जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के युद्ध संबंधी विचार (Hegel's Views on War)

जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल के युद्ध संबंधी विचार (Hegel's Views on War) 

हीगल के युद्ध संबंधी विचार (Hegel's Views on War)

हीगल के अनुसार 'सम्प्रभुता राज्य का सर्वोच्च तत्व है। राज्यों का एक-दूसरे के साथ आत्मनिर्भर, स्वायत्त और स्वतन्त्र व्यक्तियों जैसा सम्बन्ध होता है। राज्य की सम्प्रभुता समस्त व्यक्तियों तथा संगठनों पर लागू होती है। सम्प्रभुता का प्रश्न एक स्वतन्त्र तथा नैतिक समष्टि के रूप में राज्य की वास्तविकता का प्रश्न भी है। होगल के मत में यही युद्ध के जिसे निरपेक्ष बुराई और मात्र बाह्य संयोग नहीं समझना चाहिए, नैतिक पक्ष को जन्म देता है। राज्य को हीगल सामाजिक विकास का चरमोत्कर्ष मानता था। अतः उसकी शक्ति असीमित होती है। जिस प्रकार उसके ऊपर कोई आन्तरिक बन्धन नहीं होते, उसी प्रकार वह बाह्य बन्धनों से भी मुक्त होता है। उसकी शक्ति को अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों अथवा सधियों से सीमित नहीं किया जा सकता। राज्यों के ऊपर कोई अन्तर्राष्ट्रीय या सार्वभौमिक सत्ता न होने के कारण, उनके पारस्परिक झगड़े अन्ततोगत्वा युद्ध द्वारा ही तय किये जाते हैं। हीगल के अनुसार राष्ट्र राज्य का आवश्यक सिद्धांत युद्ध ही है।

हीगल के अनुसार इतिहास में 'विश्वात्मा' अपने को नाना रूपों में प्रकट करती है। प्रत्येक युग में विश्वात्मा का असली रूप शक्तिशाली राज्य के रूप में अवतरित होता है। युद्ध में ही विश्वात्मा यह निर्णय करती है कि कौन-सा राज्य उसकी आत्मा का सच्चा मूर्त रूप है और उसी राज्य को विश्वात्मा विजय प्रदान करती है। हीगल के अनुसार "विभिन्न सम्प्रभु इच्छाओं के टकराव में और उनके परस्पर सम्बन्धों की द्वन्द्वात्मकता के जरिये सार्वभौम विश्वात्मा काम करती है जो सभी राज्यों से भी ऊंची है।"

हीगल के अनुसार युद्ध के अनेक सुपरिणाम निकलते हैं जो लाभदायक होते हैं। वह मानता है कि युद्ध व्यक्ति के स्वार्थी अहम् का नाश करता है और इस प्रकार मानव जाति को पतन के मार्ग से बचाकर क्रियाशील करता है। उसके अनुसार युद्ध स्वयमेव एक नैतिक कार्य है। शान्ति भ्रष्टाचार फैलाती है और अनन्त शान्ति अनन्त भ्रष्टाचार फैलायेगी । युद्ध वह स्थिति है जो इहलौकिक स्वार्थों और स्वाभिमान को ऊंचा उठाती है। युद्ध का महत्व यह भी है कि इसके द्वारा जनता का नैतिक स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। जिस प्रकार वायु का चलना समुद्र को शान्त वातावरण से उत्पन्न होने वाली गन्दगी से बचाना है, ठीक उसी प्रकार गतिहीन अनन्त शान्ति से राष्ट्रों में भ्रष्टाचार फैलता है।

हीगल के अनुसार सफल युद्धों ने नागरिक विद्रोहों को रोककर राज्यों की आन्तरिक शक्ति को संगठित और बलशाली बनाया है। युद्ध मनुष्यों में विभिन्न सद्गुणों जैसे साहस, देशभक्ति, एकता, शूरवीरता, बलिदान, आदि का विकास करता है बन्दूक और बारूद सभ्यता को उन्नत करने वाले आविष्कार थे।

युद्ध द्वारा हीगल जर्मन राज्य का उत्कर्ष देखना चाहता था क्योंकि तत्कालीन जर्मन व्यवस्था को वह सर्वोत्कृष्ट एवं आदर्श मानता था। उसके विश्वात्मा की प्रगति का इतिहास सम्प्रभु राज्यों के विकास का इतिहास है। इसके अनुसार हीगल विश्व इतिहास को चार ऐतिहासिक राज्यों में विभाजित करते हैं- प्राच्य, यूनानी, रोमन और जर्मन इनसे सम्बद्ध राज्य पद्धतियां क्रमश: इस प्रकार हैं- प्राच्य धर्मतन्त्र (एक ही स्वतन्त्रता) जनतन्त्र तथा अभिजाततन्त्र (कुछ की स्वतन्त्रता) और सांविधानिक राजतन्त्र ( सबकी स्वतन्त्रता) हीगल लिखते हैं- "पूर्व एक ही की स्वतन्त्रता जानता था और जानता है, यूनानी और रोमन विश्व कुछ की स्वतन्त्रता जानता है और जर्मन विश्व जानता है कि सभी स्वतन्त्र हैं। " 
अतः जर्मन राज्य के विकास हेतु जिसे वह विश्वात्मा का चरमोत्कर्ष मानता था, वह व्यक्ति स्वातन्त्र्य तथा अन्तर्राष्ट्रीय नियमों की बलि देने के लिए तैयार था। हीगल के शब्दों में, “विश्व आत्मा के विकास के चरण का संवाहक होने के उसके इस परमाधिकार के सामने वर्तमान काल में अन्य सभी राष्ट्रों की आत्माएँ अधिकारहीन हैं और जिनका युग गुजर चुका है, उनकी भांति ये राष्ट्र भी विश्व इतिहास में अब कोई मानी नहीं रखते। "


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