नीति निर्माण के संवैधानिक घटक Constitutional Factors of Policy Making
नीति निर्माण की संवैधानिक संरचना (Constitutional Structure of Policy Making)
भारत में नीति निर्माण का कार्य संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ही सम्भव है। हाल ही के दिनों में भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए एवं देश में पारदर्शी, ईमानदार शासन-प्रशासन मुहैया करवाने के लिए अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव ने लोकपाल बिल का खाका तैयार किया था। संसद में इसे पास कर लागू करने के लिए देशव्यापी आन्दोलन हुए, परन्तु वह बिल आज तक उस प्रारूप में पास नहीं हो पाया है क्योंकि देश में कानून निर्माण की एक संवैधानिक प्रक्रिया है और उसके बिना संवैधानिक वरण असम्भव है। हमारे देश में नीति निर्माण की संवैधानिक व्यवस्था में मुख्य रूप से चार महत्वपूर्ण विशेषताएं निहित हैं-
1. लोकतांत्रिक सम्प्रभुता सम्पन्न गणतंत्र
2. संसदीय व्यवस्था
3. संघवाद
4. सामाजिक आर्थिकता का समावेश
1. लोकतांत्रिक सम्प्रभुता सम्पन्न गणतंत्र (Democratic & Sovereign Republic)
भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) को 'आत्मा' कहा जाता है, जिसमें देश की शासन नीति, आदर्श लक्ष्य व आकांक्षाएं प्रतिबिम्बित होती हैं। प्रस्तावना में संविधान के 42 वें संशोधन द्वारा कुछ शब्द जोड़े गए। प्रस्तावना का वर्तमान स्वरूप है-
'हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके नागरिकों को यहाँ सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न से तात्पर्य है- भारत सम्प्रभु राष्ट्र है, जिसके आन्तरिक एवं बाह्य मामलों में कोई विदेशी शक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। लोकतांत्रिक शब्द में राज्य की सम्पूर्ण शक्ति जनता में निहित है। शासन अपनी शक्ति जनता से प्राप्त करता है तथा जनता की इच्छा तक ही सत्ता में रह सकता है। 'गणराज्य' शब्द में निहित है कि सत्ता में वंशानुगत पदों की परम्परा नहीं हो। देश का प्रमुख कोई वंशानुगत नहीं होकर जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।
हमारे देश में सरकार का अस्तित्व संसद अथवा विधानमण्डल के समर्थन पर निर्भर होता है। संसद अथवा विधानमण्डल के सदस्य बहुमत से कानून एवं नीति बनाने का काम करते हैं। भारत में बहुदलीय व्यवस्था होने से बहुमत से लिए गए निर्णय को बेहतर माना जाता है। हमारे देश में न्यायालय बहुसंख्यकों की मनमानी, निरंकुशता के विरुद्ध सुरक्षा हेतु न्यायपालिका का प्रावधान करते हैं।
2. संसदीय व्यवस्था (Parliamentary System)
भारतीय शासन व्यवस्था में केन्द्र तथा राज्य (दोनों स्तरों) पर संसदीय प्रकार की कार्यपालिका होती है। इस व्यवस्था में सरकार की वास्तविक कार्यपालिका शक्तियां मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं। सभी मंत्री संसद या राज्य की विधायिका (लोकसभा या राज्य सभा) के सदस्य होते हैं। सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
3. संघवाद (Federalism)
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था मुख्यतः संघीय है परन्तु इसमें अद्भुत एकात्मक विशेषताएं हैं। (The Indian constitutional system is basically federal but with striking unitary features (Bommai vs Union of India, 1984, p. 211) भारतीय संघीय व्यवस्था में कुछ लक्षण संघात्मक और कुछ एकात्मक शासन व्यवस्था के हैं। डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था- "संघवाद का मुख्य संविधान द्वारा केन्द्र व राज्यों के बीच विधायी तथा कार्यपालिका शक्तियों के विभाजन में निहित होता है। हमारे संविधान में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है।" श्री के. सन्थानम ने भी संविधान को संघात्मक माना है जिसकी संघात्मकता न्यायपालिका द्वारा सुरक्षित है जिसे संवैधानिक संशोधनों के बिना भंग नहीं किया जा सकता। (संविधान सभा वाद-विवाद, खण्ड-11ए पृष्ठ 718) प्रो. पी. सी. माथुर ने अपने लेख 'गणतंत्रीय भारत' में 'राज्यों का संघ" के स्थापत्य में केन्द्रवर्ती राजनैतिक प्रवाहों की दशा एवं दिशाएं' में 'इण्डिया अर्थात् भारत", "राज्यों का संघ" के अनुवाद में संघवाद (federalism), 'राज्य' (States) आदि शब्दों को लेकर कई प्रश्न उठाये हैं।
भारतीय संघीय व्यवस्था के अनुरूप केन्द्र एवं राज्यों में कानून एवं नीति निर्धारण के लिए तीन 4. सूचियां बनाई गई हैं केन्द्रीय सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची । केन्द्र एवं राज्यों के बीच विवादों - के निर्णय के लिए सर्वोच्च न्यायालय है जो एक स्वतन्त्र निकाय है।
4. सामाजिक-आर्थिकता का समावेश (Social Economic Exclusiveness)
स्वतंत्रता के समय भारत में कुछ रीति रिवाज, परम्पराएं प्रथाएं एवं सामाजिक रूढ़ियों, परतंत्रता की बेड़ियों ने लोगों में असमानता की खाई बना दी थी। इस खाई को पाटने, न्याय एवं समानता दिलाने के लिए प्रस्तावना में सामाजिक न्याय शब्द जोड़ना सभी व्यक्तियों को अवसर की समानता प्रदान करने की दिशा में उठाया गया एक कदम ही था। इसी प्रकार सामाजिक न्याय की अगली पहल में आर्थिक न्याय एवं समता की बात की गई, जिसमें देश में उपलब्ध संसाधानों की उपलब्धता यथा सम्भव सभी नागरिकों को उपलब्ध करवाने की बात कही गई।
भारतीय संविधान का स्वरूप (Framework of Indian Constitution)
भारतीय संविधानवेत्ताओं एवं विधि निर्माताओं ने शक्ति और प्राधिकार का संतुलन संघ के पक्ष में करने का प्रयास किया है। भारतीय संविधान में एकात्मक लक्षणों को लिए हुए संघीय व्यवस्था को अपनाया गया है। भारत में कानून अथवा नीति निर्माण के तीन स्तर हैं- संघ, राज्य और स्थानीय सरकार। ये अपनी शक्ति संविधान से प्राप्त करते हैं। भारतीय संविधान संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन भी करता है, जिसे संविधान की अनुसूची- (VII) अनुच्छेद 246 में उल्लेखित किया गया है। भारतीय संविधान स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का प्रावधान करता है, जो संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है। के.सी. व्हीयर (K.C. Whiyar) के अनुसार- "भारतीय संघ अधिक से अधिक अर्ध संघ है। एपलबी (Aplbi) ने कहा कि भारत में देखने में तो केन्द्र अधिक शक्तिशाली दिखाई देता है परन्तु वास्तव में राज्यों की शक्तियां भी कम नहीं हैं। उनका मानना है कि राज्य यदि केन्द्र की नीतियों को लागू नहीं करने की ठान ले तो केन्द्र को अपनी नीतियों को लागू करवाने में बहुत सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। प्रो. सी. पी. भाम्भरी (Prof. C.P. Bhambri) इसे शीर्ष संघ तथा जे.सी. जौहरी (J. C. Johri) समतल संघ मानते हैं। पी. टी. चाको (P.T. Chako) कहते हैं- यह शरीर से संघात्मक है, परन्तु आत्मा से एकात्मक है।
नीति निर्माता (Policy Makers)
नीति निर्माण में पारिस्थितिकी का ध्यान रखा जाना चाहिए तथा नीति सदैव समय, स्थान एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। नीति निर्माण में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका जहाँ संवैधानिक घटक हैं, वहीं कुछ संवैधानिक संस्थाएं यथा राष्ट्रीय महिला आयोग, अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग, अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग, राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग, मानवाधिकार आयोग आदि हैं। दूसरी ओर गैर संवैधानिक घटक हैं जिनमें राष्ट्रीय विकास परिषद, योजना आयोग, दबाव समूह, राजनीतिक दल, परामर्शदात्री समितियां एवं संस्थाएं, मीडिया, नागरिक समाज (Civil Society) और उद्योगपति इत्यादि हैं।
विधायिका (The Legislature)
भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है, जहाँ सत्ता संसद तथा प्रधानमन्त्री के मंत्रिमण्डल में निहित होती है। भारत में संसद के दो सदन हैं- लोकसभा और राज्य सभा लोकसभा को जनता सदन कहा जाता है। क्योंकि इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं जबकि राज्य सभा के सदस्यों का निर्वाचन राज्य विधानमंडलों द्वारा किया जाता है। राज्य सभा एक स्थायी सदन है जो कभी भी भंग नहीं होता है परन्तु इसके एक तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में निर्वाचित होते हैं। लोकसभा का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष होता है परन्तु इससे पहले भी भंग किया जा सकता है और आपातकालीन परिस्थितियों में बढ़ाया जा सकता है।
भारत में संसद लोकनीति निर्माण की सर्वोच्च संस्था है क्योंकि प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद का गठन होता है जो कि बहुमत के आधार पर होता है। मंत्रिमण्डल में मंत्रियों का चयन अधिकांशतः संसद के सदस्यों में से ही होता है और मंत्रिमंडल जब तक सत्ता में बना रहता है जब तक कि संसद का बहुमत प्राप्त होता है। किसी भी विधेयक अथवा नीति निर्माण के लिए सर्वप्रथम उसकी पहल संसद के किसी भी सदन में रखी जा सकती है, केवल धन विधेयकों को छोड़कर (इसे पहले लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है। )
हमारे देश में संसदीय शासन व्यवस्था होने के कारण नीति निर्धारण की प्रक्रिया Stages of Policy में तीन अवस्थाएं आती हैं-
1. सदन में प्रस्तुतीकरण,
2. विचार विमर्श एवं विस्तृत चर्चा तथा
3. अनुच्छेदवार चर्चा एवं संशोधन ।
इसे इस चार्ट की मदद से भी समझ सकते है -
संसदीय व्यवस्था में विधायिका केवल प्रस्तावों पर आवश्यक सुझाव एवं विस्तृत चर्चा ही कर सकती है, वैधानिक प्रस्तावों की पहल 1 कार्यपालिका के हाथों में रहती है। नीति के प्रारूप को संसद के किसी एक सदन में प्रस्तुत किया जाता है। नीति जिस विभाग एवं मंत्रालय से सम्बद्ध होती है उसके द्वारा नीति के विविध पक्षों यथा संवैधानिक, राजनैतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं पारिस्थितिक पर ध्यान दिया जाता है। यदि आवश्यकता होती है तो विशेषज्ञों की सहायता भी ली जा सकती है। मंत्रिमंडल की स्वीकृति के पश्चात् संसद कार्यपालिका से आने वाले नीतिगत प्रस्तावों में केवल संशोधन तथा स्वीकृति प्रदान करती है।
कार्यपालिका (The Executive)
संसदीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका का अर्थ वास्तविक कार्यपालिका से लिया जाता है न कि वैधानिक अथवा नाममात्र की कार्यपालिका जो कि राष्ट्रपति अथवा राजा होता है। जे.डब्ल्यू. गार्नर (J. W. Garner) ने कार्यपालिका से आशय माना है- "मोटी और समग्र दृष्टि से, कार्यपालक अंग उन सभी पदाधिकारियों तथा ऐजेंसियों के समुच्चय अथवा संपूर्णता को समेट कर चलता है जो कि राज्य की इच्छा को लागू करने से ताल्लुक रखते हैं क्योंकि वह इच्छा कानून के तौर पर निर्धारित एवं अभिव्यक्त की जाती है।" भारत में इसके अन्तर्गत इसकी समितियां मंत्रिमण्डलीय सचिवालय तथा प्रधानमंत्री का सचिवालय सम्मिलित है। राज्य के प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है (अनुच्छेद-74)।
मंत्रिमण्डल सर्वोच्च नीति निर्माणकारी संस्था होती है। इसकी स्वीकृति के बिना कोई भी नीतिगत प्रस्ताव प्रभावी नहीं होते हैं। मंत्रिमण्डल ही उन नीतियों का निर्णय करता है जिन्हें विधायिका के समक्ष स्वीकृति हेतु प्रस्तुत किया जाता है। मंत्रिमंडल की स्वीकृति के अभाव में कोई भी नीति प्रभावी नहीं हो सकती। मंत्रिमण्डल की भूमिका का परीक्षण करते हुए प्रो. एस. आर. माहेश्वरी (Prof. S.R. Maheshvari) का मत है कि "नीतियां अपने महत्व एवं प्रकृति पर निर्भर करते हुए, सरकार के विभिन्न स्तरों पर अंतिम मंजूरी प्राप्त करती हैं। कुछ प्रस्तावों को मंत्रिमण्डल के समक्ष उसके निर्णय हेतु लाया जाना जरूरी होता है तथा मंत्रिमण्डल उन्हें या तो सीधे विचार विमर्श के लिए रख सकता है या फिर उन्हें अपनी किसी उप समिति के पास अधिक सूक्ष्म परीक्षण के लिए भेज सकता है।" ऐसा लगता है मंत्रिमण्डल एक नीति निर्धारक निकाय से अधिक एक नीति निश्चायक के रूप में अधिक कार्य करता है। मंत्रिमण्डल के नीति निर्माण सम्बन्धी कार्यों के सम्पादन में मंत्रिमण्डल सचिवालय (Cabinet Secretariat ) सहायता करता है।
यह सर्वविदित है कि मंत्रिमण्डल की धुरी प्रधानमंत्री होता है जो नीति निर्माण में महती भूमिका निभाता है। नीति निर्धारण के विभिन्न स्तर अपनी-अपनी भूमिका अदा करते हैं परन्तु निर्णय प्रक्रिया में प्रधानमंत्री एक निर्णायक की भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री को उसके कार्यों को सरलता एवं प्रभावी रूप से संचालित करने में प्रधानमंत्री कार्यालय (P.M.O.) सहायता प्रदान करता हैं। (www.pmindia.nic.in)
प्रशासनिक इकाइयाँ (Administrative Units)
नीति निर्माण की प्रक्रिया निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। एक बार निर्मित नीति कोई पत्थर की लीक नहीं होती बल्कि समय की आवश्यकता एवं परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए उसमें संशोधन भी किए जा सकते हैं। प्रायः यह माना जाता है कि नीति निर्माण का कार्य राजनीतिक कार्यपालिका (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिमण्डल, समितियों) का है और नीति क्रियान्वयन का कार्य स्थायी लोक सेवकों का है। परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति या अन्य राजनीतिज्ञों के लिए किसी शैक्षिक या व्यावसायिक योग्यता एवं अनुभव की आवश्यकता नहीं होतीजबकि लोकसेवकों के लिए शैक्षणिक, व्यावसायिक एवं पदानुसार विशेषता एवं अनुभव आवश्यक होता है। नीति निर्माण में प्रशासन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि नीति निर्माण के लिए प्रशासन कच्चे माल (Raw Material) के रूप में आवश्यक सूचनाएं, तथ्य, आंकड़े उपलब्ध करवाता है जिन्हें नीति का आधार कहा जा सकता है। दूसरी बात प्रशासन निर्माण से सम्बन्धी सभी पहलुओं पर कार्यपालिका को आवश्यक परामर्श, गुण-दोष तथा विकल्प प्रस्तुत करता है जिसे नीति के लिए असली मस्तिष्क कहा जा सकता है। तीसरी बात है कि नीति निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है तथा कार्यपालिका के पास इतना समय नहीं होता कि नीति के प्रत्येक पहलू का सूक्ष्मता से परीक्षण किया जा सके या उसकी क्रियान्विति नियम विनियमों का विस्तार से खाका खींचा जा सकें। इसके लिए प्रशासन समस्याओं तथा नियमों, संविधान के उपबन्धों का विश्लेषण करता है।
नीति निर्माण में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के अलावा योजना आयोग (Planning Commission), राष्ट्रीय विकास परिषद् (National Development Council), केन्द्रीय 1) सचिवालय (Central Secretariat ), प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister Office), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), वित्त आयोग, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA), भारतीय सांख्यिकी संस्थान, राष्ट्रीय व्यावहारिक आर्थिक अनुसंधान परिषद् (NBERC), वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (IMRC), राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (NAA), भारतीय पुलिस अकादमी (IPA), आदि संस्थाएं नीति निर्माण में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं।
न्यायपालिका (Judiciary)
★ न्यायपालिका सरकार का तीसरा अंग है जिसका मुख्य कार्य है नीतिगत निर्णयों की वैधता का परीक्षण करना। भारत में न्यायपालिका का सर्वोच्च स्थान है और आमजन का पूरा विश्वास भी है क्योंकि हमारी न्याय व्यवस्था खुली, पारदर्शी, निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, पूर्वाग्रह रहित मानी जाती रही है। न्यायपालिका के लिए सभी नागरिक समान हैं। भारत में न्यायपालिका को स्वतंत्र, स्वच्छ, नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता का संरक्षक माना जाता है। भारत में प्रमुख रूप से तीन प्रकार के न्यायालय विद्यमान हैं- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court ), उच्च न्यायालय (High Court), एवं अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Court)। प्रत्यक्ष रूप से नीति निर्माण में न्यायपालिका की भूमिका नहीं पायी जाती है परन्तु जिन देशों में न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review), की शक्ति न्यायपालिका के पास है (जैसा कि अमरीका एवं भारत में है) वहाँ न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। न्यायिक पुनरावलोकन में न्यायपालिका के पास यह परीक्षण करने का अधिकार होता है कि विधायिका एवं कार्यपालिका द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय संवैधानिकता के दायरे में आते हैं अथवा नहीं और यदि कोई नीति संविधानसम्मत नहीं है या संविधान को ठेस पहुँचाती है तो न्यायपालिका उन नीतियों में संशोधन के लिए सुझाव दे सकती है अथवा रद्द कर सकती है।
भारत में न्यायपालिका को जनता के अधिकारों का संरक्षक तथा कार्यपालिका एवं विधायिका के मध्य संतुलन बनाये रखने वाली संस्था के रूप में माना जाता है। किसी भी अस्पष्टता अथवा कानून न होने की स्थिति में न्यायपालिका निर्णय करती है। भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक समीक्षा की शक्ति दी गई है तथा इसके समक्ष किसी नीति की वैधता की निरीक्षण करने के लिए आवेदन करने पर संसद द्वारा बनाई गई नीति की संवैधानिकता को परखा जा सकता है।
नीति निर्माण में कुछ दशक पूर्व से राजनीतिक नेताओं की आज की भूमिका की तुलना करते हुए वाई. ड्रॉर (Y. Dror) ने लिखा है कि पहले की अपेक्षा अब नीति-निर्माण में उनका कम हाथ रहता है। उसने इसका कारण यह बताया है कि अब नेताओं में इस कार्य के लिए आवश्यक योग्यता नहीं होती। चाहे हम इसे न भी स्वीकार करें फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि नीति निर्माण के लिए जिस विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है, वैसा ज्ञान वर्तमान में न तो नेताओं में रहता है और न ही प्रशासकों में। इसलिए भारत के प्रशासनिक सुधार आयोग ने यह सिफारिश की थी कि मंत्रियों को बीच-बीच में अपने काम से छुट्टी लेकर कुछ समय अध्ययन और चिन्तन में लगाना। चाहिए। यह बात न केवल नेताओं के लिये बल्कि प्रशासकों के लिये भी लागू होती है। नीति निर्माण में सुधार के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक नेता और प्रशासक दोनों बीच-बीच में कुछ अध्ययन संस्थानों में जाकर इस कार्य के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करें (प्रो. के. पी. सिंह, 1994, नीति विज्ञान के सिद्धान्त, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, पृ. 9 )
इस प्रकार उक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि भारत में नीति निर्माण के अनेक घटक विद्यमान हैं जिनकी भूमिका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं अवश्य पायी जाती है। नीति का निर्माण शून्यता की स्थिति में नहीं होता तथा नीति निर्माण पर पारिस्थितिकी का प्रभाव होता है अर्थात् जिस स्थिति में राजनीतिक व्यवस्था कार्य करती है उसका प्रभाव नीति निर्माण पर होता है। नीति निर्माण के संवैधानिक घटकों में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के अलावा भी कई महत्वपूर्ण संस्थाएं सम्मिलित हैं। भारत में शासन की संसदीय व्यवस्था है और संविधान संघीय राज्य की स्थापना करता है। नीति निर्माण की एक विधिक प्रक्रिया है जो कि संविधान के दायरे में रहकर ही पूरी की जा सकती है। वाई. ड्रोर (Y. Dror) के अनुसार मानवीय विकास और लोक नीति निर्माण के लिए दीर्घकालीन रणनीति बनाना आवश्यक है। लोक नीति किसी उत्परिवर्तन (Sudden Change) का परिणाम नहीं होती अपितु यह एक सतत् प्रक्रिया है तथा सतत् प्रयासों का परिणाम होती है क्योंकि उत्परिवर्तन द्वारा बनाई गई नीति में विकृति आने की सम्भावनाएँ प्रबल होती हैं। दूसरी बात नीति के क्रियान्वयन में स्वविवेकीय शक्तियों के कारण भी नीतियों में विकृति या पूर्वाग्रह से अनेक निर्णय गलत हो जाते हैं। अतः नीतियाँ वैज्ञानिक विधि (Scientific Method) से बनाई जानी चाहिए जिससे समानता, न्याय, लोक कल्याण को ध्यान में रखते हुए नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ा जा सके।