पंचशील समझौता क्या है ? India - China के बीच पंचशील सिद्धांत क्या है (Principle of Panchsheel)

पंचशील समझौता क्या है ? India - China के बीच  पंचशील सिद्धांत क्या है (Principle of Panchsheel) 

पंचशील का सिद्धांत (Principle of Panchsheel)


• पंचशील का सिद्धांत भारतीय विदेश नीति की महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है। इस सिद्धांत ने भारत को विश्व समुदाय में एक विशिष्ट व सम्मानजनक स्थान प्रदान किया है। यह भारत की शांतिप्रियता का प्रतीक बनकर उभरा। इसे भारतीय विदेश नीति की आधारशिला भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत में अहिंसावादी दर्शन की मजबूत और शानदार परंपरा रही है। गौतम बुद्ध, महावीर एवं आधुनिक काल में महात्मा गांधी को अहिंसा के पुजारी के रूप में देखा जाता है। पंचशील का सिद्धांत बौद्ध दर्शन या धर्म का एक पारिभाषिक शब्द है, जिसका प्रयोग सर्वप्रथम गौतम बुद्ध ने किया। शील से तात्पर्य आचरण से है। आचरण से संबंधित पाँच सिद्धांत स्वयं गौतम बुद्ध ने निरूपित किये थे। इनके माध्यम से वे मानव के नैतिक गुणों का विकास करना चाहते थे। वास्तव में यह 'जियो और जीने दो' का सिद्धांत था। बौद्ध धर्म के अनुयायियों को पाँच व्रतों को धारण करना पड़ता था, जिसे पंचशील का सिद्धांत कहा जाता है। इनमें नैतिक आचरण पर बल दिया गया है। इन्हें सदाचार के नियमों के नाम से भी संबोधित कर सकते हैं। ये सिद्धांत इस प्रकार थे- 1. अहिंसा, 2. सत्य, 3. अस्तेय, 4. अपरिग्रह, 5. ब्रह्मचर्य । जिस प्रकार बौद्ध धर्म के ये आचरण व्रत एक व्यक्ति के लिये निर्धारित थे, उसी प्रकार भारत ने आधुनिक काल में पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के साथ किये जाने वाले आचरण को अनुशासित करने वाला था। अतः पंचशील का सिद्धांत विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सद्भाव पैदा कर विश्व शांति स्थापित करने के ध्येय से प्रतिपादित किया गया।

• स्वतंत्रता के पश्चात् भारत शांति का दृढ़ समर्थक रहा है। विशाल देश की महान प्राचीन संस्कृति को भविष्य का दर्शन बनाने का प्रयास पंचशील के सिद्धांतों में दिखाई देता है। पंचशील के अंतर्गत आने वाले पाँच सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

• सभी राष्ट्र एक-दूसरे राष्ट्र की भौगोलिक अखंडता, सार्वभौमिकता और संप्रभुता का सम्मान करें।

• आक्रमण की नीति का परित्याग करें अर्थात् कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण न करे और दूसरों की राष्ट्रीय सीमाओं का अतिक्रमण न करे।

• कोई भी राष्ट्र एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।

• समानता और परस्पर लाभ की नीति का अनुकरण करें अर्थात् प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करते हुए यह ध्यान रखे कि उनमें से न कोई छोटा है और न कोई बड़ा । इसी प्रकार सभी देश पारस्परिक हित में एक-दूसरे का सहयोग करें।

• शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति अपनाना। इससे तात्पर्य है कि सभी राष्ट्र 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत में विश्वास करें एवं एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रहते हुए अपनी पृथक्-पृथक् पहचान व स्वतंत्रता बनाए रखें।

• उपर्युक्त सिद्धांत भारत द्वारा प्रतिपादित किये गए थे और 1954 में भारत एवं चीन के मध्य हुए एक समझौते में इनका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पालन किया गया। जब जून 1954 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भारत आए तो उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नेहरू के साथ वार्तालाप में इन सिद्धांतों के पालन का आश्वासन दिया। चीन जैसी उभरती हुई एशियाई शक्ति के समर्थन से पंचशील के सिद्धांतों की लोकप्रियता स्वयंसिद्ध थी। 28 जून 1954 को भारत व चीन के प्रधानमंत्रियों का एक संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ, जिसमें पंचशील के सिद्धांत के प्रति दोनों की प्रतिबद्धता को व्यक्त किया गया था। इस वक्तव्य में कहा गया कि "चीन एवं भारत ने आपसी संबंधों के संचालन हेतु पाँच सिद्धांतों के पालन का निश्चय किया है तथा वे एशिया एवं विश्व के अन्य राष्ट्रों के साथ अपने संबंधों में भी इनका अनुसरण करेंगे। इसके साथ ही यदि इनका पालन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी किया जाए तो इनसे शांति एवं सुरक्षा का एक मजबूत आधार बनेगा तथा संदेह के स्थान पर विश्वास पैदा होगा तथा सभी राष्ट्रों के बीच भौगोलिक अखंडता, सह-अस्तित्व एवं मित्रतापूर्ण संबंधों में वृद्धि होगी। इससे संसार में विद्यमान वर्तमान तनाव कम होगा और शांति का वातावरण पैदा होने में सहायता मिलेगी।"

• चीन द्वारा पंचशील के सिद्धांतों की स्वीकृति ने इन्हें अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व प्रदान किया। इसके पश्चात् इनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी और एशिया के लगभग सभी देशों ने इन सिद्धांतों को स्वीकार कर लिया। समय-समय पर भारत आने वाले विदेशी शासनाध्यक्षों अथवा प्रधानमंत्रियों ने अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में पंचशील के सिद्धांतों को स्वीकृति और सहमति प्रदान की। वैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सैद्धांतिक रूप में पंचशील के सिद्धांत को मान्यता 1949 में ही मिल गई थी, जब संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने भारत द्वारा प्रस्तावित पंचशील के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया। इससे पंचशील के सिद्धांत को संपूर्ण संसार में मान्यता मिल गई। यद्यपि अनेक देशों ने इसे पूर्णतः नहीं अपनाया, किंतु इसका खुला विरोध भी नहीं किया। इससे इन सिद्धांतों की तार्किकता व प्रासंगिकता सिद्ध होती है। इन सिद्धांतों का एक विश्वव्यापी मानवीय चेहरा था। इनमें साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद की समाप्ति के विचार भी सम्मिलित थे। अतः प्रबुद्ध लोगों द्वारा इनका समर्थन किया गया एवं कहीं भी इनके विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिये। अतः पंचशील के सिद्धांतों को व्यापक मान्यता व समर्थन प्राप्त हुआ।

• अप्रैल 1955 में एशियाई और अफ्रीकी देशों का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन इंडोनेशिया की राजधानी बांडुंग में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में पंचशील के सिद्धांतों को और भी व्यापक बनाया गया। इसमें पंचशील को बढ़ाकर 'दस शील' की स्थापना की गई। यह पंचशील के सिद्धांतों की व्यापकता का परिचायक है। 

बांडुंग सम्मेलन में प्रतिपादित दस शील इस प्रकार थे-

1. मौलिक मानवीय अधिकार अर्थात् प्रत्येक मनुष्य के जन्म के साथ प्राप्त मौलिक अधिकारों को जन्म सिद्ध अधिकार बनाना, अपने और दूसरों के जन्मजात अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करना।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में समाहित सिद्धांतों के प्रति सम्मान की भावना रखते हुए उनका पालन करना।

3. छोटे-बड़े का भेदभाव समाप्त कर सभी राष्ट्रों की समानता स्वीकार करना। इसमें सभी जातियों प्रजातियों व नस्लों की समानता की बात भी की गई।

4. अन्य राष्ट्रों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना । 

5. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुरूप प्रत्येक देश को आत्मरक्षा करने का अधिकार प्रदान करना।

6. महाशक्तियों द्वारा उद्देश्य विशेष अथवा विशेष प्रयोजन से बनाई गई संस्थाओं व व्यवस्थाओं से अलग रहना। यह बिंदु भारत की गुटनिरपेक्ष नीति को व्यापक समर्थन देने वाला है।

7. एक दूसरे राष्ट्र को आक्रमण की धमकी नहीं देना।

8. सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण तरीकों से निपटारा करना।

9. आपसी सहयोग एवं हितों की वृद्धि करना ।

10. न्याय और अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति सम्मान की भावना रखना।

पंचशील का सिद्धांत निःसंदेह विश्व शांति को स्थापित करने की दिशा में एक सकारात्मक वातावरण उत्पन्न करने में सफल रहा। इसके उपरांत भी यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर बहस का मुद्दा रहा है कि इसमें मौलिकता एवं व्यावहारिकता का तत्त्व कितना है? एक तो इसके विरोधियों ने यह कहकर इसको बेकार सिद्ध करने का प्रयास किया कि पंचशील का कोई भी सिद्धांत ऐसा नहीं था, जो संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर में न हो। अतः पंचशील के माध्यम से उनकी पुनरावृत्ति अर्थहीन हो जाती है। यह आलोचना तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। यह निर्विवाद रूप से भी मान लिया जाए कि पंचशील के सिद्धांत में मौलिकता का अभाव था एवं यह संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर में समाहित सिद्धांतों की पुनरावृत्ति थी तो भारत द्वारा उन्हें अपनी घोषित नीति का आधार बनाकर इनके प्रति प्रतिबद्धता जताना संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यों में भरपूर योगदान देना था। दूसरी आपत्ति आलोचकों को यह थी कि संस्था अथवा व्यवस्था नहीं बनाई गई थी। इस आक्षेप का खंडन इस आधार पर किया जा सकता है। कि पंचशील का सिद्धांत उच्च नैतिक सिद्धांतों पर आधारित था, जिसे व्यवस्था के रूप में किसी भी राष्ट्र पर थोपना अनुचित था। विभिन्न राष्ट्रों व उनके निवासियों में इन नैतिक सिद्धांतों का विकास पंचशील के सिद्धांत का उद्देश्य था। जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय संसद में 29 दिसंबर, 1954 को पंचशील के सिद्धांत पर बयान दिया जो इस प्रकार है- "लोगों ने पंचशील का विरोध किस आधार पर किया है? वे कहते हैं कि आप यह विश्वास किस प्रकार करते हैं। कि इन सिद्धांतों का पालन भी किया जाएगा? यदि आप किसी बात पर विश्वास नहीं करते तो इस पर चर्चा करने और लिखने से कोई लाभ नहीं है, फिर आपके लिये इसके सिवाय और कोई बात शेष नहीं रह जाती कि आप अकेले रहकर और लड़कर दूसरे पक्ष को परास्त करें। यह दूसरे पक्ष की वचनबद्धता पर विश्वास करने का प्रश्न नहीं है, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने का मामला है जिसमें दूसरा पक्ष अपने वचन को भंग नहीं कर सके। यदि विश्व के विभिन्न देश आपसी संबंध और व्यवहार में इन पाँच सिद्धांतों को बार-बार दोहराएंगे तो उसके लिये वातावरण पैदा होगा।"

• पंचशील का सिद्धांत कोई मशीनी अथवा तकनीकी साधन नहीं था, जिसके सफल संचालन का पूर्व प्रयोग किया जाना संभव होता। यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार का सिद्धांत था जिसकी प्रयोगशाला संपूर्ण विश्व समुदाय था। इसकी सफलता और असफलता इसके प्रति विश्व समुदाय की भावना पर निर्भर थी। लंबे समय के पश्चात् हम यह स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते कि पंचशील का सिद्धांत सफल रहा है अथवा असफल, किंतु संपूर्ण मानवता को दृष्टिगत रखते हुए इसके नैतिक मूल्यों पर कोई विपरीत प्रश्न उठाना बेमानी होगा। यहाँ हम इतना कहना उचित समझते हैं कि इस सिद्धांत का एक पूर्ण विकसित व्यापक मानवीय स्वरूप है। भारत पंचशील के सिद्धांतों का सफल संचालन करता रहा, किंतु 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर उसके विश्वास को डगमगा दिया। चीन स्वयं भी पंचशील के सिद्धांत का समर्थक था, अतः उससे ऐसी आशा नहीं थी। इस धक्के के बाद भी भारत की विदेश नीति में पंचशील का तत्त्व इसकी एक उल्लेखनीय विशेषता बना रहा।

शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence)

 • भारतीय विदेश नीति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Co-existence) की नीति रही है, जो वास्तविक अर्थों में पंचशील के सिद्धांत से जुड़ी हुई है। पंचशील के अंतर्गत पाँचवा सिद्धांत शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति का प्रतिपादक है। यह विश्वव्यापी 'जियो और जीने दो' का महामंत्र है। कोई भी प्रबुद्ध और निष्पक्ष व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर सकता। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति अंतर्राष्ट्रीय शांति की पक्षधर थी। आण्विक हथियारों के इस युग में विश्व शांति की आवश्यकता सर्वोपरि है। हाल ही में स्वतंत्र हुए अर्द्ध-विकसित और पिछड़े देशों के उत्थान के लिये शांतिपूर्ण वातावरण पहली आवश्यकता थी। भारत भी इसी श्रेणी के देशों के अंतर्गत था। जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ इसकी आर्थिक स्थिति कमजोर और नाजुक थी। संपूर्ण संसार में शांति का वातावरण उत्पन्न होना भारत की ऐतिहासिक आवश्यकता थी। इसके अभाव में भारत का पुनर्निर्माण और आर्थिक उत्थान असंभव प्रतीत हो रहा था। अतः भारत विदेश नीति के माध्यम से अपने हित में अंतर्राष्ट्रीय शांति का वातावरण बनाने के लिये प्रयासरत था।

• हथियारों की अंधी दौड़ और सैनिक गुटबंदियों के दौर में विश्व शांति भंग होने की पूरी संभावनाएँ थीं। सभी देशों के मध्य अविश्वास एवं संदेह का वातावरण व्याप्त था। गुट विशेष के देश बाहर से

एकताबद्ध दिखाई दे रहे थे, किंतु उनके मध्य भारी अंतर्विरोध व्याप्त थे। यह अंतर्विरोध तीव्र होकर विश्व को तृतीय विश्वयुद्ध की ओर धकेलने के लिये तत्पर थे। तृतीय विश्वयुद्ध की संभावना के मद्देनजर जवाहरलाल नेहरू ने 12 जून, 1952 को अपनी शांतिवादी नीति की घोषणा करते हुए कहा कि 'हमारी प्रथम नीति यह होनी चाहिये कि हम इस भयानक घटना को घटित होने से रोकें। दूसरी नीति इससे बचने की होनी चाहिये तथा तीसरी नीति ऐसी स्थिति उत्पन्न करने की होनी चाहिये कि यदि युद्ध छिड़ जाए तो हम उसे रोकने में समर्थ हो सकें। मैं यह चाहता हूँ कि एशिया में ऐसे राष्ट्रों का क्षेत्र अधिक व्यापक हो जो यह निश्चय करें कि चाहे जो कुछ भी हो वे युद्ध में शामिल नहीं होंगे, अन्य क्षेत्रों में होने वाले युद्ध क्षेत्र को सीमित करें और अपने भू-भागों की रक्षा करते हुए दूसरों के भू-भागों को सुरक्षित बनाने का भी यत्न करेंगे।' अतः स्वतंत्रता के पश्चात् विश्व शांति के लिये भारतीय तत्परता इसकी विदेश नीति का अंग बन गई। भारत ने विदेश नीति निर्धारण में विश्व शांति व सुरक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति भारतीय विदेश नीति का मूलमंत्र बन गई। 

विश्व शांति बनाए रखने के लिये भारत ने निम्नलिखित सैद्धांतिक व व्यावहारिक नीति अपनाई-

● इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर भारत किसी भी विश्वस्तरीय गुट में सम्मिलित नहीं हुआ। दोनों गुटों की ओर से इस हेतु अनेक प्रयास किये गए कि भारत उनके गुट में सम्मिलित हो जाए किंतु भारत ने अटल रहकर अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति को नहीं छोड़ा।

● गुटनिरपेक्ष आंदोलन में इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु भारत ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।
● पंचशील का सिद्धांत शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति को सफल बनाने के लिये अपनाया गया।

● द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ऐसे अनेक अवसर आए जब तीसरा विश्वयुद्ध आरंभ होने की संभावनाएँ पैदा हो गई। ऐसे अवसरों पर भारत ने दोनों गुटों के मध्य व्याप्त तनाव को कम करने के प्रयास किये।

● भारत हथियारबंदी की होड़ से दूर रहा एवं विश्वस्तर पर निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी का परिणाम था कि जब अगस्त 1963 में आंशिक आण्विक परीक्षण प्रतिषेध (Partial Nuclear Test Ban Treaty) संधि हुई तो भारत ने इस पर अविलंब हस्ताक्षर कर दिये।

● शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति भारतीय परंपरा के 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन से भी प्रेरित थी। इसके अनुसार संपूर्ण पृथ्वी पर बसे देश और मानव एक ही कुटुम्ब के सदस्य माने गए हैं। अहिंसा दर्शन भी इस नीति का प्रेरक तत्त्व रहा है। दो विश्वयुद्धों ने जो तबाही और विनाशकारी लीला मचाई उससे मानवता लज्जित हुई। अतः भविष्य में मानव को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिये भारतीय प्रयास सराहनीय रहे हैं। 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया तथा बाद में भी ऐसे परीक्षण किये जो शांतिपूर्ण कार्यों तथा विकास के उद्देश्य से किये गए थे। इनमें आत्मरक्षा का तत्त्व भी सम्मिलित रहा है। भारत ने जो परमाणु क्षेत्र में उपलब्धियाँ अर्जित कीं, वे विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रही हैं। वैसे भी शक्ति अर्जित करने के पश्चात् उसके प्रयोग पर संयम बरतना अधिक कठिन होता है, किंतु भारत ने संयम दिखाकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

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