जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल का शासन सम्बन्धी सिद्धांत (Hegel's Theory of Government)
हीगल शासन का सिद्धांत (Hegel's Theory of Government)
हीगल के मतानुसार राज्य का प्रकटीकरण तीन रूपों में होता है। 1. संविधान 2. अन्तरर्राष्ट्रीयता सम्बन्ध तथा 3. विश्व इतिहास |
संविधान के अन्तर्गत उसने तीन प्रकार की सत्ताएँ बतलायी - विधायिका, कार्यपालिका और राजा अपने पूर्ववर्ती लॉक और माण्टेस्क्यू की भांति हीगल भी सत्ताओं के पृथक्करण की संकल्पना को एक राजनीतिक आदर्श के रूप में सांविधानिक राजतन्त्र का औचित्य सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, किन्तु लॉक और माण्टेस्क्यू से मतभेद दिखाते और फ्रांसीसी क्रान्ति के दिनों में सत्ताओं के पृथ्थकरण के विचार को जिस ढंग से इस्तेमाल किया गया था, उसकी आलोचना करते हुए हीगल सत्ताओं की स्वायत्तता और उनके परस्पर नियन्त्रण की अवधारणा को भ्रामक बताते हैं, क्योंकि उसमें इन सत्ताओं के बीच परस्पर द्वेष, परस्पर अविश्वास और एक-दूसरे के विरुद्ध कार्य करने की कल्पना की गयी है। हीगल विभिन्न सत्ताओं के बीच जीवन्त, अटूट एकता का समर्थन करते हैं, न कि उनके बीच सन्तुलन बनाये रखने का । ऐसी एकता को वह उनकी आदर्श स्थिति कहते हैं। इसका यह अर्थ है कि सभी सत्ताएँ एक समग्र की शक्ति से निःसृत होती हैं और उसके चलायमान अंग हैं। हीगल के अनुसार, राज्य की आन्तरिक सम्प्रभुता का सार समग्र की प्रधानता में और विभिन्न सत्ताओं की राज्य की एकता पर निर्भरता तथा अधीनता में ही निहित हैं।
हीगल जन सम्प्रभुता के जनवादी सिद्धांत की आलोचना करते हैं और उसके स्थान पर वंशागत सांविधानिक राजा (Constitutional Monarchy) की सम्प्रभुता का विचार रखते हैं। सम्राट का होना वह राज्य के लिए अत्यन्त आवश्यक मानता था, क्योंकि उसकी दृष्टि में सम्राट के अभाव में एकता स्थापित नहीं की जा सकती। हीगल का विश्वास था कि राज्य के सभी कार्य किसी एक व्यक्ति द्वारा ही सम्पादित किये जाते हैं। राज्य तथा प्रशासन में एकता बनाये रखने के लिए वह बहुत अनिवार्य है। अतः वह सम्राट को राज्य की एकता का मूर्तिमान रूप मानता था। हींगल का कहना था कि वह व्यक्ति वंशानुगत सम्राट ही होना चाहिए, निर्वाचित राष्ट्रपति आदि नहीं। सम्राट की समर्थता के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं कि सुव्यवस्थित राजतन्त्र में शासन का सारा वस्तुनिष्ठ पक्ष कानूनों से निर्देशित होता है और सम्राट के लिए इसमें अपना आत्मनिष्ठ "मैं चाहता हूँ" जोड़ना ही शेष रह जाता है।
कार्यपालक सत्ता को परिभाषित करते हुए हीगल कहते हैं कि यह "विशेष क्षेत्रों और अलग-अलग मामलों को एक सामान्य सूत्र में पिरोने वाली सत्ता है।" इस सत्ता का जिसमें हीगल पुलिस और न्याय प्रशासन को भी सम्मिलित करते हैं, कार्य सम्राट के निर्णयों को क्रियान्वित करना, प्रचलित कानूनों पर अमल करवाना और विद्यमान संस्थाओं को बनाये रखना है। हीगल सरकार के सदस्यों और राजकर्मचारी वर्ग को समाज के मध्यम तबके का जिसमें राज्य की चेतना तथा शिक्षा का स्तर सर्वाधिक ऊंचा होता है, मुख्य संघटक अंग मानते हैं। राजकर्मचारियों के समुदाय की प्रशंसा करते हुए हीगल उसे 'वैधता तथा बौद्धिकता के मामले में राज्य का मुख्य अवलम्ब कहते हैं।
हीगल के अनुसार, विधायी सत्ता वह है, जो सर्वसामान्य का निर्धारण तथा स्थापना करती है। विधायी सत्ता द्वारा राज्य व्यवस्था में मूलगामी परिवर्तन किये जाने का विरोध करते हुए हीगल कहते हैं कि विद्यमान व्यवस्था में सुधार शान्तिपूर्वक, क्रमशः अप्रत्यक्ष तरीके से और स्वयं इस व्यवस्था की प्रकृति के अनुसार किये जाने चाहिए। विधायी सत्ता में उसके अनुसार विभिन्न श्रेणियों के लोगों के अलावा अन्तिम निर्णय का अधिकार रखने वाले राजा और मात्र विचार-विमर्श में भाग लेने वाली कार्यपालक सत्ता का भी स्थान होना चाहिए। हीगल विधायिका में दो सदनों की व्यवस्था करते हैं। अभिजात सदन की सदस्यता वंशागत और ज्येष्ठाधिकार के सिद्धांत पर आधारित होती है। प्रतिनिधि सदन नागरिक समाज के शेष भाग से बनता है और प्रतिनिधि निगमों, गिल्डों, समुदायों, आदि द्वारा अपने लिए निर्धारित संख्या के हिसाब से, न कि व्यक्तिगत मतदान के जरिये चुने जाते है। इस प्रकार प्रतिनिधियों का निर्वाचन नहीं, चयन होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हीगल वयस्क मताधिकार में विश्वास नहीं करता था। उसके अनुसार विधानमण्डल में संगठित वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, असंगठित व्यक्तियों का नहीं। सर्वसाधारण की राय का आदर किया जाना चाहिए, पर सर्वसाधारण में प्रशासन की क्षमता नहीं होती, अतः जनता को शासन के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शासन का प्रबन्ध तो कोई महान् व्यक्ति ही कर सकता है। हीगल का कथन था कि, 'जिसने लोकमत से घृणा करना नहीं सीखा है वह कोई बड़ा कार्य नहीं कर सकता।
हीगल विधायिका में बहसों की गोपनीयता, प्रेस की स्वतन्त्रता और सूचना स्वतन्त्रता के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं, किन्तु इसके साथ ही वह कहते हैं कि जनमत में सार्वजनिक मामलों के बारे में अपना मत व्यक्त करने की आत्मनिष्ठ स्वतन्त्रता विधानमण्डल की बहसों की विवेकपरकता के विपरीत विशृंख्ल, स्वतःस्फूर्त और सांयोगिक होती है । "कुछ मिलाकर हीगल ने सांविधानिक राजतन्त्र के अपने राजनीतिक आदर्श को जिस ढंग से पेश किया उसमें उनके समकालीन जर्मनी में विद्यमान अर्द्धसामन्ती व्यवस्था को ऊपर से शनैः-शनै: शान्तिपूर्ण सुधार लाकर बुर्जुआ व्यवस्था में बदलने की गुंजाइश रखी गयी थी।"