भारतीय सिनेमा जगत का इतिहास

परिचय

एशिया के विशाल फिल्म उद्योगों में भारत का प्रमुख स्थान है। भारतीय फिल्म उद्योग विश्व में सबसे अधिक फिल्मों के निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ हिंदी, तेलुगू, तमिल, भोजपुरी इत्यादि में भी फिल्में बनाई जाती हैं। 2014 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, प्रत्येक वर्ष भारत में लगभग 3000 सेल्युलाइड फिल्मों का निर्माण होता है, जिनका वर्गीकरण 1000 लघु और 1969 फीचर फिल्मों के रूप में किया जा सकता है।

हाल ही में, फिल्म क्षेत्र में सम्पूर्ण (100%) एफ.डी.आई. या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति करने का प्रावधान पारित किया गया, जिसके पश्चात् प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मीडिया घरानों, जैसे- 20वीं सेंचुरी फॉक्स, वारनर ब्रदर्स आदि ने भारतीय फिल्म निर्माण में निवेश किया। इसी के कारण कुछ विदेशी फिल्म निर्देशकों ने भी भारत से जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों का चयन किया है।

भारतीय सिनेमा का महत्व

* स्वतंत्रता के बाद निर्मित अधिकांश फिल्मों ने हमारे नागरिकों तथा देश को एक राष्ट्र के रूप में पहचान दी है। 

*  इनसे हमें भारतियों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक अस्तित्व और समय के साथ इनमें हो रहे परिवर्तनों को समझने और प्रस्तुत करने में सहायता मिली है।

*  अधिकांश प्रायोगिक अध्ययनों से पता चलता है कि सामान्य लोगों की मानसिकता पर फिल्मों का बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है और लोग फिल्म के नायक और नायिका के चरित्र के साथ इस प्रकार सहानुभूति दर्शाते हैं कि मानों वे वास्तविक चरित्र हों।

*  यह केवल तीन घंटे का मनोरंजन ही नहीं है अपितु एक ऐसी भावना है जिसे सामान्य रूप से लोग अपने साथ समेट ले जाते हैं और उसके साथ ही जुड़े रहना चाहते हैं।

*  दो प्रकार के सिनेमा होते हैं- पहला, मनोरंजन के लिए और दूसरा, जो की जीवन की दिन-प्रतिदिन कि वास्तविकता से हमारा परिचय कराता है, जिसे हम 'वैकल्पिक' या समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) कहते हैं।

*  यह केवल शहरी महानगरों में ही उपलब्ध नहीं है, अपितु यह अब ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में भी पहुंच गया है।

भारतीय सिनेमा का इतिहास

चलचित्र की अवधारणा को भारत में लुमियर बन्धु (जो कि सिनेकैमरा के अन्वेषक के रूप में प्रसिद्ध हैं) लाए थे। वर्ष 1896 में उन्होंने छह मूक लघु फिल्में बंबई में प्रदर्शित की थीं, जो उस समय के दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहीं। पहली फिल्म का शीर्षक कोकोनट फेयर (Coconut fair) और हमारा भारतीय साम्राज्य (Our Indian empire) था और उन्हें एक अज्ञात फोटोग्राफर ने वर्ष 1897 में शूट किया था।

कालरेलो और कोर्नेग्लिया नामक एक इटली के युगल ने बम्बई के आजाद मैदान में टेंट लगाकर फिल्मों का प्रदर्शन करके एक नई एवं बड़ी पहल की। उसके बाद तो बम्बई में लघु फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी थी, जैसे- दी डेथ ऑफ नेल्सन, नोहाज आर्क नामक फिल्मों का वर्ष 1898 में प्रदर्शन किया गया।

पर यह सब विदेशी प्रयास थे, जो ब्रिटिश और भारत में उनके साम्राज्य पर केंद्रित थे। किसी भारतीय द्वारा चलचित्र का पहला प्रयास हरीशचन्द्र भटावडेकर द्वारा किया गया था, जिन्हें सेव दादा (Save Dada) के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने वर्ष 1896 एवं 1899 में दो लघु फिल्मों का निर्माण कर प्रदर्शित किया था। वर्ष 1900 में बहुत कम भारतीय फिल्म निर्माता इस कार्य में लगे हुए थे पर उनमे सबसे उल्लेखनीय एफ. बी. थानावाला थे, जिन्होंने ताबूत प्रोसेशन और स्प्लेंडिड न्यू वीयूज ऑफ बॉम्बे का निर्माण किया था। इसके अतिरिक्त वर्ष 1903 में हीरालाल सेन भी अपने चलचित्र इंडियन लाईफ एंड सीन्ज के लिए जाने गए।

धीरे-धीरे इन चलचित्रों का बाजार बढ़ने लगा था और चूंकि इनका प्रदर्शन अस्थाई स्थानों पर किया जाता था, इसलिए सर्वप्रथम सिनेमाघर स्थापित करने की आवश्यक्ता अनुभव हुई। इस आवश्यक्ता को मेजर वारविक ने पूरा किया, जिन्होंने वर्ष 1900 में मद्रास (अब चेन्नई) में पहला सिनेमाघर स्थापित किया था। इसके पश्चात् एक धनी भारतीय व्यापारी जमशेदजी मदान ने वर्ष 1907 में कलकत्ता (अब कोलकता) में एलफिन्स्टोन पिक्चर हाऊस की स्थापना की। उभरते हुए इस नए भारतीय बाजार से प्राप्त होने वाले लाभ को देखते हुए वर्ष 1916 में भारत में यूनिवर्सल स्टूडियोज ने पहली हॉलीवुड आधारित एजेंसी की स्थापना की।

मूक फिल्मों का युग

1910 से 1920 तक के दशक में मूक फिल्मों की भरमार रही। भले ही उन्हें मूक फिल्में कहा जाता था तब भी वे पूर्णतया मूक नहीं होती थीं तथा उनके साथ संगीत और डांस भी चलता रहता था। जब पर्दे पर उनको प्रदर्शित किया जाता था तब भी उनके साथ संगीत वाद्यों, जैसे- सारंगी, तबला, हारमोनियम और वॉयलिन पर संगीत बजाया जाता था। भारत और ब्रिटेन के द्वारा पहली बार परस्पर सहयोग से एक मूक फिल्म का निर्माण वर्ष 1912 में एन. जी. चित्रे और आर. जी. टर्नी ने किया था। इस फिल्म का नाम पुंडलिक था।

दादा साहेब फाल्के ने वर्ष 1913 में पहली स्वदेशी मूक फिल्म राजा हरिशचंद्र का निर्माण किया। उन्हें भारतीय सिनेमा के पिता के रूप में जाना जाता है और मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री जैसी फिल्मों के लिए भी उन्हें श्रेय दिया जाता है। बॉक्स ऑफिस पर पहली सफल फिल्म लंका दहन (1917) को बनाने का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है।
वर्ष 1918 में दो फिल्म कम्पनियों के आरम्भ होने से फिल्म निर्माण प्रक्रिया को बहुत प्रोत्साहन मिला था। वे कंपनिया थीं कोहिनूर फिल्म कम्पनी और दादा साहेब फाल्के की हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म्स कम्पनी। जैसे ही फिल्मों से अच्छी कमाई होनी शुरू हुई तो सरकार ने वर्ष 1922 में कलकत्ता में 'मनोरंजन कर' लगा दिया। अगले वर्ष यह कर बम्बई में भी लगा दिया गया।

चूंकि यह भारतीय सिनेमा की शुरुआत थी इसलिए फिल्म निर्माताओं ने कई नए विषयों की खोज की। सबसे लोकप्रिय विषय पौराणिक कथाएं और इतिहास थे क्योंकि दर्शकों में इतिहास और लोक कथाओं के प्रति एक साझे अतीत के रूप में विशेष आकर्षण था।

कुछ लेखकों और निर्देशकों ने सामाजिक विषयों का भी चयन किया, जैसे वी. शांताराम जिन्होंने नारी मुक्ति को लेकर अमर ज्योति नाम से फिल्म बनाई। इसी समय में कुछ उल्लेखनीय महिला फिल्म निर्मात्रियां भी थीं। फातिमा बेगम पहली भारतीय महिला थीं जिन्होंने 1926 में अपनी ही फिल्म बुलबुल-ए-परिस्तान का निर्माण और निर्देशन भी किया। पहला फिल्मी विवाद फिल्म भक्त विदुर की सेंसरशिप को लेकर हुआ था, जिसे वर्ष 1921 में मद्रास में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

इस दौर में फिल्म क्षेत्र में कई अंतर्राष्ट्रीय सहभागिताएं भी हुई। इसी सहभागिता के फलस्वरूप सबसे लोकप्रिय फिल्म नल दमयंती इटली के सहयोग से मदन जी द्वारा बनाई गयी। हिमांशु राय ने भी अपनी सफल फिल्में जैसे अ थ्रो ऑफ डाईस और प्रेम संन्यास, भारत-जर्मन सहयोग से बनाई थी।

अमूक ( बोलती) एवं रंगील चलचित्र का युगारंभ

पहली अमूक या बोलती फिल्म आलम आरा थी, जिसका निर्माण 1931 में अर्देशिर ईरानी के निर्देशन में किया गया। इस फिल्म में डब्लू. एम. खान के कुछ अविस्मरणीय गीत थे, जो भारत के पहले चलचित्र गायक थे और उनका गीत 'दे दे खुदा के नाम पर भारत के सिनेमाई इतिहास में रिकॉर्ड किया जाने वाला गीत था ।

कई बड़े बैनर, जैसे- बॉम्बे टाकीज, न्यू थियेटर्स और प्रभात का 1930 के अंतिम दशक में आगमन हो गया था, और इन्हीं के माध्यम से स्टूडियो प्रणाली भी आरम्भ हो गयी थी। स्टूडियो प्रणाली के द्वारा पहली फिल्म देवदास का निर्माण वर्ष 1935 में पी. सी. बरुआ ने किया था। प्रोडक्शन घरानों ने फिल्म की कथावस्तु और निर्माण शैली के साथ भी नये प्रयोग आरम्भ कर दिए थे।

इन प्रयोगों के फलस्वरूप प्रभात ने वर्ष 1933 में सैरन्ध्री नामक रंगीन फिल्म का निर्माण किया जो भारत की पहली रंगीन फिल्म थी। उसे जर्मनी में संसाधित एवं प्रिंट किया गया था। अर्देशिर ईरानी द्वारा प्रस्तुत किसान कन्या का यहां उल्लेख करना भी आवश्यक है, जिसे पहली स्वदेशी रंगीन फिल्म होने का गौरव प्राप्त है। कुछ अन्य विशिष्ट फिल्में इस प्रकार थी:



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युद्ध रंजित 1940 का दशक

चालीस का दशक भारतीय राजनीति का उथल-पुथल का समय था और वह उस दौर में निर्मित फिल्मों में झलकता भी है। उस युग में निर्मित फिल्मों, जैसे धरती के लाल, दो आँखें बारह हाथ इत्यादि में स्वतंत्रता प्राप्ति की व्यग्रता प्रदर्शित होती है। दुःखांत प्रेम कथाएँ और कल्पित ऐतिहासिक कहानियां, जैसे- चंद्रलेखा, लैला मजनू, सिकन्दर, चित्रलेखा पर भी फिल्मों का निर्माण किया गया। यद्यपि भारत अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहा था, फिल्म उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा था।

नए युग का उदय - 1950

दक्षिण और उत्तर भारत में जो भारी संख्या में फिल्म निर्माण हो रहा था उसे नियमित करने के लिए 1950 के दशक में एक केंद्रिय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की स्थापना की गयी, जिसके साथ ही भारतीय सिनेमा अपने यौवन पर पहुंचने लगा था। इस युग में 'फिल्मी सितारों' का भी उदय हुआ और जो अप्रत्याशित सफलता प्राप्त कर घर-घर में प्रसिद्ध हो गए। हिंदी सिनेमा की 'त्रिमूर्ति' दलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर का प्रादुर्भाव भी इसी युग में हुआ। वर्ष 1953 में पहली टेक्नीकलर फिल्म झाँसी की रानी का निर्माण सोहराब मोदी द्वारा किया गया।

इसी युग में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों ने भारत को अपना गंतव्य बनाने के लिए इधर का रुख किया। वर्ष 1952 में भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन बम्बई में किया गया था। इसने भारतीय फिल्मों के लिए विदेशी सम्मान के द्वार भी खोल दिए। बिमल राय की दो बीघा जमीन पहली भारतीय फिल्म थी, जिसे कांस फिल्म समारोह में पुरस्कार मिला। एक अन्य प्रसिद्ध सत्यजित रे की फिल्म पथेर पांचाली को भी कांस पुरस्कार प्राप्त हुआ। मदर इंडिया सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म के रूप में 1957 में ऑस्कर के लिए नामांकित हुई ।

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य से संकेत लेते हुए, भारत सरकार ने भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की स्थापना की, जो पहली बार श्यामची आई नामक फिल्म को दिया गया था। सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म का पुरस्कार जगत मुरारी द्वारा निर्मित फिल्म महाबलीपुरम को दिया गया। राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाली पहली फिल्म सोहराब मोदी द्वारा वर्ष 1954 में निर्मित फिल्म मिर्जा गालिब थी ।

स्वर्ण युग - 1960 का दशक

साठ के दशक में संगीत उद्योग फिल्म जगत का अभिन्न अंग बन गया था। कई फिल्मों ने संगीत को अपना एकमात्र विक्रय बिंदु (USP) बनाना आरम्भ करा दिया था। उनमें से कुछ प्रमुख फिल्में थीं- राज कपूर अभिनीत जिस देश में गंगा बहती है, देवानंद की गाईड, यश चोपड़ा की वक्त आदि। इस समय में 1962 और 1965 के दो युद्ध भी हुऐ, जो कई राष्ट्रभक्ति की फिल्मों की विषय-वस्तु बने थे। इस विधा में उल्लेखनीय नाम थे- चेतन आनंद की हकीकत, शक्ति सामंत की राजेश खन्ना अभिनीत आराधना और राजकपूर अभिनीत संगम इन सभी फिल्मों ने पंथ का दर्जा हासिल किया।

फिल्म उद्योग के सशक्त रूप से स्थापित हो जाने के पश्चात् एक ऐसी संस्था की आवश्यकता अनुभव हुई जो फिल्म निर्माण की जटिल प्रक्रिया में लगे हुए लोगों को प्रशिक्षित कर सके। इस उद्देश्य ने सरकार को भारत के फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTTI) की पुणे में वर्ष 1960 में स्थापना के लिए प्रेरित किया। इस संस्थान में लेखकों, निर्देशकों और अभिनेताओं को उनकी कला में प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्ष 1969 में जब भारतीय सिनेमा और रंगमंच के प्रतिष्ठित सदस्य दादा साहेब फाल्के का निधन हुआ तो उनके आजीवन योगदान को सम्मानित करने के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना की गयी।

“Angry Young Man" वाला युग -1970-80

यह युग एक ऐसे नवयुवक को लेकर फिल्में बनाने और निर्देशित करने का काल था, जो औद्योगिक बम्बई में अपने पाँव जमाने का प्रयास कर रहा था। रंक से राजा बनने की कहानियों का यह सफल फॉर्मूला, परदे पर लोगों को उनके अपने सपने को जीने का अवसर प्रदान करता था। अमिताभ बच्चन इस प्रकार की अधिकांश फिल्मों के प्रतिनिधि बन गये और इस दौर को 'अमिताभ बच्चन का युग' कहा जा सकता है। उनकी सफल फिल्मों में जंजीर, अग्निपथ, अमर अकबर एंथनी इत्यादि हैं।

अन्य फिल्में, जिनका विशेष उल्लेख करने की आवश्यकता है, वह है शोले जो 70 mm के पैमाने पर बनाई जाने वाली पहली फिल्म थी। इस फिल्म ने प्रदर्शन के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और यह नब्बे के दशक तक सिनेमाघरों में सबसे अधिक लम्बे समय तक चलने वाली फिल्म थी।

रोमांटिक सिनेमा का दौर 1980-2000

1980 के दशक के बाद भारतीय सिनेमा का स्वरूप तेजी से बदलने लगा था। समाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी थी। रोमांटिक और पारिवारिक कहानियों को भारी मात्रा में दर्शक उपलब्ध हो रहे थे। इस युग

के तीन प्रमुख अभिनेता थे- अनिल कपूर, जैकी श्रोफ और गोविंदा। उन्होंने अत्यंत सफल फिल्मों में अभिनय किया, जैसे- तेजाब, राम लखन, फूल और कांटे, हम इत्यादि। । अस्सी के दशक के अंत में बाजीगर और डर जैसी फिल्मों से 'नायक विरोधी' फिल्मों का उदय हुआ और इनसे खान तिकड़ी का स्टारडम आरम्भ हो गया था।

1990 में आये एल.पी.जी. (L.P.G.) के कारण भारत में उन्नत प्रौद्योगिकी को आने की अनुमति मिल गयी। उदाहरण के लिए माई डियर कुट्टी चेतन भारत की पहली 3 डी फिल्म थी, जिसे मलयालम में बनाया गया था। भारतीय दर्शकों को एक और प्रमुख प्रौद्योगिकी डॉल्बी साऊंड सिस्टम का परिचय कराया गया ।

समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema )

1940 के दशक से भारतीय सिनेमा में एक समानांतर उद्योग बन रहा है, जिसने गहरा प्रभाव डालने वाली फिल्में बनाई हैं। इसका एकमात्र उद्देश्य अच्छे सिनेमा का निर्माण और कौशल के साथ नये प्रयोग करना है, चाहे वह व्यावसायिक रूप से साध्य न भी हो। इस आन्दोलन का आरम्भ पहले क्षेत्रीय सिनेमा से मृणाल सेन की वर्ष 1969 में आयी भुवन शोम से हुआ। इसने 'नये सिनेमा' की एक ऐसी लहर को जन्म दिया, जो मानवीय दृष्टिकोण के साथ कलात्मक उत्कृष्टता पर केंद्रित थी और यह लोकप्रिय मुख्यधारा के सिनेमा के स्वप्निल संसार के पूर्णतया विपरीत थी।

भारत में समानांतर सिनेमा के प्रेरणात्मक कारक इस प्रकार हैं: 

पहला , द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् वैश्विक प्रवृत्ति नये यथार्थवाद और मानवीय भूलों के चित्रण की ओर मुड़ गयीं थी। इसकी झलक भारतीय सिनेमा की उन असाधारण फिल्मों में मिलती है, जो सामाजिक विषयों पर केंद्रित थीं, जैसे मदर इंडिया, श्री 420 इत्यादि । 

दूसरा , फिल्मों के बारे में अध्ययन करने के लिए लोगों को बहुत-से संस्थान उपलब्ध हो गए, जैसे- भारत का राष्ट्रीय फिल्म लेखागार, जिसकी स्थापना वर्ष 1964 में की गयी थी।

 अन्ततः भारत अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के लिए संवेदनशील स्थान बन गया और भारतीय निर्देशक अब वैश्विक सिनेमा से परिचित होने लगे, जो उनकी अपनी रचनाओं में झलकता था।

समानांतर सिनेमा आंदोलन में एक प्रमुख नाम सत्यजीत रे का है, जिन्होंने अपू तिकड़ी बनाई पथेर पांचाली, अपूर संसार और अपराजिता। इन फिल्मों से उन्हें वैश्विक समीक्षकों की प्रशंसा और कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। अन्य विख्यात नामों में ऋत्विक घटक का नाम है, जिन्होंने अपनी फिल्मों; जैसे-नागरिक, अजांत्रिक और मेघे ढाका तारा; के माध्यम से मध्यमवर्गीय समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया।

1980 के दशक में समानान्तर सिनेमा महिलाओं को आगे लाने की दिशा में चल पड़ा। इस समय में कई महिला निर्देशक बहुत प्रसिद्ध हुई। उनमे कुछ उल्लेखनीय नाम हैं सई परांजपे (चश्मे बद्दूर, स्पर्श), कल्पना लाज़मी (एक पल) और अपर्णा सेन (36 चौरंगी लेन)। कुछ को तो वैश्विक स्तर पर सम्मान भी मिला है जैसे मीरा नायर जिनकी फिल्म सलाम बॉम्बे को वर्ष 1989 में कांस फिल्म समारोह में पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनमे से अधिकांश फिल्मों में समाज में महिलाओं की बदलती हुई भूमिका पर चर्चा की गई है। नीचे दिए गए बॉक्स में सिनेमा के अनुभवों के अनुसार महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है:

बदलते भारतीय सिनेमा में महिलाओं की भूमिका

* बदलते हुए समय के साथ फिल्मों में महिलाओं के चित्रण में भी परिवर्तन आया है। मूक फिल्मों के दौर में निर्देशकों ने महिलाओं पर लगाये गए बन्धनों पर ध्यान केंद्रित किया था।

* 1920-40 के समय में अधिकांश निर्देशक जैसे वी. शांताराम, धीरेन गांगुली और बाबूराव पेंटर ने ऐसी फिल्में बनाई जिनमे महिलाओं की मुक्ति से संबंधित समस्याओं को जैसे बाल विवाह पर प्रतिबंध, सती प्रथा का अंत इत्यादि को प्रभावी ढंग से उठाया गया था । धीरे-धीरे सिनेमाई दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आया और उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की समानता को भी समर्थन दिया।

*  1960-80 के समय में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण बहुत ही पारंपरिक था। जब नायिका या 'आदर्श महिला' को दिखाना होता था तो वे मातृत्व महिलाओं में निष्ठा और महिलाओं द्वारा अपने परिवार के लिए असंगत त्याग को महिमामंडित करते थे।

*  समानांतर सिनेमा में ही फिल्म निर्माताओं ने महिला मुक्ति की आवश्यकता को आगे बढ़ाया। इस विधा के उल्लेखनीय निर्देशक हैं सत्यजित रे, ऋत्विक घटक. गुरुदत्त, श्याम बेनेगल इत्यादि ।

*  वर्तमान युग का सिनेमा भी अभी उस 'आधुनिक' महिला की छवि के साथ प्रयोग कर रहा है, जो जीवनयापन के लिए कार्य करती है और अपने बच्चे और कैरियर के बीच संतुलन बनाती है।

दक्षिण भारतीय सिनेमा

दक्षिण भारतीय सिनेमा को एकल उद्योग के रूप में दक्षिण भारत के पांच फिल्म उद्योगों, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम और तुल्लू (तटीय कर्नाटक) फिल्म उद्योगों को सामूहिक रूप से संदर्भित करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। तेलुगू और तमिल फिल्म उद्योग उनमें सबसे बड़े हैं। तेलुगू सिनेमा ने पौराणिक विषयों पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण किया है। आंध्रप्रदेश में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की कहानियां बहुत लोकप्रिय हैं। एन.टी. रामाराव प्रमुख रूप से अपनी कृष्ण, राम, शिव, अर्जुन और भीम जैसी भूमिकाओं की प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध थे। पौराणिक कथाओं की प्रस्तुति कन्नड़ और तमिल फिल्मों में भी पायी गयी हैं।

हालांकि सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर आधारित फिल्में भी दक्षिण भारतीय सिनेमा के एक प्रमुख घटक हैं। इसके कथानकों में सम्मलित मुद्दे है - भ्रष्टाचार, असंयमित सत्ता विन्यास, व्याप्त सामजिक संरचनाएं और उसकी समस्याएं, बेरोजगारी, दहेज, पुनर्विवाह, महिलाओं पर हिंसा आदि का अनावरण किया और उनके प्रति लोगों के विचारों को चुनौती दी और सोचने को विवश किया। 1940-1960 के दशक की फिल्मों में राजनीतिक झलक भी थी, जिन्हें प्रचार पुनः के लिए उपयोग किया गया था।

उल्लेखनीय महानायकों की उदहारणात्मक सूची में सम्मलित हैं: एम.जी. रामचंद्रन, एन.टी. रामाराव, शिवाजी गणेशन, जेमिनी गणेशन, राजकुमार, विष्णुवर्धन, रजनीकांत, थिलकन, प्रेम नजीर, मोहन लाल, कमल हसन, माम्मूटी, अजित कुमार चिरंजीवी, महेश बाबू, जोसफ विजय एवं कई अन्य।

उल्लेखनीय दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों में शामिल हैं-सावित्री, शंकर जनक, जयासुधा, लक्ष्मी, सुहासिनी श्रीदेवी. रेवती, शोभना, सौन्दर्या, पद्मिनी, जयललिता, अन्जली देवी आदि ।

विवादास्पद फिल्मों का दौर

विवादास्पद फिल्मों में से एक फिल्म शेखर कपूर द्वारा 1994 में निर्मित बैंडिट क्वीन है। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को नग्नता और अश्लीलता दर्शाने के कारण प्रतिबंधित कर दिया था।

दीपा मेहता की फिल्म वॉटर में 1930 के दशक की विधवाओं के जीवन और समाज से उनके बहिष्करण का चित्रण किया गया था, जिसने सदी का सबसे बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। भारत के अनेक सिनेमाघरों में इसे प्रतिबंधित कर दिया था। दीपा मेहता की ही एक और फिल्म फायर, जिसका निर्माण वर्ष 1996 में किया गया था, जिसमें दो भाभियों के बीच, 'अप्राकृतिक' समलैंगिक सम्बन्ध दिखाए जाने के आधार पर वह प्रतिबंधित कर दी गयी थी।

मद्रास कैफे जैसी फिल्में जो श्रीलंका के गृह युद्ध पर आधारित थी उसे श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम के कुछ भागों में प्रतिबंधित कर दिया गया। एक और निर्देशक अनुराग कश्यप ने भी बहुत विवादास्पद फिल्म निर्माण किये हैं। उनकी फिल्म पांच को सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि इसमें नशीली दवाओं का अत्यधिक

दुरुपयोग, हिंसा और अभद्र भाषा का चित्रण किया गया था। एक और फिल्म ब्लैक फ्राईडे जो मुंबई के बम विस्फोटों पर आधारित थी, उस पर बम्बई उच्च न्यायालय ने प्रतिबंध लगा दिया था। परन्तु मुकदमा समाप्त होने के पश्चात् इसके लिए सीमित सिनेमाघरों में प्रदर्शन की अनुमति मिल गयी थी। वर्ष 2014 में बाबा राम रहीम की फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड ने भी उत्तर भारत में बहुत अव्यवस्था का वातावरण पैदा किया था। इसी प्रकार से मुस्लिम समूहों ने तमिलनाडु के कुछ भागों में कमल हसन की फिल्म विश्वरूपम को लेकर बवाल खड़ा कर दिया था, क्योंकि कथित रूप से इसने उनकी भावनाओं को आहत पहुंचाया था। परन्तु भारतीय सेंसर बोर्ड ने इसके प्रदर्शन की अनुमति प्रदान कर दी थी. यद्यपि इसके विरुद्ध हिंसा की घटनाओं की रिपोर्ट भी आई थी।

भारतीय चलचित्र अधिनियम 1952

फिल्मों को प्रमाणित करने के लिए भारत सरकार ने भारतीय चलचित्र अधिनियम, 1952 पारित किया। इसका मुख्य कार्य सेंसर बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सी.बी.एफ.सी.) या भारत के सेंसर बोर्ड का संविधान और कार्यशैली का निर्धारण करना था ।

इस अधिनियम के तहत सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और कार्य निष्पादन में उनकी सहायता के लिए एक सदस्य मंडल (बारह से कम नहीं और पचीस से अधिक नहीं) की नियुक्ति का प्रावधान है। बोर्ड को एक फिल्म की समीक्षा करने के पश्चात् यह निर्णय लेना होता है कि अमुक फिल्म को किसी भौगोलिक क्षेत्र, आयु वर्ग, धार्मिक वर्ग या राजनीतिक समूह के प्रति अपमान / अभद्रता के आधार पर प्रदर्शन से रोका जा सकता है या नहीं। यह आवेदक की फिल्म को प्रमाणित करने से पहले उसमें परिवर्तन या कांट-छांट करने का निर्देश भी दे सकते है। यदि वांछित परिवर्तन नहीं किये जाते हैं तो, सेंसर बोर्ड उस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति देने से मना कर सकता है।

यद्यपि फिल्मों को प्रमाणित करने का विषय संघ के अधीन है, परन्तु सेंसरशिप को लागू करने का कार्य राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। फिल्मों का प्रमाणीकरण निम्नलिखित आधार पर होता है:

श्रेणी                       प्रमाणीकरण

यू (U)                  व्यापक प्रदर्शन।

ए (A)                  केवल वयस्कों के लिए सीमित प्रदर्शन ।

वर्ष 1983 में चलचित्र (प्रमाणीकरण) नियमों में सुधार किया गया और उनमे वर्तमान श्रेणियों में दो अन्य श्रेणियाँ भी जोड़ी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं:

यूए (U/A)           असीमित व्यापक प्रदर्शन, परन्तु 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए माता पिता की निगरानी                               आवश्यक।

एस (S)                केवल विशेषज्ञ दर्शकों जैसे डाक्टर, इंजीनियर इत्यादि के लिए प्रदर्शन।

1952 के इस अधिनियम में एक और प्रमुख प्रावधान है फिल्म सर्टिफिकेशन एपेलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) की स्थापना इसकी स्थापना इस अधिनियम के अनुच्छेद 5D के अंतर्गत की गयी, जिसका गठन विशेष रूप से सेंसर बोर्ड (सी. बी.एफ. सी.) के निर्णय से असंतुष्ट पक्षों की अपील सुनने के लिए किया गया है, जो अपनी फिल्म की पुनः समीक्षा की मांग कर सकते हैं।

CBFC - सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन 

भारत में जो सरकारी संस्था सेंसरशिप का संचालन और निर्देशन करती है उसका नाम सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सी.बी.एफ.सी.) है। इसकी स्थापना वर्ष 1950 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेन्सर्स के नाम से की गयी थी परन्तु बाद में इसे 1952 के अधिनियम के अंतर्गत परिवर्तित कर दिया गया। यह प्रत्यक्ष रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्य करती है। यद्यपि इसका मुख्य कार्यालय मुम्बई में स्थित है, इसके क्षेत्रीय कार्यालय, जो विशेष रूप से क्षेत्रीय फिल्मों के लिए बनाये गये हैं, वे दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू, गुवाहाटी, कटक, तिरुवनंतपुरम और हैदराबाद में हैं। ये सभी संस्थान फिल्मों के प्रदर्शन का प्रमाण-पत्र जारी करते हैं। प्रमाण-पत्र के बिना कोई भी फिल्म प्रदर्शित नहीं की जा सकती। सी. बी.एफ. सी. एक सुनियोजित ढांचे वाला संगठन है और इसके अध्यक्ष और सदस्यों की  नियुक्ति सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा  की जाती है सरकार के निर्देशानुसार तीन साल या इससे अधिक समय के लिए की जा सकती है। सामान्यतः इसके सदस्य फिल्म उद्योग से जुड़े प्रसिद्ध और प्रतिभाशाली व्यक्ति या अन्य बुद्धिजीवी होते हैं।

सभी फिल्मों को सेंसर बोर्ड से प्रमाण-पत्र प्राप्त करना पड़ता है, यहां तक कि विदेशी फिल्मों, जिनको भारत में आयात किया जाता है, उन्हें भी सी.बी. एफ. सी. का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना पड़ता है। वे सभी फिल्में जिन्हें एक भाषा से दूसरी भाषा में डब किया जाता हैं, उन्हें भी यह सुनिश्चित करने के लिए नया प्रमाण-पत्र प्राप्त करना पड़ता है कि भाषा बदले जाने से वे किसी भी प्रकार से अप्रिय या अपमानजनक तो नहीं हो गयी है। सी.बी.एफ. सी. प्रमाण-पत्र का एकमात्र अपवाद है दूरदर्शन पर प्रदर्शित विशेष रूप से बनाये जाने वाली फिल्में, क्योंकि दूरदर्शन भारत सरकार का अधिकृत प्रसारणकर्ता है और इस प्रकार की फिल्मों के परीक्षण के लिए उनके अपने नियम हैं। इसे टेलीविजन प्रोग्राम और सीरियलों के लिए भी सी.बी.एफ. सी. प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है।

2016 में, भारत सरकार ने विश्व के विभिन्न भागों की सर्वोत्तम प्रथाओं को ध्यान में रखते हुए, कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को उचित और पर्याप्त स्थान देते हुए फिल्म प्रमाणन के मानदंडों को निर्धारित करने के लिए श्याम बेनेगल समिति का गठन किया था। इस समिति ने अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट के कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:

● CBFC को केवल एक फिल्म प्रमाणन संस्था के रूप में ही कार्य करना चाहिए, इसका क्षेत्राधिकार आयु और परिपक्वता के आधार पर फिल्मों को दर्शकों की उपयुक्तता के वर्गीकरण तक ही सीमित होना चाहिए। 

● समिति ने बोर्ड के कामकाज के सम्बन्ध में भी कुछ अनुशंसाएं की हैं और कहा है कि अध्यक्ष सहित बोर्ड को केवल CBFC के लिए केवल मार्गदर्शक व्यवस्था के रूप में कार्य करना चाहिए, और फिल्मों के प्रमाणीकरण की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों में संलिप्त नहीं होना चाहिए।

● आवेदनों की ऑनलाइन प्रस्तुति और आवेदन पत्र के साथ लगने वाले दस्तावेजों का सरलीकरण । 

● टेलीविजन पर प्रसारण हेतु या अन्य किसी उद्देश्य के लिए फिल्मों के पुनः प्रमाणीकरण की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

● फिल्मों के वर्गीकरण के बारे में समिति ने सिफारिश की है कि इसे अधिक विशिष्ट होना चाहिए और U श्रेणी के अलावा UA श्रेणी को उप श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है. UA12+ और UAIS+1 A - श्रेणी को भी A और AC (Adult with caution) उपश्रेणीयों में बाँट देना चाहिए।

क्या भारत को राष्ट्रीय फिल्म नीति की आवश्यकता है?

● यह आवश्यक लगता है कि भारत की भी एक अपनी राष्ट्रीय फिल्म नीति हो। क्योंकि हमारे यहाँ विश्व की सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण होता है। प्रतिवर्ष एक हजार से भी अधिक फिल्मों का निर्माण होता है और भारत के GDP में इस उद्योग का एक महत्वपूर्ण योगदान है।

● इस उद्योग में एक विरोधाभास है कि यह एक अनियंत्रित उद्योग है परन्तु इसकी विषय वस्तु को सरकार ने सेंसर बोर्ड के माध्यम से नियंत्रित कर रखा है। इस उद्योग के सतत् विकास के लिए सरकार के हस्तक्षेप की एक सीमा होनी चाहिये। सामान्यतः क्षेत्रीय सिनेमा को हाशिये पर धकेल दिया जाता है। अब ऐसी नीति की आवश्यकता है जो इन्हें भी मुख्यधारा के सिनेमा के बराबर ला सके।

● फिल्म निर्माण और फोटोग्राफी की कला को सिखाया जाना चाहिये और इसे FTII जैसे और अधिक संस्थानों को खोल कर प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है और एक राष्ट्रीय नीति ही इसे सही दिशा और मार्गदर्शन दे सकती है। एक राष्ट्रीय फिल्म नीति यह सुनिश्चित कर सकती है कि विषय सामग्री का डिजिटलीकरण किया जाये।

● सेंसरशिप से जुड़े विषयों के लिए नये दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है जो, उन्हें बदलते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से परिचित कराती रहें।

● इन्टरनेट के माध्यम से हो रही चोरी, उद्योग के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। इस चोरी को रोकने के लिए संशोधन करना आवश्यक है। दोषियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक और आर्थिक कार्यवाही ही प्रभावी हो सकती है।

                                                            अभ्यास प्रश्न 

1.भारतीय सिनेमा में कितने प्रतिशत तक FDI लाने के लिए अनुमति है?

(a) 26%

(b) 51%

(c)74%

(d) 100%

2. भारतीय सिनेमा पर पहली बार 'मनोरंजन कर' कब लगाया गया था?

(a) 1920 के दशक में

(b) 1930 के दशक में

(c) 1940 के दशक में

(d) 1950 के दशक में

3. विदेशी भाषा की श्रेणी में किस पहली भारतीय फिल्म का ऑस्कर के लिए नामांकन हुआ?

(a) पाथेर पांचाली

(b) मदर इंडिया

(c) मिर्जा गालिब

(d) कागज़ के फूल

4. समानांतर सिनेमा ने अपनी यात्रा किस दशक में आरम्भ की थी ?

(a) 1950

(b) 1940

(c) 1970

(d) 1980

5. निम्नलिखित में से कौन-सा निर्देशक समानांतर सिनेमा से जुड़ा हुआ नहीं है?

(a) मृणाल सेन

(c) ऋत्विक घटक

(b) सत्यजीत रे

(d) वी. शांताराम

6. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(i) U/A श्रेणी का प्रमाण पत्र 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन से सम्बन्धित

(ii) S श्रेणी के प्रमाण पत्र प्राप्त फिल्में केवल विशेष दर्शकों के प्रदर्शन के लिए ही सीमित हैं।

कोड:

(a) केवल (i)

(b) केवल (ii)

(c) (i) और (ii) दोनों

(d) न तो (i), न ही (ii)

7. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें :

(i) भारत में आयात की गयी विदेशी फिल्म के प्रदर्शन के लिए सी.बी.एफ. सी. प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।

(ii) एक भाषा से दूसरी भाषा में डब की गयी फिल्म को सी.बी.एफ. सी. प्रमाण पत्र की आवश्यकता है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल (i)

(b) केवल (ii)

(c) (i) और (ii) दोनों

(d) न तो (i), न ही (ii)

                    उत्तर

1. (d) 2. (a) 3. (b) 4. (b) 5. (d) 6. (b) 7. (b)

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