जॉर्ज विल्हेल्म फ्रेडरिक हीगल का जीवन परिचय एंव दर्शन के स्रोत (Life History of Hegel and Sources of Hegel's Philosophy )
इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से जॉर्ज फ्रेडरिक हीगल से सम्बन्धित निम्न बिन्दुओं पर चर्चा की गई है -
(Contents)
* प्रस्तावना (Introduction)
* हीगल का जीवन परिचय (Life History of Hegel)
* हीगल के दर्शन के स्रोत (Sources of Hegel's Philosophy)
प्रस्तावना ( Introduction )
हीगल के बारे में कहा जाता है कि वह केवल दार्शनिकों का राजा ही नहीं था, बल्कि राजाओं का दार्शनिक था। जिन दार्शनिकों पर हीगल का प्रभाव पड़ा, उनमें सर्वप्रथम कार्ल मार्क्स का नाम लिया जा सकता है। मार्क्स हीगल के द्वन्द्ववाद के सिद्धांत से प्रभावित हुआ और उसको अपनी विचारधारा के अनुसार मोड़कर समस्त विश्व को एक नए मार्ग पर ले जा सका। मार्क्स के साथ ही अंग्रेजी आदर्शवादी विचारक ग्रीन और बोसांके भी हीगल के दर्शन से प्रभावित हुए। इतना ही नहीं हीगल के दर्शन ने ट्राटश्की और ट्रायसेन जैसे इतिहासकारों और सैविगनी जैसे विधिशास्त्री को भी प्रभावित किया था। उसके प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए बटूण्ड रसेल ने लिखा कि 19वीं शताब्दी के अन्त में अमरीका तथा इंग्लैण्ड में सभी प्रमुख दार्शनिक हीगल के अनुयायी थे। उसके इतिहास के दर्शन ने राजनीतिक सिद्धांत के विकास पर गम्भीर प्रभाव डाला था। मार्क्स अपनी जवानी में हीगल का शिष्य था।
हीगल के दर्शन का प्रभाव समाजवाद और साम्यवाद की दो प्रमुख विचाराधाराओं के विकास पर पड़ा। 20वीं शताब्दी की प्रमुख विचारधाराओं- फासीवाद और नाजीवाद का जन्म हीगल द्वारा राज्य को दैवी संस्था बनाने और उसे निरंकुश सत्ता प्रदान करने का परिणाम समझा जाता है। जर्मनी के महान् राजनेता एवं कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क ने हीगल के सिद्धांतों को मूर्तरूप प्रदान किया था। विश्व के इतिहास की धारा के प्रवाह को एक बार स्थिर कर देने वाले और उस प्रवाह में एक मोड़ ला देने वाले जर्मनी और इटली के दो तानाशाहों क्रमश: हिटलर और मुसोलिनी को 'हीगल के मानस पुत्र' कहा जाता है।
वेपर का कथन है कि " हीगल राज्य के सावयव सिद्धांत का सबसे महान् समर्थक तथा आधुनिक इतिहास के भाष्यकारों के मध्य एक महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली चिन्तक था। "
सेबाइन का मत है कि "हीगल के दर्शन का उद्देश्य आधुनिक चिन्तन का पूर्ण तथा क्रमबद्ध पुनर्निमाण करने से कम और कुछ नहीं था। "
वस्तुतः हीगल बहुत विवादास्पद विचारक था। एक ओर तो विद्वान उसे दर्शन का पितामह कहते थे, तो दूसरी ओर उसे सर्वथा मूर्ख कहने वालों की कमी नहीं थी।
क्रॉस ने लिखा है कि " हीगल के दर्शन में द्वन्द्वात्मकता का सिद्धांत बिल्कुल बेकार है, जबकि खास बात उसका निरंकुशवाद है, तो मार्क्स ने कहा है कि हीगल की खास बात तो द्वन्द्वात्मकता है, जबकि उसका निरंकुशवाद बिल्कुल बेकार था ।
हीगल का जीवन परिचय (Life History of Hegel)
हीगल (1770-1831) एक महान् द्वन्द्ववादी विचारक थे जिनकी सृजनात्मक उपलब्धियां दार्शनिक और राजनीतिक विधिक चिन्तन के समूचे इतिहास में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। उनका नाम जर्मन आदर्शवादी परम्परा के मूल प्रवर्तकों में काण्ट के पश्चात् लिया जाता है। उसके ग्रन्थों में राजनीतिक आदर्शवाद अपनी चरम सीमा तक पहुंच गया।
हींगल का जन्म जर्मनी के एक नगर स्टुटगार्ट में सन् 1770 में हुआ था। उनके पिता वैर्टमबग एक सरकारी पदाधिकारी थे। उसका पिता हीगल को धर्मशास्त्र का विद्वान बनाना चाहता था और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु ट्यूबिंगन के धार्मिक विद्यालय में उसे भर्ती करवाया गया। हीगल स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही प्राचीन यूनानी रोमन इतिहास तथा साहित्य में रुचि लेने लग गए थे। इस काल के उनके विचारों में प्राचीन यूनान का एक कुछ हद तक आदर्शीकृत बिम्ब और लोगों के वास्तविक नैतिक संगठन के नाते राज्य के बारे में प्लेटो तथा अरस्तू के विचारों के प्रति रुझान देखे जा सकते हैं। सन् 1788 से 1793 तक होगल ने ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र की शिक्षा पायी। विश्वविद्यालय की शिक्षा पूरी कर ( 1793) लेने के बाद हीगल ने जो उस समय ईसाई धर्म को आलोचना की दृष्टि से देखते थे, धर्माचार्य का पेशा अस्वीकार करके विश्वविद्यालय में प्राध्यापक पद पाने की आशा में कुछ वर्ष बर्न और फ्रेंकफर्ट आन-मेन में प्राइवेट शिक्षक का काम किया (1793-1800)। इन वर्षों में हीगल के राजनीतिक विचार सामन्तवाद विरोधी थे। यह पुरातन कालातीत व्यवस्था पर प्रायः क्रान्तिकारी आलोचनात्मक और बुर्जुआ जनवादी दृष्टिकोणों से खुले कटाक्ष करते थे।
1801 में हीगल ने अपने शोध प्रबन्ध 'नक्षत्रों की कक्षाएँ' का मण्डन किया और येना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बन गए। 1806 तक वे वहां रहे और दर्शन के साथ-साथ प्राकृतिक विधि पर भी व्याख्यान देते थे। 1789-1802 में उन्होंने अपना काफी समय राजनीति तथा विधि से सम्बन्धित एक विशद ग्रन्थ 'जर्मनी का संविधान' की रचना को भी समर्पित किया, जो अधूरा ही रह गया और उनके जीवन काल में प्रकाशित न हो पाया। येना में बिताए गए वर्षों की एक अन्य रचना 'नैतिकता की पद्धति' में हीगल नैतिकता को अमूर्त व्यक्ति, परिवार तथा आचार जैसे तत्वों का समन्वय बताते हैं। हीगल के 1805 1806 के व्याख्यानों का संग्रह 'येना का यथार्थ दर्शन' उनकी दर्शन पद्धति का प्रथम आभास देता है। 1807 में उनकी 'फिनोमिनोलॉजी ऑफ स्पिरिट' नामक रचना प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने विकासशील चेतना के विभिन्न चरणों पर प्रकाश डालते हुए द्वन्द्वात्मक विश्लेषण के एक विशिष्ट उपकरण के नाते बोध का दार्शनिक महत्व प्रतिपादित किया।
मार्च 1807 में हीगल बाम्बर्ग चले आए और वहां दैनिक 'बाम्बर्ग समाचार' का सम्पादन करने लगे, किन्तु इस काम की कठिनाइयों, विशेषतः सेन्सर के साथ आए दिन के झगड़ों को वह अधिक समय तक न झेल सके और अक्टूबर 1808 में बाम्बर्ग छोड़कर न्यूरेम्बर्ग आ गए, जहां 1816 तक एक विद्यालय में रेक्टर तथा प्रोफेसर के पद पर कार्य किया। येना के दिनों के अन्त से ही हीगल नेपोलियन के व्यक्तित्व और उसके ऐतिहासिक प्रगतिशील कार्यों के प्रशंसक बन गए थे। नेपोलियन को उन्होंने राज्य का महान् नायक विश्वात्मा आदि संज्ञाएँ दीं। उन्हें आशा थी कि नेपोलियन और उसके सुधारात्मक कार्य अर्द्धसामन्ती जर्मनी में भी प्रगतिशील परिवर्तन लाने और बुर्जुआ अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं एवं सांविधानिक प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना में सहायक होंगे नेपोलियन का पतन हीगल के लिए विश्व इतिहास के स्तर की ट्रैजेडी थी। उन्हें 'कजाकों बरकीरों तथा प्रशाई देशभक्तों' और 'अन्य श्रेष्ठ मुक्तिदाताओं' की विजय पसन्द नहीं आयी थी। न्यूरेम्बर्ग काल में हीगल ने 'तर्क विज्ञान' नामक रचना प्रकाशित की। अक्टूबर 1816 में हीगल हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। 1817 में उन्होंने 'ब्युटॅम्बर्ग राज्य की श्रेणी सभा की रिपोर्ट' नामक रचना प्रकाशित की जिसमें वंशागत, सांविधानिक ढंग से गठित सीमित राजतन्त्र का समर्थन किया गया। हाइडलबर्ग में बिताए वर्षों में ही उनका दर्शन शास्त्र विश्वकोश' (1817) भी प्रकाशित हुआ जिसका तीसरा भाग - 'आत्मा का दर्शन' उनके अधिकार दर्शन विषयक आधारभूत प्रस्थापनाओं को समर्पित है। अक्टूबर 1818 से 14 नवम्बर 1831 तक ( लगभग मृत्युपर्यन्त) हीगल बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इस काल में उनकी राजनीतिक विचारधारा में अनुदारवाद ने जोर पकड़ा। 61 वर्ष की उम्र में 14 नवम्बर 1831 को अचानक हैजे की बीमारी से उनका देहान्त हो गया।
बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में हीगल को अपूर्व ख्याति मिली। उन्हें जर्मनी का राष्ट्रीय दार्शनिक कहा जाने लगा। उनके भाषणों को सुनने के लिए विद्यार्थियों और विद्वानों की भीड़ लगी रहती थी। उनके निधन के बाद हीगल को पढ़ना, उनके दर्शन पर चर्चा करना एक फैशन सा हो गया। कोई भी दार्शनिक या विचारक अपनी विद्वता की छाप तब तक नहीं छोड़ सकता था जब तक वह यह सिद्ध न कर दे कि उसने हीगल के ग्रन्थों को पढ़ा है। मार्क्स तक को हीगल पढ़ना पड़ा। 19वीं शताब्दी में 0उन्हें न केवल जर्मनी का चिन्तक माना जाता था बल्कि प्लेटो और अरस्तू की कोटि का विश्व स्तर का दार्शनिक माना जाने लगा।
Note : - क्या आप जानते हैं यह आश्चर्य की बात है कि जिस व्यक्ति को आगे एक प्रसिद्ध दार्शनिक एवं विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर बनना था उसके (होगल के) स्नातक परीक्षा के प्रमाण पत्र पर यह लिखा था कि " अर्थशास्त्र और भाषाशास्त्र में प्रवीण है, चरित्रवान, किन्तु दर्शनशास्त्र में उसकी कोई योग्यता नहीं है।"
हीगल की रचनाएँ (Works of Hegel )
हीगल न केवल एक महान् दार्शनिक था अपितु एक विद्वान लेखक भी था। उसकी रचनाओं की परिधि दर्शन और राजनीति के क्षेत्रों से भी अधिक आगे थी। उसके कृतित्व की परिधि में दर्शन, आध्यात्म, कला, आचार, इतिहास और राजनीति सभी आते हैं। उसकी कतिपय उल्लेखनीय रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
(1) फिनोमिनोलॉजी ऑफ स्पिरिट (The Phenomenology of Spirit),
(2) साइन्स ऑफ लॉजिक (Science of Logic),
(3) ऐनसाइक्लोपीडिया ऑफ दि फिलोसोफिकल साइन्स (The Eneyclopaedia of the Philosophical Sciences),
(4) फिलोसफी ऑफ लॉ या फिलासफी ऑफ राइट (The Philosophy of Law or Philosophical Sciences),
(5) कान्स्टीट्यूशन ऑफ जर्मनी (Constitution of Germany), (6) दि फिलोसफी ऑफ हिस्ट्री (The Philosophy of History),
हीगल के दार्शनिक विचारों का श्रेष्ठतम निचोड़ उसके ग्रन्थ 'फिनोमिनॉलोजी ऑफ स्पिरिट' में मिलता है। यह राजनीतिक विचारों से सम्बन्धित ग्रन्थ नहीं है, अपितु सार्वभौमिक सत्य की खोज मात्र है। इस ग्रन्थ में हीगल यह प्रतिपादित करता है कि इस विश्व के मूल में जो प्रधान वस्तु है वह 'विश्वात्मा' (Geist) है। और 'विश्वात्मा' का विचार ही उसके समस्त राजनीतिक दर्शन का आधार स्तम्भ है।
'साइन्स ऑफ लॉजिक' में हीगल ने तर्क के तरीकों का विश्लेषण नहीं किया है, लेकिन तर्क हेतु प्रयोग की जाने वाली धारणाओं का विश्लेषण किया है। इस दृष्टि से दर्शन, हीगल के अनुसार एक वस्तुनिष्ठ, निर्णयात्मक विज्ञान है। अपने उपागम को परिकल्पनात्मक कहते हुए हीगल उसका खुलासा विलोमों का उसकी एकता में द्वन्द्वात्मक ज्ञान, नकारात्मक में सकारात्मक का ज्ञान के रूप में करते हैं।
'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ दि फिलोसोफिकल साइन्स' में अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं से सम्बन्धित व्यापक प्रश्नों की चर्चा करते हैं। उनकी सहानुभूति कानूनों का अंकुश मानने वाले वंशागत राजतन्त्र के साथ है।
'फिलोसफी ऑफ राइट' राजनीतिक दर्शन के इतिहास में हीगल की महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। इसमें स्वतन्त्रता की प्राकृतिक और सामाजिक अवधारणा प्रस्तुत की गई है। स्वतन्त्रता की अवधारणा ही उनके राजनीतिक चिन्तन को समझने में हमारी सहायता करती है ।
'कान्स्टीट्यूशन ऑफ जर्मनी' उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो सकी थी। इसमें टुकड़ों टुकड़ों में विभाजित जर्मनी की हालत पर प्रकाश डालते हुए वह एक नीति एक शासन और एक विधान से युक्त केन्द्रीकृत जर्मन राज्य को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता को प्रमाणित करते हैं।
'हिस्ट्री ऑफ फिलोसफी' में स्वतन्त्रता बोध के क्षेत्र में हुई ऐतिहासिक प्रगति पर प्रकाश डाला गया है। इसमें हीगल ने इतिहास की द्वन्द्वात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है।
आलोचकों के अनुसार हीगल की रचनाओं का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। उसकी अधिकांश रचनाएँ उन विद्यार्थियों के नोट्समात्र हैं जिन्होंने कक्षाओं में उसके व्याख्यानों को सुनते हुए तैयार किए थे। केवल 'साइन्स ऑफ लॉजिक' और 'फिनोमिनोलॉजी ऑफ स्पिरिट' उसने अपनी कलम से लिखी है। उसकी सभी रचनाएँ दुर्बोध एवं क्लिष्ट हैं और उन्हें जर्मन मूर्खता का स्मारक समझा जाता है। उसके विचारों को समझना कठिन है और ऐसा कहा जाता है कि हीगल ने स्वयं अपने विचारों के बारे में कहा था कि "केवल एक ही व्यक्ति ने मेरे सिद्धांतों को समझा है, यह भी सम्भव है कि उसने भी इन्हें न समझा हो।" अन्य आलोचकों ने उसे 'रहस्यवादी मूर्ख' (Mystifying nonsense) तथा 'अनपढ़ ढोंगी' (Illiterate charlatan) तक कह डाला है जो स्वयं अपने दर्शन को नहीं समझ पाया था। फिर भी वेपर का यह कथन उल्लेखनीय है कि 'वह जितना क्लिष्ट है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। '
हीगल के दर्शन के स्रोत (Sources of Hegel's Philosophy)
हीगल के दार्शनिक विचारों के बहुआयामी स्रोत हैं। रूसो के दर्शन का उसने विस्तृत अध्ययन किया तथा यूनानी दार्शनिकों का उसके जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा। प्लेटो और अरस्तू के राज्य संबंधी विचारों का बचपन से ही उस पर प्रभाव देखा गया। “ हीगल स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही प्राचीन यूनानी रोमन इतिहास तथा साहित्य में रुचि लेने लग गए थे। इस काल में उनके विचारों में प्राचीन यूनान का एक कुछ हद तक आदर्शीकृत बिम्ब और लोगों के वास्तविक नेथ्तक संगठन के नाते राज्य के बारे में प्लेटो तथा अरस्तू के विचारों के प्रति रुझान देखे जा सकते हैं।" उसने ईसा के जीवन चरित्र को लिखकर ईसाई धर्म की नैतिक असत्यता के रूप में आलोचना की। काण्ट और फिक्टे के प्रभाव में उसने अंग्रेजी विचाराधारा की इन्द्रियों से प्राप्त संवेदना (Sensation) तथा परीक्षण द्वारा ही ज्ञान की प्राप्ति होती है, का खण्डन किया। इन दोनों दार्शनिकों की भांति हीगल का भी विश्वास था कि अन्तिम सत्य तथा इस विश्व से सम्बन्धित समस्याओं का निराकरण केवल दार्शनिक चिन्तन द्वारा ही किया जा सकता है। साथ ही वह इन्हीं की तरह यह भी स्वीकार करता था कि विश्व का आन्तरिक स्वरूप नैतिक एवं आध्यात्मिक है तथा स्वतन्त्रता विवेक बुद्धि के अनुसार कार्य करने को ही कहते हैं।
हीगल के दृष्टिकोणों के निर्माण और बौद्धिक विकास में फ्रांसीसी क्रान्ति का भी प्रबल प्रभाव पड़ा, किन्तु जहां वह इस क्रान्ति के मुख्य विचारों को स्वीकार करते थे और अपने सृजनात्मक विकास के आरम्भिक चरणों में सामन्तवाद तथा निरंकुशतन्त्र विरोधी बुर्जुआ क्रान्ति की आवश्यकता से सहमत थे, वहां वह जैकोबिनी आतंक और रोबेसपियर के अनुयायियों के घोर आलोचक भी थे।
हीगल के विचारों पर जर्मन दार्शनिकों काण्ट, फिक्टे, यूनानी दार्शनिकों-प्लेटो, अरस्तू तथा फ्रांसीसी दार्शनिकों माण्टेस्क्यू और रूसो का बहुत प्रभाव पड़ा। फिर भी हीगल के विचारों की अपनी विशेषता है तथा उसने इन विचारकों से उन्हीं सिद्धांतों को ग्रहण किया जो उसको रुचिकर लगे ।