, लेकिन मुश्किलें तब बढ़ गईं जब पिता भी चल बसे | जिम्मेदारी आई तो रोजी बचपन में कमाने निकल पड़ीं।
कमाई का इकलौता जरिया था घास काटकर बेचना । इसी से गुजारा होता। 1920-25 के बीच दर-दर भटक रहे लावारिस परिवार को चाचा घर ले आए।
छोटी जाति की राजम्मा ने देखा था ऊंचा सपना
दलित मजदूर रोजी को हमेशा से नाच-गाने का शौक था। उस समय दो ही तरह के लोग डांस सीखा करते थे या तो ऊंचे घराने के लोग या फिर तवायफें।
इस कारण घर में उसके इस शौक को अच्छा नहीं माना गया। फिर भी रोजी की लगन देख उसके चाचा ने उसे आर्ट स्कूल में दाखिला दिलवा दिया।
आर्ट्स स्कूल में रोजी ने कक्काराशी फोक डांस सीखा, जिसमें शिव-पार्वती के धरती पर आने की कहानी डांस और गाने के जरिए दिखाई जाती थी ।
रोजी के डांस करने से परिवार नाखुश था दादाजी ने उसे रिहर्सल पर जाने से रोका, लेकिन रोजी स्कूल जाती रही तो समाज ने भी विरोध किया।
मां से दूरी, परिवार से बगावत और धर्म की कुर्बानी
पीके रोजी को समाज या परिवार की परवाह नहीं थी । कुछ दिनों बाद रोजी की मां ने LMS चर्च के पादरी से दूसरी शादी कर ली |
सौतेले पिता ने दबाव बनाकर रोजी को भी ईसाई बना दिया। हालांकि उसकी मां हिंदू ही रहीं | राजम्मा (रोजी) अब रोजम्मा बन गईं।
मां ने दूसरा घर बसा लिया, लेकिन रोजी दादाजी के साथ ही रही। ये वही समय था, जब बड़ी संख्या में दलितों का धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा था।
रोजी ने एक ड्रामा कंपनी जॉइन कर ली। समाज के ताने बढ़े तो दादाजी ने उसे घर से निकाल दिया। मजबूरन रोजी ड्रामा कंपनी के लोगों के साथ ही रहने लगीं ।
मुंबई की हीरोइन को फेसेलिटी नहीं मिली तो फिल्म छोड़ी
फादर ऑफ मलयालम सिनेमा कहे जाने वाले जेसी डेनियल मलयालम की पहली फीचर फिल्म विगताकुमारम बना रहे थे | इसमें हीरोइन बनने के लिए कोई महिला तैयार नहीं थी ।
उन्हें एक इंडो एंग्लो एक्ट्रेस मिस लाला मिली, लेकिन जब मिलने पहुंचे तो उसने 10 हजार रुपए फीस की डिमांड की। 1926 में ये बड़ी रकम थी, लेकिन डेनियल मान गए ।
5 हजार रुपए एडवांस और फर्स्ट क्लास टिकट देकर डेनियल ने उस हीरोइन को मुंबई से तिरुवनंतपुरम बुलाया। मिस लाला ने सुविधाएं ठीक ना होने पर फिल्म छोड़ दी।
मिस लाला ने एडवांस भी वापस नहीं किया। डेनियल पहले ही कर्ज तले दबे हुए थे, लेकिन अब ना उनके पास हीरोइन थी और ना ही पैसे ।
हीरोइन बनाया, लेकिन नाम से थी आपत्ति
मिस लाला ने फिल्म छोड़ दी तो जेसी डेनियल अपने दोस्त जॉनसन के कहने पर गांव में एक प्ले देखने पहुंचे।
जॉनसन एक लड़की को जानते थे जो डेनियल की हीरोइन बन सकती थी। वो लड़की थी घास काटने वाली रोजी।
मजबूरी में जेसी डेनियल ने रोजी को फिल्म की हीरोइन बना लिया, लेकिन उन्हें उनका नाम रोजम्मा पसंद नहीं आया |
वो चाहते थे हीरोइन का पिछली हीरोइन मिस लाला जैसा मॉडर्न नाम हो तो उन्होंने रोजम्मा को पीके रोजी बना दिया |
रोजी मलयालम फिल्मों की पहली हीरोइन बन गई, लेकिन पहली ही फिल्म से उसके सारे सपने टूटने वाले थे।
एक दिन की फीस 5 रुपए, 10 दिन की शूटिंग के मिले 50 रु.
विगताकुमारम फिल्म में रोजी ने अपर कास्ट की नायर महिला सरोजिनी का रोल प्ले किया। सेट पर भी रोजी के लगातार साथ छुआछूत होती रही।
रोजी को दूसरे कलाकारों के साथ बैठने और सेट पर मिलने वाला खाना छूने की इजाजत नहीं थी । वो खाना घर से लाती और अकेले खाती।
अखबारों से जैसे ही लोगों को जानकारी मिली कि एक दलित लड़की फिल्म में है, तो लोगों ने खूब आपत्ति जताई।
रोज 5 रुपए मिलने की खुशी में रोजी शूटिंग करती रही। 10 दिन में विगताकुमारम बनकर तैयार हो गई और रोजी को पूरे 50 रुपए मिले।
लोगों ने दलित एक्ट्रेस की फिल्म देखने से इनकार कर दिया
विवादों के बीच जेसी डेनियल की विगताकुमारम की स्क्रीनिंग 23 अक्टूबर 1928 को कैपिटल सिनेमा हॉल, तिरुवनंतपुरम में हुई।
पहले तो लोगों ने रोजी की फिल्म देखने से इनकार कर दिया। वहीं समाज का एक धड़ा रोजी के अपर क्लास बनने से नाराज था ।
ऊंची जाति के सामने किसी नीची जाति के व्यक्ति को बैठने की इजाजत नहीं थी, तो दलित लड़की के साथ बैठकर फिल्म कैसे देखेंगे।
स्क्रीनिंग जरूरी थी तो आखिरकार जेसी डेनियल ने रोजी को ही ऊंची जाति के लोगों के साथ स्क्रीनिंग पर आने से रोक दिया ।
फिल्म लगी तो थिएटर के बाहर करती रहीं इंतजार
रोजी को देखकर लोग भड़क गए। प्रीमियर में पहुंचे गेस्ट एडवोकेट मल्लूर गोविंदा ने साफ कहा कि ये लड़की होगी तो हम अंदर नहीं जाएंगे।
रेक्टर डेनियल ने रोजी को बाहर ही रुकने को कह दिया। रोजी थिएटर के बाहर खड़ी अगले शो का इंतजार करने लगी।
विगताकुमारत की स्क्रीनिंग में भीड़ तो पहुंची, लेकिन हर कोई दलित पीके रोजी को पर्दे पर देखकर गुस्से में था।
एक दिन में तबाह हो गई रोजी की जिंदगी
एक सीन ने लोगों के गुस्से की आग में पेट्रोल का काम किया। सीन में अपर कास्ट हीरो, दलित रोजी के बालों में लगा फूल चूम रहा था।
लोगों ने स्क्रीन पर खूब पत्थर फेंके और थिएटर का पर्दा फाड़ दिया। फिल्म खत्म होने से पहले ही भीड़ गुस्से में रोजी को मारने दौड़ पड़ी।
रोजी कुछ समझ पातीं, तभी भीड़ नजदीक आने लगी। रोजी ने दौड़ना शुरू किया और थायकोड के थिएटर में जाकर छुप गईं।
गुस्साए लोगों ने उन्हें मारने के लिए पूरे थिएटर में ही आग लगा दी। रोजी भीड़ के गुस्से और आग से जान बचाने की जद्दोजहद करती रही।
जातिवाद की आग में जलता रोजी का घर, सपना और पहचान
रोजी को थिएटर से निकालने के लिए जेसी नियल ने पुलिस की मदद ली और रोजी को थिएटर से जिंदा निकाला |
रोजी वहां से भाग गईं, लेकिन लोग नहीं रुके। जान लेने के लिए भीड़ ने उनके घर में पहले पत्थर फेंके और फिर आग लगा दी।
गुस्सा इस बात का था कि एक नीची जाति की औरत पर्दे पर किसी नायर महिला का किरदार कैसे निभा सकती है।
घरवालों ने अफरा-तफरी के बीच किसी तरह जान बचा ली, लेकिन अब परिवार का उस जगह रहना खतरे से खाली नहीं था |
एक फिल्म ने कर दिया शहर छोड़ने पर मजबूर
रोजी ने मौका देखकर ब्रिज से गुजरते हुए एक लॉरी ड्राइवर से उसे दूर ले जाने की मदद मांगी और वहां से निकल गई।
ट्रांसपोर्क कंपनी का ड्राइवर केसावा पिल्लई भी ऊंची जाति का था। वो रोजी को तमिलनाडु के नागरकोइल ले आया।
नागरकोइल आकर रोजी ने लॉरी ड्राइवर केसावा पिल्लई से शादी कर ली और राजम्मा बनकर गुमनाम जिंदगी जीने लगीं।
शादी, ऊंची जाति और गुमनाम जिंदगी
केसावा और रोजी की दो बेटियां हुईं, लेकिन वो भी ताउम्र मां के संघर्ष और उनके मलयालम सिनेमा में दिए योगदान से अनजान रहीं ।
1928 की फिल्म विगताकुमारत, मलयालम सिनेमा की पहली फीचर फिल्म है, जिसका नाम आज इतिहास में दर्ज है।
इस फिल्म को बनाने में डायरेक्टर जेसी डेनियल कंगाल हो गए। वहीं हीरोइन पीके रोजी को भी अपना सब कुछ कुर्बान करना पड़ा।












