नीति निर्माण में लोक प्रशासन की भूमिका Role of Public Administration in Policy Making
परिचय (Introduction)
नीति निर्माण सरकार का महत्वपूर्ण कार्य एवं लोक प्रशासन की सफलता का सोपान है। नीति सरकार की गतिविधियों, उद्देश्यों एवं कृत्यों को प्रदर्शित करती है। अतएवं नीति का महत्व सरकार और उसके सर्वाधिक सशक्त अंग यानि शासन की कार्यप्रणाली से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाता है। प्राचीन राजशाही शासन तंत्र से लेकर वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी नीति की महत्ता सदैव विद्यमान रही है। प्राचीनकाल में राजतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था में सेनापति (दरबारी धर्मगुरू, राजपुरोहित तथा मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्य राजा को नीति के सन्दर्भ में सलाह प्रदान करने में अहम् भूमिका निभाते थे। कौटिल्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' विभिन्न प्रशासनिक विषयों पर सरकार की व्यावहारिक नीतियों की अनुशंसा करता है।
पूर्व में राज्य केवल पुलिस राज्य की भूमिका अदा करता था किन्तु समय के साथ-साथ । लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार को अधिक महत्व दिये जाने एवं लोक-कल्याणकारी राज्य की > अवधारणा के उदय के पश्चात् राज्य के कार्यक्षेत्र में अभिवृद्धि होने के कारण नीति-निर्माण का क्षेत्र भी स्वतः विस्तृत हो गया। अतः सरकार द्वारा कार्य निष्पादन हेतु तत्सम्बंधी नीति का अस्तित्व जरूरी हो गया। वस्तुतः नीति सरकारी एवं प्रशासनिक कृत्यों का प्रमुख केन्द्र बिन्दु है, जिस पर प्रशासन पूर्णत: अवलंबित है।
नीति-निर्माण की अवधारणा (Concept of Policy Making)
नीति एक ऐसी धारणा है जो वर्तमान में लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच चुकी है। दैनिक जीवन एवं शैक्षणिक साहित्य में नीति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से किया जाता है। पर्यावरण नीति, स्वास्थ्य नीति, कृषि नीति, वन नीति, जनसंख्या नीति, शिक्षा नीति एवं वैदेशिक नीतियों की चर्चा करें तो ये सभी नीति निर्माण के वे सार्वजनिक क्षेत्र हैं जो जीवन के विविध पक्षों को गहन रूप से प्रभावित करते हैं।
एक शैक्षणिक अवधारणा के रूप में 'नीति' 1950 के दशक के आरम्भिक काल में उभरकर आई और तब से लेकर वर्तमान समय तक इसमें अनेक नवीन आयाम जुड़ते चले गये हैं। समाज विज्ञान की शाखा के रूप में मान्यता हेतु नीति निर्माण की धारणा आरम्भ से लेकर आज तक संघर्षरत है। सरकारी अध्ययन क्षेत्र में तथा विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रमों में यथा लोक प्रशासन, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, प्रबंध विज्ञान एवं विधि शास्त्र आदि में नीति एक महत्वपूर्ण घटक है। वर्तमान सन्दर्भ में शोधार्थियों, लोक प्रशासकों, विषय विशेषज्ञों, समाज वैज्ञानिकों के लिए नीति की उपयोगिता एवं अन्तर अनुशासनात्मक गुणवत्ता की दृष्टि से नीति निर्माण की अवधारणा अत्यन्त रोचक, विचारशील एवं समाधान का बिन्दु बन गई है। मूलतः नीति-निर्माण की धारणा एक ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है जो व्यक्तिगत न होकर सर्वजन से जुड़ा होता है।
नीति क्या है? (What is Policy?)
नीति निर्माण लोक प्रशासन की आत्मा है। नीति के द्वारा ही लोक प्रशासन का कार्य निर्धारित होता है। नीति उस कार्यसीमा का निर्धारण करती है जिसके अन्तर्गत निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु किये जाने वाले सभी कार्य सम्मिलित हो जाते हैं। वस्तुतः नीति किसी कार्य को करने की योजना है एवं निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने की पूर्व तैयारी है। नीति से तात्पर्य है यह निर्णय लेना कि क्या, कब, कैसे और कहाँ किया जायेगा ? आधुनिक लोक कल्याणात्मक राज्य व्यवस्था में जनाकांक्षाओं की पूर्ति करना सरकार का ही अहम् उत्तरदायित्व है। सरकार को अगणित कार्यों का निष्पादन करना पड़ता है और प्रत्येक कार्य के निष्पादन से पूर्व एक सुनिश्चित नीति का होना आवश्यक है। संक्षेप में नीति को पारिमार्थिक आधार पर समझना ज्यादा स्पष्ट और सरल है।
साधारण शब्दों में, नीति से आशय है, 'नियमों का एक समूह' जिसे निर्धारित वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाया जाता है।
रिचार्ड रोज़ (Richard Rose) के अनुसार - " नीति कोई निर्णय नहीं है, अपितु कार्यवाही हेतु मार्गदर्शन है।"
राबर्ट आइस्टोन (Robert Eyestone) ने नीति को इस प्रकार परिभाषित किया है "यह एक सरकारी इकाई है जिसका सम्बन्ध इसके वातावरण के साथ होता है। "
डिमॉक (Dimock) के शब्दों में "नीतियाँ कार्यव्यवहार के सजग स्वीकृत नियम हैं, जो प्रशासकीय निर्णयों का मार्गदर्शन करती हैं। "
लोक प्रशासन विषय के प्रसिद्ध विद्वान एल. डी. व्हाईट (L.D. White) लोक प्रशासन को सार्वजनिक नीतियों के व्यावहारिक धरातल पर मूर्त रूप प्रदान करने वाले विषय के रूप में परिभाषित करते हैं, क्योंकि नीति ही सरकारी कृत्यों का मूल आधारस्तंभ है।
भारतीय संदर्भ में नीति इस प्रकार से परिभाषित की जा सकती है ये सरकारी नियम तथा कार्यक्रम होते हैं जिन पर व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से विचार-विमर्श किया जाता है। उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि नीति एक प्रस्ताव अथवा लक्ष्योंमुखी गतिविधि है जिसके आधार पर निर्धारणकर्ता समस्या के समाधान तक पहुँचता है।
भारत में नीति निर्माण (Policy Making in India)
'नीति निरूपण एक सामूहिक क्रियाविधि है जिसमें विभिन्न प्रकार की संस्थाएँ, अभिकरण, समूह एवं कार्यकर्ता सहयोग करते हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण संस्थाएँ अधोलिखित हैं-
1. विधानमंडल (Legislature)- संसद तथा सभी राज्यों की विधानसभायें नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। केंद्र व राज्यों के मध्य संघ, राज्य व समवर्ती सूचियों के माध्यम से शक्ति विभाजन किया गया है। संघ व राज्य सरकारें अपने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत नीति निरूपण का कार्य करती हैं।
2. मंत्रिमंडल (Cabinet)- भारतीय संदर्भ में मंत्रिमंडल नीति निर्माण का मुख्य स्रोत है। यह केंद्र में प्रधानमंत्री तथा राज्यों में मुख्यमंत्रियों के निर्देशन एवं नियंत्रण में गठित एक सहयोगी समूह है जो सभी महत्वपूर्ण नीतियों के निर्माण में योगदान देता है।
3. योजना आयोग (Planning Commission)- योजना आयोग एक गैर संवैधानिक निकाय है। यह शीर्ष स्तर पर परामर्शात्मक निकाय के रूप में कार्य करता है। योजना आयोग भारत के विकास और प्रशासनिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। यह प्रशासनिक नीतियों के निरूपण पर गहरा प्रभाव डालता है। योजना आयोग की भूमिका प्रत्यक्षतः संविधान द्वारा सौंपे गए उन कार्यों से संबद्ध है जो उसके निर्देशक सिद्धांतों में उल्लिखित है, विशेषतः वे सिद्धांत जो आर्थिक व विकास से संबंधित हैं।
4. राष्ट्रीय विकास परिषद् (National Development Council) - यह परिषद नीति निरूपण का सर्वोच्च एवं महत्वपूर्ण अंग है। यह विकास एवं उत्पादन संबंधी पहलुओं पर योजना आयोग को परामर्श देती है। इस परिषद में कुछ केंद्रीय मंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और सभी राजनीतिक दलों, प्रमुख सामाजिक संगठनों के महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल होते हैं।
5. नौकरशाही (Bureaucracy) - लोक सेवाएं यद्यपि नीतियों के क्रियांवयन स्तर पर मुख्य रूप से संबद्ध होती हैं लेकिन नीति निरूपण में भी अहम् भूमिका निभाती हैं। ये नीति निरूपण हेतु मंत्रियों को महत्वपूर्ण सलाह तथा आवश्यक आँकड़े उपलब्ध कराती हैं। लोक सेवाएं नीतियों को वैधानिक स्वरूप प्रदान करती हैं और नीतियों के क्रियान्वयन हेतु प्रशासनिक नियम-उपनियमों का निर्धारण करती हैं।
6. मंत्रिमण्डल सचिवालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय (Cabinet Secretariat and Prime Minister Office)- ये दोनों ही नीति निरूपण के सहायक अभिकरण हैं। ये दोनों नीति निरूपण में समन्वयकारी एवं परामर्शात्मक भूमिका निभाते हैं।
7. विविध समितियाँ एवं बोर्ड (Various Committees and Boards) - ऊपर वर्णित निकायों के अतिरिक्त कुछ समितियाँ एवं समूह भी नीति-निर्धारण की प्रक्रिया पर प्रभाव डालते हैं, जैसे-स्थायी समितियाँ, आंकलन समिति, लोक लेखा समिति, लोक उपक्रम समिति, प्रतिरक्षा समिति एवं विदेशी मामलात समिति आदि। इन समितियों के अलावा कुछ परामर्शात्मक समूह यथा - स्थायी श्रम समिति, भारतीय श्रम सभा, आयात-निर्यात परामर्श समिति, केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, यू.जी.सी. आदि सभी केन्द्र एवं राज्य विधानमण्डलों को नीति निर्धारण में सहयोग करते हैं। विभिन्न दबाव समूह, राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र तथा समाचार पत्र आदि भी नीति निरूपण में अच्छी भूमिका का निर्वाह करते हैं।
नीति-निर्माण में प्रशासन की भूमिका (Role of Administration in Policy Making)
शैक्षणिक अध्ययन क्षेत्र के रूप में लोक प्रशासन को नागरिक संगठनों के माध्यम से पूर्व निर्धारित नीतियों के अनुरूप सुनिश्चित लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है। यद्यपि नीति निरूपण एवं नीति क्रियान्वयन सरकार के दो अलग-अलग प्रकार्य हैं, किन्तु इन दोनों के मध्य परस्पर बहुत गहरा सम्बन्ध है । नीति निरूपण व्यवस्थापिका या राजनीतिक सत्ता के उन प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है जिन्हें नीति को विधायी प्राधिकार प्रदान करने की शक्ति प्राप्त होती है। व्यवस्थापिका सामान्यतः किसी नीति की रूपरेखा प्रस्तुत करती है जिसकी अभिव्यक्ति अधिनियमों व कानूनों के रूप में होती है। इन अधिनियमों व कानूनों को सटीक रूप प्रदान करने के क्रम में सरकार का प्रशासनिक संभाग नीति निरूपण में भी अहम भूमिका निभाता है। स्पष्ट है कि नीति निर्माण में प्रशासन तंत्र सक्रिय रूप से शामिल रहता है। वरिष्ठ प्रशासक सक्रिय अभियान, आँकड़ों की सुसंगत व्याख्या तथा विभिन्न कार्यक्रमों तथा रणनीतियों के माध्यम से नीति निरूपण के प्रत्येक स्तर पर असाधारण प्रभाव डालते हैं।
प्रशासनतंत्र का अर्थ (Meaning of Administration)
नीति निर्माण में प्रशासन तंत्र की भूमिका पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि प्रशासन तंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है? साधारण भाषा में प्रशासकों द्वारा संचालित सरकारी तंत्र को नौकरशाही या अधिकारी तंत्र या प्रशासन तंत्र के नाम से जाना जाता है। अधिकारी तंत्र या प्रशासन तंत्र एक प्रशासनिक संगठन है जो अनिर्वाचित एवं रोजगार प्राप्त अधिकारियों का एक वैधनिक आधार प्राप्त निकाय है।
प्रशासन तंत्र के अर्थ को विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। यहाँ हम कुछ विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं का उल्लेख कर रहे हैं-
मैक्स वेबर (Max Weber) के शब्दों में, "यह सार्वभौमिक सामाजिक तथ्य है तथा सामुदायिक क्रिया को युक्ति संगत रूप से सामाजिक क्रिया में बदलने का एक साधन है।"
हरमन फाइनर (Harman Finer) के अनुसार यह "स्थायी, वेतनभोगी तथा कुशल अधिकारियों का एक व्यावसायिक संकाय है। "
आर्थर के डेविस (Aurther K Devis) के अनुसार अधिकारी तंत्र या प्रशासन तंत्र - " विशिष्ट पदों का एकीकृत पदसोपान है जिसे व्यवस्थित नियमों, अवैयक्तिक ढाँचे के माध्यम से परिभाषित किया जा सकता है जहाँ वैधानिक सत्ता पद में निवास करती है न कि पदधारी में। " उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रशासन तन्त्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सभी कर्मचारियों को कार्यालयों के पदसोपान में संगठित किया जाता है तथा प्रत्येक पद तथा उत्तरदायित्व का क्षेत्र स्पष्ट रूप से उल्लेखित रहता है।
प्रशासनतंत्र की नीति निर्माण में भूमिका (Role of Administration in Policy Making).
वर्तमान लोक कल्याणकारी राज्य के प्रादुर्भाव ने प्रशासन तंत्र के विस्तार में नये आयामों को जोड़ा है। नीति निर्माण में प्रशासन तंत्र की भूमिका बदलते हुए परिप्रेक्ष्य में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। नीति निर्माण में प्रशासन तंत्र अपनी भूमिका निम्न प्रकार से निभाता है। यह कार्यपालिका के वृहद नीति क्षेत्र को जानने, बड़ी नीतियों के प्रस्ताव तैयार करने, सामाजिक समस्याओं के विकल्प तलाशने, विश्लेषण करने, वर्तमान नीतियों में अनुभव के आधार पर क्रियान्वयन के स्तर पर संशोधन हेतु परामर्श प्रदान करता है। नीति निरूपण के क्षेत्र में प्रशासन तंत्र की चुनौतीपूर्ण एवं बहुआयामी भूमिका को निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है-
1. परामर्शदाता (Advisory)
भारतीय संविधान के अन्तर्गत प्रशासन तंत्र नीति संबंधी विकल्पों पर परामर्श प्रदान करने के संवैध ानिक दायित्व का निर्वहन करता है। प्रशासन तंत्र निरंतर रूप से नीतिगत प्रस्तावों को प्रमाणित करने तथा महत्वपूर्ण आँकड़े एकत्रित करने में व्यस्त रहता है। इसलिए प्रशासकगण देश की विविध समस्याओं तथा मुद्दों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा रहता है। विशेषतः सचिवालय स्तर पर प्रशासन तंत्र को सरकार के मस्तिष्क (Think tank) की संज्ञा दी जाती है। इस क्रम में, यह तंत्र सदैव विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं पर विचार करता रहता है। यह नीतिगत मुद्दों को पहचानने में मदद करता है। यह विद्यमान नीतियों के संचालन के संदर्भ में मन्त्रियों के काम में आने वाली विशद अध्ययन सामग्री तैयार करने में व्यापक रूप से शामिल रहता है। यह विभिन्न नीतिगत विकल्पों के प्रशासनिक तथा वित्तीय निहितार्थों पर भी सलाह प्रदान करता है। यह अपने विचारों को परामर्शक के रूप में प्रस्तुत करता है और यह परामर्श प्रशासकीय दक्षता एवं योग्यता पर आधारित होता है। यह बहुत से अवसरों पर नीतिगत मुद्दों को मुखरित करने की पहल करता है। यह परामर्शक के रूप में वर्तमान समस्या के निराकरण हेतु वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करता है। अतः स्पष्ट है कि प्रशासन तंत्र नीति-निर्माण की प्रक्रिया के क्षेत्र में परामर्श प्रदाता से भी व्यापक भूमिका का निर्वाह करता है।
2. सूचना प्रदानकर्ता ( Informer)
नीति निरूपण की तैयारी का मुख्य कार्य प्रशासन तंत्र द्वारा किया जाता है। नीति निर्माण में प्रशासन तंत्र की भूमिका के मूल में एक अन्य तथ्य यह है कि अपने विशाल अनुभव एवं ज्ञान के आध र पर वे नीति सम्बन्धी प्रस्तावों की प्रशासनिक एवं वित्तीय कठिनाईयों, उनसे प्रभावित समूहों की संभावित प्रतिक्रियाओं तथा नीतिगत समस्याओं के समाधान के नए-नए तरीकों पर अधिकारपूर्वक अपने विचार प्रस्तुत करने में समर्थ होते हैं। मात्र यह तथ्य कि वे नीति सम्बन्धी निर्णयों हेतु उपयुक्त आँकड़े एकत्र करते हैं, नीति निरूपण से संबंधित समस्याओं का विश्लेषण करते हैं और नीतिगत विकल्पों का चयन करते हैं, नीति-निर्माण के सन्दर्भ में प्रशासनिक तंत्र के गहन प्रभाव को दर्शाता है।
अधिकांश मंत्रियों को निश्चित विषयों या क्षेत्रों की पर्याप्त जानकारी का अभाव होता है। यद्यपि भावी नीति निर्धारण के विषय में उनके पास व्यापक विचार होते हैं किन्तु इन विचारों को यथार्थपरक योजनाओं में रूपान्तरण हेतु उन्हें आधिकारिक परामर्श प्रदाताओं पर निर्भर रहना पड़ता है।
विकासशील देशों के सन्दर्भ में फ्रेड. डब्ल्यू. रिग्स (Fred. W. Rigs) स्पष्ट करते हैं-, " यद्यपि औपचारिक रूप से राजनैतिक संस्थाओं का निर्माण संविधानों तथा विधानों द्वारा हो सकता है, व्यावहारिक स्वरूप ग्रहण करने के बाद वे बहुधा तुलनात्मक रूप से अशक्त हो जाती हैं। इसके विपरीत अभिनव औद्योगिक तथा वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी आधुनिक संभ्रांत वर्ग एवं राज्य के अधिकारियों को सामाजिक नियंत्रण के साधन विशाल परिमाण में प्रदान करती हैं। परिणामस्वरूप प्रशासन तंत्र लोकप्रिय मार्गदर्शन के नाम पर वह भूमिका हथिया लेता है जो आधुनिक समाज में निर्वा कार्यपालिका एवं विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा निभाई जानी चाहिए। "
वस्तुतः सूचना प्रदाता के रूप में नीति-निर्माण में प्रशासनिक तंत्र की भूमिका नीति संबंधी प्रस्तावों की व्यवस्थित रचना के लिए वस्तुगत आधार तैयार करने तथा प्रस्तावों को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक आँकड़े उपलब्ध कराने से सम्बंधित है।
3. विश्लेषक (Analyst)
नीति निर्माण एक अत्यन्त जटिल प्रक्रिया है। अतः नीति निर्धारण में प्रशासन तंत्र चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाता है। अति महत्वपूर्ण मुद्दे जिन पर तुरन्त ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत होती है, को पहचानने के बाद यह सुनिश्चित करना होता है कि ऐसे मुद्दे जीवन्त नीतियों का निर्माण कर सकते हैं अथवा नहीं। प्रशासन तन्त्र नीति-निर्धारण के लिए चुने गये मुद्दों के गुण-दोषों का विश्लेषणात्मक आंकलन करने में स्वयं को व्यस्त रखता है। यह नीति प्रस्तावों को इसकी जीवन योग्यता (Viability), भविष्य में आशा (Future Prospects), साधनों की उपलब्धता, स्वीकार्यता आदि को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण तथा पुनर्निमाण करता है। यह प्रशासन तंत्र का प्रमुख उत्तरदायित्व है कि नीति प्रस्तावों को संविधान के उपबन्धों, संसद द्वारा निर्मित विधियों तथा वर्तमान नियमों एवं उपनियमों के संदर्भ में विश्लेषित करें। इस प्रकार प्रभावशाली नीति निरूपण में प्रशासन तंत्र का अहम स्थान है।
निष्कर्षतः
नीति निर्धारण में प्रशासन तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है यद्यपि नीति-निर्धारण का कार्य मुख्यतः राजनीतिक कार्यपालिका का है और उसके क्रियान्वयन के उत्तरदायित्व स्थायी कार्यपालिका का निर्वहन करती है, परन्तु 20वीं सदी में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के प्रादुर्भाव के साथ-साथ राज्य के कार्यों में बहुआयामी वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप राज्य का दायित्व न केवल कानून व्यवस्था बनाये रखना वरन् अर्थव्यवस्था के नियमन से लेकर सामाजिक, आर्थिक नियोजन एवं जन कल्याण हेतु अपेक्षित कार्यों तक बढ़ गया। तदनुरूप प्रदत्त विधायन के तहत स्थायी कार्यपालिका ( प्रशासन तंत्र) की शक्तियों में अभिवृद्धि हुई। शनैः-शनैः नवीन परिस्थितियों ने प्रशासन तंत्र को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान किया और उसकी भूमिका नीति क्रियान्वयन से परिवधि त होकर नियम-उपनियम निर्माण तक पहुँच गई। वस्तुतः नीति निर्माण की प्रक्रिया में प्रशासनतंत्र का परामर्शदाता, सूचना प्रदाता एवं विश्लेषणकर्ता के रूप में अविकल्पनीय योगदान है।