लोक नीति क्या है ? लोक नीति निर्माण प्रक्रिया की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिये (Process of Policy Making

लोक नीति क्या है ? लोक नीति  निर्माण प्रक्रिया की  व्याख्या कीजिये (Process of Policy Making

नीति निर्माण प्रक्रिया (Process of Policy Making)

परिचय (Introduction)

लोक नीति अत्यन्त समग्र, व्यापक एवं वृहद् आयामों को शामिल करने वाली संकल्पना है। सरकार की लोक नीतियों को सिर्फ समाज कल्याण की विषय वस्तुओं के आधार पर ही परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि लोक नीति का सरोकार समाज कल्याण से हटकर अन्य पक्षों पर भी होता है। यही कारण है कि निकोलस हेनरी ( Nikols Henari) जैसे विचारक ने लोक नीति को परिभाषित करने की बहुत चिन्ता नहीं की बल्कि कूटनीतिक तौर-तरीकों को अपनाते हुए उन्होंने कहा कि नौकरशाही जिन-जिन घटकों एवं विकास के लक्ष्यों इत्यादि का क्रियान्वयन करती है, वे सभी लोक नीतियाँ हैं। परन्तु लोक नीति को परिभाषित करने का यह कूटनीतिक प्रयास भी कारगर नहीं है क्योंकि नौकरशाही जो कार्य नहीं करती है एक प्रकार से वह भी सरकार की नीतियाँ होती हैं अर्थात् किसी राष्ट्र की लोक नीतियों में यह देखा जा सकता है कि सरकार क्या करना चाहती है? कितना करना चाहती है? किस कीमत पर करना चाहती है? सरकार क्या नहीं करना चाहती है?

सामान्यतः लोक नीति प्रतिमान को प्रमुखता के साथ परिभाषित करने वाले हैराल्ड लॉसवेल (Herald Lasswell) एवं डेनियल लैमेर (Denial Lemer) जैसे विचारकों ने यह बताया कि लोक नीति वह घटक है जिसमें किसी विशिष्ट समुदाय, क्षेत्र की स्थितियों में बेहतरी लाने हेतु विशिष्ट प्रकार का परिप्रेक्ष्य तथा उसी प्रकार का दृष्टिकोण एवं उस क्षेत्र या समुदाय के विषयवस्तु पर भविष्य के सरकारी तौर तरीकों, भविष्य की योजनाओं तथा सरकार के लक्ष्यों को शामिल किया जाता है।

स्पष्ट है कि लोक नीति एक अमूर्त वस्तुपरक और बहुआयामी अवधारणा है जिसका क्षेत्र इतना व्यापक है कि 1950 के दशक से लगातार आज तक लोक नीति के प्रतिमानों पर अध्ययन / अन्वेक्षण होते रहे हैं परन्तु 1975 का थॉमस डाई (Thomas Dye) का लोक नीति निर्माण / लोक नीति विश्लेषण का मॉडल लोक प्रशासन का सर्वाधिक मान्य प्रतिमान है।

लोक नीति की प्रकृति अत्यन्त अन्तर्विषयी है। नीति निर्माताओं को राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र इत्यादि कई मानविकी अनुशासनात्मक विषयों से सम्पर्क स्थापित करने होते हैं, यहाँ तक कि कई बार लोक नीति के लक्ष्य कुछ और होते हैं तथा उसकी रणनीतियों को अलग विषय वस्तुओं के आधार पर सुनिश्चित किया जाता है। यदि कोई लोक नीति निर्माता इसके अन्तर्विषयी चरित्र का ध्यान नहीं रखता है तो वह लोक नीति अवश्य असफल होती है। जैसा भारतीय परिस्थिति में हाल में 'भारत निर्माण योजना' की ग्रामीण जलापूर्ति परियोजनाओं के सन्दर्भ में देखने को मिलता है। यह योजना संथाल बहुल क्षेत्र एवं उराव जनजाति क्षेत्रों में सफल नहीं हो पा रही है, क्योंकि उनकी आर्थिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप स्वच्छ जलापूर्ति की परियोजना के क्रियान्वयन का ध्यान नहीं रखा गया। इससे स्पष्ट होता है कि संथाल एवं उराव जाति की बस्तियों में नागरिकों को पीने का पानी दिये जाने का मौलिक अधिकार जो कि संविधान की धारा 21 से प्रभावित है तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता जब तक कि मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र खासकर उनके सांस्कृतिक पक्ष का ध्यान बेहतर तरीके से न रखा जाये। अतः लोक नीति की सफलता ही इस बात का प्रमाण है कि उसकी प्रकृति अन्तर्विषयी होती है। यदि कोई नीति सफल होती है तो इससे स्पष्ट है कि नीति निर्माता ने अन्तर्विषयी चरित्र का ध्यान रखा है और लोक प्रशासन के संबंधों को अन्य मानविकी अनुशासनात्मक विषयों के साथ । कार्यकुशल तरीके से सम्बन्धित करते हुए नीतिगत निर्णय करने का फैसला किया है।

लोक नीति एवं निर्णय-निर्माण (Public Policy and Decision Making)

कई बार लोक नीति को निर्णय निर्माण का समानार्थी समझ लिया जाता है जो कि एक भूल है। निर्णय-निर्माण किसी लोक नीति के निर्धारण/निर्माण में एक छोटा सा चरण है। लोक नीति अत्यन्त व्यापक वृहद् एवं समग्र अवधारणा है। किन्तु निर्णय निर्माण में उतनी व्यापकता एवं समग्रता देखने को नहीं मिलती है। किसी लोक नीति के निर्धारण में निर्णय निर्माण एक साधन या यंत्र है इतना ही नहीं निर्णय निर्माण की श्रृंखला अपने आप को दोहराने वाली नहीं होती है। एक निर्णय के उपरान्त दूसरे प्रकार का निर्णय लिया जाता है जैसे पिछड़े क्षेत्रों में समुदायों की समस्या का पता लगाना, समाधान के विकल्पों का अलग-अलग प्रकृतियों का प्रदर्शन करने वाले प्रतिमानों की खोज करना इत्यादि । साथ ही निर्णय निर्माण में साधन-साध्य सम्बन्ध देखने को मिलते हैं। पिछला निर्णय अगले निर्णय का आगत बन जाता है, जैसे किसी प्रबन्धक को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के जीवन स्तर में विकास हेतु वेतन में अभिवृद्धि करने की आकांक्षा का पता लगाना, ऐसा निर्णय अधीनस्थों की वेतन बढ़ोत्तरी का साधन बन जाता है और उसके आधार पर अगला निर्णय किया जा सकता है।

परन्तु लोक नीतियाँ अपने आप को दोहराने वाली होती हैं, जैसे- शिक्षा की नीति समाज कल्याण मंत्रालय, मानव संसाधन मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा एक ही आधार पर संचालित की जाती हैं अर्थात् समुदाय का क्षैतिज शैक्षणिक विकास तथा समुदायों का उर्ध्वाधर शैक्षणिक विकास। अन्तर सिर्फ इतना है कि ये तमाम मंत्रालय अपने-अपने मुवक्किल से संबंधित होते हैं परन्तु वो एक ही कार्य करना चाहते हैं इतना ही नहीं लोक नीतियों में कोई साधन-साध्य सम्बन्ध नहीं होते, लोक नीतियों का मूल्यांकन अवश्य होता है। उनमें सुधार, संशोधन /समाशोधन किया जाता है अगर बेहतर लाभकारी लोक नीति नहीं है तो उसे बन्द कर दिया जाता है। परन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि कोई लोक नीति बड़ी या छोटी होती है या कोई लोक नीति किसी दूसरी लोक नीति की आगत है या किसी दूसरी लोक नीति का साधन है। भूलवश किसी छोटी परियोजना को किसी लोक नीति के साधन के रूप में परिभाषित कर ऐसी शंका उत्पन्न की जाती है कि इनमें साधन-साध्य सम्बन्ध होते हैं परन्तु उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्टतः कहा जा सकता है कि साधन-साध्य के बीच के सम्बन्ध को सिर्फ निर्णय निर्माण के क्षेत्र में ही देखा जाना चाहिए लोक नीति से इसका कोई सरोकार नहीं है।

नीति निर्माण की प्रक्रिया (Process of Policy Making)

लोक नीति निर्माण किसी भी राष्ट्र के विकास हेतु अति आवश्यक है विशेषकर 1950 के बाद उभरे कल्याणकारी राज्य के युग में असंख्य लोक नीतियों की आवश्यकता हुई और लोक नीति विश्लेषण प्रारम्भ हुआ। इस दिशा में डेनियल लैमर (Denial Lemer) एवं हैराल्ड लॉसवेल (Herald Lasswell) की कृति 'दी पॉलिसी साइन्स (1951)' का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

लोक नीति निर्माण की प्रक्रिया जॉन डेवी (John Devi) द्वारा प्रतिपादित नीति-निर्माण के छह चरणों में देखने को मिलती है जो निम्न प्रकार से परिलक्षित होते हैं-

प्रथम चरण : लोक नीति का निर्माण (First Step Public Policy Making)

 
इसमें लोक नीति की प्रक्रिया का आरम्भ किया जाता है व उस समस्या का पता लगाया जाता है, जहाँ नीतिगत फैसले करने आवश्यक होते हैं। उससे संबंधित लोक नीति के विकल्पों का विकास किया जाता है और उन विकल्पों का एक-एक कर मूल्यांकन करते हुए लोक नीति के रूप में उस विकल्प को चुना जाता है जो कम व्यय वाला तथा क्रियान्वयन के पश्चात् जिसका नुकसान कम से कम हो और जिसके क्रियान्वयन में समुदायों का विरोध कम से कम देखने को मिले।

द्वितीय चरण : लोक नीति का विश्लेषण (Second Step: Analysis of Public Policy)

इस चरण में लोक नीति का विश्लेषण सम्मिलित है जिसमें भविष्य में किसी लोक नीति के क्रियान्वयन में होने वाली समन्वय की समस्या, उसके उपायों एवं उससे उबरने हेतु प्राथमिकताओं के क्रम का निर्धारण पहले ही कर लिया जाता है। थॉमस डाई के प्रतिमानों में इस विश्लेषण के तौर-तरीकों को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कहना होगा कि यह पहला और दूसरा चरण आपस में काफी कुछ घुले-मिले से हैं, परन्तु नीति निर्माण की प्रक्रिया के चरण में इन चरणों को अलग-अलग परिभाषित करना एवं समझना अत्यन्त आवश्यक है।

तृतीय चरण : लोक नीति ज्ञान (Third Step: Knowledge of Public Policy )

 
लोक नीति प्रक्रम का तीसरा चरण लोक नीति ज्ञान का है, जिसमें जनता के प्रतिनिधियों को विधान मण्डल में एवं आम नागरिकों को संचार के माध्यम से, सरकार के इन नीतिगत फैसलों से अवगत कराया जाता है। आम नागरिकों एवं उनके प्रतिनिधियों की प्रतिपुष्टि के आधार पर निर्धारित किये गये नीतिगत फैसलों में संशोधन किया जाता है और उन्हें संसद या विधान मंडलों में प्रस्तुत कर सरकार के मान्य नीतिगत फैसलों के रूप में परिभाषित किया जाता है।

चतुर्थ चरण : लोक नीति क्रियान्वयन (Fourth Step: Implementation of Public Policy)


लोक नीति प्रक्रिया के इस चरण में लोक नीति के क्रियान्वयन को सम्मिलित किया जाता है जिसमें क्रियान्वयन करने वाला प्राधिकारी या संगठन नीति के अनुरूप संसाधनों, कार्मिकों, तकनीकों एवं परियोजनाओं के क्रियान्वयन की प्राथमिकताओं का निर्धारण करता है। कई बार नई समस्याओं या नये संगठनों को भी स्थापित किया जाता है यथा बफर स्टॉक की नीतियों के क्रियान्वयन हेतु एफ. सी. आई. जैसी संस्था को स्थापित किया जाना।

पंचम चरण : लोक नीति परिवीक्षण (Fifth Step : Supervision of Public Policy)


लोक नीति के क्रियान्वयन के चरण के पश्चात् लोक नीति के परिवीक्षण चरण को प्रारम्भ किया जाता है। जिसमें यह ध्यान रखा जाता है कि किसी लोक नीति हेतु जितने संसाधनों का आवंटन किया गया था, क्या कहीं उस अनुमान से अधिक व्यय तो नहीं किया गया है? साथ ही जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस नीति का निर्माण किया गया था, यह किस स्तर तक उन उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल रहा है। जैसे- बी.पी.एल. श्रेणी के लोगों के लिए जारी योजना का लाभ क्या उस बी.पी. एल. श्रेणी के लोगों को प्राप्त हो पाया है या नहीं।

षष्ठम् चरण : लोक नीति मूल्यांकन (Sixth Step: Public Policy Evaluation)


लोक नीति निर्माण प्रक्रिया के अंतिम चरण में लोक नीति मूल्यांकन किया जाता है। इसमें यह परिलक्षित किया गया है कि कोई भी लोक नीति चाहे कितने ही बेहतर तरीके से व्यवस्थित क्यों न हो और चाहे कितने ही बेहतर तरीके से उसे वित्तीयन क्यों न किया गया हो, यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि उस लोक नीति का प्रभाव और परिणाम क्या होगा ? इन प्रभावों एवं परिणामों का निर्धारण केवल मूल्यांकन पद्धति से ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः मूल्यांकन सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

लोक नीति का क्रियान्वयन (Implementation of Public Policy)

नीति क्रियान्वयन सम्पूर्ण लोक नीति प्रक्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है और पूरी लोक नीति की सफलता उपयुक्त क्रियान्वयन से ही निर्धारित होती है। इसलिए सभी राष्ट्रों में नीति क्रियान्वयन को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। हमारी अधिकांश पंचवर्षीय योजनाओं में यह अनुमान लगाए जाते रहे हैं कि एक बार नीति का निर्धारण हो जाने पर, इसका व्यवस्थित ढंग से क्रियान्वयन हो जाएगा और नीति निर्धारकों द्वारा आशातीत परिणाम, उसी रूप में प्राप्त हो जाएँगे। लेकिन यह अनुमान, विभिन्न राजनैतिक व संगठित कारकों पर आधारित होते हैं।


लोक नीति क्रियान्वयन की प्रक्रिया में अग्रलिखित चरण शामिल होते हैं-


1. एक बार जब लोक नीति अन्तिम रूप से घोषित हो जाती है तो सबसे पहला चरण नीति को प्रबन्धन योग्य इकाईयों में विभाजित करने का होता है जैसे भारत सरकार की नीति को राज्यों व जिलों के स्तर पर बांटा जाता है।

 
2. यदि लोक नीति पूर्णतया नई है और इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक संरचना का अभाव है तो शीघ्रता से उपयुक्त प्रशासनिक संरचना व भौतिक संरचना का सृजन किया जाना चाहिए।

3. तीसरा महत्वपूर्ण चरण नीति क्रियान्वयन के प्रत्येक स्तर पर आवश्यक वित्तीय तकनीकी व मानवीय संसाधनों को उपलब्ध कराना है।

4. यह चरण लोक नीति का व्यापक प्रचार करने से संबंधित है। इसके लिए राष्ट्रीय मीडिया व अन्य दूर संचार माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है। लोक नीति में जन सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए लोगों को लोक नीति के बारे में जागरूक बनाना व जानकारी देना अति आवश्यक है।

5. अन्तत: जिला स्तर व निचले स्तरों पर नीति क्रियान्वयन हेतु नागरिक समाज संस्थाओं का सहयोग सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। यद्यपि नीति क्रियान्वयन लोक नीति प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इसके बावजूद अधिकतर नीतियों का क्रियान्वयन अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।

अग्रलिखित कारक नीति क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं-

सामाजिक कारक (Social Factors)

सामाजिक कारक कई बार नीति क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं। विशेषकर तृतीय विश्व के देशों में समाज में व्यापक निरक्षरता, रूढ़िवादी विचार और अधिकार बोध का अभाव इत्यादि कारक नीति की सफलता को बाधित करते हैं। इसी प्रकार व्यापक सामाजिक असमानता व गरीबी इत्यादि के कारण भी कई बार हितों में द्वन्द्व की समस्या उभरती है। भूमि अधिग्रहण, मानवीय विस्थापन जैसे कारक परियोजना के क्रियान्वयन को या तो विलम्बित कर देते हैं अथवा क्रियान्वित ही नहीं होने देते।

वित्तीय या आर्थिक कारक (Financial Factors)

कई बार महत्वपूर्ण बड़ी परियोजनाओं का क्रियान्वयन वित्तीय संसाधनों के अभाव में बाधित हो जाता है। कई बार परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता न होने के कारण परियोजनाओं को मध्य में ही स्थगित करना पड़ता है।

राजनीतिक कारक (Political Factors)

कई बार राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते हैं अथवा विचारधाराओं के टकराव के कारण महत्वपूर्ण विकासात्मक सरकारी नीतियों का विरोध करते हैं। राजनैतिक दबावों का सामना करने तथा नीतिगत लक्ष्यों पर अडिग रहने के लिए कार्यान्वयन अधि कारियों के पास पर्याप्त शक्तियों का अभाव होता है जिस कारण नीति क्रियान्वयन बाधित होता है।

तकनीकी कारक (Technical Factors)

लोक नीति के क्रियान्वयन में कई बार तकनीकी कारक भी परियोजना के क्रियान्वयन को बाधि त करते हैं। विशेषकर विकासशील देशों में नई तकनीकी के विकास हेतु प्रशिक्षित मानवीय व वित्तीय संसाधनों का अभाव होता है। इस कारण कई बार परियोजनाएँ विलम्बित हो जाती हैं या प्रारम्भ ही नहीं हो पातीं।

प्रशासनिक कारक (Administrative Factors)

नौकरशाही में नीति पर अमल के लिए आवश्यक पर्याप्त व्यावसायिक दक्षता का अभाव भी नीति क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है। विशेषकर भारत में सामान्य विशेषज्ञ विवाद, निम्न स्तरीय कर्मचारियों के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव, प्रशासन के आधुनिकीकरण का अभाव, क्षेत्रीय इकाईयों के पास उपयुक्त प्राधिकार का अभाव इत्यादि भी नीति क्रियान्वयन को बाधित करते हैं।

भारत जैसे संघीय चरित्र वाले राष्ट्रों में केन्द्र व राज्यों के बीच उपयुक्त सहयोग की कमी से भी नीति क्रियान्वयन बाधित होता है। उल्लेखनीय है कि भारत में सामाजिक क्षेत्र के विकास से सम्बन्धि त कई परियोजनाएँ केन्द्र प्रायोजित होती हैं और राज्य सरकारें इन परियोजनाओं को या तो स्वीकार नहीं करना चाहतीं या पूरे मनोयोग से लागू नहीं करतीं। उल्लेखनीय है कि केन्द्र प्रायोजित परियोजनाओं को मैचिंग पैटर्न परियोजनाएँ भी कहा जाता है क्योंकि इन परियोजनाओं के लिए राज्यों को अपने संसाध न भी जुटाने होते हैं एवं यदि राज्य सरकारें अपने संसाधन नहीं जुटा पाती हैं तो भी केन्द्रीय अनुदान का उपयोग नहीं कर पाती हैं। अधिकतर राज्य केन्द्र प्रायोजित परियोजनाओं का विरोध करते हैं। इसी कारण सामाजिक क्षेत्र की कई परियोजनाओं का उपयुक्त क्रियान्वयन नहीं हो पाता है।

इस प्रकार नीति क्रियान्वयन एक अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया होते हुए भी सीमित सफलता प्राप्त कर पाती है। उल्लेखनीय है कि किसी भी देश का तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास नीतियों के सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करता है। इसलिए नीतियों के उपयुक्त क्रियान्वयन को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए।

लोक नीति के सफल क्रियान्वयन के उपाय (Measures to Successful Execution of Public Policy)

1. नीति निर्माण के समय ही नीति से प्रभावित होने वाले सभी भागीदारों की सहभागिता होना।
2. नीति क्रियान्वयन हेतु वित्तीय तकनीकी व मानवीय संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
3. क्रियान्वयन हेतु एक उपयुक्त योजना का निर्माण करना अर्थात् कितने चरणों में नीति को क्रियान्वित किया जायेगा, इस चरण में कितने समय व कितने संसाधनों द्वारा कितना लक्ष्य प्राप्त कर लिया जायेगा।
4. नीति क्रियान्वयन में नेटवर्क के अधिकतम उपयोग की सम्भावनाओं को तलाशना ।
5. क्रियान्वयन के चरण से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति अथवा पद की भूमिका का उपयुक्त निर्धारण ताकि भूमिकाओं के दोहराव, अतिव्यापन व अस्पष्टता से बचा जा सके।
6. प्रशासन व समाज के बीच की दूरी को कम करना व दोनों के मध्य विश्वास की भावना को बढ़ावा देना।
7. नीति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर बल देना ।
8. नीति के प्रति प्रशासकों एवं जनता में आवश्यक उत्साह उत्पन्न करना।
9. नेतृत्व की स्थायी विद्यमानता को बढ़ावा देना ।
10. सहभागी प्रबन्धन पर बल देना।

पर्यवेक्षण एवं प्रबोधन (Supervision and Monitoring)

लोक नीति के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि नीति के क्रियान्वयन के पश्चात् प्रभावी पर्यवेक्षण की व्यवस्था हों। पर्यवेक्षण और मूल्यांकन नीति प्रबन्धन का हृदय है। किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी मूल्यांकन एवं पर्यवेक्षण पर निर्भर करती है। पर्यवेक्षण के माध्यम से ही पर्यवेक्षणकर्ता नीति के प्रभाव और कमियों को भली प्रकार से समझ सकता है। पर्यवेक्षण की इस प्रक्रिया में पर्यवेक्षण नीति के परिणामों को देखकर ही पर्यवेक्षण की शुरूआत करता है। नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भी आवश्यक है कि क्रियान्वयन के स्तरों का प्रभावी रूप से निरीक्षण होता रहे ताकि नीति के क्रियान्वयन में उपस्थित बाधक तत्वों का उचित समाधान प्रस्तुत किया जा सके।

एक प्रभावी पर्यवेक्षण कम समय में अच्छे परिणाम के साथ नीति को निर्धारित करता है। एक प्रभावी नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण व्यवस्था नीति क्रियान्वयन में लागत में कमी लाती है, समय की बचत करती है और संसाधनों का प्रभावी उपयोग निर्धारित करती है। एक अच्छे पर्यवेक्षण का अस्तित्व उसके मुख्य परिणामिक बिन्दु पर आधारित सूचना के संचार की गति पर निर्भर करता है।

पर्यवेक्षण के चरण (Steps to Monitoring)

नीति पर्यवेक्षण में इस बात के लिए आश्वस्त होना होता है कि नीति कार्यक्रम निश्चित समय एवं निश्चित बजट में पूरे हुए हैं। नीति पर्यवेक्षण व्यवस्था को कुल छह चरणों में समझा जा सकता है।

नियोजन - नियोजन में उन महत्वकांक्षाओं को स्थापित किया जाता है जो कि क्रियान्वयनकर्ता और नीति निर्माताओं एवं पर्यवेक्षणकर्ताओं को नीति प्रदत्तीकरण प्रक्रिया में उपयोग करनी हैं।

आवंटन - आवंटन का अर्थ हैं, नीति प्रदत्तीकरण प्रक्रिया में सम्बन्धित लोगों के मध्य वितरण करना।

 
क्रियान्वयन - क्रियान्वयन, नीति प्रदत्तीकरण प्रक्रिया के तकनीकी कार्यों को करने से सम्बन्धित है।


अनुमापन - अनुमापन का अर्थ है, नीति प्रदत्तीकरण में सभी परिणामों के आधार पर प्रदर्शन निर्देशांकों का निरीक्षण करना।


मूल्यांकन -
मूल्यांकन का आशय है नीति प्रदत्तीकरण में उत्पन्न विचलनों का विश्लेषण करना।


समायोजन - समायोजन का अर्थ है, नीति प्रदत्तीकरण के परिणामों के आधार पर उत्पन्न विचलनों को दूर करने के लिए आवश्यक क्रिया करना ।

प्रभावी नीति पर्यवेक्षण के आधार (Bases of Effective Policy Monitoring)

नीति पर्यवेक्षण क्रियान्वयन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण है। यह लोक नीति प्रक्रिया का हृदय है। प्रभावी क्रियान्वयन को निश्चित करने के लिए समय पर पर्यवेक्षण आवश्यक है। पर्यवेक्षण, नीति प्रक्रिया के अन्य चरणों की तरह ही महत्वपूर्ण है। पर्यवेक्षण के लिए आवश्यक समय देना नीति प्रबंधन प्रत्यक्ष निवेश की तरह है। 

प्रभावी नीति पर्यवेक्षण में निम्नलिखित आधार हो सकते हैं-

पर्यवेक्षण व्यवस्था का प्रारूपण (Sketching Monitoring System)


प्रभावी पर्यवेक्षण के लिए आवश्यक है कि पर्यवेक्षण के प्रारूप का निर्धारण बेहतर तरीके से किया जाये। इसमें नीति प्रक्रिया के तकनीकी कारकों, समय कारकों एवं लागत कारकों को सम्मिलित किया जायें। प्रभावी पर्यवेक्षण में इन सभी कारकों को पर्याप्त महत्व प्रदान किया जाना चाहिए और यह भी महत्वपूर्ण है कि इन तीनों कारकों में उपस्थित विचलनों को भी ध्यान में रखा जाए।

मजबूत सूचना तंत्र (Strong Information System)


नीति पर्यवेक्षण उन विभिन्न प्रक्रियाओं से संबंधित होता है, जो महत्वपूर्ण सूचना एवं आंकड़ों को प्रदान करती हैं, जो कि आगामी नीति निर्माण में प्रशासकों एवं संबंधित नीति निर्माताओं को सहायता प्रदान करती हैं। प्रभावी सूचना तंत्र नीति के प्रत्येक पहलू को आवश्यक रूप से प्रभावित करता है। इसी कारण प्रभावी पर्यवेक्षण में एक प्रभावी सूचना तंत्र का उपस्थित रहना आवश्यक है।

प्रशासन तंत्र की मजबूती (Strength of Administration System)


प्रभावी पर्यवेक्षण के लिए आवश्यक है कि पर्यवेक्षण से संबंधित प्रशासकों की क्षमता, प्रतिबद्धता और उनके व्यक्तित्व को सशक्त बनाया जाये। पर्यवेक्षण की प्रक्रिया पर्यवेक्षक कार्मिकों के एक उच्च स्तर की माँग करता है। इस कारण यह आवश्यक है कि पर्यवेक्षणकर्ता, पर्यवेक्षण में अपने इस स्तर को बनाये रखें। प्रभावी पर्यवेक्षण के लिए आवश्यक है कि पर्यवेक्षक कार्मिकों को सशक्त बनाया जाए, उन्हें पर्याप्त शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जाए।

सफल नीति क्रियान्वयन इस तथ्य पर निर्भर करता है कि पर्यवेक्षण अधिकारियों द्वारा निर्धारित नीति परिणामों को किस स्तर तक प्राप्त किया गया है। पर्यवेक्षण की प्रक्रिया नीति-निर्माताओं और प्रशासकों को नीति मूल्यांकन के लिए आवश्यक तथ्य एवं आंकड़े उपलब्ध कराता है। जिसके आधार पर नीति सुधार एवं नीति नियंत्रण किया जा सकता है, जिससे कि नीति प्रदत्तीकरण प्रक्रिया और अधिक प्रभावशाली बनती है।

नीति मूल्यांकन (Policy Evaluation )

नीति मूल्यांकन, नीति निर्माण प्रक्रिया का अन्तिम एवं अत्यधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी नीति की सफलता अथवा असफलता का निश्चय करने के लिए यह आवश्यक है कि देश में एक प्रभावी नीति-मूल्यांकन प्रणाली विद्यमान हो। नीति मूल्यांकन के माध्यम से विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।

■ नीति मूल्यांकन से यह स्पष्ट हो पाता है कि कोई नीति अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल रही, किस सीमा तक अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकी।
■ नीति मूल्यांकन से यह स्पष्ट हो पाता है कि नीति का लाभ लक्षित समूह तक पहुँचा या नहीं।
■ नीति मूल्यांकन से उन कारकों की पहचान सम्भव है जो कि नीति की सफलता या असफलता के लिए उत्तरदायी होते हैं। 
■ नीति मूल्यांकन से कई महत्वपूर्ण सूचनाएँ एवं आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं और इन सूचनाओं एवं प्रतिपुष्टियों के माध्यम से भविष्य के नीति निर्माण में सहायता प्राप्त होती है।

नीति मूल्यांकन की प्रविधियाँ (Techniques of Policy Evaluation)

नीति मूल्यांकन में अग्रलिखित प्रविधियों का उपयोग किया जाता है-
■ परम्परागत प्रविधि  - लागत-लाभ प्रविधि 
■ समकालीन प्रविधि  - सामाजिक लेखा परीक्षण प्रविधि

लागत लाभ प्रविधियाँ (Cost - benefit Techniques)

परम्परागत रूप में लोक नीति का मूल्यांकन परियोजना के लागत व तदजनित लाभों के पदों से किया जाता रहा है, जैसे कि योजना में यदि लक्षित समूहों के लिए खाद्यान्न की मात्रा व लाभार्थियों की संख्या निर्धारित है व खाद्यान्न आवंटन रिकार्ड से यह प्रमाणित होता है कि सभी को खाद्यान्न की प्राप्ति हुई अथवा कुल निर्धारित संख्या के जितने प्रतिशत लोगों को लाभ पहुँचा उसी अनुपात में नीति सफल मानी जाएगी।

लेकिन लागत लाभ पद्धति नीति की सफलता या असफलता की वास्तविक स्थिति प्रकट नहीं हो पाती है क्योंकि प्रशासन तंत्र के द्वारा 'सकारात्मक प्रतिपुष्टि प्रस्तुत करने की चेष्टा की जाती है व कार्यक्रम की सफलता केवल मात्रात्मक पदों में मापी जाती है। पुनः सरकार के कार्यों की प्रकृति सम्प्रभु व कल्याणात्मक होने जैसे कानून व्यवस्था, आपदा प्रबन्धन, प्रतिरक्षा इत्यादि के कारण लागत लाभ प्रविधि का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है।

सामाजिक लेखा परीक्षण (Social Audit)

सामाजिक लेखा परीक्षण समकालीन समय में विशेष रूप से लोकप्रिय हो रहा है। इसे नागरिक समाज की एक पहल माना जाता है। इसमें लोक नीति की सफलता या असफलता का मूल्यांकन सरकारी तंत्र के द्वारा न करके नागरिक समाज समूहों द्वारा किया जाता है।

नीति मूल्यांकन के मानदण्ड (Scale of Policy Evaluation)

नीति मूल्यांकन के मानदण्ड यह निर्धारित करते हैं कि निर्मित एवं क्रियान्वित की गई नीतियों से अपेक्षित लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति हुई है अथवा नहीं। नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति या अप्राप्ति का मापन करने के लिए जिन तत्वों या घटकों को आधार बनाया जाता है, उन्हीं के आधार पर उसका मापन किया जाता है। 

नीति मूल्यांकन के लिए निम्नलिखित आधार बिन्दु हो सकते हैं-
(i) समानता (Equity) एवं निष्पक्षता
(ii) दक्षता (Efficiency)
(iii) प्रभाविकता ( Effectiveness)
(iv) पैरेटो की आशावादिता (Pareto Optimality)
(v) पर्याप्तता (Adequacy)
(vi) लोकहित (Public Interest
(vii) जनसहभागिता (Public Participation)
(viii) सततता (Sustainability) आदि।

मूल्यांकन के मानदण्ड को निम्न तालिका से समझा जा सकता है - 



नीति मूल्यांकन की समस्याएँ (Problems of Policy Evaluation)

भारतीय परिस्थिति में मूल्यांकन की समस्या लोक नीति की विषय वस्तु पर आधारित विशिष्ट चरित्र की है। सामान्यतः मूल्यांकन उच्च स्तरीय नौकरशाही द्वारा किया जाता है जब कि ऐसा सक्रियतावाद पर कार्य करने वाले गैर-सरकारी संगठन जैसे मजदूर किसान शक्ति संगठन एवं पार्टिसिपेटिव रिसर्च इन एशिया (प्रिया) इत्यादि संगठनों द्वारा किया जाना चाहिए। मुख्यतया लोक नीति के मूल्यांकन में निम्न प्रकार की समस्याएँ देखी जाती हैं-
■ लोक नीति मूल्यांकन में केवल मात्रात्मक पक्षों पर ध्यान देना ।
■ शोध संगठन व्यवहारिकता से दूर की बात करते हैं।
■ लोक नीति की भागीदारी में निजी संगठनों की भागीदारी की वजह से उचित आंकड़ों का संकलन संभव नहीं हो पाता।
■ PERT, CPM तथा MIS जैसे आधुनिक तरीकों के उपयोग का अभाव भी नीति मूल्यांकन में समस्या उत्पन्न करता है। 
■ परियोजनाओं में सामाजिक लेखा परीक्षण को बेहतर तरीके से संचालित न करना भी नीति मूल्यांकन में बाधा उत्पन्न करता है।
■ मूल्यांकन में गैर-सरकारी संगठनों की सीमित भागीदारिता।
■ उच्च अधिकारियों द्वारा परियोजना का मूल्यांकन वित्तीय वर्ष की समाप्ति के समय करना मूल्यांकन को संदेहास्पद बनाता है।
■ प्रशासनिक अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार ।

प्रभावी नीति मूल्यांकन के उपाय (Measures to Effective Policy Evaluation)

नीति मूल्यांकन लोक नीति प्रक्रिया का अत्यन्त आवश्यक चरण है क्योंकि सरकार के बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु निश्चित किये गये छोटे-छोटे उद्देश्यों के बीच प्रत्यक्ष सकारात्मक सम्बन्ध है या नहीं ऐसा सुनिश्चित करने हेतु मूल्यांकन की आवश्यकता होती है और प्रभावी नीति मूल्यांकन के बिना किसी भी नीति की प्रभाविकता को ज्ञात करना असंभव प्रतीत होता है। इसलिए प्रभावी नीति मूल्यांकन के लिए निम्नलिखित उपायों को ध्यान में रखना आवश्यक है। 
• नीति का मूल्यांकन मात्रात्मक होने के साथ-साथ गुणात्मक भी होना चाहिए।
• नीति के उद्देश्य एवं लक्ष्यों के मध्य अन्तर किया जाये।
• नीति मूल्यांकन में गैर-सरकारी संगठनों की प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित किया जाये। 
• मूल्यांकन में सामाजिक लेखा परीक्षण प्रणाली को प्रभावी रूप से क्रियान्वित करना । 
• PERT, CPM तथा MIS जैसी आधुनिकतम मूल्यांकन पद्धतियों के प्रयोग को बढ़ावा देना। 
• सुरेन्द्र नाथ समिति द्वारा सुझाया गया नौकरशाही 360° विश्लेषण किया जाये।
• शोध संगठनों एवं नौकरशाही में अन्तर स्थानान्तरण करने होंगे ताकि इनमें परिस्थितियों के अनुसार व्यवहारिकता का समावेश किया जा सके।
• प्रशासनिक अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित हो ।
• जनता में उनके लिए प्रायोजित योजनाओं के प्रति जागरूकता पैदा करना ताकि वे नीति मूल्यांकन में सहयोग प्रदान कर सके।

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