लोकनीति से आप क्या समझे हैं? इसको परिभाषित करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। लोक नीति की प्रकृति , लोक नीति के प्रकार एंव महत्व

लोक नीति का अर्थ , प्रकृति , लोक नीति के प्रकार एंव महत्व 



इस लेख के माध्यम से लोकनीति से सम्बन्धित निम्न बिन्दुओं की चर्चा की गई -

प्रस्तावना
उद्देश्य
लोकनीति का महत्व
लोकनीति का अर्थ
लोकनीति के प्रकार
नीति तथा प्रशासन
नीति की अवधारणा
लोकनीति की प्रकृति
सारांश

प्रस्तावना

एक अकादमिक धारणा के रूप में 'लोक नीति' 1950 के दशक के आरम्भ में उभरकर सामने आयी और तब से इसके साथ नये आयाम जुड़ते चले गये हैं और यह सामाजिक विज्ञान की एक शाखा के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करती रही है। सरकार के उत्पादों के एक अध्ययन के रूप में, विभिन्न शाखाओं के कई पाठ्यक्रमों जैसे राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, अर्थनीति, प्रबन्धन में नीति एक महत्वपूर्ण संघटक की भूमिका निभाती है। विकास इतना तीव्र है कि कई शोधकर्ता, शिक्षक, लोक प्रशासक अब महसूस करने लगे हैं कि यह अधिक से अधिक अनियंत्रणीय होता जा रहा है। इन शाखाओं में पुरानी सीमांकन की रेखा के स्थान पर लोकनीति को सम्मिलित करना आवश्यक हो गया है। इसके अलावा अर्न्त- अनुशासनात्मक गुणवत्ता की वजह से लोकनीति का क्षेत्र रोचक एवं विचारोत्तेजक बन जाता है।

'लोक नीति' एक ऐसी धारणा है जो अब काफी लोकप्रिय हो चुकी है। इसका हमारे दैनिक जीवन और हमारे अकादमिक साहित्य में धड़ल्ले से प्रयोग होता है। जहाँ हम अक्सर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, नई शिक्षा नीति, वेतन नीति, कृषि नीति, अमेरिकी या फ्रांसीसी विदेश नीति आदि का उल्लेख करते हैं। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसका सम्बन्ध क्षेत्रों से है जो सार्वजनिक माने जाते हैं। लोकनीति की धारणा के तहत माना जाता है कि जीवन का एक प्रभाव क्षेत्र होता है जो निजी या विशुद्ध रूप से वैयक्तिक न होकर साझा होता है।

लोकनीति का महत्व

लोकनीति को मोटे तौर पर प्रस्तुत परिवेश के भीतर विशिष्ट लक्ष्य या उद्देश्य प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति, समूह, संस्था या शासन की प्रस्तावित क्रियाविधि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। प्रत्येक प्रकार के संगठन में चाहे वह सरकारी हो या गैर-सरकारी, प्रत्येक क्रिया के पूर्व नीति निर्धारण आवश्यक होता है। सभी प्रकार के प्रबन्धन के लिए यह पूर्वापेक्षा है। नीति ही एक ऐसे ढाँचे का निर्धारण करती है, जिसके भीतर संगठनात्मक लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है। किसी संगठन के उद्देश्य प्रायः अस्पष्ट और सामान्य होते हैं, जिन्हें नीति लक्ष्यों के रूप में सुनिश्चित किया जाता है और जो प्रशासन में गतिशीलता उत्पन्न करते हैं। नीति निर्धारण सरकार का एक महत्वपूर्ण कार्य है। जन प्रशासन का सार नीति-निमार्ण है।

लोक नीतियां सरकारी निकायों एवं सरकारी अधिकारियों द्वारा विकसित की जाती हैं। यद्यपि गैर-सरकारी लोक एजेन्सियां भी नीति-निर्माण प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डाल सकती हैं या उसे प्रभावित कर सकती हैं। विभिन्न प्रकार से अलग लोकनीति की विशेषताओं का पता इस तथ्य से विदित होता है कि प्राधिकारी इन्हें राजनीतिक प्रणाली में सूत्रबद्ध करने का काम करते हैं। पहला- यादृच्छिक (Random) व्यवहार की अपेक्षा उद्देश्य परक या परिणामोन्मुखी कार्यवाही लोकनीति का प्रमाण चिन्ह है। आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों में लोक नीतियों का निर्माण अकस्मात घटना के रूप में नहीं होता। दूसरा- लोकनीतियों का सम्बन्ध जन प्रशासकों द्वारा किसी प्रश्न पर तदर्थ किये गये पृथक निर्णयों से न होकर किसी विशेष प्रश्न पर निश्चित समयावधि के लिए कार्यवाही या निर्णयात्मक प्रतिमान से होता है। तीसरा- वह नीति जो शासन वास्तव में करती है और जो कुछ बात में घटित होने को होता है। चौथा- लोकनीति स्वरूप में या तो सकारात्मक या नकारात्मक हो सकती है। अंततः लोकनीति कम से कम अपने सकारात्मक रूप में नियम पर आधारित होती है और इसके पीछे कानूनी स्वीकृति होती है।

लोकनीति क्या है? इसकी अवधारणा और प्रकृति को निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। 

लोकनीति का अर्थ

लोकनीति शब्द का प्रयोग प्रायः शिथिलता से किया जता है। इसे गलती से नियम, रीति- रिवाज तथा विनिश्चय ( Decision) की खिचड़ी समझा जाता है। जबकि सत्य यह है कि नियम मार्ग-दर्शक होते हैं, वे करने और न करने योग्य कार्यों में अन्तर करते हैं, किन्तु नियम नीतियों के विपरीत कठोर तथा विशिष्ट होते हैं। निर्णय प्रायः नीति के क्षेत्र के भीतर ही किया जाता है। यह बहुत सम्भव है कि किसी नीति के कारण लगातार कई प्रकार के निर्णय लेने पड़ जायें। नीति का सम्बन्ध मौलिक मामलों से है, जब कि रीति का सम्बन्ध किसी नीति को प्रभावकारी बनाने के तरीके से होता है। जार्ज टैरी के शब्दों में "नीति उस कार्यवाही की शाब्दिक, लिखित या विहित बुनियादी मार्गदर्शक है जिसे प्रबन्धक अपनाता है तथा जिसका अनुगमन करता है।"

डिमॉक ने भी नीतियों को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है, "नीतियां सजगता से निर्धारित आचरण के वे नियम जो प्रशासकीय निर्णयों को मार्ग दिखाते हैं।” नीति एक ओर तो लक्ष्य या उद्देश्य से और दूसरी ओर कार्य संचालन के लिए उठाये गये कदमों से भिन्न होनी चाहिए। उदहरणार्थ, देश में प्रत्येक नागरिक को शिक्षित बनाना एक लक्ष्य है, अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा एक नीति है जो इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बनाई गई है और स्कूल खोलना तथा अध्यापकों को प्रशिक्षित करना इत्यादि वे कदम हैं जो इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक है।

राबर्ट आइस्टोन के अनुसार, “सरकारी इकाई का अपने आस-पास की चीजों से सम्बन्ध लोकनीति कहलाती है। "

रिचर्ड रोज के शब्दों में, “लोकनीति एक निर्णय नहीं है, बल्कि क्रिया की एक प्रक्रिया अथवा प्रतिरूप है। "

थॉमस आर डे) के अनुसार, “सरकार जो कुछ भी करना चाहती है या नहीं करना चाहती. लोकनीति कहलाती है। "

कार्ल जे(0) फ्रैडरिक के विचार में, “लोकनीति निश्चित वातावरण के अर्न्तगत एक व्यक्ति, समूह अथवा सरकार की क्रियाविधि की प्रस्तावित प्रक्रिया है, जिसमें अवसर या बाधाएं आती हैं। जिन्हें नीति एवं उद्देश्य की पूर्ति अथवा लक्ष्य की प्रक्रिया के प्रयत्न के प्रयुक्त करती है अथवा दूर करती है।"

निम्नलिखित बिन्दु लोकनीति के अर्थ को स्पष्ट रूप से समझने में काफी सहायक होंगे।

1. लोकनीति लक्ष्योन्मुखी होती है। लोकनीति के निर्माण एवं क्रिया चयन का उद्देश्य सामान्यतः जनता के सर्वोच्च हितों की पूर्ति के लिए एवं सरकार के विचाराधीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। लोकनीति से सरकारी योजनाऐं स्पष्ट होती हैं।

2. लोकनीति सरकार की सामूहिक गतिविधियों का परिणाम होती हैं। यह सरकार के अधिकारियों एवं कार्यकर्त्ताओं की सामूहिक गतिविधियों का प्रतिरूप अथवा प्रक्रिया है।

3. लोकनीति वह है जो सरकार वास्तव में करने का निश्चिय करती है अथवा करना चाहती है। यह एक निश्चित प्रशासनिक प्रणाली में सरकारी वर्ग का राजनीतिक वातावरण के विशिष्ट कार्य क्षेत्र से सम्बन्धित है। यह अनेक रूपों में अभिव्यक्ति होती है यथा- कानून, अध्यादेश, न्यायालय के निर्णय, कार्यकारी आदेश आदि।

4. लोकनीति सकरात्मक होती है क्योंकि यह सरकार की चिन्ताओं और विशिष्ट समस्या के प्रति उसकी गतिविधि को स्पष्ट करती है। लोकनीति के पीछे कानून की शक्ति व मान्यता होती है। नकारात्मक रूप में लोकनीति को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है कि यह किसी मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों द्वारा कोई कदम न उठाने के रूप में भी अभिव्यक्त हो सकती है।

लोकनीति के प्रकार

लोक नीतियां विभिन्न प्रकार की होती हैं। मुख्यतः इनके प्रकारों का भेद अलग अलग मुद्दों पर आधारित है।

1. तात्विक अथवा सारगत नीतियां- तात्विक नीतियों का विकास समाज की आवश्यकतानुसार होता है। इन नीतियों का सूत्रीकरण संविधान के स्वरूप को ध्यान रखते रखते में हुए सामाजिक, आर्थिक कठिनाइयों को एवं समाज की नैतिक मांग को ध्यान में हुए होता है। ये नीतियां किसी वर्ग विशेष से सम्बन्धित न होकर पूरे समाज के विकास से सम्बन्धित होती हैं। शिक्षा का प्रबन्ध एवं रोजगार के अवसर, आर्थिक स्थितीकरण, विधि और व्यवस्था बनाये रखना आदि इसी का प्रमाण है।

2. नियन्त्रक नीतियां- तात्विक नीतियों का सम्बन्ध व्यापार, व्यवसाय, सुरक्षा उपाय, जनोपयोगी आदि के नियन्त्रण से हैं। इस प्रकार का नियन्त्रण सरकार की ओर से काम करने वाली स्वतंत्र संस्थायें करती हैं। भारत में जीवन बीमा निगम, भारतीय रिजर्व बैंक, हिन्दुस्तान इस्पात, राज्य विद्युत परिषद, राज्य यातायात निगम, राज्य वित्तीय निगम आदि संस्थाऐं नियन्त्रक क्रियाओं में जुटी हुई हैं। इन सेवाओं से सम्बन्धित सरकार द्वारा बनायी गई नीतियां वह संस्थाएं हैं जो यह सेवाऐं प्रदान करती हैं, नियंत्रक नीतियां कहलाती हैं।

3. वितरक नीतियां- वितरक नीतियां सम्पूर्ण समाज के लिए न होकर केवल समाज के विशिष्ट वर्गों के लिए होती है। ये माल के अनुदान के क्षेत्र में लोक कल्याण अथवा स्वास्थ्य सेवाओं आदि के क्षेत्र में हो सकती है। जैसे- प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम, खाद्य सहायता, बालवाड़ी पोशाहार, इन्दिरा महिला योजना, टीका शिविर आदि ।

4. पुनः वितरक नीतियां- इनका सम्बन्ध नीतियों की पुनः व्यवस्था से है जो मूल सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाने से सम्बन्धित होती है। कुछ कल्याण सेवाओं एवं सार्वजनिक माल का वितरण समाज के विशिष्ट वर्गों से बेमेल होता है। अतः ऐसी सेवाओं एवं माल को पुनः वितरक नीतियों द्वारा सीमित किया जाता है।

5. पूंजीकरण- पूंजीकरण नीति के अन्तर्गत राज्यों एवं स्थानीय सरकारों को यूनियन सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त होती है और यदि आवश्यकता हो तो यह सहायता अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी प्रदान की जा सकती है।

नीति तथा प्रशासन : 

लोक प्रशासन अपेक्षाकृत एक आधुनिक अनुशासन है। प्रारंभिक विद्धानों ने नीति-निर्माण और लोक प्रशासन को एक-दूसरे से असंबद्ध माना है। वे नीति-निर्माण को प्रशासन के कार्य क्षेत्र से बाहर मानते हैं। नीति और प्रशासन के बीच सुनिश्चित भेद करने का सर्वप्रथम श्रेय वुडरो विल्सन को जाता है। उन्होंने 1887 में प्रकाशित अपने निबन्ध “प्रशासन का अध्ययन" में राजनीति और प्रशासन के बीच अलगाव पर जोर दिया। उनका मानना था कि नीति-निर्माण एक राजनीतिक कार्य है जबकि प्रशासन का सम्बन्ध केवल नीतियों को लागू करने से है । उनका मानना था कि प्रशासनिक प्रश्न राजनीतिक नहीं होते । विल्सन का अनुसरण 'गुडनाउ' ने भी किया और यही विचार रखा। इन दोनों के विचारों का प्रभाव आगे कई दशकों तक रहा। इसी क्रम में 1926 में व्हाइट ने अपनी पुस्तक “Introduction to the Study of the Public Administration" के प्रथम संस्करण में प्रशासन और राजनीति के बीच अलगाव की जोरदार वकालत की।

यह विचार आगे बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सका । विद्वानों ने यह माना कि प्रशासन और नीति को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं किया जा सकता। प्रशासन और राजनीति के अन्योन्याश्रय(Interdependence) सम्बन्ध पर अधिक बल दिया जाने लगा। लूथर गुलिक इस दृष्टिकोण के अग्रणी चिंतकों में से थे। एक अन्य महत्वपूर्ण विचारक 'एपल्बी' का दृष्टिकोण भी इस मत के साथ जुड़ा है कि राजनीति और प्रशासन एक ऐसे युग्म की तरह हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। एपल्बी के शब्दों में “प्रशासक निरन्तर भविष्य के लिए नियम निर्धारित करते रहते हैं और प्रशासक ही निरंतर यह निश्चित करते हैं कि कानून क्या है, कार्यवाई के अर्थ में इसका तात्पर्य क्या है तथा इस प्रक्रिया में आदान-प्रदान और भविष्य के आदान-प्रदान के सम्बन्ध में दोनों पक्षों अर्थात् प्रशासन और नीति के अपने अलग-अलग अधिकार क्या होंगे। प्रशासक एक अन्य प्रकार से भी भावी नीति-निर्माण में भाग लेते हैं। वे विधान मंडल के लिए प्रस्तावों एवं सुझावों का स्वरूप निश्चित करते हैं। यह नीति-निर्माण का एक भाग होता है।"

संसदीय प्रणाली वाले देशों में नीति-निर्माण और प्रशासन को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से अभिन्न होते हैं। विधायिका के सदस्य ही कार्यपालिका के सदस्य होते हैं और पूरी कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह होती है। ऐसी परिस्थिति में नीति-निर्माण और प्रशासन का एक अटूट रिश्ता बन जाता है। इस संदर्भ में पीटर ओडेगार्ड ने बिल्कुल ठीक कहा है कि नीति और प्रशासन राजनीति के जुड़वां बच्चे हैं जो एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। उपरोक्त बातें न सिर्फ संसदीय प्रणाली वाले देशों के लिए सही हैं बल्कि अध्यक्षीय प्रणाली वाले देशों के संदर्भ में भी बहुत हद तक सही हैं, जहाँ शक्तियों के पृक्कीकरण का सिद्धान्त लागू होता है।

यह बात ठीक है कि नीति-निर्माण प्रधानतः विधायिका का काम है, क्योंकि नीति का आधार तथा प्रारूप विधान के द्वारा ही निर्धारित और निश्चित होता है। पर इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासन का सहयोग महत्वपूर्ण होता है। जमीनी हकीकत और वास्तविक आंकड़े प्रशासन के माध्यम से प्राप्त होते हैं, जिनके आधार नीतियों का निर्माण किया जाता है। दूसरी बात यह है कि विधायिका के लिए यह संभव नहीं है कि एक बार व्यापक नीति बनाने के बाद कार्य किए जाने के क्रम में आने वाली विभिन्न तरह की समस्याओं के संदर्भ में उन नीतियों को आवश्यक विस्तार दे सकें, या उन्हें पुनः परिभाषित कर सकें। यह काम अंततः प्रशासन को ही करना होता है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नीति का उदगम (स्रोत) स्थल तो विधायिका है लेकिन आगे के सोपानों की रचना प्रशासन के ही भिन्न-भिन्न वर्ग करते हैं। हालांकि भारत जैसे देशों में नीति-निर्माण के कार्यों में प्रशासन की भूमिका निर्णायक होती जा रही है। पूरी नीति प्रशासन के द्वारा ही तैयार होती है, जिसे विभागीय मंत्री के माध्यम से सदन में प्रस्तावित किया जाता है। बहुमत होने के कारण विधायिका में प्रस्ताव प्रायः स्वीकृत हो जाता है। इस तरह नीति-निर्माण में प्रशासन की भूमिका काफी अहम हो गई है।

 नीति की अवधारणा

'लोक' के विचार की तरह 'नीति' की अवधारणा एक मूल्यवान शब्द नहीं है। नीति के अन्तर्गत अन्य तत्वों के अलावा कार्यवाही के लिए मार्गदर्शन शामिल होता है। 

यह निम्न स्वरूप अपना सकती हैं-

1. लक्ष्यों की एक घोषणा; 
2. कार्यवाहियों की एक घोषणा;
3. आम उद्देश्य की एक घोषणा; और
4. एक अधिकारिक निर्णय।

होगवुड एवं गन ने 'नीति' शब्द के इन प्रयोगों को निर्धारित किया है:

1. गतिविधि के क्षेत्र के लिए एक स्तर के रूप में; 
2. किसी वांछित स्थिति की अभिव्यक्ति के रूप में;
3. निश्चित प्रस्तावों के रूप में;
4. औपचारिक अधिकार के रूप में;
5. उत्पादन के रूप में;
6. निष्कर्ष के रूप में; 
7. एक सिद्धान्त या प्रतिरूप के रूप में:
8. एक प्रक्रिया के रूप में।



दुर्भाग्यवश नीति अपने आप में ऐसी होती है जो अलग-अलग स्वरूप धारण करती रहती है। है। नीति को राजनीतिक प्रणाली के 'निष्कर्षों' के रूप में परिभाषित करने की कोशिश होती रही "कई अलग-अलग गतिविधियों से जुड़ी कम या ज्यादा आत्मनिर्भर नीतियों के रूप में लोकनीति की व्याख्या करने की कम कोशिश होती रही है।" लोकनीति के क्षेत्रों के अध्ययन में इसके विपरीत, नीति निर्णयों के विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो एक राजनीतिक विश्लेषण की जगह निश्चित बुद्धि संगत मूल्यों पर आधारित है। इस समस्या के केन्द्र बिन्दु को अन्य व्याख्याओं के जरिए पहचाना जा सकता है जिसका इस क्षेत्र के विद्वानों ने काफी विकास किया है।

लोक विज्ञान के अग्रणी अध्येताओं में से एक, वाई ड्रोट ने नीतियों की व्याख्या "कार्यवाही के मुख्य मार्ग जिनका अनुसरण किया जाना हो उसके सम्बन्ध में आम निर्दशावली" के रूप में की है। 

इसी तरह पीटर सेल्फ ने नीतियों की व्याख्या "किस तरह कार्यों को समझा जाएगा एवं निष्पादन किया जाएगा, उसके सम्बन्ध में परिवर्तनशील निर्देशावली के रूप में किया है।" 

सर जेफरी विकर्स मानते है कि नीतियां "ऐसे निर्णय हैं जो कार्यवाहियों को दिशा, संगति और क्रम प्रदान करते हैं और जिनके लिए निर्णय लेने वाली संस्था उत्तरदायी होती है।” 

कार्ल फ्रेडरीच नीतियों के बारे में कहते हैं "एक निश्चित परिवेश में एक व्यक्ति, समूह व सरकार एक प्रस्तावित कार्यवाही, जहाँ अड़चनें और अवसर हों, जिन्हें नीति उपयोग करे और उन पर जीत हासिल कर लक्ष्य तक पहुँचे या एक विषय या उद्देश्य के रूप में प्रयोग करें। "

जेम्स एंडरसन मानते है कि नीति "एक उद्देश्यपूर्ण कार्यवाही है जिसका पालन एक कर्ता या कई कर्ता एक समस्या या चिन्ता के विषय से निपटने के लिए करते हैं। "

सम्पूर्ण स्वरूप में नीति की व्याख्या एक उद्देश्यपूर्ण कार्यवाही के रूप में की जा सकती है, जिस पर सत्ता में रहने वाले निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य को प्राप्त करने में लिए अमल करते हैं या अपनाते हैं। यहाँ पर भी जोड़ा जाना चाहिए कि लोक नीतियां ऐसी नीतियां हैं, जिन्हें सरकारी संस्थाऐं एवम् अधिकारी अपनाते हैं और क्रियान्वित करते हैं। डेविड इस्टोन लोकनीति की व्याख्या करते हुए कहते हैं "पूरे समाज के लिए मूल्यों का अधिकारिक आवंटन। "

लोक नीतियों का संघटन इस्टोन के शब्दों में एक राजनीतिक प्रणाली में 'प्राधिकरणों' द्वारा किया जाता है।, जिनके नाम हैं- बुजुर्ग, अग्रणी प्रमुख, कार्यकारिणी, विधायिका, न्यायाधीश, प्रशासक, पार्षद, राजा एवम् अन्य। उनके अनुसार ये व्यक्ति “राजनीतिक व्यवस्था के दैनिक मामलों से जुड़े होते हैं और व्यवस्था के अधिकतर सदस्यों द्वारा इन विषयों के प्रति उत्तरदायी माने जाते हैं। तथा ऐसी कार्यवाही करते हैं जो अधिकतर सदस्यों द्वारा तब तक स्वीकार किए जाते हैं जब तक अपनी भूमिकाओं के दायरे में कार्य किए गये हों।" जे0 देवी (1927) ने कहा था कि लोकनीति 'जनता और उसकी समस्याओं पर केन्द्रित होती है। 

थॉमस ड्राई की परिभाषा है “सरकार जो करना चाहती है या जो करना नहीं वही लोकनीति है।” इसी तरह रॉबर्ट लीनबेरी का कहना है कि “सरकार अपने नागरिकों लिए जो करती है या जो करने में नाकाम रहती है, वही लोकनीति है।” इन परिभाषाओं में सरकार द्वारा प्रस्तावित निर्णय और उनके क्रियान्वयन के बीच भिन्नता है। 

लोकनीति की प्रकृति

एक नीति सामान्य या विशिष्ट, व्यापक या संकीर्ण, सहज या जटिल, सार्वजनिक या निजी, लिखित या अलिखित, स्पष्ट या धुंधली, संक्षिप्त या विस्तृत और गुणवत्ता सम्पन्न या संख्या सम्पन्न हो सकती है। यहाँ 'लोक नीति' को महत्व दिया गया है जिसे सरकार कार्यवाही की निर्देशावली के रूप में अपनाती है।

लोकनीति के दृष्टिकोण से सरकार की गतिविधियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

पहली -  ऐसी गतिविधियां जो निश्चित नीतियों से जुड़ी हों, 
दूसरी -  ऐसी गतिविधियां जिनकी प्रकृति सामान्य हो और , 
तीसरी - ऐसी गतिविधियां जो अस्पष्ट और असंगत नीतियों पर आधारित हो। 

हालांकि, व्यावहारिक धरातल पर एक सरकार शायद ही अपनी गतिविधियों के लिए सिद्धान्तों की एक निर्देशावली तैयार करती है। महत्वपूर्ण लोक नीतियों को अक्सर अधिक स्पष्ट बनाया जाता है। खास तौर पर जहाँ एक कानून, एक विनियम या एक योजना और उसके समकक्ष कोई मुद्दा जुड़ा हो। भारत का सर्वोच्च न्यायालय संविधान के कुछ अनुच्छेदों की अपने निर्णयों के माध्यम से नई व्याख्या प्रस्तुत कर सकता है, जिन्हें एक नई नीति का दर्जा मिल सकता है।

एक लोकनीति अपनी गतिविधियों के प्रमुख हिस्से को समाहित कर सकती है जो विकास की नीति के साथ संगतिपूर्ण होते हैं। सामाजिक-आर्थिक विकास, समानता या स्वतंत्रता या आत्मनिर्भरता या उसी तरह समकक्ष कार्यवाही के निर्देश के सिद्धान्त को एक विकामुलक नीति या राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में अपनाया जा सकता है। एक लोकनीति संकीर्ण भी हो सकती है जो किसी निश्चित गतिविधि से सम्बन्धित हो, जैसे परिवार नियोजना एक लोकनीति देश की भतार लागू हो सकती है या नागरिकों के एक अंश पर ही लागू हो सकती है।

इसके अलावा सरकार के प्रत्येक स्तर पर केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर निश्चित या सामान्य नीतियां हो सकती हैं। इसके अलावा 'महानीतियां भी होती हैं। सभी निश्चित नीतियों द्वारा अपनाए जाने वाले सामान्य निर्देश को 'महानीति' कहते हैं। ड्रोर के अनुसार 'महानीतियां' एक प्रकार की मास्टर नीति का स्वरूप अपना लेती हैं, जो ठोस स्पष्ट नीतियों से अलग होती हैं और जो मुख्य लक्ष्यों के प्रतिष्ठान से जुड़ी होती हैं ताकि ठोस एवं निश्चित नीतियों के लिए निर्देशावली की भूमिका निभा सके। नीतियों से सामान्यतया निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य अधिक अस्पष्ट या स्पष्ट अर्थों में जुड़े होते हैं। नजर आने वाले या नजर नहीं आने वाले के निष्कर्ष के रूप में नीतियां हो सकती हैं।

आधुनिक राजनीतिक प्रणालियों में लोक नीतियां उद्देश्यपूर्ण या लक्ष्य अभिमुख कदम होती हैं। इसके अलावा एक लोकनीति अपने स्वरूप में या तो सकारात्मक हो सकती हैं या नकारात्मक । अपने सकारात्मक स्वरूप में किसी खास समस्या से निपटने के लिए सरकार की किसी गुप्त कार्यवाही से जुड़ी रह सकती है, जिसके तहत उन विषयों पर कार्यवाही नहीं की जाती जिन पर सरकारी आदेश की जरूरत होती है। लोकनीति की एक विधिसम्मत गुणवत्ता होती है, जिसे नागरिक एक कानून के रूप में स्वीकार करते हैं। उदाहरणस्वरूप करों का अदा करना जरूरी है, नहीं तो व्यक्ति को जुर्माना देना पड़ सकता है या जेल जाना पड़ सकता है। लोक नीतियों की यह विधिसम्मत गुणवत्ता उन्हें निजी संगठनों से भिन्नता प्रदान करती है। अगर संबन्धित अवधारणाओं से तुलना की जाए तो कार्यवाही के एक उद्देश्यपूर्ण तरीके के रूप में नीति की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। 

सारांश

समाज की उत्तरोत्तर वृद्धि से हो रही जटिलता के साथ-साथ लोकनीति के क्षेत्र का महत्व बढ़ता गया है। यह केवल सरकारी गतिविधियों के कारणों और परिणामों के विवरण और व्याख्या से ही सम्बन्धित नहीं होता, वरन् लोकनीति को आकार प्रदान करने वाली शक्तियों के बारे में विज्ञान सम्मत ज्ञान के विकास से संबंधित होता है। अध्ययन के अन्तर्गत विषय की लोक नीति सामाजिक व्याधियों को समझने के लिए लोकनीति का अध्ययन काफी सहायक सिद्ध होता है। किसी सामाजिक प्रणाली को अतीत से भविष्य की तरफ गतिशील करने के लिए लोकनीति एक महत्वपूर्ण तंत्र है। 

उदारीकरण, निजीकरण एवम् भूमंडलीकरण के वर्तमान युग में शासन की भूमिका बदल गई है। सामान एवम् सेवाऐं प्रदान करना शासन का महत्वपूर्ण कार्य है | परन्तु आधुनिक परिस्थतियों में चूंकि शासन समाज की एक संस्था है, जिसका कार्य समाज के विकास के लिए निरन्तर होना चाहिए। फलस्वरूप इसकी योग्यता नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने में निहित है। लोकनीति में जनता की लोकतांत्रिक अथवा राजनीतिक क्षमता का सुधार सम्मिलित है और यह सामान तथा सेवा प्रदत्त कराने की क्षमता से सम्बन्धित नहीं है। लोकनीति एक अनिवार्य सार्वजनिक शिक्षा की भूमिका निभाती है। नीति निमार्ण का मुख्य लक्ष्य ऐसे मूल्यों का निर्माण करना है, जिनके जरिए समाज में व्यक्ति का सम्पूर्ण रूप से विकास सम्भव हो सके। वे लोगों को एकजुट करती है और अनुशासित स्थिति बनाये रखती है।


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