लोक नीति के विभिन्न मॉडल या प्रतिमान की विशेषताए
लोक नीति के प्रतिमान Models of Public Policy
परिचय (Introduction)
लोक नीति की विभिन्न विधाओं को समझाने के लिए कई अवधारणीय मॉडल निर्मित किए गए हैं। इन मॉडलों का उद्देश्य वास्तविकताओं को सरलीकृत तरीके से प्रस्तुत करना है।
इसकी निम्नलिखित उपयोगिताएँ हैं-
• लोक नीति एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं के बारे में सरल एवं स्पष्ट तरीके से विचार प्रस्तुत करना।
• नीति समस्याओं के प्रमुख पक्षों को चिन्हित करना ।
राजनीतिक पक्ष की प्रमुख विशेषताओं को उजागर करना तथा विचारों को संप्रेषित करना ।
• लोक नीति के महत्वपूर्ण तथा नगण्य आयामों के बारे में विस्तार से समीक्षा करना ।
• लोक नीति के विभिन्न पक्षों को समझाना तथा भविष्य में होने वाले प्रभावों के बारे में विवेचना प्रस्तुत करना ।
समय-समय पर लोक नीति के विभिन्न मॉडलों को प्रस्तुत किया जाता रहा है, जो कि लोक नीति के विभिन्न आयामों को समझने में सहायक हैं। इनमें निम्नलिखित प्रमुख प्रतिमान हैं -
(i) संस्थागत प्रतिमान,
(ii) प्रक्रिया प्रतिमान,
(iii) विवेकशील प्रतिमान,
(iv) वृद्धिशील प्रतिमान,
(v) समूह प्रतिमान,
(vi) कुलीन प्रतिमान,
(vii) लोक चयन प्रतिमान (P.C. Model),
(viii) खेल प्रतिमान।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि ये प्रतिमान कोई प्रतिस्पर्धात्मक नहीं हैं, बल्कि हर एक प्रतिमान कोई निश्चित स्थिति की ओर संकेत करता है। इसलिए अगर नीति को समग्र रूप से समझना हो तो अच्छी नीति में विभिन्न प्रतिमानों का उपयोग होना चाहिए तथा यह परिवर्तनजन्य है।
लोक नीति के विभिन्न प्रतिमान (Models of Public Policy)
1945 के दशक में ज्यादातर अमरीकी राजनीतिक चिन्तकों ने अपना ध्यान लोक नीति की विभिन्न प्रक्रियाओं को समझने में लगाया न कि नीति की विषयवस्तु को समझने में। यही कारण है कि 1960 के दशक में लोक नीति राजनीतिक शास्त्र के उपक्षेत्र के रूप में प्रतिस्थापित हुआ तथा लोक प्रशासन को दिशा देने में योगदान किया।
इसको अध्ययन क्षेत्र के रूप में समझने के लिए दो अध्ययन शाखाओं में विभाजित किया जा सकता है-
1. वह शाखा जो लोक नीति को विशिष्ट विषय उत्सुक, प्रक्रियात्मक, विवरणात्मक तथा वस्तुनिष्ठ स्वरूप में स्थापित करती है। यह राजनीतिक चिन्तन से प्रभावित है तथा वृद्धिशील पैराडाईम के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
2. वह शाखा जो इसे सैद्धांतिक, फलप्रद, निदानात्मक और आदर्शनात्मक स्वरूप में स्थापित करती है, इसको विवेकशील पैराडाईम के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
हाल ही में एक तीसरा पक्ष जो व्यूह रचना आयोजन पर अधिक जोर देता है और दोनों का विकसित रूप प्रस्तुत करता है।
येहजकल ड्रोर, हयू विश्वविद्यालय, येरूशलम (Yehezkel Dror, 1968 Hebrew University, Jerusalem) ने अपने विभिन्न प्रकाशनों के माध्यम से नीति विज्ञान को विस्तार से समझाने का प्रयास किया है। (Design for Policy Sciences; Ventures in Policy Sciences and Improvement of Policy and Administration in Isreal)
ड्रोर (Dror) ने अपने विवेचन में नीति विश्लेषण के विभिन्न अभिगमों, व्यवहार विज्ञान तथा व्यवस्था विश्लेषण के आधार पर लोक नीति निर्माण की वास्तविकताओं को समझाया है।
ड्रोर का प्रमुख उद्देश्य (अ) सरकार के विवेक संगत संदर्भ को बढ़ाना, (ब) निर्णयन में 'अतिरिक्त विवेक संगत' आयामों को निहित करना। इन दोनों को उन्होंने 'मानदण्डात्मक अधिकता' (Normative Optimism) के द्वारा समझाया है। इस विवेचन में विवरणात्मक एवं निदानात्मक तर्क के आधार पर इस पर जोर दिया है कि नीति निर्माण की समुचित व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता है।
संस्थागत प्रतिमान (Institutional Models)
लोक नीति का निर्माण, क्रियान्वयन तथा व्यवहारीकरण विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से सुनिश्चित होता है। इस दृष्टि से 'लोक नीति एवं सरकारी संस्थाओं का बहुत निकट का संबंध है। वास्तव में कोई नीति जब तक लोक नीति नहीं बनती जब तक कि वह आत्मसात् एवं क्रियान्वित नहीं हो जाती सरकारी संस्थाएँ, लोक नीति की तीन विशिष्ट विशेषताएँ निर्धारित करती हैं-
(i) वैधता (Legitimacy) - क्योंकि लोक नीतियाँ सरकार का विधायी कार्यक्षेत्र है जो उन्हें नागरिकों से अनुबंधित करता है।
(ii) सार्वभौमिकता (Universality) मात्र लोक नीतियाँ ही समाज के हर व्यक्ति के लिए लक्षित होती हैं।
(iii) घर्षण (Coercisin) - मात्र सरकार और कोई संस्था किसी प्रकार के उल्लंघनों का विधायी नियंत्रण नहीं लगा सकतीं इस तरह से नीतियों की अवहेलना किसी को भी भारी पड़ सकती है।
प्रारंभ में सामान्यतः संस्थागत अध्ययनों में विशिष्ट सरकारी संस्थाओं का अध्ययन, उसके संरचना को, संगठनों को, कार्यों को और उत्तरदायित्वों को जानने के लिये किया गया। इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया था कि संस्थागत विशेषताओं का प्रभाव नीति निर्गतों पर क्या पड़ता है? इस संबंध में अनुसंधान करना बाकी है कि संस्थागत व्यवस्थाओं और नीति की विषयवस्तु में किस प्रकार से कड़ी स्थापित की जा सकती है।
यह सरकार के संगठनात्मक चार्ट पर केन्द्रित है। इस आधार पर यह अधिकारियों के उत्तरदायित्व निर्धारित करता है। कार्यालय, विभाग, अधिकारी अपने अधिकार संविधान से विधेयकों से तथा अन्य विधायी प्रक्रियाओं से ग्रहित करते हैं।
कार्ल जे. फ्रेडरिक (CarlJ. Friedrich's Constitutional Government & Democracy, 1941) इस दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण विवेचन है जो सरकारों को संवैधानिक रूप से संचालित मानता है। इस मॉडल को चिन्हित किया गया है।
इसके मूलकेन्द्र में संवैधानिक रूप से अधिकृत तथा विधेयकों के माध्यम से परिभाषित नीतियाँ, लोक नीति का निर्माण एवं क्रियान्वयन करती है। लोक नीति एवं सरकार में बहुत ही घनिष्ठ संबंध है। कोई नीति तब तक लोक नीति में परिणित नहीं होती जब तक वह सरकारी संस्थाओं के द्वारा मान न ली गई हो, क्रियान्वित न हो इस तरह से सरकारी संस्थाएँ, लोक नीति की तीन विशिष्ट विशेषताएँ चिन्हित करती है।
1. सरकार, लोक नीतियों को विधिक आधार देती है। सरकार की नीतियाँ, वे विधिक बाध्यताएँ हैं जिससे नागरिकों के प्रति विश्वसनीयता स्थापित होती है।
2. सरकारी नीतियाँ सार्वभौमिक होती हैं, क्योंकि समाज के हर व्यक्ति के लिए ये नीतियाँ बनाई जाती हैं, कोई मतभेद या अलगाववादी नहीं होतीं।
3. सरकार की नीतियाँ ही समाज में व्याप्त मनमुटावों को दूर कर सकती हैं, क्योंकि ऐसे तत्त्व जो समाज में विभेदन का कार्य करते हैं या अन्य उल्लंघन करने पर सरकार संवैधानिक रूप से दी गई विधि सम्मत व्यवस्था के तहत् सजा देने का प्रावधान है। इस तरह से लोक नीति सरकार के विभिन्न संस्थागत स्वरूपों से प्रवाहित होती है।
प्रारंभ में इस मॉडल की संगठनात्मक संरचनाओं पर ही ज्यादा जोर दिया तथा ये संस्थाएँ नीति की प्रक्रिया में क्या भूमिका निभाती हैं, उस पर कम विवेचना की गई। इस तरह से संस्थाओं में तथा नीति की विषयवस्तु में क्या संबंध है, इसकी चर्चा नहीं की गई है।
परन्तु समय के साथ इस विवेचन में परिवर्तन हुआ तथा नीति को संस्थान से जोड़ कर देखा गया, क्योंकि संस्थात्मक परिवर्तन कर लोक नीति के प्रभावों में भी अंतर देखा जा सकता है। एक तरह से यह समझा जा सकता है कि संस्थाएँ एवं लोक नीतियाँ दोनों ही सामाजिक एवं आर्थिक तत्त्वों से प्रभावित होती हैं और अगर ये तत्त्व लम्बे समय तक हावी होते रहे तो संस्थाओं का प्रभाव नीति पर स्वतंत्र रूप से नहीं पड़ता।
नव संस्थात्मक मांडल (New Organisational/Institutional Model)
थियोडोर जे. लॉवी (Theodore J. Lowi, 1970, Decision Making versus Policy Making: Towards an Anecdote for Technocracy, PAR, pp. 134-139) ने एक नई दृष्टिकोण से संस्थात्मक मॉडल की विवेचना की नव संस्थात्मक मॉडल लोक नीति व्यवस्थाओं के अनुरूप लोक नीतियों को वर्गीकृत करने की व्यवस्था प्रदान करता है।
लोक नीति निर्माण का नव संस्थात्मक अभिगम दो आयामों पर आधारित है।
(i) घर्षण की संभावना क्या है? अर्थात् या तो यह संभावना दूरगामी हो सकती है अथवा तुरन्त प्रभावी हो सकती है।
(ii) घर्षण के लक्षण कौन से हैं, ये या तो व्यक्तिगत हो सकता है या व्यवस्थित।
लॉवी के इन दोनों आधारों पर कुछ प्रकार के राजनीतिक व्यवहार इंगित किए जा सकते हैं। उदाहरण स्वरूप वितरण नीतियों में जन-आधारित और विकेन्द्रित राजनीतिक व्यवहार दिखाई पड़ता है, जबकि पुनः वितरण में ये ज्यादा पार्टी आधारित व केन्द्रित हो जाता है। इस तरह से राजनीतिक संस्थानों को नीति प्रकारों के आधार पर इस मॉडल के द्वारा समझा जा सकता है।
संगठित अराजकता मॉडल (Organized Anarchy Model)
जॉन डब्ल्यू. किंगडन (John W. Kingdon) ने स्वास्थ्य एवं यातायात में नीति निर्माण प्रक्रिया का अनुभवमूलक अध्ययन 1976 1979 में किया और कुछ नीति की बारीकियों को समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने तीन प्रकार के प्रवाहों की विवेचना प्रस्तुत की है-
(i) समस्या ( Problem ) जो कि नीति निर्माताओं का ध्यान विशेषतौर पर सामाजिक समस्याओं की तरफ आकर्षित करता है, समस्याओं को परिभाषित करना तथा उन समस्याओं के अनुरूप नवीन लोक नीतियाँ निर्मित करना ।
(ii) राजनीतिक धारा (Political Veiw ) - यह एजेण्डा युद्धों में शामिल करने का आधार भी है, जिसको सरकार नीतियों के माध्यम से लागू करती है। यह भी राष्ट्रीय आंकलन के बाद ही सम्मिलित होता है। इसमें सामान्यतः सभी हितों को तथा राजनीतिक घोषणा पत्र में लिखित घोषणाओं, कार्मिकों की उपलब्धता इत्यादि में देखते हुए ही निर्धारित होता है।
(iii) नीति धारा (Policy Veiw) - यह एजेण्डा में परिलक्षित युद्धों को 'निर्णय विकल्पों' में परिणति करते हैं। इस निर्णय। इस निर्णय एजेण्डा से ही नीति निर्माता किसी लोक नीति का चयन कर सकते हैं। इसके निर्माण में गैर-राजनीतिक अभिकर्ता ज्यादा सजग भूमिका निभाते हैं, परन्तु ये अदृश्य रहकर नीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
सी. वेन्डर एवं जे. कोहल (C. Wendt and J. Kohl) ने OECD देशों के संदर्भ में स्वास्थ्य नीति का विशेष आंकलन कर अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस अध्ययन के आधार पर लोक नीति का संरचनात्मक तथा स्तरों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। स्वास्थ्य क्षेत्र के अध्ययन को व्यापक लोक नीति के संदर्भ में भी लागू किया जा सकता है। इनके द्वारा तीन आदर्शनात्मक लोक नीति के प्रकारों का सुझाव विस्तृत स्तर पर व्यवहारिकता की कसौटी पर खरा उतरता है।
(i) वे लोक नीतियाँ जो किसी विषय पर प्रत्यक्ष लोक नियंत्रण प्रस्तावित करती हैं, जिसमें वित्तीय एवं सेवा प्रावधान हो
(ii) वे लोक नीतियाँ जो गैर-सरकारी अभिकर्ताओं के द्वारा स्व-नियमित होती हैं।
(iii) वे लोक नीतियाँ जिनकी दिशा बाजार की व्यवस्था निर्धारित करती हैं।
ये ग्यामो एवं मॅनाओ (Giaimo & Manow, 1999) के द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था जिसमें तीन प्रकार की नीतियों को 'राज्य निर्देशित (State Led), 'उद्यमी निर्देशित (Corpoatist Governed) और 'बाजार निर्देशित (Market Driven) में वर्गीकृत किया गया हैं. से मिलता-जुलता है।
विवेकशील प्रतिमान (Rationalistic Paradigm of Public Policy Monitoring & Implementation)
लोक नीति का विवेक सम्मत मॉडल संवर्धनशील विवेचना का विलोमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसका मुख्य केन्द्र बिन्दु बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन है, जिसमें समाज में प्रचलित सभी मूल्यों के बारे में विवेकपूर्ण तर्काधार पर जानकारी उपलब्ध की जाती है तथा प्रत्येक मूल्य को 'सापेक्षित भार' दिया जाता है। जितने भी नीति विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं, उसको चिन्हित किया जाता है, प्रत्येक विकल्प के प्रतिक्रियात्मक प्रभावों को जानना तथा यह मापना कि किस नीति का चयन बचे हुए विकल्पों पर मूल्यों के आधार पर पड़ने वाले प्रभावों को मूल्यांकित कर अंतिम रूप से अपनाया जाना चाहिए।
इस पैराडाईम का प्रमुख ध्येय ज्यादा उन्नत लोक नीतियों का निर्माण किया जाना है। वाई. ड्रॉर के अनुसार यह 'मेटा-पॉलिसी' जिसका तात्पर्य 'लोक नीति की प्रक्रियाओं' के संबंध में नीति निर्मित करना है। इस तरह से यह सरकारी संरचनाओं की अधिकतम उपयोगी संगठनात्मक गठन जो कि सभी सूचनाओं का प्रवाह तथा सही फीडबैक, कि किन सामाजिक चरों को लोक नीति में परिलक्षित करना चाहिए का समर्थन करता है। (Yehezkel Dror, 1968, Public Policy Making Reexamined)
यह विभिन्न बौद्धिक दशाएँ प्रदान करता है, जैसे यह लोक सेवाओं की प्रकृति एवं गुणवत्ता निर्धारित करता है (Otto Eckstein, 1967, Public Finance)। यह औपचारिक निर्णयन संरचनाओं और मानवीय क्षमताओं का संबंध स्थापित करता है (Cordon Tullock, 1967, The Politics of Bureacucrecy) तथा सामूहिक गतिविधियों का आंकलन प्रस्तुत करता (Mansurolson, 1965, The Logic of Collective Action), सामूहिक गतिविधियों का प्रारूप है। तथा संवैधानिक सरकार की अनिवार्यताएँ निर्धारित करता है। (The Calculus of Consent Logical Foundations of Constitutional Democracy), विभिन्न हित समूहों जैसे उत्पादक, उपभोक्ता, नागरिक इत्यादि का विवेकपूर्ण सामंजस्य करता है। (Earrett Hardin, 1968, the Tregedy of Commons, Science, 162, p. 1243-1248) तथा तकनीकी सृजनता का व्यापक प्रभाव (Nicholas Henry, 1974, Public Policy and Information Technology, Science, 182, p. 384-391)
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इस तरह से यह मॉडल 'अधिकतम सामाजिक लाभ' (Maximum Social Gain) का है जिसका तात्पर्य सरकार को ऐसी नीतियों का चयन करना चाहिए जिससे अधिक से अधिक सामाजिक विकास हो सके। सारांशतः इस मॉडल के द्वारा विवेक सम्मत नीति निर्माण के लिए-
(i) वैकल्पिक नीतियों के बारे में सभी सूचनाएँ उपलब्ध होनी चाहिए।
(ii) भविष्यकीय क्षमता जो वैकल्पिक नीतियों के दूरगामी प्रभावों का आंकलन प्रस्तुत करता है। या निर्धारित किया जाना चाहिए।
(iii) मूल्य का लाभ पर अनुपातिक गणना करने की बौद्धिक क्षमता विकसित की जानी चाहिए तथा,
(iv) इस नीति निर्माण में ऐसे निर्णयनों की आवश्यकता होगी जो नीति निर्माण में विवेकशीलता को प्रोत्साहित करे।
हालांकि इस निर्णयन में कई बाधाएँ हैं, इसी कारण सरकार इस आधार पर नीतियाँ बहुत कम निर्धारित करती हैं। इसके प्रमुख बाधक तत्व निम्नलिखित हैं-
(i) संपूर्ण सामाजिक लाभों पर शायद ही समझौता हो सकता है क्योंकि विशेष समूहों के अथवा व्यक्तियों के लाभ ही देखे जाते हैं, जो कि वास्तव में विरोधाभासी हो सकते हैं।
(ii) बहुत सारे विरोधाभासी लाभों और मूल्यों की तुलना नहीं की जा सकती है।
(iii) नीति निर्माता विशुद्ध सामाजिक लाभ के आधार पर नीतियाँ बनाने के लिए प्रेरित नहीं होते बल्कि अपने लाभ को देखते हैं।
(iv) नीति निर्माता कुल सामाजिक लाभ को अधिकतम करने के लिए प्रेरित नहीं होते हैं बल्कि प्रगति की मांगों को ही संतुष्ट करते हैं।
(v) सभी विकल्पों का, उनके प्रभावों का उनके लाभों का आंकलन करना प्रायः संभव नहीं होगा, क्योंकि इसके समय और मूल्य दोनों ही ज्यादा होंगे।
(vi) सभी नीति विकल्पों के भविष्य संकेतों को पूर्णतः जानने की क्षमता विकसित नहीं है।
(vii) तकनीकी रूप से सक्षम व्यवस्थाओं में भी पूर्ण बौद्धिक क्षमता विकसित नहीं है, जो प्रत्येक विकल्प के मूल्य और लाभ का सही आंकलन कर सके।
(viii) विभिन्न नीतियों के प्रभावों को सही रूप से जानने की अनिश्चितता उन्हें पुरानी नीतियों को ही मानने के लिए प्रेरित करती है। व्यवहारिक रूप से कई उदाहरण वर्ष 2012 में लिए गए नीतिगत निर्णयों में देखे जा सकते हैं, जैसे सब्सिडी पर निर्णय, एफ.डी.आई. पर निर्णय इत्यादि ।
ड्रोर द्वारा प्रस्तुत आधिक्यता मॉडल (Optimal Model) में उन्होंने तीन चरणों में नीति निर्माण की प्रक्रिया को वर्गीकृत किया है-
इन सभी चरणों को उन्होंने पुनः 18 उपचरणों में निम्न प्रकार से विभाजित किया है-
1. मैटा नीति निर्माण ( Meta Policy Making)
इस चरण का मुख्य तात्पर्य 'नीति किस प्रकार निर्मित होगी' से है। इसके उन्होंने सात उपचरण बताए हैं-
(i) प्रक्रियागत मूल्य (Processing Values)
(ii) प्रक्रियागत समस्याएँ (Processing Problems)
(iii) प्रक्रियागत वास्तविकता (Processing Reality)
(iv) प्रक्रियागत संसाधन (Processing Resources)
(v) संसाधनों का सर्वेक्षण, प्रक्रिया एवं विकास (Surveying, Processing and Developing Resources)
(vi) नीति निर्माण व्यवस्था का प्रारूपण, मूल्यांकन एवं पुनःप्रारूपण (Designing, Evaluating and Redesigning the Policy Making System)
(vii) नीति व्यूह रचना का निर्धारण (Determining Policy Strategy)
2. नीति निर्माण (Policy Making)
इस चरण में मुद्दों पर आधरित नीति निर्माण पर जोर दिया गया है। इसके भी उन्होंने सात उपचरण बताए हैं, जो निम्न प्रकार से दर्शाए गए हैं-
(i) संसाधनों का उप आवंटन (Sub-allocating Resources)
(ii) प्राथमिकता के क्रम में व्यवहारिक उद्देश्यों की स्थापना (Establishing Operational Goals with Order of Priority for them)
(iii) प्राथमिकता के क्रम में अन्य महत्वपूर्ण मूल्यों के समुच्चय की स्थापना (Establishing Set of Other Significant Value with Some Order of Priority for Them)
(iv) प्रमुख वैकल्पिक नीतियों का समुच्चय तैयार करना (Preparing a Set of Major Alternative Policies, Including Some 'Good' Ones )
(v) प्रमुख लाभ एवं मूल्य के विश्वसनीय संभावनाओं को तैयार करना (Preparing Reliable Predictions of Significant Benefits and Costs)
(vi) सभी संभावित वैकल्पिक नीतियों के लाभ और मूल्यों की तुलना करना एवं सर्वोच्च की पहचान करना (Comparing the Predicted Benefits & Costs of Various Alternatives and Identifying the Best Ones)
(vii) सभी संभावित वैकल्पिक नीतियों के लाभ और मूल्यों का मूल्यांकन कर उसकी उत्कृष्टता का निर्धारण करना (Evaluating the Benefits and Costs of the 'Best' Alternatives and Deciding Whether They are Good or Not)
3. उत्तरोत्तर नीति निर्माण (Post Policy Making)
इसका तात्पर्य फीडबैक के आधार पर नीति में आवश्यक परिवर्तन करना। इसको तीन प्रमुख उपचरणों में दर्शाया गया है-
(1) नीति निरूपण के लिए प्रोत्साहित करना (Motivating the Execution of Policy)
(ii) नीति का निरूपण (Executing Policy)
(iii) नीति निरूपण के बाद नीति निर्माण का मूल्यांकन करना। (Evaluating of the Policy Making after Executing the Policy)
ये सभी 17 उपचरण आपस में जटिल प्रक्रिया द्वारा अंर्तसंबंधित हैं, जिसे कि 18वें उपचरण के रूप में दर्शाया जा सकता है।
18वें उपचरण में सभी चरणों में संप्रेषण एवं फीडबैक द्वारा अंर्तसंबंध स्थापित किया जाता है।
वृद्धिशील पैराडाइम (Incremental Paradigm )
आरंभ में संकेत के रूप में चार्ल्स ई. लिण्डब्लॉम (Charles E Lindbloom, 1959 The Science of Muddling Through) ने भेदित पृथक वृद्धिशीलता (Disjointed Incrementalism) की विवेचना की है। भेदित अथवा पृथक से उनका तात्पर्य है विभिन्न दशाओं का विश्लेषण एव मूल्यांकन तथा ग्रहित दशाओं की वैकल्पिक प्रतिक्रियाएँ असमवित हैं तथा समाज में निरंतर घटित होती रहती हैं। जबकि वृद्धिशीलता का तात्पर्य है कि नीति निर्माताओं को सीमित नीति विकल्पों में से ही चयन करना होता है तथा हर विकल्प एक सूक्ष्म परिवर्तन दर्शित करता है, जो तटस्थ स्थिति में लाया जा सकता है। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि नवीन नीति एक तरह से प्रचलित नीतियों में ही परिवर्तन है।
राबर्ट डाहल एवं चार्ल्स ई. लिण्डब्लोम ( Robert Dahl and Charls E. Lindbloom) ने वृद्धिशीलता के सात कारण बताए हैं-
(i) विकल्पों के प्रभावों को, जो वास्तविकताओं से दूरस्य संबंध रखते हैं उसकी सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल है।
(ii) लोग अपने भविष्य की आवश्यकताओं को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देख सकते तथा वे कई अनचाही आवश्यकताओं को बिना प्रमाणिकता के निकाल देते हैं, परन्तु यह जानना कठिन होगा कि इनकी सही प्राथमिकता क्या होनी चाहिए।
(iii) व्यक्तियों के एक से अधिक उद्देश्य हो सकते हैं, जो परस्पर विरोधाभासी भी हो सकते हैं, परन्तु कुछ समझौतों के द्वारा उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते हैं। यह व्यक्तिगत वृद्धिशीलता है, परन्तु यह तर्क सामाजिक गतिविधि पर भी लागू होगा।
(iv) वृद्धिशीलता व्यक्ति की चयन के निष्कर्ष का प्रमाणीकरण भी प्रस्तुत करता है। यह किसी एक चर को इंगित करने का भी सिद्धांत है। प्राप्त निष्कर्षो की परिवर्तन से पहले के निष्कर्षो से तुलना की जा सकती है तथा चयन की प्राथमिकता को स्थापित किया जा सकता है।
(v) वृद्धिशीलता नियंत्रण करने में सक्षम है। वृद्धिशीलता परिवर्तन वरिष्ठ अधिकारियों को निदानात्मक अवसर प्रदान करती है कि कौन से मुद्दे पर अधीनस्थ कर्मचारियों को ध्यान आकर्षित करना चाहिए।
(vi) वृद्धिशीलता आत्मसंशोधित है, गलतियों को सुधारने की संभावना बनी रहती है।
(vii) वृद्धिशीलता दोनों जीवनदायनी तथा निरंतरता परिवर्तनों को किसी संगठन संचालन में चिन्हित करने की क्षमता रखता है (Robert Dahl & Charles E. Lindbloom; Politics, Economics and Welfare, 1953)।
यह इस भ्रान्ति को स्थापित करता है कि लोकनीति निर्माताओं के पास समय पूंजी एवं बौद्धिक क्षमताओं का अभाव है इसलिए चली आ रही नीतियों में ही मामूली परिवर्तन होना चाहिए। इसके निम्नलिखित तर्काधार हैं-
(i) उद्देश्य अस्पष्ट हैं।
(ii) समस्या उद्देश्य तथा क्रियान्वयन एक-दूसरे से गुथे हुए हैं।
(iii) जैसे-जैसे विकल्प और उद्देश्य निर्मित होते हैं वैसे-वैसे ये निरंतर विकसित होते रहते हैं।
(iv) नीति निर्माता सर्वोत्तम चयन के लिए स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि संभावित नीति की क्रियान्वयन की संभावनाएँ भी अस्पष्ट हो सकती हैं।
निकोलस हेनरी (Nicholas Henry) ने वृद्धिशील पराडाईम को समझने के लिए छः प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया है- (i) कुलीनता, (ii) समूह व्यवस्था, (iii) व्यवस्थात्मक, (iv) संस्थात्मकता, (v) संगठित अराजकता, (vi) नव संस्थात्मक
कुलीन / जनसमूह मॉडल (Elite/ Mass Model)
यह इस विवेचना पर आधारित है कि नीति निर्माण / नीति क्रियान्वयन से संबंधित प्रबुद्ध वर्ग इस तरह कार्य करते हैं जिसमें सूचनाओं को तोड़-मरोड़ कर तथा ऐसा उदासीन वातावरण उत्पन्न करते हैं जो कि निष्क्रिय जन को शासित करने के लिए हो। नीति ऊपर से नीचे की तरह प्रवाहित होती है, यानि प्रबुद्ध वर्ग से आमजन तक समाज भी शक्तिशाली और गैर शक्तिशाली वर्ग में वर्गीकृत है। प्रबुद्ध वर्ग के अपने मूल्य हैं जो कि उन्हें आमजन से भिन्न करते हैं तथा लोक नीति इन प्रबुद्ध वर्ग के मूल्यों को प्रतिबिम्बित करती है, जिसका सरल अर्थ हुआ तटस्थता बनाए रखना। इसके अतिरिक्त इस वर्ग में आम जन के मुकाबले में संपन्न, ज्यादा शिक्षित तथा ऊँचे स्थान पर आसीन होते हैं। प्रबुद्ध वर्ग सिद्धांत की विवेचना राईट मिल ने सफलतापूर्वक की है (Mill, 1956; The Power Elite ) ।
थॉमस आर. डाई (Thomas R. Dye) के अनुसार लोकनीति को प्रबुद्ध वर्ग के सापेक्षित मूल्यों, प्राथमिकताओं के आधार पर भी समझा जा सकता है। हालांकि सामान्यतः यह कहा जा है कि लोकनीति आम आदमी की नीतियों को प्रतिबिंबित करती है। (Thomas R. Dye & Harmon Zeigler. The Irony of Democracy Millennialed, Harcourt Brace, 2000) इस सिद्धांत के अनुसार आमजन लोक नीतियों के बारे में पूर्ण रूपेण सूचित नहीं होते हैं इसलिए उनका दृष्टिकोण भी तटस्थ होता है तथा प्रबुद्ध वर्ग वास्तव में जनमत को नीतिगत प्रश्नों पर ज्यादा प्रभावित करता है वनस्पत आमजन प्रबुद्ध मत को प्रभावित करने के। जैसे गुजरात में 2012 के आम चुनावों 1 में विकास एक मुद्दा रहा है। आम जनता इस मुद्दे को कितना महत्वपूर्ण मानती हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रबुद्ध वर्ग उसे किस प्रकार से प्रस्तुत करता है।
(i) शासित कुलीन ( Governing elites)
(ii) गैर शासित कुलीन (Non-governing elites)
गेटोनो मोस्का (Gaetano Mosca) के अनुसार प्रबुद्ध वर्ग दो प्रकार के हो सकतें हैं-
(i) शासक वर्ग ( Ruling class)
(ii) शासित वर्ग (Ruled class)
रोबर्ट मिशेल्स (Robert Michels) ने कुलीन मॉडल के तीन सिद्धांत दिये हैं-
(i) सशक्त नेतृत्व, विशिष्ट स्टाफ एवं सुविधाओं की आवश्यकता ।
(ii) नेतृत्व के द्वारा अपने संगठन में सुविधाओं का उपयोग।
(iii) नेताओं के मनोवैज्ञानिक गुणों की महत्वता ।
फ्लोयड हंटर (Floyed Hunter) ने अपने कार्य "Regional City" में शक्ति के वास्तविक धारकों के बारे में परीक्षण किया है बजाए उन प्रबुद्ध वर्गों के जिनके पास शासकीय पद हों।
इसी प्रकार सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills) ने अपनी पुस्तक "The Power Elite " (1956) में, जी. विलियम डॉमहॉफ (G. William Domhoff) ने अपनी पुस्तक "Who Rules America?" में, जेम्स बर्नहम (James Burnham) ने अपनी पुस्तक "The Managerial Revolution" में तथा थॉमस आर. डाई (Thomas R. Dye) ने अपनी पुस्तक "Top-Down Policymaking" में कुलीन प्रतिमान की विस्तृत चर्चा की है।
जनसमूह प्रतिमान के अनुसार नीति निर्माण/ नीति क्रियान्वयन से संबंधित कुलीन/ प्रबुद्ध प्रकार कार्य करता है कि वे सूचनाओं, तथ्यों एवं आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर ऐसा उदासीन वातावरण बनाते हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि कुलीन वर्ग अथवा प्रबुद्ध वर्ग अथवा अभिजात्य वर्ग बहुलवाद (आमजन ) पर शासन कर रहे हों।
सारांश में कहा जा सकता है कि-
(i) यह सिद्धांत समकालीन समाज में विभिन्न वर्गों के मध्य संबंधों को स्पष्ट करता है।
(ii) यह काल्पनिक आदर्श का खंडन करता है व प्रजातंत्र में विभिन्न वर्गों का समान प्रतिनिधित्व करता है अतः
नीति ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होती है अर्थात् प्रबुद्ध वर्ग से आमजन की ओर। समाज में सदैव दो वर्ग विद्यमान होते हैं- शक्तिशाली तथा गैर शक्तिशाली । कुलीन वर्ग के अपने मूल्य, पहचान होती है जो उन्हें आमजन से अलग करती हैं।
थॉमस आर. डाई (Thomas R. Dye) द्वारा प्रस्तुत चित्र के माध्यम से कुलीन प्रतिमान को समझा जा सकता है-
समूह मॉडल (Group Model)
बदलते हुए समय में दबाव समूह की भूमिका लोक नीति में ज्यादा सक्रियता के आधार पर देखी जा सकती है। इसको हाइड्रोलिक थीसिस (Hydraulic Thesis) के आधार पर देखा जा सकता है जो राजव्यवस्था को क्रियात्मक एवं प्रक्रियात्मक दबावों की व्यवस्था के रूप में देखती हैं, जो लोक नीति का निर्माण करते हैं।
आर्थर एफ. बेन्टले के इस मॉडल की विस्तार से विवेचना प्रस्तुत की है (Arthur F. Bentley, 1949, The Process of Governance ) |
सामान्यतः समूह मॉडल को विधायी स्तर पर जोड़ा जाता है, परन्तु अधिकारी तंत्र में भी यह देखा गया है कि दबाव समूहों के जनित दबावों में कार्य करते हैं। इस तरह से लोक सेवकों के लिए यह अन्तर करना कठिन हो जाता है कि कोई विशिष्ट नीति लोक हित के लिए कार्य कर रही है अथवा कुछ शक्तिशाली समूहों के हित के लिए क्योंकि नियामक यह मान लेते हैं कि जो समूहों के लिये उपयुक्त है वह राष्ट्रहित में है।
इस तरह से समूह सिद्धांत निम्न मान्यताओं को लोक नीति के लिए आवश्यक मानता है।
(i) लोक नीति के लिए उत्पन्न मांगें एवं सहायक तत्त्व संगठित समूहों के द्वारा प्रदर्शित होते है।
(ii) कोई एक 'समूह' शक्ति को एकाधिकृत नहीं कर सकता।
(iii) प्रभावी समूह का निर्धारण उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता तथा गुणों पर आधारित होगा।
(iv) लोक नीति में 'समझौतात्मक प्रवृत्ति प्रतिलक्षित होती है।
(v) राजनीतिक अभिकर्ता एक निष्पक्ष रेफरी की तरह कार्य करते हैं, जो यह निर्णय लेते हैं कि कौनसा समूह सक्षम है।
यह सिद्धांत समूहों को स्थापित करता है, परन्तु लोक सेवकों की भूमिका को नगण्य करता है। (Jay M. shafritz & E. W. Russel, Introducing Public Administration) |
राजनीति एक तरह से विभिन्न समूहों में लोक नीति को प्रभावित करने की लड़ाई है। राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य 'समूह तनावों' का निम्न प्रकार से प्रबंध करता है।
(i) समूह संघर्षो के नियम निर्धारित करना ।
(ii) हितों में संतुलन साधाना तथा समझौते कराना ।
(iii) इन समझौतों को लोक नीति में परिणित करना।
(iv) इन समझौतों को लागू करवाना।
इस सिद्धांत के समर्थकों का मानना है कि लोक नीति किसी भी निश्चित अवधि में 'समूह संघर्षों' में संतुलन स्थापित करता है जिसको चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है।
यह संतुलन विभिन्न दबाव समूहों के सापेक्षित प्रभावों के द्वारा निश्चित होगा। अगर सापेक्षित प्रभाव किसी भी समूह के समर्थन में बदलता है तो वह लोक नीति में अपेक्षित परिवर्तन लाएगा। नीति उसी दिशा में जाएगी जिस समूह का प्रभाव ज्यादा होगा।
अर्ल लॉथम (Earl Letham) ने राजनीतिक दृष्टि से स्थापित किया कि 'समूह संघर्षों' में विधायक रेफरी की तरह कार्य करेगा। किस समूह का वर्चस्व रहेगा और समझौते के द्वारा कानूनों में कैसे लागू किया जा सकेगा, ये लोक नीति वास्तव में समूहों में संतुलन स्थापित करती हैं (Earl Letham, 1956, p. 236) 1
समूह में प्रभाव निर्धारित करने के कई कारण तत्त्व होते हैं, जैसे कि उनकी संख्या, संपन्नता, संगठनात्मक कौशल, नेतृत्व की क्षमता, निर्णायकों तक पहुँच तथा आंतरिक सामंजस्य । लोक नीति को एक समनवयक की तरह देखा जाता है जो विभिन्न समूहों में प्रभावशाली मांगों और कम प्रभावशाली मांगों के मध्य समझौते कराता है। किसी भी राजनीतिज्ञ का जितना बड़ा निर्वाचन क्षेत्र होगा, उतना ही ज्यादा विभाजित हितों की संभावना बनी रहेगी ।
इस पूरे दर्शन में राजनीतिक व्यवस्था स्वयं विभिन्न कारकों के द्वारा संतुलित होती रहती है। जैसे इस व्यवस्था में अदृश्य समूह होते हैं, जो इन नियमों को प्रभावित करते हैं। समूह सदस्यों का एक से ज्यादा समूहों में सदस्य होना भी अपना हित साधते हुए संतुलन स्थापित करते हैं। समूह स्पर्धा में स्वतः ही संतुलन की व्यवस्थाएँ निर्धारित हो जाती हैं।
व्यवस्था मॉडल (System Model)
कई व्यवस्था सिद्धांत के समर्थक जैसे डेविड ईस्टन इत्यादि लोक नीति निर्माण की प्रक्रिया को व्यवस्था के आधार पर स्पष्ट करते हैं। यह वस्तुतः इन प्रश्नों की तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं कि,
1. लोक नीति निर्माण व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण चर एवं प्रारूप क्या हैं?
2. वास्तविक नीति निर्माण की प्रक्रिया में 'ब्लैक बाक्स' में क्या आता है?
3. 'आगत' (Inputs). 'विदिनपुट्स' (With Inputs ), निर्गत (Outputs) एवं 'फीडबैक' लोक नीति की व्यवस्था में क्या है ? इसको इस चित्र के माध्यम से दर्शाया जा सकता है-
पर्यावरण राजनीतिक व्यवस्था में सामाजिक आर्थिक चर Environment: Social & Economic Variables in the Polity
लोक चयन मॉडल (The Public Choice Model)
विवेक सम्मत मॉडल से भिन्न कुछ चिन्तकों द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में 1963 में किया गया प्रयास तेजी से एक नवधारणा के रूप में लोक नीति समझने का नया आधार है। (Nicholas Henry, 2004, PA & PA)। इस मॉडल में राजनैतिक अर्थव्यवस्था की अवधारणाओं का उपयोग किया गया है। यह इस तर्क की पुष्टि करता है कि 'लाभांश' आमजन के ऊपर नहीं थोपा जा सकता है, यानी कि आम व्यक्ति किसी भी निजी कंपनी का लाभ अपने ऊपर वहन नहीं करेगा। जैसा निकोलस हेनरी ने कार के उदाहरण द्वारा प्रदूषित होने वाले प्रभावों से बचने के लिए कर भार उत्पादक तो वहन करेगा ही, परंतु वे उपभोक्ता जो कि यह कार खरीदे, वे भी कर भार वहन करेंगे।
यह अवधारणा निम्न बिंदुओं पर आधारित है:
(i) आधिक्यता (Optimality) - यह पेरिटो आधिक्यता (Pareto Optimality) पर आधारित - है, जो अर्थशास्त्री विल्फ्रेड पेरिटो के द्वारा विकसित किया गया था। पेरिटो सुधार (Pareto Imporverment) का तात्पर्य यह है कि आर्थिक संगठनों में इस प्रकार से परिवर्तन करना कि यह समाज में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बिना किसी को दयनीय स्थिति में डाले संतुष्ट कर सके और खुशहाल कर सके। यह चित्र के द्वारा समझाया जा सकता है।
इस चित्र में X एक परिकाल्पनिक सामाजिक मूल्य है जो कि अन्य सामाजिक मूल्यों का उपलब्धिता का सापेक्षित बिन्दु है । उदासीन वक्र (Indifference Curve) उन मूल्यों को संयुक्त करता है जिसके बारे में समाज उदासीन है। एक सीमा तक मूल्य निष्पत्ति वक्र (Value Achievement Curve) उस स्थिति को दर्शाता है, जब सरकार सीमित संसाधनों द्वारा अधिकतम निष्पत्ति मूल्यों को देने में सक्षम हो। दोनों वक्र एक बिन्दु पर आकर मिलते हैं जिसे पेरिटो आधिक्यता (Pareto Optimality) कहा जाता है। कोई समाज नीतियों के माध्यम से जितना इस बिन्दु के निकट आता जाता है उसे पेरिटो सुधार (Pareto Improvement) की स्थिति कहा जाएगा।
(ii) आदान-प्रदान (Trade off) - उपरोक्त चित्र एक अन्य स्थिति जिसे Trade Off कहा - गया भी दर्शाता है। इससे तात्पर्य हुआ कि कौन-सा मूल्य (सामाजिक मूल्य तथा लाभ ) किस अन्य मूल्य से बदला गया है (exchange)। दूसरे शब्दों में जितनी बार X मूल्य की निष्पत्ति होती है तो उतनी बार अन्य मूल्य कम होते जाएँगे ।
(iii) बहिर्भाव (Externalities) - इसका तात्पर्य हुआ कि लोक नीति की कोई एक सामाजिक गतिविधि की उपलब्धता अन्य सामाजिक गतिविधियों के निष्पादन पर प्रभाव डालती है, जिसको बहिर्भाव (externality) कहा गया है। यानि सरल भाषा में एक सामाजिक क्षेत्र की उपलब्धि अन्य सामाजिक क्षेत्रों के निष्पादन पर छिटकन प्रभाव डालती है। यह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है, ऐच्छिक या अनऐच्छिक हो सकता है। उदाहरणस्वरूप FDI पर लिया गया निर्णय इस आधार पर समझा जा सकता है कि उसके क्रियान्वयन से क्या संसाधन सामाजिक क्षेत्र में वृद्धि करेंगे या हास होगा।
वंचित / उपभोग प्रतिमान (The Exclusion / Consumption Model)
निकोलस हैनरी (Nicholas Henry) द्वारा इस मॉडल के तहत् व्याख्या की गई कि सरकार को किस प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध करानी चाहिए तथा निजी क्षेत्र के लिए कौन-से क्षेत्र छोड़े जाने चाहिए।
वंचन एवं उपभोग (Excluding & Consuming)
वंचन (Exclusion) का तात्पर्य है किसी उत्पाद पर विक्रेता और खरीददार दोनों ही किस प्रकार से नियंत्रण लगा सकते हैं। अगर कोई ऐसा उत्पाद खरीदा जा रहा हो जो उदाहरण स्वरूप खाद्य का हो तो बेचने वाला तथा खरीददार दोनो ही किसी एक मूल्य पर समझौता कर सकते हैं। इसमें बेचने वाले को कभी-कभी मूल्य कम करना पड़ सकता है और इस प्रकार से वंचना नियंत्रण (exclusinary control) कर सकता है। परंतु अन्य उत्पादों पर यह नियंत्रण इतना आसान नहीं है।
दूसरा आधार जो लोक चयन-चिंतकों ने बताया है, वह उपभोग का है कई उत्पाद ऐसे हैं जिनका उपभोग बिना उसकी गुणवत्ता को गिराए हुए सामूहिक रूप से किया जा सकता है। जबकि कई ऐसे उत्पाद हैं जो कि व्यक्ति विशेष ही उपभोग कर सकता है, सामूहिक रूप से उपभोग संभव नहीं होगा।
सामूहिक उपभोग में टी.वी. प्रसारण का उदाहरण दिया जा सकता है तथा खाद्य उपभोग व्यक्ति विशेष पर निर्भर करेगा।
इस तरह कोई सेवा या उत्पाद सार्वजनिक अथवा किसी उपभोग के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इस प्रतिमान के द्वारा यह समझा जा सकता है कि राजनीतिक दल तथा उनके उम्मीदवार चुनाव अभियान में क्यों स्पष्ट नीति विकल्पों को देने में असफल होते हैं। दल एवं उसके उम्मीदवार सिद्धांतों को प्रचलित नहीं करते वरन् चुनाव जिताने वाले मुद्दे रखते हैं। वह जीतने के लिए नीति बनाते हैं न कि वे चुनाव जीतकर नीति बनाते हैं। इस तरह से चुनाव उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा मतदाता को किस प्रकार रिझा सकते हैं पर नीतिगत स्थिति निर्धारित करते हैं। यह एक व्यापक प्रतिमान है जो कि हित समूह तथा उसके प्रभावों को स्पष्ट करता है।
प्रक्रियात्मक मॉडल (Process Model )
लोक नीति चक्र (Policy Cycle)
यह नीति चक्र, नीति के विभिन्न तत्त्वों की अंतक्रियाओं को प्रस्तुत करता है। इस व्यवस्था को नीति अध्ययन संगठन (Policy Studies Organization) के द्वारा दर्शाया जा सकता है।
नीति में कार्य कारण चक्र को विभिन्न चिन्तकों ने समय-समय पर परिलक्षित किया है। राबर्ट एल. लिनबॅरी (Robert L. Linebery, 1977) ने नीति प्रक्रिया के दो पक्ष बताए हैं।
डेविड ईस्टन (David Easton, 1957), को श्रेय जाता है राजनीतिक गत्यात्मकता को निरंतर प्रक्रिया तथा अंतक्रियाओं की व्यवस्था के रूप में स्थापित करने का उनके अनुसार राजनीतिक व्यवस्था, गतिविधियों, भूमिकाओं, संस्थाओं के अंतरसंबंधों को स्थापित करती है, जो कि एक निश्चित परिस्थितिनुसार गतिशील होती है तथा राजनीतिक व्यवस्था को 'इनपुट' (Input) प्रदान करती है, जो उसे 'आउटपुट' (Output) में परिवर्तित करती है।
लोक नीति की चक्रीय व्यवस्था को जोन्स (Jones, 1984) ने निम्नलिखित चरणों में विभाजित कर समझाया है-
1. एजेण्डा निर्धारण (Agenda Setting)
2. नीति निर्माण (Policy Making), जिसे पुनः दो उपचरणों में विभाजित कर समझाया है -
(अ) वैकल्पिक नीति प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण जो कि विवेक सम्मत तथा तकनीकी विश्लेषण पर आधारित हो,
(ब) नीति विकल्पों में से चुनना 'नो एक्शन' के विकल्प के साथ, जो सामान्यतः बहुमत विकसित करने के लिए सहायक होता है। इस दृष्टि से विकसित विकल्प राजनीतिज्ञों के लिए बाध्य होते हैं, जो कि स्वयं नीति विशेषज्ञ नहीं होते परन्तु आमजन के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
3. क्रियान्वयन (Execution)
अधिकृत नीति सरकारी अभिकरणों के द्वारा शासित होती हैं। अभिकरणों तथा अभिकर्ताओं को नीति में उल्लेखित एवं दर्शित निर्देशों का अनुपालन आवश्यक होगा तथा इसके अतिरिक्त अभिलक्षित उद्देश्यों, समयावधि, कार्यक्रम प्रारूप तथा रिर्पोट विधियों को भी समझना आवश्यक होगा।
4. बजट (Budget)
नीतिगत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बजट द्वारा वित्तीय साधनों का आवंटन जो वार्षिक आंकलन पर आधारित है, किया जाता है। यह क्रियान्वयन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। नीति चक्र में इसे एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में शामिल किया गया है क्योंकि यह नीति निष्पादन के लिए आवश्यक है।
5. मूल्यांकन (Evaluation)
नीति के प्रभावों को जाना व समझा जा सकता है, अगर उद्देश्य स्पष्ट हैं तो नीति के लिए आवश्यक तत्त्वों और नीति की प्रभावशीलता का आंकलन संभव है। मूल्यांकन यह सुनिश्चित कर सकता है कि नीति में क्या आवश्यक है, परिवर्तन, कुछ रूप भेदन, भूल-चूक परिवर्तन अथवा निरस्तीकरण ? यह आंकलन फीडबैक के माध्यम से पुनः एजेण्डा निर्धारण करने के लिए आवश्यक रूप से कार्य करते हैं। इस तरह से जोन्स के अनुसार चक्रीय व्यवस्था नीति के चरणों को समग्र रूप से प्रस्तुत करती है।
थियोडॉलन एवं कॉफिनिस (Theodoulon and Kofinis, 2004) ने नीति चक्र को एक निश्चित विधि के रूप में प्रस्तुत किया है जो कि सम्पूर्ण नीति को छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित कर परीक्षण के आंकलन के आधार पर संचालित करती है। लोक नीति चक्र में बहुत से पक्ष, भूमिकर्त्ता तथा मुद्दे होते हैं इसलिए किसी एक आयाम को महत्त्वपूर्ण बताना मुश्किल है।
पीटर ब्रिजमेन (Peter Bridgeman) एवं ग्लीन डेविस (Glyn Devis) ने नीति चक्र के आठ चरण बताये हैं-
(i) मुद्दे चिन्हित करना, (ii) नीति विश्लेषण, (iii) नीति उपकरणों का विकास, (iv) नीति विचार-विमर्श, (v) समन्वयन, (vi) निर्णयन, (vii) क्रियान्वयन, (viii) मूल्यांकन
1. एजेण्डा निर्धारण (Agenda Setting)
एजेण्डा निर्धारण उन सभी मुद्दों को आधार बनाता है, जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक रूप में आमजन को प्रभावित करते हैं। इस निर्धारण में सामान्य संप्रेक्षण के माध्यम जिसमें पत्र, पत्रिकाएँ, ; विशिष्ट विषय आधारित संबोधन, जन चेतन प्रतिक्रियाएँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करते हैं। परन्तु ये मुद्दे सामान्यतः दो स्रोतों से प्रवाहित होते हैं- (i) कार्यपालक, (ii) विधायक। आमजन जो । विधायक के क्षेत्र से है तो वह अपेक्षा करता है कि चुनावों के दौरान किए गए वायदे लोक नीति में परिणित होकर विधेयकों के माध्यम से उन तक पहुँचेंगे। इसी तरह प्रशासनिक अभिकरण की अपेक्षाओं को नकारा नहीं जा सकता। उदाहरण स्वरूप 1955 रोजा पारक्स (अफ्रीकी-अमरीकी) महिला को गिरफ्तार किया गया जो 'सिविल राईट' आंदोलन का आधार बना। डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के द्वारा दक्षिणीय अलगाव नीतियों के खिलाफ अहिंसान्मुख, लोक सहमति से महत्त्वपूर्ण 'सिविल राईट विधेयक' लाने में सक्षम रहें।
जन उपेक्षा ने वर्तमान कई सरकारों के सामने ज्वलंत मुद्दों द्वारा सत्ता परिवर्तन के लिए बाध्य किया। ईजिप्ट, मिस्त्र सीरिया आदि ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
एजेण्डा सामान्यतः 'नीति एन्टरप्रेन्योर' के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं, जो कोई भी हो सकता है, जिसके पास आम मुद्दों को प्रभावित करने की क्षमता हो, इस तरह से इसमें महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली व्यक्ति, समूह, लोक सेवक, हित समूह इत्यादि सम्मिलित हो सकते हैं।
एंथॉनी डाउन्स के द्वारा प्रस्तावित मुद्दे आकर्षित चक्र (Issue Attention Cycle Model)' वर्तमान में भी उपयुक्त है। एजेण्डा निर्धारण में यह जानना आवश्यक होगा कि किस प्रकार से मुद्दे आकर्षित किए जा सकते हैं, जिसको उन्होंने पाँच चरणों में समझाया है-
(i) पूर्वोत्तर - समस्या चरण (Pre-problem Stage) - जिसमें अनचाही सामाजिक दशाएँ रहती हैं परन्तु मुद्दों में परिवर्तित नहीं होता ।
(ii) सतर्क खोज एवं अतिरेक उत्साह (Alarmed Discorvery and Euphonic Enthusiasm) - कोई संवेदनशील घटनाचक्र जो लोक मुद्दों को आकर्षित कर सकता हो जिसका उद्देश्य उत्साहपूर्वक समस्या के निराकरण का हो।
(iii) परिवर्तन के मूल्य को पहचानना (Recognition of Cost of Change) आम जनता धीरे-धीरे महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की क्रियान्वयन संबंधी मुश्किलों को स्वयं ग्रहण करती है।
(iv) जनहित का पतन (Decline of Public Interests) समय के साथ जन-मानस में परिवर्तन की गंभीरता कम होती जाती है।
(v) उत्तरोत्तर समस्या चरण (Post Problem Stage) ऐसे मुद्दे जो महत्त्वपूर्ण ज्वलंतता समापन पर बिना समस्या निराकरण के राष्ट्रीय एजेण्डा से निकाल दिया जाता है (Anthony Downs, 1957; 1967 - Inside Bureaucracy) |
भारत के संदर्भ में 'अन्ना आंदोलन' के रूप में इन सभी चरणों को समझा जा सकता है कि किस प्रकार से 'जन लोकपाल अधिनियम' की मांग प्रभावित हुई।
जॉन किंगडन (John Kingdon) के अनुसार यह हास वित्तीय एवं सामाजिक मूल्यों, जो इन गतिविधियों में होते हैं, के कारण भी जन सहयोग में कमी आने लगती है तथा उत्पन्न उत्साह क होने लगता है।
2. निर्णयन (Judgement )
लोक नीति समग्र रूप से सरकार के द्वारा विभिन्न प्रक्रियाओं का समाहित स्वरूप है जो कि सरकार करना चाहती है अथवा नहीं करना चाहतीं। 19वीं सदी के लार्ड सेलिसबरी (Lord Salisbury) ने मत व्यक्त किया कि वास्तव में नीति में स्थिरता जैसा कुछ नहीं होता, क्योंकि नीति में भी सभी जैविक की तरह निर्माण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यह निरंतरता उसको एक जीवंतता प्रदान करती है।
दो विरोधाभासी परन्तु विशिष्ट मत हैं जो नीति निर्णयन एवं अनिर्णयन की प्रवृत्तियों को समझाते हैं। पहला, निर्णयन अभिगम जो हेराल्ड डी. लासवेल (Harold D. Lasswell) ने 'The Future of Political Science' नामक पुस्तक में दिया, को निम्न सात चरणों के रूप में अभिलेखित किया-
(i) बौद्धिक चरण (Intelligence Phase) जिसमें सूचनाओं का ताना-बाना होता है।
(ii) सिफारिशी चरण (Recommending Phase) जिसमें गतिविधियों को इस प्रकार से प्रारूपित किया जाता है कि निष्कर्षों को प्रभावित किया जा सके।
(iii) विहित चरण (Prescribing Phase) मानदण्डों को प्रवाहित करना ।
(iv) समन्वय चरण (Invoking Phase) जो प्रस्तावित एवं विशिष्ट परिस्थितियों के मध्य कड़ी स्थापित करता है।
(v) निरूपण चरण (Application Phase) जिसमें प्रस्तावित को निरूपित किया जाता है।
(vi) मूल्यांकन चरण ( Appraisal Phase) जिसमें कार्य प्रभाव संबंध देखा जाता है।
(vii) निस्तारण चरण ( Terminating Phase) निर्णय लागू करते वक्त अपेक्षाओं का निस्तारण करना।
हालाँकि इस तरह से चरणों को सूचीबद्ध करने से एक कमी हमेशा देखी जा सकती है कि इसे पूरा करना संभव नहीं है। चाहे कितने ही तर्कपूर्वक इनका समावेश किया गया हो क्योंकि सभी तथ्यों को एकत्रित कर हर पक्ष को ध्यान में रखना मानवीय रूप में संभव नहीं है। इसलिए हबर्ट साइमन जब यह कहते हैं कि निर्णयकर्त्ता कुछ तथ्यों का त्याग (Sacrifice) करता है अगर वह संतुष्ट तथा पर्याप्त तथ्यों पर आधारित निर्णय करता है।
चार्ल्स ई. लिण्डब्लोम (Charles E. Lindblom) भी पूर्ण विवेक अभिगम का खण्डन करते प्रतीत होते हैं जब वे नीति-निर्णयन प्रक्रिया में वृद्धिशील अभिगम (Incremental Approach ) के आधार को स्थापित करते हैं। उन्होंने इस आधार को नकारा कि ज्यादातर निर्णय विवेक पर पूर्ण सूचनाओं एवं तथ्य पर लिखे जाते हैं। इन्होंने यह माना कि निर्णयन की प्रक्रिया परिस्थितिजनित घटनाओं से ज्यादा प्रभावित होती है न कि निर्णय लेने वाले पदासीन व्यक्ति की इच्छा से पूर्ण विवेकसम्मत एवं वृद्धिशील (Incremental) दोनों छोर हैं जो निर्णयन की प्रक्रिया की अवधारणीय व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।
सारांश में नीति निर्माताओं को दो तरह की बौद्धिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होगा, एक निर्माता की अपनी मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता, जटिल समस्याओं को आंकलित करने की कितनी है तथा दूसरा, सूचनाएँ क्या हैं तथा मुद्दों पर उनका अनुभव क्या है। ये दोनों प्रकार की क्षमताएँ पुनः उनके विचार जो उन्हें निर्णय लेने में मदद करती है। इसलिए राजनीतिक निर्णयन में कई बार उनके समय के परे जाकर समुचित जन के हित की दृष्टि से निर्णय लेना आवश्यक समझते हैं।
सरकार में कई बार नीतिगत निर्णय न्याय अथवा समानता स्थापित करने की दृष्टि से नहीं लिए जाते बल्कि ये निर्णयन उन्हें सत्तासीन करने में कितने सहायक हैं कि दृष्टि से लिए जाते हैं। इस तरह से राजनीतिक निर्णयन के क्रियान्वयन हेतु प्रशासकों को बाध्य करते हैं कि उनके सत्तारूढ़ रहने में मददगार हो सके।
3. क्रियान्वयन (Implementation)
यह लोक नीति वास्तविक संचालन को प्रदर्शित करती है। यह वह समुचित प्रक्रिया है, जो 'विधिक आज्ञापत्र', जो कार्यपालक आदेश को कार्यक्रम निर्देशन द्वारा संरचनाओं और व्यवस्थाओं के माध्यम से लागू करती है। क्रियान्वयन लोक प्रशासन की अंतर्निहित क्रिया है जो राजनीतिक प्रक्रिया को परिलक्षित करती है। एक नीतिगत निर्णय को विस्तृत बारीकियों की दृष्टि से छोटे-छोटे निणयों में विभाजित किया जाता है। यह वास्तव में निर्णय का विस्तृत, व्यवहारिक स्वरूप है।
क्रियान्वयन में निरूपण की दृष्टि से परिवर्तन भी इस क्रिया का महत्त्वपूर्ण पद है। ये ऐसे परिवर्तन हैं जो प्रशासनिक रूप से आवश्यक एवं जानबूझ कर किए जाते हैं। क्लॉजविट्ज (Clausewitz) के अनुसार बड़े पैमाने पर नीति कितनी ही योजनाबद्ध क्यों न हो परन्तु वास्तविकताएँ उसे कार्यशील बनाती हैं, जो एक आदर्श से कम है।
जेफरी प्रेसमेन (Jeffery Pressman) एवं ऑरून्ट विल्डावस्की (Aaroon Wildavsky) ने इस मत को सुदृढ़ किया है कि नीति आयोजन एवं विश्लेषण में क्रियान्वयन की मुश्किलों का ध्यान नहीं रखा जाता है (Jeffery Pressman & Aaroon Wildavsky's, 1973)। क्रियान्वयन को परिभाषित करते हुए स्पष्ट किया कि 'यह उद्देश्य निर्धारण एवं उसको प्राप्त करने के लिए आवश्यक गतिविधियों की अंतर्क्रियाओं का समावेश है' तथा उन कारक कड़ी को स्थापित करना जो इच्छित निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए आवश्यक है ( Pressman & Wildavsky's, 1973, Implementation) | क्रियान्वयन की प्रक्रिया में प्रशासक, हित समूह तथा अन्य भूमिकर्त्ता जिनके अलग-अलग विचार मूल्य हों, एक संगठित समावेशित समूह बनाकर अपनी व्यूह रचनाएँ रचते हैं तथा क्रियान्वयन को प्रभावित करते हैं।
नीति विश्लेषक चार्ल्स ओ. जोन्स ने मत दिया कि क्रियान्वयन में वे सभी गतिविधियाँ आती हैं जो कार्यक्रमों को अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाने में मददगार हैं। इसका तात्पर्य हुआ कि कार्यक्रम कथनों का व्यावहारिक निरूपण में परिवर्तित करना जो इच्छित प्रभाव रूप में हो। इस मतानुसार, रूटीन कार्य तथा इसके निष्पादन हेतु संगठनात्मक संरचनाओं के विभिन्न आयाम ही क्रियान्वयन के द्वारा सेवाओं को निष्कर्ष स्वरूप प्रदान करता है। इस प्रक्रिया में लगने वाले समय और शक्ति को बचाने के लिए मानक व्यवहारिक प्रक्रियाओं को विकसित करना चाहिए। ये मानक प्रक्रियाएँ तथा औपचारिक निर्णयन नियम प्रशासकों के लिए सही निरूपण आसान बना देते हैं।
4. मूल्यांकन (Evaluation)
ई मूल्यांकन एक निर्धारण की प्रक्रिया है, जो व्यवस्थित तरीके से उन गतिविधियों का परीक्षण करता है, जो सरकार ने लोक नीति के क्रियान्वयन के लिए उपयोग की है। यह लघुकालिक और १ दीर्घकालिक प्रभावों को जानने की प्रक्रिया है। इस दृष्टि से समुचित प्रभावों की व्याख्या करता है। जिससे उन प्रभावों का आंकलन हो सके जो सकारात्मक हैं या नकारात्मक हैं। मूल्यांकन के लिए १ कार्यकुशलता और प्रभावशीलता प्रमाण मानक है, जो किसी नीति की उपयोगिता को दर्शाते हैं। यह जानना युक्तिसंगत होगा कि कुशलता ही काफी नहीं है, क्योंकि अगर गत उद्देश्यों की तरफ कुशलतापूर्वक गतिविधि हो तो वह लोक नीति जन कल्याण नहीं कर सकेगी, जो कि किसी भी लोक नीति का केन्द्र बिन्दु है। इसलिए मूल्यांकन में प्रभावशीलता तथा उसकी सामयिकता दोनों ही प्रतिस्थापित होनी चाहिए।
सरकार की सभी तीनों शाखाएँ अपने-अपने स्तर पर मूल्यांकन करती हैं, परन्तु प्रेस का भी अपना योगदान है, जो किसी भी लोक नीति पर ध्यान आकर्षित कर सकती है, चाहे वह निर्माण / के स्तर पर हो या क्रियान्वयन के स्तर पर हो।
फीडबैक (Feedback)
लोक नीति चक्र, मूल्यांकन के द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सूचनाओं को एजेण्डा का पुनः आधार बनने पर पूर्ण हो जाता है। इसको फीडबैक कहते हैं क्योंकि यह पूर्वोत्तर निर्माण में नवीन सूचनाएँ उपलब्ध कराता है जिससे कि नीति को पुनः नवदृष्टिकोण द्वारा निष्पादन संभव हो ।
पीटर ब्रिजमेन, डेविस ग्लीन तथा ऑलथस केथरीन में नीति चक्र के आठ चरण को बताया हैं-
1. मुद्दे चिन्हित करना (Issue Identification),
2. नीति विश्लेषण (Policy Analysis)
3. नीति उपकरणों का विकास (Development of Policy Instruments),
4. नीति विचार विमर्श (Policy Exchange).
5. समन्वय (Coordination),
6. निर्णयन (Decision Making).
7. क्रियान्वयन (Implementation),
8. मूल्यांकन (Evaluation)।
क्रीड़ा सिद्धांत (Game Theory)
यह प्रतिमान व्यूह चक्रीय निर्णयन के लिए मूल रूप से निर्मित हुआ तथा औपचारिक रूप से यह गणितीय सूत्रों के माध्यम से विभिन्न विवेकशील निर्णायकों के मध्य विवाद और समन्वयन की प्रक्रिया को समझाता है। यह सिद्धांत अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान, जीव शास्त्र इत्यादि में व्यवहारिक रूप से लागू किया जाता है।
प्रारंभ में शून्य - प्रस्तावित खेल के माध्यम से समझाया गया, जब समूह में एक व्यक्ति का लाभ दूसरे व्यक्ति की हानि के रूप में समझा गया जो कि उसके कुल निर्णयन की प्रभावशीलता को समाप्त कर देता है। बदलते समय के साथ इसमें भी परिवर्तन आया है।
इस सिद्धांत के अनुसार ऐसी स्थिति में जब दो या अधिक सहभागियों का चयन करना हो तो उसका परिणाम प्रत्येक अभिकर्ता के द्वारा किए गए चयन के निर्णयन पर निर्भर करेगा। नीति निर्माण में अगर कोई सर्वोच्च चयन नहीं कर पाता हो तो उसका 'सर्वोच्च' परिणाम इस पर निर्भर करेगा कि अन्य क्या करते हैं। यह एक गणितीय सूत्र से समझा जा सकता है, प्रत्येक खेल-
1. अभिकर्ताओं का समुच्चय है (Set of Players). है
2. गतिविधियों का समुच्चय है (Set of Moves), तथा
3. प्रत्येक व्यूह चक्र/व्यूह रचना के अनुसार विभिन्न समन्वय के अनुसार लाभ है।
इस तरह से इस प्रतिमान में निर्णयन में सभी अभिकर्ताओं की अंतरनिर्भरता स्पष्ट होती है। यह एक प्रकार से अमूर्त प्रतिमान है जो यह नहीं समझता कि व्यक्ति वास्तव में निर्णय कैसे लेता है। बल्कि यह समझता है कि प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियों में विवेक सम्मत निर्णयन केसे लिया जाना चाहिए। इसको एक मैट्रिक्स के द्वारा समझाया जा सकता है।
इस तरह से किसी भी निर्णय के सहयोग असहयोग के अनुपात को निकाला जा सकता है और उसके कुल परिणामों को खेल प्रतिमान की दृष्टि से समझाया जा सकता है। दो अभिकर्ताओं में कौन अधिक शक्तिशाली है वही सहयोग असहयोग के समीकरण को प्रभावित करेगा।
खेल के निम्न प्रकार हो सकते हैं-
(i) सहभागी अथवा असहभागी (Cooperative or Non-cooperative)
(ii) सममित एवं असममित (Symmetric and Asymmetric)
(iii) शून्यता एवं अशून्यता (Zero-sum and Non-zero-Sum)
(iv) युगपत एवं अनुक्रमिक (Simultaneous and Sequential)
(v) सही सूचना एवं अपूर्ण सूचना (Perfect Information and Imperfect Information)
(vi) मिश्रित खेल (Combinatorial Game)
(vii) असीम सामयिक खेल (Infinitely Long Game)
(viii) असतत एवं सतत खेल (Discrete and Continuous Games)
(ix) अंतर खेल (Differential Games)
(x) बहु खिलाड़ी एवं जनसंख्या खेल (Many Player & Population Games)
(xi) स्टोचैस्टिक परिणाम (Stochastic Outcomes )
(xii) मेटा खेल (Meta Games )
फेडनबर्ग एवं ट्राईरोल (1991, p. 67) के अनुसार इसे एक वृक्ष के माध्यम से समझाया जा सकता है, जिसमें बहुत अभिकर्ता हों। चित्र में दो अभिकर्ताओं में गतिविधियों के रूप में समझाया गया है।
अधिकारी वर्ग द्वारा नकारात्मक परिणामों की व्याख्या (Description of Negative Results By officer Class)
सरकारी तंत्र के अधिकारी तंत्र सामान्यतः यह जानते हुए कि कार्यक्रम या नीति सफल नहीं है तो भी उसे तर्कों द्वारा यह स्थापित करते हैं कि यह असफल नहीं है-
* कार्यक्रमों और नीतियों के परिणाम दूरगामी हैं इसलिये वर्तमान समय में नहीं मापे जा सकते।
* कार्यक्रमों के परिणाम बिल्कुल सामान्य हैं, अतः इसे मापना किसी एक मापन तंत्र पर संभव नहीं हो सकता।
* सांख्यिकीय तकनीकों से परिणामों को नहीं मापा जा सकता क्योंकि आंकड़ें सही रूप से एकत्रित नहीं किए गए हैं।
* प्रयोगात्मक शोध सही प्रकार से नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके लिए प्रभावों को रोक कर देखना पड़ेगा।
* यह तथ्य कि जो इस लोक नीति से लाभान्वित हुए अथवा जो लाभान्वित नहीं हुए के अंतर समान हैं इसलिए इसको सफल बनाने के लिए ज्यादा संसाधन की आवश्यकता है।
* अगर कोई सकारात्मक आंकलन नहीं आया है तो यह शोध की कमी है, न कि कार्यक्रम की।
जेम्स क्यू. विलसन (James Q. Wilson) ने दो सामान्य सिद्धांत दिए हैं जो कि नीति पर पड़ने वाले सामाजिक विज्ञान शोध के प्रभावों को समझा सकते हैं-
1. विल्सन का प्रथम सिद्धांत सामाजिक समस्या निराकरण के लिए गए निर्णय कुछ ऐच्छिक प्रभाव डालते हैं अगर अनुसंधान उन लोगों के द्वारा किया गया है, जो उसके क्रियान्वयन से जुड़े हुए हो।
2. सामाजिक समस्या निराकरण के लिए निर्णय कोई ऐच्छिक प्रभाव नहीं डालते अगर अनुसंधान उन लोगों के द्वारा किया जो नीति क्रियान्वयन में भाग नहीं लेते हैं। (James Q. Wilson, 1973, On Pettigrew & Armor, The Public Interest 31.p 132-134)
क्यों सरकारी कार्यक्रम कभी भी समाप्त नहीं होते? (Why do Government works never end?)
यह आश्चर्य की बात है कि कोई सरकारी कार्यक्रम खत्म नहीं होता जबकि पूरा मूल्यांकन उसे असफल या सत्ता का दुरूपयोग भी स्थापित कर दे। एक बार अगर नीतिगत निर्णयन संस्थाकृत हो जाते हैं तो उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता। इस प्रश्न को समझना एक नीति विशेषज्ञ की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा - कुछ सामान्यकृत संभावनाएँ निम्न रूप से प्रस्तुत की जा सकती हैं-
1. केन्द्रीय लाभ - विस्तृत मूल्य (Concentrated Benifit- Dispersed Costs)
एक सबसे सामान्य कारण यह है कि असफल नीति के द्वारा लाभ कुछ लोगों में केन्द्रित होता तथा मूल्य आमजन पर लाद दिए जाते हैं क्योंकि जिसे 'लाभ' हो रहा है उसके पास नीति से लाभ है लेने की पूरी सूचनाएँ हैं तथा जो 'आमजन' अनभिज्ञ है अथवा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं या जो 'कर' (Tax) दे रहे हैं, पर लाभों को जानने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं हैं।
2. व्यवस्थापकीय एवं अधिकारी तन्त्र के हित (Legislative & Bureaucratic Interests)
किसी भी नीतिगत कार्यक्रम के लाभार्थी सामान्यतः वे ही हैं जो उस पर प्रशासनिक कार्यवाही के लिए उत्तरदायी होते हैं। अधिकारी तंत्र का विस्तार सभी कार्यक्रमों को चलते रहने में होता है, इसलिए किसी नीति के समापन से इन अधिकारियों की प्रतिष्ठा, वेतन तथा अन्य लाभ खत्म होने की संभावना रहती है। समितियों के माध्यम से एक-दूसरे के हितों को साधने में सफल होते हैं, इसलिए वे जानकर असफल नीतियों को समाप्त नहीं करते वरन् सुधार की दिशा भी कम कर देते हैं। बिना व्यवस्थापिकीय संबल के कोई लोक अधिकारी जन मंच पर नीति के असफल होने की घोषणा नहीं कर सकता।
3. कार्य में वृद्धिशीलता ( Incrementalism at Work)
सरकार किसी कार्यक्रम का एक वर्षीय संपूर्णता में आंकलन नहीं करती तथा बजट में नीतियों के आंकलन पर ही आवंटन होता है और अगर नकारात्मक आंकलन प्रस्तुत किया है तो नीतिगत आवंटन अगले वित्तीय वर्ष में होने की संभावना समाप्त हो जाएगी, इसलिए प्रति वर्ष बजट द्वारा आवंटन प्राप्त करने के लिए आवश्यक होगा कि असफल नीति अथवा कार्यक्रम को 'असफल' न दिखाया जाए।
लोक नीति की सीमाएँ (Limitations of Public Policy)
लोक नीति की कुछ सीमाएं भी होती हैं जो निम्न प्रकार हैं:
(i) कई सामाजिक समस्याओं का निस्तारण नीतियों के माध्यम से संभव नहीं है क्योंकि समस्याओं को 'विशुद्ध रूप से परिभाषित' नहीं किया गया है और 'सापेक्षित परिभाषाएँ' लोक नीति के माध्यम से समस्या निस्तारित नहीं कर सकती।
(ii) जन अपेक्षाएँ हमेशा बढ़ती हैं तथा नीति में हर समय परिवर्तन अपेक्षानुसार संभव नहीं है। इसलिए जन अपेक्षा के आधार पर नई समस्याएँ उत्पन्न होती रहती हैं।
(iii) हितों का टकराव, लोक नीति में संभवतः होगा क्योंकि एक समूह की समस्याओं का निस्तारण दूसरे समूह के विरोध में हो सकता है।
(iv) कई सामाजिक समस्याएँ जो कारक तत्व प्रधान होती हैं, सरकार के द्वारा निबटाना असंभव है।
(v) एक सामाजिक समस्या के कई कारण हो सकते हैं, तो कोई विशेष नीति एक कारण का समाधान कर सकती है, परन्तु सभी का नहीं।
(vi) मूल्य या नीति के निर्णयों को सीमित कर सकता है।
(vii) राजनीतिक व्यवस्था पूर्णरूप से विवेक सम्मत निर्णयन के लिए तैयार नहीं होतीं।

