भारत मे लोक नीति का निर्माण कैसे होता है , भारत में लोकनीति निर्माण की प्रक्रिया क्या है ? Public Policy in India

भारत मे लोक नीति का निर्माण कैसे होता है , भारत में लोकनीति निर्माण की प्रक्रिया क्या है ? Public Policy in India 

भारत में लोक नीति Public Policy in India

परिचय (Introduction)

लोक नीति सरकार की उन समस्त गतिविधियों को दर्शाती है जिसके द्वारा नागरिकों या लोक नीति के सन्दर्भ में विभिन्न कार्य किए जाते हैं, चाहे वह कार्य सरकार स्वयं करे या वह किन्हीं अन्य संस्थाओं के माध्यम से किए जाएं। बी. गाई पीटर्स (B. Gai Peeters) ने लोक नीति के बारे में यह एकदम सही कहा है कि वास्तव में किसी भी देश में जब किसी भी सरकार के बारे में कोई भी निष्कर्ष निकाला जाता है कि यह सफल है या असफल तो उसकी लोक नीतियों को ही आधार बनाया जाता है। लोक नीति एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा भविष्य में उभरती हुई आवश्यकताओं की प्राथमिकताओं को सरकार के द्वारा रखा जाता है। अन्य शब्दों में यह राज्य व्यवस्था के कार्यक्रमों या उद्देश्यों की प्राप्ति को दर्शाती है। लोक नीति के द्वारा विभिन्न लोक प्रतिबद्धताओं को लाया जाता है, साथ ही साथ सार्वजनिक हित की प्राप्ति की जाती है। विधि के उद्देश्यों को प्राप्त करने का भी यह एक सशक्त माध्यम है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोक नीति राज्य व्यवस्था की लोक 1 जवाबदेही का भी उपकरण है। अपनी विशिष्ट महत्ता रखने के कारण ही लोक नीति के विभिन्न चरणों में इसकी निर्माण प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दिया जाता है। भारत जैसे विकासशील देश और विकसित देशों में नीति-निर्माण प्रक्रिया में कुछ अन्तर होता है जिसे आगे बताया गया है।

विकासशील देशों में नीति-निर्माण (Policy Making in Developing Countries)

ड्रोर (Dror) के अनुसार विकासशील राज्यों में नीति-निर्धारण के प्रमुख लक्षण निम्न प्रकार हैं- 

1. आनुवांशिकता, विरासत तथा शासक उच्च वर्गों के कार्य पैटर्न, नीति निर्धारण प्रक्रिया के लक्षणों को आकार प्रदान करते हैं।
2. पुनर्निवेश प्रणाली तथा क्रियाविधि बहुत कमजोर होती है।
3. नीतिगत रणनीति का निर्णय सजगता से नहीं होता। लोक नीति निर्धारण की अभिजातीय रणनीति, प्रायः कम सुरक्षा एवं अपेक्षाकृत अधिक खतरों से भरपूर होती है।
4. मूल्यों की प्राथमिकताएँ तय करना तथा कार्यकारी ध्येय भली प्रकार परिभाषित होते हैं। 
5. नीति के विकल्पों की गहन खोज की जाती है।
6. राजनैतिक संस्कृति समेत समूचा वातावरण, जिसका नीति निर्धारण प्रक्रिया की कार्यवाही के लक्षणों से काफी निकट सम्बन्ध होता है, वास्तविकता से प्रेरित नहीं होता। 
7. समर्थन प्राप्त करने, न कि वास्तविक अमल के इरादे से किए गए नीति सम्बन्धी वक्तव्य अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट नियमित तथा विस्तृत क्षेत्र तक फैले होते हैं।
8. पर्याप्त तरीकों व अधिरचना के अभाव के कारण, किसी नीति के वास्तविक परिणामों तक पहुँचना बहुत मुश्किल होता है।
9. मूल्यांकन तथा नीतियों की पुनः रूपरेखा तैयार करने का काम संतोषजनक नहीं होता। 
10. नीति निर्धारण में मतदाताओं की भूमिका प्रायः नगण्य ही रहती है।
11. बुद्धिजीवियों की भूमिका भी संतोषजनक नहीं रहती ।
12. नीति-निर्धारण में विधानमण्डलों की भूमिका दूसरे दर्जे की होती है। 
13. राजनैतिक कार्यपालिका अधिक शक्तिशाली होती है तथा स्थाई कार्यपालिका कमजोर होती है। इसमें समुचित संस्थागत ढांचे का अभाव रहता है, ऊपर से काम के भारी बोझ से यह दबी रहती है।
14. इनमें से अधिकांश राज्यों में न्यायपालिका की भूमिका लगभग गैर महत्वपूर्ण रहती है। 
15. विकासशील देशों में जनशक्ति स्रोतों की भारी कमी नीति निर्धारण प्रणाली पर बुरी तरह प्रभाव डालती है।
16. उन लोगों में पर्याप्त ज्ञान व सूचनाओं का अभाव रहता है, जो प्रक्रिया के अभिन्न अंग होते हैं। 
17. ऐसे व्यावसायिक मानकों का जिन्हें नीति-निर्धारण में मानक के रूप में उपयोग में लाया जा सकता हो, अभाव रहता है। 
18. बोधशील योजना, जो कि नीति निर्धारण प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है, या तो उसका पालन ही नहीं किया जाता अथवा उसे समुचित ढंग से संकलित नहीं किया जाता है। 
19. नीति निर्धारण के इस्टतम गुण काफी कम रहते हैं। 
20. नीति निर्धारण पूरे तौर पर औसत दर्जे का होता है और इसे 'अवशेष गुणवत्ता' कहा जा सकता है।

विकसित देशों में नीति-निर्माण (Policy Making in Developed Countries)

ड्रोर (Dror) के अनुसार विकसित राज्यों में नीति निर्धारण के प्रमुख लक्षण निम्न प्रकार हैं- 

1. पुनर्निवेश का अध्ययन करने के लिए व्यवस्थित संस्थागत इन्तजामों का अभाव रहता है। कुछ मामलों में केवल परख एवं दोष विधि लागू की जाती है। सामान्य रूप में, अध्ययन नाममात्र का तथा धीमा रहता है।
2. नीति के विभिन्न साधारण गुणधर्मों की खोज तथा इन्हें विकसित करने के लिए पर्याप्त कार्यवाही प्रतीत नहीं होती।
3. निहित अन्तिम सीमा तक हासिल की गई ऊँचाईयाँ संकरी हैं और निकटवर्ती समस्याओं तथा उनसे प्राप्त परिणामों को मद्देनजर रखते हुए ही तय की गयी हैं।
4. विलक्षण तार्किक अवयवों द्वारा महत्वपूर्ण व आश्चर्यजनक भूमिका निर्वहन की जाती है। 
5. पश्चिमी जनतन्त्रों में निर्धारित नीतियाँ यथार्थवादी होती हैं तथा आर्थिक व राजनैतिक रूप से संभव होती हैं।
6. दीर्घकालीन नीतियों के निर्धारण के लिए कुछ देशों में सर्वेक्षण, ज्ञान तथा निर्माण पर अनुसंधान एवं विकास के लिए पृथक एवं विशिष्ट संस्थाएँ विद्यमान रहती हैं। 
7. अनेक विकसित और आधुनिक देशों में सरकार की विभिन्न इकाइयाँ जो नीति निर्धारण करने के साथ-साथ इन्हें लागू करने के बीच अन्तर बनाए रखने में कठिनाई होती है। 
8. जनतांत्रिक व्यवस्थाओं में, चुनावों के माध्यम से मतदाताओं द्वारा नीतियों के निर्माताओं पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला जाता है। 
9. नीति निर्धारण में बुद्धिजीवियों द्वारा मूल्य एवं व्यापक भूमिका निर्वहन की जाती है।
10. नीति निर्धारण में सरकार के प्रमुख की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, चाहे वह प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, चांसलर इत्यादि जैसी भी राज्य व्यवस्था हो ।
11. जनतांत्रिक व्यवस्थाओं में एक संस्था के रूप में विधान मण्डलों द्वारा नीति निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाई जाती है और निरंकुश तानाशाह शासकों में इनकी भूमिका न्यूनतम रहती है।
12. नीति निर्धारण में राजनैतिक दलों का स्थान निर्णायक महत्व का होता है।
13. हालांकि स्वार्थ गुटों का मूल्यों व ध्येयों के प्रति संकीर्ण व सशर्त रुख होता है फिर भी नीति निर्धारण में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
14. स्रोतों तथा साधनों की अपेक्षा प्रशिक्षित एवं पूरी तरह से लैस जनशक्ति की कमी रहती है। 
15. नीति निर्धारण प्रक्रिया में व्यावसायिक नागरिक सेवाएँ प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभर रही हैं।
16. नीति के मूल्यांकन के उद्देश्य के लिए नीति निर्धारण के व्यावसायिक मानकों का प्रभावी इस्तेमाल पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।
17. अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने तथा आबादी की वास्तविक जरूरतों व मांगों की पूर्ति के लिए विकसित देशों में नीति निर्धारण अपने आप में पर्याप्त है। 

उपरोक्त वर्णित बिन्दुओं से शासन की विभिन्न राजनैतिक व्यवस्थाओं में नीति निर्माण की स्थितियों का ब्यौरा प्रस्तुत होता है।

भारत में नीति-निर्माण प्रक्रिया (Policy Making Process in India)

भारत में लोक नीति निर्माण में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न संगठन एवं संस्थाएँ योगदान देती हैं, जैसे- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विभिन्न राजनीतिक दल, दबाव समूह प्रशासन एवं जनमत। लोक नीति निर्धारण का कार्य एक सरकारी प्रयास के रूप में किया जाता है जिसमें अनेक व्यक्ति एवं संस्थाएँ अपनी सक्रियता निभाते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार देश की लोक नीति का निर्धारण संविधान के मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप होना चाहिए, फिर भी इनके अनुरूप प्रस्तुत की गयी लोक नीति में अनेक विकल्प होते हैं, जिन्हें सरकार अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार चुन सकती है अथवा छोड़ सकती है।

व्यवस्थापिका (Parliament)

भारत में व्यवस्थापिका (संसद) नीति निर्धारण की सर्वोच्च संस्था है। भारतीय संसद के दो सदन हैं- लोकसभा एवं राज्यसभा । यह सर्वोच्च इसलिए है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बनने वाली सरकार सत्ता में बने रहने के लिए लोकसभा के समर्थन पर निर्भर रहती है। यह ऐसे नियमों का निर्माण करती है जो लोक नीति को प्रभावी बनाते हैं। फिर भी वास्तविक रूप में यह सर्वोच्च नहीं है क्योंकि यह संवैधानिक तथ्यों को छोड़कर अन्य नीतियों को निर्धारित नहीं करती। यह तो केवल वाद-विवाद तथा सामान्य चर्चाओं के माध्यम से लोक नीतियों को प्रभावित करती है, अतः वास्तविक रूप में व्यवस्थापिका नीति निर्धारक संस्था होने के साथ-साथ नीति अनुमोदक संस्था भी है।

कार्यपालिका (Executive Authority)

देश की कार्यपालिका (सरकार) का यह संवैधानिक दायित्व होता है कि वह संसद में प्रस्तुत की जाने वाली लोक नीति तय करे। भारतीय कार्यपालिका के अन्तर्गत राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद् तथा सरकार तंत्र सम्मिलित होते हैं। राजनैतिक कार्यपालिका शासन प्रणाली की भावना, सत्ताधारी दल की  विचारधारा, वक्त की जरूरत, समूहों के दबावों इत्यादि पर रहते हुए व्यवस्थापिका के समक्ष पेश किए जाने वाले मुद्दों की पहचान करती है ताकि उन पर नीतियाँ निर्धारित की जा सकें। नीति निर्धारण के लिए एजेण्डा में रखे जाने योग्य मुद्दों के बारे में आवश्यक सूचनाएँ एकत्रित करने में स्थायी कार्यपालिका, राजनैतिक कार्यपालिका के साथ सहयोग करती है।

नीति निर्माण में कार्यपालिका की एक अन्य दृष्टि से भी भूमिका रहती है। बहुत से कानून व्यवस्थापिका के बाहर सरकारी विभागों में बनाए जाते हैं, जिनके विविध नामकरण, नियम. विनियमन, उपकानून, योजनाएँ, आदेश, अधिसूचना आदि होती हैं। इसे सुपुर्द विधि-निर्माण कहा जाता है । एक अर्थ में इसके मायने हैं उस शक्ति के परिणाम अर्थात् नियम, विनियमन, आदेश  इत्यादि । किसी भी अर्थ में इन शब्दों का प्रयोग क्यों न किया गया हो, वास्तविकता यह है कि भारत में सुपुर्द विधि निर्माण का काम काफी तेजी से बढ़ा है। इसे समेटने की दृष्टि से, व्यवस्थापिक कुछ कार्यों को कार्यपालिका को सौंप देती है।

न्यायपालिका (Judiciary)

भारत में न्यायपालिका देश की लोक नीतियों को संवैधानिक एवं व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। देश में न्यायपालिका के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य सरकार पर उच्च न्यायालय विधायन की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार रखते हैं। न्यायिक समीक्षा के तहत ये विधानमण्डलों तथा कार्यपालिका की क्रियाओं की संवैधानिकता सुनिश्चित करते हैं। यदि कोई क्रियाएँ विवादास्पद हैं तो न्यायपालिका इन्हें व्यर्थ एवं शून्य घोषित कर सकती है। सरकार को ये बताती है कि लोक हित में क्या करना है? इस प्रकार प्रशासनिक क्रियाकलापों के क्षेत्र में न्यायपालिका की भूमिका राज्य की कार्यपालिका एवं विधायिका की शक्तियों से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में होती है। वर्तमान में सामाजिक, आर्थिक समस्याओं को निपटाने के कारण इस क्षेत्र में समस्या को लेकर न्यायपालिका अधिक सचेत होकर नीति निर्माण में न्यायिक सक्रियता को बढ़ा रही है।

स्थापित संस्थाएँ (Established Institutions)

देश में नीति निर्धारण के क्षेत्र में सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त सरकार ने कुछ विशिष्ट संस्थाएँ भी स्थापित की हैं। ये लोक नीति निर्धारण में परामर्शीय भूमिका निभाती हैं। इन स्थापित संस्थाओं में भारतीय रिजर्व बैंक, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड, राष्ट्रीय एप्लाइड एवं आर्थिक शोध परिषद्, मेडिकल शोध परिषद्, इण्डियन चैम्बर आफॅ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज आदि हैं, लेकिन भारत में नीति निर्माण प्रक्रिया में दो संस्थाएँ ही अधिक प्रभाव डालती हैं- योजना आयोग तथा राष्ट्रीय विकास परिषद् । योजना आयोग द्वारा लोक नीति पर विचार-विमर्श किया जाता है तथा राष्ट्रीय विकास परिषद् द्वारा राष्ट्रीय लोक नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करके सामाजिक-आर्थिक नीतिगत महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार किया जाता है तथा लक्ष्य प्राप्ति हेतु उपायों की सिफारिशें की जाती हैं। के. संस्थानम् के अनुसार राष्ट्रीय विकास परिषद् ही देश में सर्वोच्च नीति निर्मात्री संस्था है।

गैर-सरकारी संस्थाएँ (Non-governmental Insititutions)

भारत में लोक नीति निर्धारण में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, अधिकारी तंत्र तथा जनमत के अतिरिक्त कुछ गैर सरकारी संस्थाएँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन गैर-सरकारी संस्थाओं में राजनीतिक दल, दबाव समूह, स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा संचार माध्यम प्रमुख हैं।

संविधान के अनुसार, उन विषयों को, जिन पर संघ एवं राज्य सरकारें नीतियाँ निर्धारित कर सकती हैं, तीन सूचियों में विभाजित किया गया है अर्थात् संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची। इन सूचियों के सन्दर्भ में नीति-निर्माण में संघ एवं राज्य सरकारों की विशेष भूमिका होती है। निम्नलिखित चित्रांकन सरकार के तीन स्तरों के बीच अन्योन्य क्रिया को स्पष्ट कर देता है।

नीति निर्माण ऊर्ध्व सम्पर्क (Policy Making: High Contact)

उर्ध्व अन्योन्य क्रिया के अलावा, प्रत्येक स्तर पर क्षैतिज सम्पर्क सूत्र भी रहते हैं। नीति निर्माण प्रक्रिया में सरकार के विभिन्न अंगों के बीच के सम्बन्ध काफी बड़ी भूमिका निभाते हैं। नीचे दिया गया रेखाचित्र संघ के स्तर पर क्षैतिज सम्पर्क सूत्रों पर प्रकाश डालता है।

नीति-निर्माण : क्षैतिज सम्पर्क सूत्र (Policy Making : Parallel Contact )


यह रेखाचित्र नीति-निर्धारण में विभिन्न अंगों के बीच सम्पर्क सूत्रों को दर्शाता है। सीधी रेखाएँ एक अथवा अधिक अंगों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध तथा नीतियों के निर्धारण में अन्य अंगों के योगदान को इंगित करती है। बिन्दु-रेखाएँ विधानमण्डल तथा कार्यपालिका (राजनीतिक एवं स्थाई दोनों ) के बीच सुपुर्द किए गए विधि-निर्माण के कारण उपजी नीतियों के मामले में अप्रत्यक्ष सम्बन्ध को इंगित करती हैं तथा संविधान की भावना एवं स्वाभाविक न्याय के अनुरूप नीतियों को परिभाषित करने के सम्बन्ध में न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच के अप्रत्यक्ष सम्बन्ध को प्रदर्शित करती हैं।

नीति-निर्धारण प्रक्रिया में आने वाले व्यवधान : प्रभावी नीति प्रक्रिया की आवश्यकता (Hurdles in Policy Setting Process: Need of Effective Policy Process)

किसी नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार से बनाया, प्रस्थापित, क्रियान्वित एवं मूल्यांकित किया गया है। आज भी किसी नीति को प्रभावी बनाने हेतु एक व्यवस्थित नीतिगत रूपरेखा एक सम्पूर्ण नीति शिक्षा कार्यक्रम तथा एक सुस्पष्ट मूल्यांकन पद्धति की दिशा में काफी कुछ किया जाना बाकी है। नीति का विश्लेषण एक अति महत्वपूर्ण तकनीक है, जिसके द्वारा किसी नीति को वाकई टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह नीतिगत समस्याओं को कम करने का काफी प्रभावी तरीका है, यह समस्याग्रस्त नीतिगत मुद्दों का निराकरण करने के लिए जरूरी तमाम उपयोगी सूचनाएँ उपलब्ध कराता है। प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में नीति से जुड़ी समस्त गतिविधियों का विधिवत विश्लेषण करना होगा, चाहे वह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करना, उपलब्ध स्रोतों का सर्वेक्षण, ध्येयों व उद्देश्यों का निर्धारण, क्रियान्वयन के तंत्र का निर्णय, नीतियों के बारे में जनता को शिक्षित करने क्रियान्वयन में शामिल एजेन्सी तथा संस्थाओं को सक्रिय बनाने. कार्यक्रमों का पर्यवेक्षण, बचाव के रास्तों की पहचान, वैकल्पिक रणनीतियों की प्रस्थापना अथवा नीतियों के निष्पादन से जुड़ी गतिविधियाँ हों।

नीति निर्धारण में ऐसे कई व्यवधान मौजूद हैं जो कि नीति प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। संक्षेप में वित्तीय स्रोतों की अपर्याप्तता भी एक समस्या है जो नीति प्रक्रिया के सुगम संचालन को प्रभावित करती है। समयबद्ध कार्यक्रमों पर अमल न कर पाने के कारण व्यय में होने वाली बढ़ोतरी, स्थिति को और खराब बना देती है। नीति निर्धारण से जुड़े कर्मियों में पायी जाने वाली अपर्याप्त दक्षता व निपुणता एक अन्य व्यवधान है जिसे समुचित प्रशिक्षण व शिक्षा द्वारा हल किया जा सकता है। ध्येय के बारे में अस्पष्टता तथा अल्पकालिक लाभों पर जोर दिया जाना भी एक व्यवधान का ही काम करता है। राजनैतिक दखलंदाजी, जन समर्थन की कमी, सामाजिक रूप से जागृत समूहों की भागीदारी न होना, आदि कुछ अन्य व्यवधान हैं। इसके अलावा दोषपूर्ण नीति-रूपरेखा, नीति- शिक्षा का अभाव, नीतियों का अपर्याप्त पर्यवेक्षण तथा मूल्यांकन आदि को भी व्यवधानों को सूची में जोड़ा जा सकता है।

नीति के निर्धारण, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन से जुड़ी समस्याओं की प्रकृति पर चर्चा करते समय, यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनैतिक गतिविधि, नीति-चक्र के प्रत्येक चरण को प्रभावित करती है। प्रत्येक चरण में चुनाव करना होता है। यह चुनाव करने की गतिविधि, राजनैतिक गुटों को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने का क्षेत्र उपलब्ध कराती है। अन्तिम चुनाव अथवा प्रतिफल, या तो विभिन्न गुटों के बीच सौदेबाजी अथवा सबसे प्रभावशाली गुट की पसन्द का नतीजा होता है। दोनों ही मामलों में, अन्तिम चुनाव को जनता अर्थात् समूचे समाज द्वारा स्वीकार करना होता है। एक नीति को न्यायसंगत एवं विश्वसनीय होना चाहिए। जब तक इसे जनता द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता, व्यवस्थित क्रियान्वयन के लिए जन समर्थन जुटाना एक दुष्कर कार्य हो जाता है। इससे प्रभावित हुए गुटों में यह भावना नहीं आने देनी चाहिए कि नीति को उन पर थोपा जा रहा है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में, जरूरी सौदेबाजी होनी चाहिए तथा राजनैतिक संस्थाओं को इस तरह कार्य करना चाहिए कि वे असहमति के स्वरों को अभिव्यक्त होने दे। नीति-निर्धारकों को भी चयनित नीति के समर्थन में जनता की राय जुटानी चाहिए। पुनः इस क्षेत्र में भी राजनैतिक दलों द्वारा प्रमुख योगदान दिया जाता है। उग्र सुधारों के मामले में इस प्रकार का समर्थन प्राप्त करना बेहद जरूरी है, अन्यथा नीतियाँ सफल नहीं हो सकतीं। क्रियान्वयन के तंत्र को निश्चय करने वाले चरण में, भी जन समर्थन जुटाने की जरूरत होती है। भारत में नौकरशाही को हमेशा से जन आक्रोश का सामना करना पड़ा है। कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में नौकरशाही के शामिल किए जाने को प्रायः जनता द्वारा संदेह एवं अविश्वास के साथ देखा जाता है। नौकरशाही के परिवर्तन के वाहक की नयी भूमिका को अभी तक जनता द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है इसलिए नीतियों के क्रियान्वयन में जनता का बढ़ा हुआ समर्थन व भागीदारी एक आवश्यकता बन गयी है। राजनैतिक दलों को लक्षित गुटों का समर्थन प्राप्त करना होगा ताकि नीतियों को प्रभावी बनाया जा सके। इस तरह किसी नीति को टिकाऊ बनाने के लिए, उसके उद्देश्यों व लक्षणों को इस तरह निर्धारित किया जाना चाहिए कि जिससे जनता का बेहिचक समर्थन प्राप्त हो। यह स्वीकृति, नीति के ध्येयों को न्याय संगत बनाने में सहायक होगी। इस पर अमल के लिए चयनित माध्यमों को जनता का विश्वास व सहयोग प्राप्त करने में समर्थ होना चाहिए।

बल प्रयोग, नीति से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। वैध एवं नियमित प्रयासों द्वारा ही नीतियों को प्रभावी बनाया जा सकता है। जब लोग, सरकारी नीतियों की वैधता के बारे में आश्वस्त होंगे, तो वे उनका पूरे मन से समर्थन करेंगे। नीतिगत ध्येयों की प्राप्ति के लिए नीति - प्रक्रिया में स्वयंसेवी संस्थाओं, सहकारी मजदूर संघों, ट्रेड यूनियनों, महिला संगठनों, मानव अधिकार गुटों तथा अन्य विभिन्न सामाजिक, राजनैतिक तथा जागरूक निकायों का समर्थन हासिल करने की आवश्यकता है। ये ऐसे मंच हैं, जिनके माध्यम से परस्पर विरोधी विचारों को जोड़ कर सरकार के सम्मुख प्रस्तुत किया जा सकता है। सरकार को इस तरह की राय को अभिव्यक्त करने के अवसर प्रदान करने चाहिए।

भारत में नीति प्रक्रिया का मूल्यांकन (Evaluation of Policy Process in India)

तीन स्तरों पर निरन्तर नीति मूल्यांकन होता है- प्रशासनिक स्तर, न्यायिक स्तर तथा राजनीतिक स्तर । प्रशासनिक अथवा सरकारी स्तर पर कई कार्य विधियाँ स्थापित की गयी हैं जहाँ सरकार की नीतियों का परीक्षण होता है। हमारी संसदीय व्यवस्था के अन्तर्गत, सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी है । संसद की ऐसी कई तकनीकें प्राप्त हैं जिनके द्वारा वह सरकार की नीतियों तथा कार्यों का परीक्षण कर सकती है। ये वाद-विवाद, विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव, प्रश्नकाल, शून्यकाल आदि का रूप लेते हैं। यह कार्य अधिकतर संसदीय समितियों द्वारा किया जाता है जैसे अनुमान समिति, सार्वजनिक उपक्रमों पर समिति, विषय समितियाँ आदि। यह निश्चित करने के लिए कि इनकी सिफारिशों पर तरकार पूरा ध्यान देगी, समितियों को पर्याप्त कार्यशैलियाँ प्राप्त हैं।

इसके अतिरिक्त, संसदीय मामलों का मंत्रालय प्रत्येक मंत्रालय से जुड़ी हुई संसद के सदस्यों की सलाहकार समितियाँ स्थापित करता है। इन समितियों का उद्देश्य सरकार तथा संसद सदस्यों के बीच सरकार की नीतियों-कार्यक्रमों को लागू करने के सम्बन्ध में अनौपचारिक सलाह मशविरा करना है।

प्रधान नियंत्रक एवं परीक्षक अपनी वार्षिक रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत करता है जिसमें सरकार की नीतियों तथा उनके कार्यान्वयन का वित्तीय तथा लागत मूल्यांकन होता है।

भारत सरकार ने दो विभागों प्रशासनिक सुधार तथा लोक शिकायत विभाग और कार्यक्रम कार्यान्वयन विभाग स्थापित किए हैं, जो इसके कार्यक्रमों पर नियन्त्रण रखते हैं और सुधार के लिए सुझाव प्रस्तुत करते हैं। कार्यक्रम क्रियान्वयन विभाग की स्थापना 1985 में की गई थी, ताकि एक नयी व्यवस्था लक्ष्योन्मुखी प्रबंधन की आरम्भ हो जो निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन, अर्थव्यवस्था के सभी औद्योगिक अवसंरचना के क्षेत्रों के निष्पादन और 20 करोड़ से अधिक लागत वाले केन्द्रीय सरकार के औद्योगिक प्राजेक्टों को कार्यान्वित करने पर नियंत्रण रख सके।

भारत का संविधान न्यायिक पुनर्निरीक्षण की व्यवस्था करता है। इसके अधीन सरकार के किसी भी कार्य को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है यदि वह कार्य संविधान का उल्लंघन करता है | या किसी विधि या प्राकृतिक न्याय अथवा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इस देश में न्यायालयों का यह सामान्य दृष्टिकोण रहा है कि वे नीति के मामलों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर देते हैं। परन्तु जहाँ स्वनिर्णय शक्ति का दुरुपयोग हुआ है, वहाँ नीति के मामलों में भी न्यायालयों ने हस्तक्षेप किया है और सरकार को विवश किया है कि वह अपनी नीति को त्याग दें या उसमें संशोधन करें। पर्यावरण के मुद्दों पर तथा लोक हित मुकदमाबाजी सक्रियता से न्यायपालिका ने | हस्तक्षेप किया है। इसको न्यायिक सक्रियतावाद का नाम दिया जाता है।

राजनीतिक मूल्यांकन राजनीतिक दलों, हित समूहों जैसे चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स, मजदूर संगठनों, सामाजिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय संगठनों बार परिषदों जैसे व्यावसायिक संगठनों, मीडिया, टी.वी., रेडियो तथा समाचार पत्रों, शैक्षिक संस्थानों आदि द्वारा किया जाता है। चूंकि भारत एक मुक्त समाज है जिसमें नरम सरकार है तो ऊपरलिखित कार्यकर्ता सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का समर्थन या विरोध करने तथा इन पर वाद-विवाद करने में बड़े सक्रिय रहे हैं।

सरकार की नीति-निर्माण, कार्यान्वयन तथा मूल्यांकन की गतिशीलता की ओर ध्यान देना भी अनिवार्य है। नीतियाँ एवं नीति-प्रक्रियाएँ एक स्थिर पर्यावरण में अचल पदार्थ नहीं हैं। सफलता या असफलता पर कोई भी विचार करते समय यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी। समय बीतने के साथ किसी भी नीति का समर्थन या विरोध कम हो सकता है। यही बात प्रभावकारिता या कार्यकुशलता या किसी अन्य मापदण्ड से जुड़े संकेतों की है। परन्तु जो लोग एक नीति की सफलता या असफलता पर निर्णय देते हैं और नीति में परिवर्तन का समर्थन करते हैं, प्रायः वे तब तक प्रतीक्षा नहीं करते जब तक कि उसका कार्यान्वयन तथा प्रभाव सुस्पष्ट नहीं हो जाते। यहाँ जो बात कही। जा रही है वह यह है कि नीतियों की सफलता या असफलता पर निर्णय घोषित करने से पूर्व हो सकता है कि उनको इतना समय न दिया जाए जिसमें कि वे अपने आप को सिद्ध कर सकें।

नीति-निर्धारण मूल्यांकन की प्रासंगिकता (Relevance of Policy Setting Evaluation) 

देश में लोक नीति का विश्लेषण अनिवार्य है क्योंकि इसके द्वारा सरकारी निर्णयों के प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सकता है। सरकार द्वारा निर्मित लोक नीति लगभग सभी नागरिकों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, अतः देश के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि सरकार द्वारा क्यों कुछ विशेष निर्णय किए गए हैं? कैसे किए गए हैं? और इनके भावी परिणाम क्या होंगे? इसी प्रकार के प्रश्न अब नीति विश्लेषकों द्वारा उठाए जाने लगे हैं। सरकारी दीर्घकालीन नीतियाँ एवं योजनाएँ समाज के भावी रूप का निर्धारण करती हैं, अतः इस सम्बन्ध में अब वैज्ञानिक आधार बनाने की आवश्यकता है। समाज की गम्भीर समस्याओं को हल करने के संबंध में येज्कल ड्रोर (Yezcal Dror) ने नीति विज्ञान के विकास की सिफारिश के बारे में कहा है, "नीति विज्ञान को आंशिक रूप में एक ऐसे विषय के रूप में वर्णित किया जा सकता है जो नीति सम्बन्धी ज्ञान की खोज करता है तथा जो सामान्य नीति विषयों की ओर उन्हें एकीकृत करके एक विशिष्ट रूप प्रदान करता है।" नीति विषयक ज्ञान विशिष्ट नीति सम्बन्धी ज्ञान है, जबकि नीति निर्माण का ज्ञान समस्त नीति निर्माण गतिविधियों से सम्बद्ध है जो यह बताता है कि नीति किस तरह संयोजित होती है तथा इनमें किस तरह सुधार किया जा सकता है? येज्कल ड्रोर (Yezcal Dror) ने नीति निर्माण और नीति विश्लेषण के लिए एक उपागम का समर्थन किया है जिसमें लक्ष्यों, मूल्यों, विकल्पों, लागतों तथा लाभों के विवेकपूर्ण मूल्यांकन द्वारा ऐसी सर्वोत्तम नीति निर्धारण की बात कही। है जो उपलब्ध सभी ज्ञान और वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी के सर्वाधिक उपयोग पर आधारित हो । उनका कहना है कि नीति-निर्धारण एवं विश्लेषण में सहज ज्ञान, मूल्य वरीयताएँ असाधारण नेतृत्व तथा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी उपयोग में लाए जा सकते हैं। वर्तमान में विश्व भर में लोक नीति विश्लेषण एक उपविषय के रूप में तेजी से उभर कर आया है, जिसका सम्बन्ध निम्नलिखित क्षेत्रों से है-

(i) इसमें लोक नीतियों से सम्बन्धित सिफारिशों के बजाए नीतियों के बोध पर ध्यान दिया जा रहा है न कि प्रत्यक्ष रूप में नई नीतियों के प्रस्ताव पर ।

(ii) इसमें अब लोक नीति सम्बन्धी कारणों और परिणामों को वैज्ञानिक कसौटी पर परखा जाएगा तथा लोक नीति विषयक मामलों पर आकस्मिक सम्पर्क खोजने के प्रयास किए जाएंगे। 

(iii) लोक नीति विज्ञान के ज्ञान से सम्बन्धित निकायों के निर्माण करने की आवश्यकता है, अतः व्यापक स्तर पर सामान्यीकरण करने के लिए विशिष्ट लोक नीति विषयक अध्ययनों का उपयोग किया जा रहा है।

सारांशतः आज लोक प्रशासन के क्षेत्र में लोक नीति निर्धारण एवं मूल्यांकन पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है, क्योंकि विश्व परिप्रेक्ष्य में एवं बदलती हुई परिस्थितियों के सन्दर्भ में लोक नीति निर्धारण का मूल्यांकन मानवाधिकार की दृष्टि से करना अति आवश्यक हो गया है।

राजनीति - प्रशासन सम्बन्ध (Politics-Administration Relation )

शासन नीति- प्रशासन द्वैधता (Government Policy - Administration Diarchy)

 राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका (प्रशासन) के बीच मूलभूत अन्तर शासन नीति प्रशासन के दोहरे विभाजन की अवधारणा में निहित है। यह दोहरा विभाजन इस तथ्य में निहित है। कि नीति निर्धारण की प्रक्रिया इसके लागू करने की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न है। शासन नीति के विषय में ऐसा माना गया है कि यह राजनीति का प्राथमिक कार्य है और इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि राजनीति एक वैचारिक व्यवस्था में निहित होती है। विचारधारा प्राथमिकताओं का एक ढाँचा है जिसके अन्तर्गत एक राजनीतिक दल उपलब्ध विकल्पों के आधार पर विभिन्न समस्याओं को हल करने को प्राथमिकता देता है जिनका सामना जनता कर रही होती है। एक राजनीतिक दल की भिन्नता दूसरे राजनीतिक दल से उनकी प्राथमिकताओं की भिन्नता होती है। शासन नीति की प्रक्रियाएँ भी इन प्राथमिकताओं द्वारा ही शासित होती हैं। उसी समय पर स्थायी कार्यपालिका सुनिश्चित स्थिति के बारे में तथ्यात्मक सूचना के संग्रह के साथ संलग्न होती है। यह सूचना को तैयार करती है और शासन नीति के आने की प्रतीक्षा करती है। जब एक बार शासन नीति तैयार की जाती है, तो प्रशासन या स्थायी कार्यपालिका को कार्य प्रारम्भ करने की आवश्यकता होती है। और वह उन कार्यों को पूरा करने के लिए सभी आवश्यक तरीकों को अपनाता है जिनको शासन नीति प्रशासनिक मशीनरी के लिए तय करती है। स्थायी कार्यपालिका से यह आशा की जाती है कि व्यक्तियों और मामलों का प्रशासन करने के लिए वह स्वयं को आवश्यक तकनीकी एवं प्रबन्धक विशेषज्ञ दोनों से ही सुसज्जित करें क्योंकि वे स्थायी कार्यकारी हैं जिसका उनके पास अनुभव होता है। जिसकी सहायता से आकस्मिक हानि से बचा जा सकता है और अर्थव्यवस्था एवं कार्यकुशलता में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस दोहरे विभाजन पर पर्याप्त वाद-विवाद है। इस सैद्धान्तिक स्थिति के पक्ष एवं विपक्ष में बहुत से तर्क दिए गए हैं। यह पृथक्करण सिद्धान्तत: समझने योग्य है, परन्तु यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि इसको कार्यान्वित करने से अनेक प्रकार की समस्याएँ पैदा होती हैं। यहाँ पर तथ्यों एवं मूल्यों के पृथक्करण से एक प्रश्न पैदा होता है कि जब स्थायी कार्यपालिका को तथ्यात्मक सूचना तैयार करनी होती है, क्या वह उनके मूल्यों के साथ मिश्रित नहीं हो जाती? क्या किसी के लिए यह संभव है कि वे अपने मूल्यों को उन तथ्यों से अलग कर सकते हैं जो उन्होंने संग्रहित किए हैं? तब यह पूछा जाता है कि क्या कोई स्थायी कार्यपालिका उन नीतियों को लागू करती है, यदि वह उन प्राथमिकताओं का निर्धारण नहीं करती। दूसरे शब्दों में, वह उस कार्यक्रम को कैसे लागू कर सकती है, जिसको वह स्वयं नहीं बनाती ? आगे क्या यह विश्वास करना ठीक है कि स्थायी कार्यपालिका के सदस्य अपने मूल्यों को प्राथमिकताएँ नहीं देते ? इन प्रश्नों पर विस्तृत रूप से वाद-विवाद नहीं किया गया है फिर भी कुछ विद्वान यह तर्क उद्धृत करते हैं कि दोहरा विभाजन एक ऐसा व्यावहारिक तर्क है कि शासन नीति की प्राथमिकताओं में अधिक मूल्य और राजनीतिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं जबकि प्रशासनिक प्रक्रिया में अधिकतम तकनीकी और विस्तृत तथ्य तथा कम मूल्य शामिल होते हैं। एक समान साधन के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह एक ही समय पर आर्थिक एवं कार्यकुशलता के दोनों कार्यों का निर्वाह कर सके। इन दोनों के बीच विभाजन न केवल सैद्धान्तिक स्तर पर उचित है बल्कि व्यावहारिकता के लिए भी आवश्यक है।

नीति-निर्माण तथा नीति क्रियान्वयन राजनैतिक व स्थायी कार्यपालिका के सम्बन्ध में : (Policy Making and Policy Implementation: In the Context of Political and Permanent Executive)

नीति निर्माण एक राजनैतिक कार्य है, राजनीति प्रशासन द्वैधता का एक पक्ष यह था कि राजनीति का सम्बन्ध नीति निर्माण, ध्येय निर्धारित करना या विधि निर्माण होता है, जबकि प्रशासन (स्थायी कार्यपालिका) उस नीति को लागू करता है या विधि का परिपालन करता है। एक का संबंध ध्येय से हैं दूसरे का साधनों से अथवा उन औजारों से जिनके द्वारा ध्येय की पूर्ति होती है। इसमें दोनों की पूर्ण पृथकता का प्रश्न ही नहीं उठता और राजनीति और प्रशासन के पारस्परिक सम्बन्ध स्वीकार किए जाते हैं। किन्तु प्रशासन को राजनीति के अधीनस्थ रहना चाहिए। एफ. एम. मार्क्स का कथन है "रूचि का क्षेत्र सार्वजनिक हो अथवा निजी प्रशासन सदा ही नीति का दास होता है ......... प्रबन्ध का अभिप्राय साधन होता है और साधनों का ध्येय के सन्दर्भ के बिना कोई महत्व नहीं।" इस विचार का समर्थन कई अमरीकी विद्वान करते हैं कि प्रशासन और नीति को भी पूर्णतया पृथक नहीं किया जा सकता। किन्तु उनका दावा है कि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में नौकरशाही से यह आशा की जाती है कि यथार्थ में वह नीति-निर्माण कार्यों में सीधे तौर पर कम उलझे, परन्तु कम विकसित राष्ट्रों में यह बात सत्य नहीं, यह समझा जाता है कि नीति निर्माण करने वाले संस्थान पर्याप्त शक्तिशाली हैं। वे नौकरशाही को सहायक भूमिका निभाने तक ही सीमित रख सकते हैं। प्रशासकों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी भूमिका को साधक या सहायक के रूप में ही देखें। पश्चिमी देशों में काफी हद तक अधि कारी इस नियम में विश्वास करते हैं और वे अपने आपको तथा दूसरों को यह मनवाने के लिए काफी मेहनत करते हैं कि उनकी अनिवार्य भूमिका मुख्य तौर पर सहायक या साधक की है। यह कल्पना नहीं की जाती है कि वे नियम-निर्माण कार्य को हथिया ले। इस दृष्टिकोण के पीछे उद्देश्य यह है कि प्रशासकों को राजनीतिक दलों में पारस्परिक अथवा प्रबल राजनीतिक दल के आन्तरिक गुटों के झगड़ों में उलझने से रोका जाए। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत रूप में अथवा दूसरों के साथ मिलकर प्रशासक मतदाताओं द्वारा किए गए निर्णय को उलट या पथ भ्रष्ट न करें।

फिर भी अधिकतर मत तथा आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाओं का व्यवहार नीति-निर्माण और नीति परिपालन में स्पष्ट भेद उत्पन्न करने का समर्थन नहीं करते। वास्तव में यह धारणा भ्रांति पर आधारित है जो 'नीति' और 'प्रशासन' शब्दावली की अस्पष्ट परिभाषा के प्रयोग और अनेकार्थता से उत्पन्न होती है। राजनीति और प्रशासन के पारस्परिक सम्बन्धों की घनिष्ठता केवल नीति-निर्माण और नीति कार्यान्वयन के क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं, अपितु वह तो अन्य क्षेत्रों जैसे- संविधानवाद, स्थानीय सरकार तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तक भी पहुँचती है।

वर्तमान राज्यों का कठोर सत्य यह है कि नौकरशाही को ठीक-ठीक नीति परिपालन अथवा साधन भूमिका तक सीमित नहीं रखा जा सकता। संरचनात्मक दृष्टि से अधिकतम विभेदीकृत राजनीतिक व्यवस्थाओं में भी कार्यों की सम्पूर्ण पृथकता की कल्पना करना असम्भव है जिसकी "आवश्यकता पड़ेगी यदि नौकरशाही को ठीक-ठीक साधक भूमिका निभाने तक सीमित कर दिया गया। जिन्होंने पश्चिमी संसार की लोक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को निकट से देखा है, उन्होंने गुमराह करने वाली नीति और प्रशासन के बीच सुस्पष्ट द्विभाजन की कल्पना का चिरकाल से परित्याग कर दिया है। प्रशासन के उच्च स्तरों पर इस प्रकार की सरल पृथकता किसी भी समाज में किसी भी समय यथार्थ नहीं हुई। नीति और प्रशासन के बीच अन्तर की रेखा बनावटी है जो संस्थात्मक सुविधा के लिए सरकार के निर्णयों के विशालतर तथा संकीर्णतर पक्षों के बीच और अधिक सामान्य या अधिक विस्तृत पक्षों के बीच खींची गई। वर्तमान राज्यों में प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर प्रशासक हजारों निर्णय करते हैं जिनमें विवेक का प्रयोग होता है और जो पक्षों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, नियम बनाते हैं, विधि-निर्माण के लिए सिफारिशें तैयार करते हैं, आदि -आदि और यह नीति निर्माण कार्य का ही भाग है। वास्तव में नीति-निर्माण का कार्य सरकार के किसी भी एक स्तर पर या एक स्थान पर अनन्य तौर पर निहित नहीं किया जा सकता। जहाँ कहीं भी जनता को प्रभावित करने वाला कार्य किया जाता है, वहाँ ही नीति निर्माण होता है। एपलबी (Apalbi) के अनुसार अधिकतर प्रशासन कार्य जो साधारणतया प्रशासकों के पास छोड़ा जाना चाहिए, एक प्रकार की शक्ति का अस्थायी हस्तान्तरण है। यदि प्रशासन के प्रत्येक सिलसिलेवार स्तर के सन्दर्भ में देखा जाए, वह 'नीति' है और जो भी निचले स्तर के लिए छोड़ दिया जाए, वह प्रशासन है। प्रशासन के लोग दो अलग मेजों पर नहीं बैठते, ताकि एक पर नीति और दूसरे पर प्रशासन का कार्य कर सकें। बौद्धिक दृष्टि से भी वे अकेले नीति की समस्याओं या अकेले प्रशासन की समस्याओं से नहीं निपटते, अपितु वे तो समूची समस्याओं के साथ निपटते हैं।

अतः नीति के प्रश्नों को तथा विस्तार के प्रश्नों को पृथक विभागों में बन्द करना सदा ही अव्यावहारिक होगा। कोई भी विषय जरूरी तौर पर बनाने से ही राजनीतिक रूप धारण करता है। साध रणतया, बहुत सारे निर्णय जो निर्वाचित अधिकारियों द्वारा किए जाते हैं, अति निश्चित होते हैं जबकि इतिहास में सदा ही सामान्य नियमों का स्रोत प्रायः प्रशासनिक अनुभव और सुविधा में होता है।

सम्बन्धता को शासित करने के सिद्धान्त (Principles to Regulate Relativity)

राजनीति व प्रशासन के सम्बन्ध को शासित करने वाले सिद्धान्त अग्रलिखित हैं-

1. तटस्थता का प्रतिमान (Model of Neutrality)

तटस्थता का नियम और प्रतिमान तीन प्रकार की परिस्थितियों की कल्पना करता है - 

 1. सत्ता में राजनीतिक दलों का परिवर्तन, 

2. योग्यता सूची पर आधारित नौकरशाही, 

3. स्थायी नौकरशाही ।

 अब हमें इन तीनों प्रकार की परिस्थितियों को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रथमतः विशेषकर निर्वाचन व्यवस्था के अन्तर्गत उदार लोकतन्त्र में अनेकता की प्रवृत्ति के साथ बहुत से राजनीतिक दल अस्तित्व में होते हैं जिसके कारण निश्चित तौर पर सत्ता में राजनीतिक दलों का परिवर्तन होता रहता है। वास्तव में यह परिवर्तन इस व्यवस्था के तर्क में निहित है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पेंडलटॉन अधिनियम से पूर्व इस व्यवस्था को नष्ट करने का प्रयत्न किया गया था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत भी राजनीतिक दल सत्ता में आता था उसको ऊपर से नीचे तक के प्रशासनिक अधिकारियों को परिवर्तित करने का पूर्ण अधिकार था जिसका तात्पर्य यह है कि दल के राजनीतिक मूल्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था के मूल्य एक दूसरे के समान थे। प्रशासनिक अधिकारियों को उनके मूल्यों के आधार पर चुना जाता था। इस व्यवस्था ने अपने आप में समस्याओं को पैदा किया। इसी कारणवश पेंडलटॉन अधिनियम में ऐसी पंक्तियों को सम्मिलित करना पड़ा जिससे कि योग्यता की अवधारणा का जन्म हुआ। 

अब हमें यह दूसरी परिस्थिति की ओर ले जाता है अर्थात् व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था के सदस्यों के रूप में भर्ती होना। यहाँ इस प्रश्न पर कोई बहस नहीं करेंगे कि योग्यता क्या है? यहाँ पर यही बतलाना पर्याप्त होगा कि इससे चुनाव या भर्ती की एक ऐसी प्रणाली विकसित की गयी है जो उन सभी प्रत्याशियों पर एक समान रूप से लागू होती है जो प्रशासन में सम्मिलित होना चाहते हैं। यहाँ संकीर्णता की परिभाषा में राजनीतिक मूल्यों की अवहेलना करने का प्रयास किया गया है।

यह हमको तीसरी परिस्थिति की ओर अग्रसर करता है, स्थायित्व के आधार पर भर्ती करना। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन लोगों को सेवा के लिए चुना गया है वे सेवा के आजीवन सदस्य होंगे। इसमें यह तथ्य निहित है कि कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आए परन्तु नागरिक सेवा के सदस्यों की सेवा जारी रहने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वास्तव में यही वे कारक हैं जिन्होंने स्थायी कार्यपालिका (प्रशासन) की अवधारणा को पैदा किया।

परिवर्तित होते राजनीतिक वातावरण में स्थायी आधार पर अधिकारियों की भर्ती यह मांग करती है कि स्थायी सदस्यों को तटस्थ बनाकर रखना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि सदस्यों को स्वयं किसी भी राजनीतिक मूल्यों के लिए समर्पित नहीं होना चाहिए। उनसे यह आशा की जाती है कि कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में हो, उन्हें बिना किसी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के उस दल की सरकार के साथ सहयोग एवं मदद करनी चाहिए। इसमें यह निहित है कि स्थायी कार्यपालिका के सदस्य न तो स्पष्ट प्राथमिकताओं का मूल्य रखते हैं और न ही दिन-प्रतिदिन के कार्यों को आड़े आने देते हैं। इस प्रश्न पर बहुत से वाद-विवाद हुए हैं लेकिन विद्यमान सैद्धान्तिक स्थिति यह है कि स्थायी कार्यकारी और उनके व्यक्तिगत मूल्य प्राथमिकताएँ साथ-साथ नहीं चल सकती। इसी कारणवश तटस्थता को राजनीतिक एवं स्थायी कार्यपालिका के बीच की सम्बन्धता को शासित करने के नियमों के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

2. अनामता / गुमनामता का प्रतिमान (Model of Anonymous)

दूसरा सिद्धान्त अनामता तटस्थता के नियम से निकलता है। अनामता का सिद्धान्त इस तथ्य पर बल देता है कि स्थायी कार्यपालिका पर्दे के पीछे से कार्य करती है। दूसरे शब्दों में उन्हें आम जनता की दृष्टि से बचना चाहिए। इसमें यह निहित है कि राजनीतिक कार्यपालिका सही और गलत का पूर्ण दायित्व उठाती है। वह उपलब्धियों का लाभ और असफलताओं की हानि को ग्रहण करती है। आम जनता चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से उस राजनीतिक दल को सम्मानित करती है या सजा देती है जो सत्ता में होता है। स्थायी कार्यपालिका कुल मिलाकर राजनीतिक कार्यपालिका के दिशा-निर्देशन पर कार्य करती है। राजनीतिक कार्यपालिका के पास न केवल वह शक्ति होती हैं। जिसके आधार पर वह स्थायी कार्यकारी से काम को वापस ले सकती है बल्कि उनको सम्मानित भी कर सकती है एवं उनको सजा भी दे सकती है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत जवाबदेही के प्रतिमान को इस ढंग से विभाजित किया गया है कि राजनीतिक कार्यपालिका की जवाबदेही भी राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति ही है। इसलिए यह उचित ही जान पड़ता है कि अनामता राजनीतिक स्थायी कार्यपालिका की संबंधता को शासित करने के नियमों में एक महत्वपूर्ण नियम माना गया है। इन दोनों नियमों के बारे में वाद-विवाद एक और प्रश्न को पैदा कर सकता है कि हम इन दोनों नियमों के बीच एकता कैसे स्थापित करते हैं? जबकि एक तटस्थता की वकालत करता है तो दूसरा जवाबदेही के लिए तर्क प्रस्तुत करता है। यदि स्थायी कार्यपालिका राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति * पूर्णतः जवाबदेह है तो क्या राजनीतिक कार्यपालिकाएँ तटस्थ हो सकने की क्षमता रखती हैं। अगर इसका अर्थ यह है कि उनको सत्ता में राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति समर्पित होना चाहिए तो क्या स्थायी कार्यपालिका के लिए यह संभव है कि वे एक शासक दल से दूसरे शासक दल के प्रति अपने समर्पण को परिवर्तित करती रहे? या दूसरी स्थायी कार्यपालिका के सदस्यों को अपनी तटस्थता को इस ढंग से बनाए रखना चाहिए कि सभी दलों के शासनकाल में एक समान कार्य करते रहे। फिर भी यह माना जाता है कि तकनीकी एवं प्रबन्धक निपुणता राजनीतिक नहीं होती है। अक्सर यह कहा जाता है कि लेनिन ने टेलरवाद का स्वागत किया था जो कि अमेरिका में औद्योगिक विकास की उत्पत्ति था। निपुणताओं एवं तकनीकी ज्ञान को अराजनीतिक माना गया है। और सत्ता में किसी भी राजनीतिक दल के द्वारा उनका उपयोग किया जा सकता है।

3. राजनीति और स्थायी कार्यकारी के बीच संबंध : बदलते हुए परिदृश्य में एक संतुलित मत (Relation between Politics and Parmanent Executive: A Balanced Opinion in Changing Scenario)

राजनीतिक-प्रशासन द्विविभाजन जो पहले प्रचलित था, अब बदल रहा है। सिविल सेवा तटस्थता की परम्परागत अवधारणा का स्वरूप रूपान्तरित हो रहा है। नीति निर्माण और कार्यान्वयन को अब एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। इसलिए सक्षम सरकार के लिए प्रशासन, राजनीति और स्थायी कार्यकारी के बीच सहयोग अनिवार्य समझा गया है। 

भारत में प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी कुछ मानदण्ड निर्धारित किए हैं-

1. मंत्रियों की सभी नीतियों और निर्णयों को निष्ठापूर्वक कार्यान्वित करने के लिए प्रत्येक सरकारी अधिकारी का दायित्व, भले ही यह उस सलाह के विपरीत हो, जो उन्होंने दी है।

2. मंत्रियों सहित अपने वरिष्ठों को सलाह देकर अपनी बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख करने के लिए सरकारी अधिकारी स्वतन्त्र हैं।

3. तटस्थता, निष्पक्षता और अनामता के सिद्धान्तों का सरकारी अधिकारियों द्वारा पालन ।

 नीति कार्यान्वयन के लिए राजनीतिक कार्यकारी का परामर्श और मार्गदर्शन भी आवश्यक है। नीतियों के कार्यान्वयन के दौरान लिए गए कुछ प्रक्रियात्मक निर्णयों का नीति सम्बन्धी निहितार्थं भी होता है। भूमण्डलीकरण युग के समय प्रशासन का कार्य विशेषीकृत होता जा रहा है और नीति निर्माण ऐसा कार्य हो गया है जिसके लिए प्रशासकों से विशेषीकृत साधन आवश्यक है। प्रशासन भी व्यावसायिक होते जा रहे हैं। कार्यान्वयन कार्यों को राजनीतिक प्रतिनिधियों के सहयोग की भी आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें आवश्यक फीडबैक मिलता है, जो नीति निर्माण के लिए उपयोगी है। नीति और प्रशासन के बीच वैचारिक अन्तर के बारे में पूर्ववर्ती का दृष्टिकोण वर्तमान समय में पर्याप्त नहीं है। राजनीति और प्रशासन के सम्बन्ध में दो प्रकार के विचार प्रचलित हैं। प्रथम मत में वे विद्वान आते हैं जो दोनों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बताते हैं। दूसरी ओर ऐसे विचारक आते हैं । जो दोनों के बीच अन्तर मानते हैं। इन के अतिरिक्त इन दोनों के बीच एक सन्तुलित मत भी हैं। इस मत के समर्थकों का कहना है कि यद्यपि प्रशासन एवं राजनीति दो अलग-अलग विषय हैं, फिर भी उनके कार्य व उत्तरदायित्व एक-दूसरे की सीमा का उल्लंघन कर जाते हैं और ऐसी परिस्थिति में यह कठिन हो जाता है कि एक स्पष्ट विभाजक रेखा दोनों के बीच खींची जाए। एक देश की राजनीतिक व्यवस्था वहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह असम्बद्ध नहीं होती बल्कि इसके लिए आधार और प्रेरणा का काम करती है। दूसरे, प्रशासन को अराजनीतिक मानने वाला दृष्टिकोण। एक प्रकार से राजनीति विरोधी बन जाता है तथा यह मानने लगता है कि प्रतिनिधि एवं दलीय सरकार का प्रशासन पर बुरा असर पड़ेगा। प्रशासकों का इस प्रकार का दृष्टिकोण लोकतन्त्र के लिए खतरनाक है और वह नौकरशाही का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

इन दोनों के बीच अध्ययन करते समय हमें दोनों ही अतियों से बचने का प्रयास करना चाहिए। अतः हमें एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। जेम्स डब्ल्यू. डेविस ने स्पष्ट लिखा है कि 'लोक प्रशासन का सार राजनीति और लोक नीति है और लोक प्रशासन लोक नीति के निर्माण, क्रियान्वयन, मूल्यांकन एवं संशोधन से सम्बन्धित विषय है'। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से दोनों के बीच अलगाव को स्थायी और अन्तिम रूप से समाप्त कर दिया गया है।

अब प्रशासन के नीति निर्धारण में बढ़ते हुए हस्तक्षेप के कारण दोनों समीप आ गए हैं। ऐपल्बी (Apalbi) के अनुसार 'नीति का निर्माण ही लोक प्रशासन है'। दूसरे, प्रदत्त व्यवस्थापन के कारण प्रशासन और राजनीति समीप आ गए हैं। प्रदत्त विधान की सम्पूर्ण धारणा 'राजनीति' व 'प्रशासन' । के विभाजन को अर्थहीन सिद्ध कर देती है। तीसरे, मंत्रियों की काफी व्यस्तता के कारण नीति निर्माण का कार्य प्रशासन द्वारा किया जाने लगा है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रशासन और राजनीति एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं। और दोनों के बीच एक सन्तुलित मत अपनाने की आवश्यकता है।

नीति क्रियान्वयन व्यवस्था (Policy Implementation System)

नीति क्रियान्वयन की प्रक्रिया (Process of Policy Implementation)

एक प्राधिकृत लोक नीति का क्रियान्वयन निदेशात्मक प्रक्रिया को करना है, जो सरल या स्वचालित नहीं है। वान मीटर (Wan Meter) और कार्लवान हार्न ( Carlwan Harn) ने 1975 में उल्लेख किया कि 'अभी हम नीति क्रियान्वयन की प्रक्रिया के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत कम जानते हैं।' जबकि एडविन सी. हरग्रीव (Advin C. Hargriv) ने नीति प्रक्रिया को सामाजिक नीति के अध्ययन के लिए 'लुप्त कड़ी' कहा है। एक अन्य लेखक के अनुसार नीतियों को बनाने और समर्थन के लिए हमें प्रस्तावित नीति को ग्रहण करने और लागू करने की सरकारी निष्पादन की क्षमता का पूर्वाभास अवश्य होना चाहिए। क्रियान्वयन का अर्थ होता है- पालन करना हासिल करना, पूर्ण करना। इस सम्बन्ध में निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

1. क्रियान्वयन को नीति से विच्छिन्न नहीं होना चाहिए,

2. नीति निर्माताओं को उद्देश्य प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष साधनों का उपयोग करना चाहिए,

3. जिस सिद्धान्त का सहारा लिया है उस पर सावधानीपूर्वक विचार करना,

4. नीतियों में सरलता को अपनाना ।

क्रम विकास के रूप में कार्यान्वयन (Implementation in terms of Systematic Development)

निर्माण की गई नीति के कुछ निश्चित उद्देश्य, लक्ष्य एवं विचार होते हैं, जो कि मोटे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। निष्पादन प्रक्रिया द्वारा नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के बीच एक कड़ी का निर्माण होता है। परिवर्तनशील पर्यावरण परिस्थितियाँ, राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थ एवं प्रभावशाली समूह कभी-कभी ऐसी नीतियाँ बनाने पर बाध्य करते हैं जिनके बहुसंख्यक, परस्पर विरोधी तथा अनेकार्थक लक्ष्य होते हैं। ऐसी नीतियों का निर्माण करते समय नीति निर्माता कार्यान्वयन के समय आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान करने की स्थिति में नहीं होते हैं। ग्यान्डोमेनिकोमैजोन (Gyandomenicomaijoun) तथा ऑरन विल्डाव्सकी ( Oran Vildavsaki) कहा है कि कार्यान्वयन मूल नीति निर्माण के समय ही निश्चित होता है। ऐसी समस्याओं एवं बाधाओं का पूर्वावलोकन नीति निर्माण के समय ही कर लेना चाहिए जिससे उन्हें दूर करने के उपाय भी सुझाए जा सकें। शायद निर्माण के वक्त ऐसा करना सम्भव नहीं है क्योंकि ये समस्याएँ तभी सामने आती हैं जब नीति का क्रियान्वयन किया जाता है। परिणामस्वरूप, कार्यान्वयनकर्ता को अपने सामने अनेक बिन्दु रखने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, उन नीतियों के विभिन्न उद्देश्य, जिनका क्रियान्वयन करना है। ये कैसे किया जाना है? प्राथमिकताओं का निर्धारण कैसे करना है? किन साधनों का उपयोग करना है? इत्यादि। इसके अलावा, कई अन्य समस्याएँ जैसे कि लक्षित समूह का समर्थन अथवा विरोध, पहले से ही चल रही कई नीतियों के साथ विरोधाभास तथा नीति के सकारात्मक एवं नकारात्मक बिन्दुओं के बारे में पुनर्निवेश आदि भी कार्यान्वयन के समय ही सामने आते हैं। यह कहे बिना ही समझा जा सकता है कि कार्यान्वयन एक अतिमहत्वपूर्ण संयोजना है, जहाँ नीति में वह जरूरी तत्व शामिल किए जाते हैं जो कि इसकी मूल अभिव्यक्ति के समय नहीं किए जा सकते हैं। जैसे-जैसे नीति 'निष्पादन स्पैक्ट्रम' में आगे बढ़ती है, नई परिस्थितियों एवं समस्याओं का सामना होता है तथा नीति का निरन्तर विकास होता है। इन्हें उचित तरीके से समझना चाहिए जिससे मूल नीति में आवश्यक पहलू एवं सम्भावनाएँ समाविष्ट की जा सकें। मैजोन (Maijoun) एवं विल्डव्स्की (Vildvsaki) ने कहा है कि आरम्भिक नीति निर्माण भी त्रुटियों के प्रति संवेदनशील होता है तथा क्रियान्वयन का विकासवादी चरित्र, उन्हें सुधारने के लिए ज्ञान एवं अनुभव प्रदान करता है।

लोक नीति कार्यान्वयन के सन्दर्भ में विभिन्न उपागम या विचारधाराएँ (Different Conceptual Constructs in Relation with Public Policy Implementation)

इनग्राम (Ingram) और सीन्डेर ( Schneider) ने लोक नीति कार्यान्वयन के सन्दर्भ में विभिन्न उपागम रखे हैं। सशक्त कानूनी उपागम, इसमें लोक नीति को सबल कानूनी आधार से लाया जाता है। नीति प्रक्रिया को कानूनी प्रावधानों से स्पष्ट किया जाता है। लोक नीति के सन्दर्भ में कार्यों को भी स्पष्ट करते हैं। दायित्व और जवाबदेही को भी तय किया जाता है। विल्सन (Wilson) का दृष्टिकोण (विल्सोनियन पर्सपेक्टिव) - इसमें मान्यता यही है कि लोक नीतियों के निर्णय राजनीतिक तंत्र द्वारा लिए जाएंगे। उनका कार्यान्वयन सिविल सेवाएँ करेंगी। सिविल सेवाएँ तटस्थता तथा अनामिता से कार्य करती हैं। इसमें लोक नीति को लाने और लोक नीति को लागू करने के मध्य द्विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है। यह कानून और नियमों की व्यवस्था के अनुरूप औपचारिकता से कार्य करने को अग्रसर करता है। ग्रास रूट उपागम इसमें नीचे के स्तर पर सक्षमता का विकास किया जाता है। स्थानीय भागीदारी को बढ़ाया जाता है। स्थानीय जवाबदेही भी आती है। स्थानीय स्तर पर लोक सेवाओं का निर्माण किया जाता है और उनकी सहायता ली जाती है। इसका प्रयोग विकेन्द्रीकरण को बढ़ाने के सन्दर्भ में किया जाता है। सपोर्ट बिल्डिंग उपागम- इसमें विभिन्न स्तरों में लोक नीति के सन्दर्भ में सक्षमता का निर्माण किया जाता है। इसमें बहुस्तरीय प्रयास किए जाते हैं। विभिन्न स्तरों के द्वारा परिपूरकता से कार्य किया जाता है। इसमें लोक नीति की एक मिश्रित व्यवस्था की स्थिति आती है। यह बहुस्तरीय लोक नीति निर्माण या नियोजन को दर्शाता है।

संक्रियात्मक सम्भावनाएँ (Operational Possibilities)

लोक नीति क्रियान्वयन की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें 'क्या हो सकता है' और 'क्या नहीं हो सकता है' की खोज की जाती है। क्रियान्वयन को एक नैत्यिक गतिविधि नहीं समझना चाहिए। जब नीति संक्रियात्मक होती है तब इसके कुछ नगण्य पक्ष नियमित हो जाते हैं। क्रियान्वयन के समय-काल में नीति बनाने वाले संगठन इस बात के प्रति सदैव चिन्तित रहते हैं कि सबसे अच्छी तरह से नीति के उद्देश्यों को केसे प्राप्त किया जाए। क्रियान्वयन के समय नीति में कुछ मात्रात्मक परिवर्तन अवश्यम्भावी होते हैं। सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्रियान्वयन का है, न कि यह देखने का कि कितने लोग कार्यरत हैं तथा कितना धन व्यय किया जा रहा है। क्रियान्वयन के समय सरकार को विविध प्रकार की परस्पर विरोधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। क्रियान्वयन की विभिन्न प्रकार की इकाइयों में संघर्ष उत्पन्न होता है जिसका प्रतिकूल प्रभाव क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में यदि नीति में कुछ परिवर्तन होते हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

नीति निर्देशों और वास्तविक क्रियान्वयन में परिवर्तन के निम्न कारण हो सकते हैं-

1. नीति क्रियान्वयन में संलग्न लोग परस्पर विरोधी आदेश एक से अधिक स्रोतों से प्राप्त करते हैं। अधिकांश प्रशासक एक से अधिक उच्च अधिकारियों से आदेश प्राप्त करते हैं।

2. कभी - कभी प्रशासक यह समझ नहीं पाते हैं कि नीति उनसे जो करवाना चाहती है, कैसे करें। ऐसी परिस्थितियों में प्रशासक अपनी पसन्दगी के अनुसार कार्य करें या कार्य न करें, और

3. कभी-कभी प्रशासकों के पास पर्याप्त सत्ता और अन्य आवश्यक नियन्त्रणों का अभाव होता है। समस्त संगठन और संस्थाएँ सब प्रकार की लोक नीतियों को लागू नहीं कर सकते हैं। उनका चयन करना आवश्यक है। इस चयन में संगठन की संरचना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नीति किस प्रकार लागू की जाएगी, इसे संगठन निश्चित करता है। संगठन क्रियान्वयन की प्रक्रिया को गतिशीलता और स्थायित्व प्रदान करता है। रिचर्ड एलमोर (Richerd Elmore) ने चार संस्थागत मॉडलों का उल्लेख किया है जो क्रियान्वयन प्रक्रिया के लिए वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। ये मॉडल हैं - व्यवस्था प्रबन्ध मॉडल, नौकरशाही प्रक्रिया मॉडल, संगठनात्मक विकास मॉडल और संघर्षपूर्ण एवं सौदाकारी मॉडल।

नीति क्रियान्वयन में बाधक कारक (Impediments in Policy Implementation)

1. सामाजिक कारक (Social Factors)- 

कई बार सामाजिक कारकों से नीति क्रियान्वयन बाधित होता है विशेषकर तृतीय विश्व के देशों में समाजों में व्यापक निरक्षरता, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी व जागरूकता इत्यादि का अभाव होता है और इस कारण नीति क्रियान्वयन हेतु अपेक्षित जनसहभागिता प्राप्त नहीं हो पाती। इन देशों में बहुवर्गीय समाज विद्यमान होते हैं और हितों के टकराव की समस्या भी उभरती है। उदाहरण के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) की नीति का विरोध होना । इसी प्रकार कई बार प्रक्रियान्मुख मानवीय कारणों से भी नीतियों का क्रियान्वयन बाधित होता है जैसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं में मानवीय विस्थापन की समस्या के कारण नीति का विरोध होता है। उदाहरण के लिए नर्मदा घाटी विकास परियोजना ।

2. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

 बहुदलीय लोकतंत्रों में कई बार नीतियों का क्रियान्वयन राजनीतिक विरोधों के कारण भी बाधित होता है। कई बार विपक्षी दल केवल विरोध के लिए नीति का विरोध करते हैं। उदाहरण के लिए सेतुसमुद्रम परियोजना |

3. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

कई बार वित्तीय संसाधनों का अभाव व परियोजना के लिए आवश्यक संसाधनों के अभाव में भी नीति क्रियान्वयन बाधित हो जाता है।

4. तकनीकी कारक (Technical Factors)-

तृतीय विश्व के देशों में कई बार आधुनिक तकनीकी के अभाव में कई महत्वपूर्ण नीतियों का क्रियान्वयन बाधित होता है। उदाहरण के लिए उपयुक्त तकनीकी के अभाव में नदियों को जोड़ने की परियोजना भी बाधित हुई है।

5. प्रशासनिक कारक (Administrative Factors)- 

कई बार प्रशासनिक कारणों से भी नीति का क्रियान्वयन बाधित होता है विशेषकर प्रशासन में मानव संसाधनों का अभाव, निष्पादन के लिए उपयुक्त मान्यता व प्रेरणा का अभाव, सामान्यज्ञ - विशेषज्ञ विवाद, निम्न स्तरीय कर्मचारियों व अधि कारियों के लिए उपयुक्त सेवा दशाओं व प्रशिक्षण इत्यादि का अभाव। सचिवालय, निदेशालय इत्यादि भी कई बार नीतियों के क्रियान्वयन को बाधित करते हैं। यदि निकट अतीत में उत्तर भारत के राज्यों के सन्दर्भ में देखें तो प्रशासनिक शक्तियों का राजनीतिक हित में दुरुपयोग किए जाने से असमय स्थानान्तरण की समस्या उभरी है और जिलाधिकारियों का औसत कार्यकाल 3 माह रहा है इससे एक ओर प्रशासनिक सततता बाधित हुई है। दूसरी ओर विकास कार्यों में बाधा पड़ी है। 

6. राष्ट्रीय कारक (National Factors)- 

कई बार संघीय चरित्र के राष्ट्रों में केन्द्र-राज्य संबंध ों में तनाव के कारण भी नीतियों का सफल क्रियान्वयन नहीं हो पाता और विशेषकर यदि भारत के सन्दर्भ में देखें तो राज्य सरकारें केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को विशेष महत्व नहीं देती जबकि अधिकतर केन्द्र प्रायोजित परियोजनाएँ जो कि सामाजिक क्षेत्र के विकास से सम्बन्धित होती हैं केन्द्र व राज्यों में अपेक्षित सहयोग के अभाव के कारण सफल नहीं हो पाती इसलिए संघीय चरित्र के राष्ट्रों में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव, विकास की प्राथमिकताओं में अन्तर जैसे तत्व भी नीति क्रियान्वयन को बाधित करते हैं।

7. अन्तर्राष्ट्रीय कारक (International Factors) -

कई बार विकास परियोजनाएँ अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सहयोग अथवा अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा वित्त पोषित होती हैं लेकिन ये संस्थाएँ कई बार बिना किसी पूर्व सूचना के अथवा उपयुक्त आधार के अनुदान देना बन्द कर देती हैं और इससे योजनाएँ या तो अधूरी पड़ी रह जाती हैं अथवा पूर्णता में लागू नहीं हो पाती। इस प्रकार नीति क्रियान्वयन उपरोक्त कारणों से बाधित होता है। इसके अतिरिक्त परम्परागत नौकरशाही की कमियाँ जैसे लालफीताशाही, प्रक्रिया उन्मुखता, जन विमुखता, साधन को साध्य मानने की प्रकृति भी नीति क्रियान्वयन को बाधित करती है। इसी प्रकार कई बार नीतियाँ राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए लाई जाती हैं और समस्या केन्द्रित होने के स्थान पर व्यक्ति केन्द्रित अधिक होती हैं और उपयुक्त परिणाम नहीं दे पाती।

सफल नीति क्रियान्वयन को प्रभावित करने वाले घटकों का सम्बन्ध (Relationship of Factors Influencing Successful Policy Implementation)


सफल नीति क्रियान्वयन हेतु सुझाव (Suggestion for Successful Policy Implementation)

सफल नीति क्रियान्वयन हेतु जनोन्मुख कारकों व प्रक्रियोन्मुख कारकों पर ध्यान देना आवश्यक है। वर्तमान में सर्वाधिक शोध नीति क्रियान्वयन में ही हो रहा है और कई विद्वानों ने इस पर शोध किया है और द्विस्तरीय रणनीति पर बल दिया है। एक ओर प्रक्रिया उन्मुख कारकों को मजबूत बनाने पर बल दिया गया है और दूसरी ओर जनोन्मुख कारकों को मजबूत बनाने पर बल दिया गया है। 

प्रक्रियोन्मुख कारकों में अग्रलिखित तत्व शामिल हैं-

1. नीति क्रियान्वयन से प्रभावित होने वाले सभी भागीदारों को नीति निर्माण के दौरान ही भागीदारी प्रदान की जानी चाहिए और विश्वास में लिया जाना चाहिए।

2. नीति निर्माण के दौरान ही सभी संसाधनों की उपलब्धता के लिए उपयुक्त नियोजन किया जाना चाहिए ताकि उपयुक्त वित्तीय तकनीकी व मानवीय संसाधन उपलब्ध हो सकें व सफल क्रियान्वयन हो सके।

3. क्रियान्वयन हेतु उपयुक्त नियोजन किया जाना चाहिए अर्थात् नीति कितने चरणों में क्रियान्वित की जाएगी? किस चरण में कितने समय व कितने संसाधनों द्वारा कितना लक्ष्य प्राप्त किया जाएगा?

4. नीति क्रियान्वयन में नेटवर्क की अधिकतम संभावनाओं को तलाशना चाहिए। उल्लेखनीय है कि नेटवर्क की संकल्पना रॉड रॉथेस (Rod Rothes) नामक विद्वान सरकार के बिना शासित (Governing without Government) ने दी जिसका मतलब है सम्बन्धों का जाल जो विभिन्न संस्थाओं को किसी लोक उद्देश्य के लिए समीप लाता है, ताकि संसाधनों, जानकारी व प्रयासों का साझा उपयोग किया जा सके।

5. भूमिकाओं का उपयुक्त परिभाषन होना चाहिए ताकि भूमिकाओं में दोहराव, अतिव्यापन व अस्पष्टता ना रहे।

इस प्रकार प्रक्रिया उन्मुख कारकों के उन्नयन से एक प्रभावी दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।

इस प्रतिमान में प्रक्रिया उन्मुख कारकों के साथ-साथ जन्मुख कारकों को प्रभावी बनाने पर बल दिया गया वस्तुतः नीतियों के असफल क्रियान्वयन के लिए जनोन्मुख कारकों की अवहेलना उत्तरदायी होती है क्योंकि किसी भी नीति की सफलता जनसहभागिता से सुनिश्चित होती है और जनसहभागिता जनोन्मुख कारकों को प्रभावी बनाकर सुनिश्चित की जा सकती है इसके लिए अग्रलिखित तत्वों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

1. सर्वप्रथम जनता व प्रशासन के बीच दूरी कम करना तथा जनता व प्रशासन के मध्य आपसी विश्वास को जन्म देना सफल नीति क्रियान्वयन हेतु आवश्यक शर्त है।

2. परम्परागत रूप से प्रशासकों एवं जनता में नीति की सफलता को लेकर एक नकारात्मक दृष्टिकोण रहा क्योंकि प्रशासक नीति की अव्यवहारिकता को लेकर उदासीन रहे, इसी प्रकार आम जनता में भी प्रशासनिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण नीतियों के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण रहा। अतः यह प्रतिमान प्रशासकों व जनता में नीतियों के प्रति एक सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करने पर बल देता है।

3. नीति क्रियान्वयन के लिए उत्साह महत्वपूर्ण होता है। प्रशासकों व समाज में उत्साह जरूरी है। प्रशासकों को नीति क्रियान्वयन के लिए उत्साही बनाने हेतु पदोन्नति व वेतन वृद्धि को निष्पादन से जोड़ा जाना चाहिए। इसी प्रकार व्यापक जनजागरूकता द्वारा लोगों में नीतियों के लिए उत्साह बढ़ाया जाना चाहिए।

4. सफल नीति क्रियान्वयन के सामुदायिक नेतृत्व व प्रशासनिक नेतृत्व दोनों पर बल दिया जाना चाहिए। प्रशासकों को जैसे कि नए सिविल सेवा अधिनियम में 3 वर्ष का स्थायी कार्यकाल देने का प्रावधान किया गया है इससे प्रशासनिक नेतृत्व सुनिश्चित हो सकेगा। इसी प्रकार स्थानीय समुदायों में विकास कार्यक्रमों में आम सहमति विकसित करने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि अधिक बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

5. परम्परागत नौकरशाही तंत्र विकास कार्यक्रमों के उपयुक्त प्रबन्धन में असफल रहा क्योंकि प्रबन्धन शैली असहयोगपूर्ण तथा नियन्त्रणकारी रही अतः यह प्रतिमान नीतियों के क्रियान्वयन में सहभागी प्रबन्धन शैली सुनिश्चित करने पर बल देता है।

इस प्रकार जनोन्मुख कारकों को प्रभावी बनाकर नीति क्रियान्वयन को सफल बनाया जा सकता है। यदि प्रक्रियान्मुख व जनोन्मुख कारक मजबूत बना दिए जाएं तो इससे नीति क्रियान्वयन हेतु आवश्यक प्रतिबद्धता विकसित की जा सकती है। सभी प्रकार का सहयोग प्राप्त किया जा सकता है और प्रशासकीय कौशल व सक्षमताओं द्वारा सफल नीति क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सकता है।


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